प्रभाकर मणि तिवारी-
रिटायर पत्रकार!
बीते सप्ताह Priyadarshan की एक पोस्ट पढ़ी थी. उन्होंने उसमें लिखा था कि अगले महीने रिटायर हो रहे हैं और अब लेख और अनुवाद के पैसे लेंगे ताकि जीवन चल सके. उनकी उस पोस्ट पर जनसत्ता में मेरे संपादक रहे Shambhunath Shukla के अलावा कई अन्य लोगों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए थे.
अब मेरी बारी है. लिखना तो उसी समय चाहता था. लेकिन लगातार यात्राओं में व्यस्त रहने के कारण ऐसा नहीं कर सका.
करीब 28 साल तक सिलीगुड़ी, पूर्वोत्तर भारत और कोलकाता में जनसत्ता की नौकरी के बाद मुझे रिटायर होने से दो साल पहले ही नौकरी छोड़नी पड़ी थी. दरअसल, प्रबंधन कोलकाता संस्करण का कामकाज समेट रहा था और मैं एकमात्र स्थायी कर्मचारी बचा था. वेज बोर्ड के तहत स्थायी नौकरी होने के कारण प्रबंधन सीधे तो हटा नहीं सकता था. इसलिए उसने एकमात्र दूसरा वैकल्पिक रास्ता चुना था. वह था लखनऊ तबादले का.
मुझे उस लखनऊ दफ्तर का काम संभालने को कहा गया जहां बरसों से जनसत्ता का कोई रिपोर्टर नहीं था. पता चला कि वहां इंडियन एक्सप्रेस के दफ्तर में जनसत्ता के नाम की कोई कुर्सी और मेज तक नहीं थी. अब कोलकाता से वहां तक रास्ता भी टेढ़ा और लंबा था. वहां जाकर भला क्या करता?
इसके अलावा वहां जाने पर वेतन भी कम हो जाता. कोलकाता ए श्रेणी का महानगर था जबकि लखनऊ का नंबर उसके नीचे था. तो, ट्रांसपोर्ट और हाउस रेंट अलाउंस कम हो जाता. इसके अलावा अकेले वहां रहना पड़ता तो दो जगह का खर्च होता.
काफी सोच-विचार और घर-परिवार से सलाह करने के बाद कोई महीने भर बाद मैंने इस्तीफा दे दिया था. अक्तूबर, 2019 में. मेरी रिटायरमेंट की तारीख थी एक दिसंबर, 2021. इस तरह समय से पहले नौकरी छोड़ने के कारण मुझे लाखों का नुकसान हुआ. लेकिन जान तो बच गई. कोरोना काल में लखनऊ में सड़कों पर लोगों को मरते देख कर पहली बार अपना फैसला सही लगा था.
उसके बाद कुछ जगह लिखता-पढ़ता रहा. लेकिन कोरोना काल में खर्चों में कटौती के तहत कुछ जगह लिखना बंद हो गया. हिंदी वालों के साथ दिक्कत यह है कि ज्यादातर लोग मुफ्त में लेख चाहते हैं. कई दशक तक पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत इलाके में काम करने के कारण मुझसे एक्सक्लूसिव रिपोर्ट की उम्मीद तो संपादकों को रहती थी. लेकिन एकाध के अलावा कोई भुगतान करने को तैयार नहीं था. जो लोग पैसे देते हैं वहां भी बरसों से एक पाई नहीं बढ़ाई गई है. जबकि इस बीच कर्मचारियों के पैसे लगातार बढ़ते रहे हैं.
खासकर चुनाव के मौके पर तो तमाम यूट्यूब चैनलों और टीवी चैनलों की ओर से मुफ्त में बैठने के अनुरोध मिलते रहे. लेकिन पैसे के नाम पर सबको सांप सूंघ जाता था. अभी विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ टीवी चैनलों पर बैठा था. लेकिन अब तक उनकी ओर से भुगतान नहीं मिला है.
टीवी चैनलों के लाखों-करोड़ों के पैकेज वाले कुछ एंकर और हिंदी अखबारों के भारी-भरकम संपादक तो फिर भी वेतन से खासी रकम बचा लेते हैं. लेकिन दिक्कत हम जैसे उन पत्रकारों की है जिनके पास रिटायर होने के बाद पीएफ और ग्रेच्युटी के अलावा कोई खास रकम नहीं होती. जो पैसे मिले उसमें से ज्यादातर तो बेटी की शादी में खर्च हो गए.
अब लिखना-पढ़ना मजबूरी है. लेकिन इस मामले में हिंदी की हालत क्षेत्रीय भाषाओं से भी खराब है. बांग्ला अखबार और पत्रिकाएं भी अपने लेखकों को बढ़िया भुगतान करती हैं. लेकिन हिंदी के एक अखबार ने तो प्रति रिपोर्ट मिलने वाली रकम में भी 25 फीसदी कटौती कर दी. उसके बाद मैंने लिखना छोड़ दिया था. यह तब जबकि उसके संपादक कभी साथ काम कर चुके थे.
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में मेरे अनुभव की प्रशंसा तो ज्यादातर लोग करते हैं और उन सबको मुझे अच्छे लेख और रिपोर्ट की भी उम्मीद होती है. लेकिन पैसे के मामले में ऐसे संपादक प्रबंधन का हवाला देकर चुप्पी साध लेते हैं. आखिर कोई करे तो क्या करे?
यह शायद आजीवन निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता करने की कीमत है जो चुकानी ही पड़ेगी.
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