सलमान अहमद-
जेफ्री एप्सटीन बाहर से देखने में अमेरिका का एक अमीर और शरीफ़ फाइनेंसर लगता था। बड़े सूट, बड़े घर, प्राइवेट जेट, और दुनिया के ताक़तवर लोगों के बीच उठना बैठना। न्यूयॉर्क से लेकर फ्लोरिडा तक, और कैरिबियन के टापुओं तक उसकी पहचान एक ऐसे आदमी की थी जो बहुत कम बोलता था, लेकिन हर बड़े आदमी तक उसकी पहुंच थी। लोग उसे “इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र” कहते थे, मगर हैरानी की बात ये थी कि कोई साफ़ तौर पर नहीं बता पाता था कि वो असल में किसका पैसा इन्वेस्ट करता है और कितना कमाता है। उसका पैसा, उसकी ताक़त और उसका असर तीनों ही हमेशा धुंध में रहे।
असल कहानी तब सामने आई जब धीरे-धीरे ये पता चला कि ये आदमी नाबालिग लड़कियों का एक गंदा और खतरनाक जाल चला रहा था। गरीब घरों की, कमजोर हालात वाली लड़कियां, अगवा की गई लड़कियां जिन्हें मसाज, मॉडलिंग या हल्के-फुल्के काम का लालच देकर या ज़बरदस्ती बुलाया जाता था। शुरुआत में सब कुछ आम लगता था, मगर बहुत जल्द वो लड़कियां एक ऐसे जाल में फंस जाती थीं जहाँ से निकलना मुमकिन ही नहीं था। पैसा, डर, धमकी और शर्म सब कुछ एक साथ इस्तेमाल होता था ताकि कोई बोले नहीं।
ये सब किसी गली मोहल्ले में नहीं होता था। एप्सटीन के पास ऐसी जगहें थीं जहाँ आम इंसान तो क्या कई बार दुनिया के किसी भी देश का कानून भी पहुंचने से कतराता था। क्या FBI क्या CIA क्या अमेरिकन पुलिस और क्या इंटरपोल। सबके सब इसके असर के सामने बौने थे। इसका ठिकाना न्यूयॉर्क की आलीशान कोठियां, फ्लोरिडा के महंगे महलनुमा घर, और सबसे ज़्यादा बदनाम उसका प्राइवेट टापू, लिटिल सेंट जेम्स, जिसे बाद में लोग “पेडोफाइल आइलैंड” कहने लगे।
यहां इसकी गंदी सर्विस लेने इसके गेस्ट आते थे। इसके गेस्ट लिस्ट में पूरी दुनिया के बड़े लोग शामिल थे जैसे मुल्कों के सदर, मंत्री, वज़ीर, बादशाह, सेनाध्यक्ष, खुफिया एजेंसी के चीफ़, जज, वकील, बिजनेसमैन, वैज्ञानिक, हथियारों के डीलर, ड्रग्स डीलर, सभी तरह के पॉवरफुल नेता, अभिनेता और वो लोग जो अपनी पावर से दुनिया के सिस्टम को चलाते हैं, देशों को चलाते हैं।
कुछ नाम ये हैं जो अमेरिकी हाउस डेमोक्रेट्स ने 68 तस्वीरें जारी कीं जिनमें-
- बिल गेट्स (Bill Gates),
- सर्गेई ब्रिन (Sergey Brin),
- नोम चॉम्स्की (Noam Chomsky),
- स्टीव बैनन (Steve Bannon),
- वुडी एलेन (Woody Allen) और
- डोनाल्ड ट्रंप जैसे नाम दिखाई दे रहे हैं।
पहले के कुछ डोक्युमेंट लाइनों और कॉन्टैक्ट लिस्ट में दुनिया के बड़े नाम पहले ही कैप्चर हुए थे जैसे-
- डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump)
- बिल क्लिंटन (Bill Clinton)
- नाओमी कैंपबेल (Naomi Campbell)
- माइक जैक्सन (Michael Jackson)
- मिक जैगर (Mick Jagger)
- एलेक बोल्डविन (Alec Baldwin)
- राल्फ फाइनेस (Ralph Fiennes)
और मशहूर वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का नाम भी जेफरी एपस्टीन से जुड़े अदालती दस्तावेजों (एपस्टीन फाइलों) में सामने आया था। और भी कई हस्तियां फाइल में उल्लेखित हैं लेकिन इनके खिलाफ कोई सबूत अभी तक पब्लिक नहीं हुए। ऐसा नहीं है कि सबूत नहीं हैं बल्कि पब्लिक नहीं हुए हैं।
लेकिन ध्यान रहे इन तस्वीरों में किसी का अपराध साबित नहीं हुआ है या अपराध बताया नही गया है सिर्फ मौजूदगी/मुलाकातें दिखती हैं। सरकार द्वारा छाँटी जा रही सामग्री में बहुत सी चीज़ें भी redacted (काटी-छँटी) होंगी ताकि भागीदारों की निज़ी जानकारी पब्लिक ना हो।
ये फाइल्स सिर्फ आम दस्तावेज़ नहीं हैं। क़रीब 95,000 से भी ज्यादा फोटो, ईमेल, कनेक्शन, कॉन्टैक्ट लिस्ट, फ्लाइट लॉग और बहुत सारे व्यक्तिगत डेटा हैं जो सालों तक ख़ुफ़िया रखे गए थे वो अब कोर्ट में हैं। अगर सारे नाम खुल जाएं तो दुनिया के हर देश की सरकार गिर जाएगी।
अब बात करते हैं जेफ्री एप्सटीन के प्राइवेट टापू की जिसपर ये सारा गन्दा खेल होता था। टापू पर महलनुमा घर बने थे। इन जगहों पर कैमरे थे, तमाम आने जाने वालों का हिसाब था, फ्लाइट लॉग थे, उनके घरों में, कमरों में ख़ुफ़िया कैमरे लगे थे और हर हरकत किसी न किसी तरह रिकॉर्ड होती थी। उसका प्राइवेट जेट, जिसे लोग मज़ाक में नहीं बल्कि डर के साथ “लोलिता एक्सप्रेस” कहते थे, दुनिया के ताक़तवर लोगों को इधर-उधर लाता-ले जाता था।
यहीं से सवाल पैदा होता है कि क्या ये सारे बड़े लोग उसके क्लाइंट थे। इसका सीधा जवाब नहीं है। बहुत से लोग सिर्फ़ पार्टियों में मिले, मीटिंग में बैठे या सोशल रिश्तों की वजह से उसके आसपास आए। सिर्फ़ नाम आ जाना या फोटो में दिख जाना अपने-आप में जुर्म नहीं होता। मगर ये आप और हम कैसे जान पाएंगे कि जिसकी फ़ोटो है वो सिर्फ़ सोशल मुलाक़ात कर रहा था या गंदे खेल में शामिल था। इसमें कुछ लोग ऐसे भी थे जो समझौता कर चुके थे, जिन्होंने गलत रास्ता चुना, और जिनके बारे में एप्सटीन के पास ऐसी चीज़ें थीं जिनसे वो उन्हें खामोश रख सकता था। असली ताक़त यहीं से पैदा होती है।
धीरे धीरे ये समझ आने लगा कि एप्सटीन सिर्फ़ हवस का मरीज नहीं था। वो इंसानी कमज़ोरियों का कारोबारी था। वो जानता था कि ताक़तवर आदमी किस चीज़ से डरता है। इज़्ज़त से, कुर्सी से, परिवार से, नाम से और पावर के जाने के डर से। एक बार अगर कोई उस जाल में फंस जाए, तो फिर उसे बस इतना कहा जाता था कि चुप रहो, रास्ता साफ़ करो, सवाल मत पूछो। इस तरह वो सीधे सरकारें नहीं चलाता था, लेकिन सरकारों के हर फ़ैसले को मोड़ सकता था, कुछ जांचों को धीमा कर सकता था, और कुछ लोगों को हमेशा के लिए खामोश रख सकता था। वो जो चाहे कर सकता था या यूं कहें कि करता था।
इस पूरे खेल में उसका सबसे करीबी नाम था Ghislaine Maxwell। वही लड़कियों को लाती थी, वही भरोसा दिलाती थी, वही सिस्टम को चलाती थी। आज वही जेल में सज़ा काट रही है, जो इस बात का सबूत है कि ये सब सिर्फ़ अफ़वाह नहीं था। दूसरी तरफ़ कुछ नाम ऐसे भी सामने आए जिनका असर बहुत बड़ा था, जैसे इंग्लैंड रॉयल फ़ैमिली के Prince Andrew, जिसने बाद में सिविल केस में समझौता किया। कई और बड़े नाम रिकॉर्ड में आए, जिनमें पूर्व राष्ट्रपति, अरबपति और मशहूर चेहरे शामिल हैं मगर उनके खिलाफ़ अभी तक जुर्म साबित करने वाले सबूत पब्लिक नहीं हुए।
सबसे रहस्यमय मोड़ 2019 में आया, जब एप्सटीन जेल में मरा हुआ पाया गया। हाई सिक्योरिटी जेल, चप्पे-चप्पे पर कैमरे है लेकिन अचानक खराब हो गए। गार्ड सोते हुए पाए गए। और सरकारी आधिकारिक बयान ये कि उसने खुदकुशी कर ली। बहुत से लोग आज भी इसे सच नहीं मानते। वजह साफ़ है। अगर वो ज़िंदा रहता और बोलने लगता, तो सिर्फ़ कुछ लोग नहीं, पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा हो जाता। उसकी मौत के साथ बहुत से सवाल भी मर गए।
अब सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि क्या एप्सटीन किसी सरकार या इंटेलिजेंस एजेंसी के लिए काम करता था। आज तक कोई ऐसा पक्का सबूत सामने नहीं आया या आने नहीं दिया गया जो अदालत में साबित हो सके कि वो किसी एक सरकार का ऑफिशियल एजेंट था। मगर ये भी सच है कि उसे जो सुरक्षा मिली, जो नरमी मिली, और जो सालों तक आंख बंद करके देखा गया, वो किसी आम अपराधी को नहीं मिलती। इसलिए बहुत से जांचकर्ता और पत्रकार ये मानते हैं कि वो पूरी तरह अकेला नहीं था। शायद वो एक मुखौटा था, एक फ्रंट-मैन, जिसके पीछे एक बहुत ही मज़बूत और ताक़तवर नेटवर्क खड़ा था।
क्या पूरा सच कभी सामने आएगा? शायद नहीं। कुछ फाइलें हमेशा के लिए बंद रहेंगी, कुछ नाम कभी अदालत तक नहीं पहुंचेंगे, और कुछ गवाह हमेशा खामोश रहेंगे। मगर जितना सच अब तक बाहर आया है, वो इतना काफी है कि दुनिया ये समझ सके कि ये सिर्फ़ एक आदमी की कहानी नहीं थी। ये ताक़त, पैसे और इंसानी कमजोरी से बने उस सिस्टम की कहानी थी जो बरसों तक चलता रहा।
जेफ्री एप्सटीन कोई जादूगर नहीं था और न ही अकेला शैतान। वो एक खतरनाक औज़ार था, जिसे सही वक्त पर इस्तेमाल किया गया और जब लगा कि औज़ार बोल सकता है, तो उसे हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया। आज जो हलचल है, वो किसी एक नाम की वजह से नहीं, बल्कि इस डर की वजह से है कि अगर पूरा सच सामने आ गया, तो दुनिया को खुद से ही नज़र मिलाना मुश्किल हो जाएगा।
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