
सुनील चतुर्वेदी-
हम अक्सर अपने मन में सुनी-सुनायी बातों के आधार पर एक धारणा बना लेते हैं और हर एक चीज़, व्यक्ति, समाज को उसी एंगल से देखने, समझने लगते हैं। इसी धारणा को कसौटी मानते हुए हम किसी को स्वीकार करते हैं तो किसी को रीजेक्ट।
कई सौ सालों के अनुभव से जो तकनीकें हमारे समाज से आयीं उन्हें हमने ‘जुगाड़ टेक्नोलॉजी’ मानकर नकार दिया। हमने यह मान लिया कि हमारे यहाँ जो भी परंपरा से चला आ रहा है वो सब अवैज्ञानिक है। इस धारणा ने हमारा बहुत नुक़सान किया है। जबकि वास्तविकता इसके उलट थी। यह तकनीकें अवैज्ञानिक नहीं थीं। यह किताब में पढ़े विज्ञान पर आधारित न होकर लंबे अनुभव से उपजे विज्ञान आधारित थी और इन तकनीकों के विकास में स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया गया था। बस इसी आधार पर हमने इन्हें ख़ारिज कर दिया।
पूर्वोत्तर के राज्यों ने भी पानी के बहाव, उसके सतह पर ठहरने या ज़मीन के नीचे रिसने को अनुभव किया और अपनी आवश्यकताओं के आधार पर तकनीकें विकसित की। यह स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप थीं। इसके विपरीत आज थम्ब रूल के आधार पर पानी बचाने का काम ज्यादा किया जा रहा है। जो सही था उसे गलत मान बैठे और जो ग़लत है उसे ही सही समझ लेना इसे विडंबना ही कहा जायेगा।

नागालैंड में चट्टानें नयी है और मिट्टी में नमी नहीं रह पाती। पहाड़ से फूटने वाले झरनों और सोतों से नालियाँ बनाकर सीढ़ीदार खेतों तक पहुँचाया जाता है। जहां नालियों का मोड़ना है वहाँ पत्थर की ओट लगाकर पानी के बहाव को मनचाही दिशा में ले ज़ाया जाता था। नालियों से आ रहे इस पानी के बहाव से खेत की मिट्टी न कटे इसके लिये भी पत्थरों की मेड़ बनाकर पानी के बहाव को नियंत्रित किया जाता था। पहाड़ को काटकर बनाये गये सीढ़ीदार खेतों में एक हिस्से से दूसरे हिस्से में पानी पहुँचाने और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिये बांस का पाइप की तरह इस्तेमाल किया जाता था। स्थानीय भाषा में इसे ‘अंगामी पद्धति’ कहा जाता था।
नागालैंड में ही एक ‘रजा पद्धति’ होती थी जिसमें ऊँचाई वाले गावों में पहाड़ के ऊपरी हिस्से में पेड़ लगाये जाते थे बीच वाले हिस्से में में पहाड़ को समतल कर बारिश का पानी संचित करने के लिये तालाब बनाया जाता था। इसी हिस्से में पशुओं को बांधने का स्थान भी होता था। पहाड़ के नीचे वाले हिस्से में सीढ़ीदार खेत बनाकर धान की खेती की जाती थी। पहाड़ से जैविक कचरा और पशुओं के गोबर और मूत्र बहकर खेतों में पहुँचता था जो खाद का काम करता था।
इसी तरह मेघालय में भी झरने के पानी को नालियों की बजाय बांस की सहायता से खेतों में पहुँचाया जाता था। बांस से बनाये गये इस कृत्रिम जल मार्ग में पानी का रिसाव नहीं हो पाता था। जबकि नालियों से बहकर खेत तक पहुँचने के बीच कुछ पानी ज़मीन में रिस जाता था। यह तकनीक में स्थानीय कौशल और संसाधनों के उपयोग का भी उदाहरण है जिससे स्थानीय वहाँ के लोगों में तकनीक के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ती है। पान और काली मिर्च की खेती की जाती थी।
अरुणाचल प्रदेश में भी झरनों के पानी को पत्थर और लकड़ी से बांध बनाये जाते थे।
और भी ढेरों तकनीकें थीं। आप-हम ढूँढने जाएँगे तो देश के चप्पे-चप्पे में देशज तकनीकें मिलेंगी। इन सब तकनीकों को जुगाड़ टेलनोलॉजी कहकर ख़ारिज करने के पहले क्या इनकी वैज्ञानिकता का अध्ययन किया जाना उचित नहीं होता!
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट- 12) : पानी तेरी भी अजब कहानी, कहीं सूखा कहीं पानी ही पानी!


