
सुनील चतुर्वेदी-
पानी तेरी भी अजब कहानी, कहीं सूखा, कहीं पानी ही पानी! (पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा और झारखंड की जल परंपरा )
एक देश के भीतर कई देश! हमारे देश में थोड़ी-थोड़ी दूर पर बोली-बानी ही नहीं बदलती मिट्टी पानी भी बदल जाता है। अलग- अलग भौगोलिक स्थिति, भूगर्भीय संरचना और जलवायु वाला देश है हमारा। कहीं 5 से.मी. भी बारिश नहीं तो कहीं खूब बरसता है पानी।
तो, आज बात पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा की जहां बारिश में नदियाँ उफनती, पाट तोड़ती कोसों तक किनारे के घर, खेत सब बहा ले जाती हैं। और किनारे से किलोमीटर भर की दूरी पर खेत प्यासे रह जाते हैं। आदमी को बाढ़ से भी बचना है और खेतों में धान पैदा करने के लिये पानी भी पहुँचाना है।
कई सौ साल पहले ही यहाँ के पुरखों ने खोज ली थी ऐसी तरकीबें कि बाढ़ से नुकसान भी कम हो और खेत में भी खूब धान उपजे।

पहले बात पश्चिम बंगाल की। तो पश्चिम बंगाल के कुछ इलाक़ों को छोड़ दो तो बचा हुआ बंगाल गंगा का मैदान है। ज़्यादातर समतल और कहीं दलदली भी। राढ़ मैदानी क्षेत्र के पूरब में पहाड़। यहाँ से नदियाँ निकलती और नदियों के जाल से घिरा डेल्टा क्षेत्र। बारिश भी खूब 60-65 से.मी. से ज्यादा। दलदली क्षेत्र में मच्छर और नदियों किनारे बाढ़ का ख़तरा। एक समय पश्चिम बंगाल मलेरिया का देश कहलाता था। बाढ़ से बचने और खेतों को सींचने के लिये सदियों पहले यहाँ के लोगों ने आप्लावन पद्धति विकसित की।
इस आप्लावन पद्धति में बाढ़ का पानी मोड़ने और खेतों तक पहुँचाने के लिये यहाँ के समाज ने नदी तट से अलग-अलग दिशाओं में नहरें खोदी। बाढ़ का पानी नदी में न बहकर अब इन नहरों में बहता हुआ कई गाँव के खेतों तक पहुँचता और बाढ़ के पानी के साथ महीन मिट्टी, मछली के अंडे, छोटी मछलियाँ भी होती। इससे फ़ायदा यह हुआ कि एक तो नदी में गाद कम जमती और धान के खेतों में हर साल उपजाऊ मिट्टी पहुँचने से पैदावार अच्छी होती और बाढ़ से नुकसान भी कम होता। इसके अलावा एक और फ़ायदा यह हुआ कि खेतों में पहुँची मछलियाँ मच्छरों के अंडे चट कर जाती जिससे मलेरिया में भी कमी आने लगी। तरकीब एक थी और फ़ायदे अनेक!
उड़ीसा में भी पारंपरिक जल संचय संरचनाओं में इसी आप्लावन पद्धति को अपनाया गया था। मज़ेदार बात यह थी कि अपने आप को विज्ञान का पुरोधा कहने वाले अंग्रेज जब यहाँ पहुँचे तो यहाँ के पूर्वजों की सूझबूझ और बरसात के पानी को सहेजने की इस देसी तरकीब को देख हैरत में पड़ गये।
उधर, बिहार को भी नदियों का जाल घेरे है। ज़्यादातर नदियाँ उथली हैं। बारिश में खूब उफनती, हाहाकार मचाती हैं और बारिश के बाद लकीर भर रह जाती हैं। यहाँ के पुरखों ने अपनी भौगोलिक स्थिति के हिसाब से पश्चिम बंगाल से थोड़ी अलग जुगत लगायी। पश्चिम बंगाल की भौगोलिक स्थिति समतल है तो बिहार की ढलान वाली। यहाँ पानी को संचित करने की जो पद्धति विकसित हुई उसे नाम दिया ‘आहर-पइन’।
इस पद्धति में नदी तट से 20-30 की.मी. लंबी नहर निकाल कर उसके अंतिम छोर पर तीन तरफ 1 या 2मी ऊँचा मिट्टी का तालाब नुमा बंधान बना दिया जाता है। इस बंधान को ‘आहर ‘और नहर को ‘पइन’ कहा जाता है। पइन को जगह-जगह से काट कर खेतों में सिंचाई की जाती थी। यह पद्धति सदियों पुरानी है। शायद जातक युग की। झारखंड में भी यही परंपरा रही है।
आज यह आहर-पइन और आप्लावन पद्धति पूरी तरह चरमरा चुकी है। अब बहुत ढूँढे से इसके अवशेष कहीं-कहीं मिल जाते हैं।
अपनी परंपराओं को भूलने का दर्द आज हम सभी जल संकट के रूप में झेल रहे हैं। आज आसन्न जल संकट से निजात पाने के लिये इन जल परंपराओं को अपनी विरासत मानते हुए सरकार और समाज दोनों को मिलकर सहेजना चाहिये! आप क्या सोचते हैं!
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट-11) : क्लाइमेट चेंज हो या पानी का संकट हमारी नजरें विदेश की तरफ ताकने लगती हैं!


