डॉ. जयंत जिज्ञासु-
एक चैनल से गेस्ट को-ऑर्डिनेटर का फ़ोन आता है। पूछा जाता है कि आप अंग्रेज़ी बोल पाएंगे न! मैं कुछ सेकंड तक प्रोसेस करता रहा, और कहा, “जी, इतना बोल लूंगा कि आपके लोग समझ जाएंगे, और हमारे लोग भी!”
सोच रहा हूं कि आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से हम भारतीय बाहर निकल नहीं पाए हैं। मैं कोई नेसफ़ील्ड, शेक्सपियर, डिकेन्स, जेन ऑस्टिन, एमिली या वर्जीनिया वुल्फ़ के ख़ानदान से नहीं हूं, पर इन सबको पढ़ा-गुना तो है!
केरल विधानसभा चुनाव के प्रचार में गया तो वहां न मलयालम में बोल रहा था न हिन्दी न मैथिली में! अंग्रेज़ी में ही संवाद कर रहा था, रूस गया तो वहां भी अंग्रेज़ी में ही। टीएनबी कॉलेज, भागलपुर में अंग्रेज़ी साहित्य में बीए (ऑनर्स) किया, सब्सिडियरी पेपर्स (हिस्ट्री और पॉलिटिकल साइंस) के आन्सर भी अंग्रेज़ी माध्यम में लिखे।
सेंट स्टीवन’स कॉलेज में एमए (इंग्लिश) के कोर्स में महज 10 सीटें थीं, जिनमें 5 क्रिश्चियन व स्टीवेनियन के लिए रिज़र्व्ड थीं। वहां बची 5 सीटों में मेरा भी चयन हुआ। यह और बात है कि पहले ही आईआईएमसी में दाखिला ले लिये जाने के चलते वहां उस कोर्स में एडमिशन नहीं ले सका।
जेएनयू के स्कूल ऑव सोशल साइंसेज़ के सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ में अपनी एम.फिल. का डिजर्टेशन अंग्रेज़ी माध्यम में लिखा। रेटरिक के रिसेप्शन पर अपनी पीएच.डी. की थीसिस अंग्रेज़ी माध्यम में लिखी।
सरकारी विद्यालय में 6ठी कक्षा में “दिस इज़ अ कैट, दैट इज़ अ डॉल” सीखने के बावजूद अंग्रेज़ी को मैंने कभी ज्ञान का सूचकांक नहीं माना। यह मेरा राजनैतिक स्टैंड है कि जहां ज़रूरत न हो, वहां मैं स्वभाषा में अपनी बात रखूं चाहे वह ओरल कम्पोजिशन हो या रिट्न कम्पोजिशन! मधु लिमये साब कहते थे, “जनता से जिस भाषा में मैंने वोट मांगा है, उसके मसाइल को मैं उसी की भाषा में संसद में उठाऊंगा”।
क्या मधु लिमए की अंग्रेज़ी ख़राब थी? कोई उनकी “द गैलेक्सी ऑव इंडियन सोशलिस्ट लीडर्स” पढ़ लें या “हिस्टोरिक पार्टनरशिप बिटवीन गांधी एंड नेहरू” पढ़ ले, उनकी प्रांजलता से अभिभूत हो जाएंगे!
बहरहाल, भाषाओं का कोई पारस्परिक अंतर्विरोध नहीं होता! गर मैं ब्राह्मण होता, तो यह सवाल मुझसे नहीं पूछा जाता, “आप अंग्रेज़ी बोल लेंगे न!”
कोई भी भाषा बरतने वाले के सतत अभ्यास से निखरती है। इसीलिए, संविधान की प्रस्तावना में “अवसर की समानता” व “व्यक्ति की गरिमा” सुनिश्चित करने की बात कही गई।
हासिल-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ बस इतना
आदमी आदमी को पहचाने। (फ़िराक़)
आज मंगलेश डबराल की कविता “बार-बार मैं कहता था” याद आई:
ज़ोरों से नहीं बल्कि
बार-बार कहता था मैं अपनी बात
उसकी पूरी दुर्बलता के साथ
किसी उम्मीद में बतलाता था निराशाएं
विश्वास व्यक्त करता था बग़ैर आत्मविश्वास
लिखता और काटता जाता था यह वाक्य
कि चीज़ें अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही हैं
बिखरे काग़ज़ संभालता था
धूल पोंछता था
उलटता-पलटता था कुछ क्रियाओं को
मसलन ऐसा हुआ होता रहा
होना चाहिए था हो सकता था
होता तो क्या होता।
उन्हीं की एक और कविता:
मैं चाहता हूं कि स्पर्श बचा रहे
वह नहीं जो कंधे छीलता हुआ
आततायी की तरह गुज़रता है
बल्कि वह जो एक अनजानी यात्रा के बाद
धरती के किसी छोर पर पहुंचने जैसा होता है
मैं चाहता हूं स्वाद बचा रहे
मिठास और कड़वाहट से दूर
जो चीज़ों को खाता नहीं है
बल्कि उन्हें बचाए रखने की कोशिश का
एक नाम है
एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य है
मसलन यह कि हम इंसान हैं
मैं चाहता हूं इस वाक्य की सचाई बची रहे
सड़क पर जो नारा सुनाई दे रहा है
वह बचा रहे अपने अर्थ के साथ
मैं चाहता हूं निराशा बची रहे
जो फिर से एक उम्मीद
पैदा करती है अपने लिए
शब्द बचे रहें
जो चिड़ियों की तरह कभी पकड़ में नहीं आते
प्रेम में बचकानापन बचा रहे
कवियों में बची रहे थोड़ी लज्जा।




Jagdish Nagpal
June 10, 2025 at 12:22 pm
बिना मतलब इतनी लंबी सफाई दे डाली। उन्होंने इंग्लिश बोल सकने के बारे में इसलिए पूछा था क्योंकि वो प्रोग्राम इंग्लिश में था। इसमें बुरा क्या मानना? इस तरह की सफाई देना हीन भावना को दर्शाता है।
Sheela
June 10, 2025 at 12:38 pm
तुम्हारे जैसे लोग कभी सुधर नहीं सकते है। घुमा फिरा कर जातिवादी राजनीति कर ही दी और घुमा फिरा कर अपनी डिग्री का घमंड प्रदर्शित कर दिया। तुमने कहा है सिर्फ तुम ही जानते हो कि तुमने सच कहा कि झूठ। किसी ने तुम्हें फोन किया है कि नहीं है यह भगवान जानता है या तुम जानते हो।
Sheela
June 10, 2025 at 12:41 pm
कभी कोशिश करना अपनी इस मानसिकता से उबरने की ;कि दूसरों पर दोष देते हुए स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना है।