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आज के अखबार (दो):झूठे आरोपों से चुनाव जीतना और राजनीतिक विरोधी को कमजोर करना मुद्दा ही नहीं है

संजय कुमार सिंह

नरेन्द्र मोदी जब कांग्रेस पर झूठे आरोप लगाते रहे हैं, स्विस बैंक में भारतीयों का कालाधन होने और उसे 100 दिन में वापस लाने की बात कर मतदाताओं को रिझाने की कोशिश कर चुके हैं तो मुझे लगता है कि उनके शासन में इस मामले में भी प्राथमिक तौर पर सबूत नहीं हैं। पर्याप्त तथा अकाट्य सबूत हो तो कार्रवाई से कोई क्यों इनकार करेगा। दूसरी ओर, जब प्रक्रिया ही सजा है तो ऐसे मामले सिर्फ विपक्षी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ क्यों? बेशक, निर्वाचित मुख्यमंत्री को जेल में रखने का ठोस आधार होना चाहिए और सिर्फ शक के आधार पर या सजा हुए बगैर जेल में रखना क्यों जरूरी है? अगर पद पर रहने से जांच में दिक्कत या सबूत छिपाने का शक है तो यह केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के मामले में भी होना चाहिए। वरना जांच चले, सबूत जुटाए जाएं और सबूत मिटाने का मामला बने तो उसका भी मुकदमा चल सकता है लेकिन वह सब नहीं हो रहा है और समन की अवज्ञा का मामला है जो तकनीकी है। वैसे भी लोकसेवक के खिलाफ मुकदमा चलाने (या कार्रवाई करने) के लिए सरकार से अनुमति लेनी होती है। सत्तारूढ़ दल को विपक्ष के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने में विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है और उदाहरण है कि विपक्ष के लोग तो आरोप पर ही जेल में रहे और भाजपा के समर्थकों को सजा होने पर भी छुड़ा लिया गया। राहत का मामला तो राम रहीम को मिलने वाले बेल और फर्लो से पता चलता है। अगर सबूत होते, सबूतों से छेड़छाड़ का मामला होता तो ना जमानत मिलती ना खबर बनती। अभी हेमंत सोरेन का राजनीतिक महत्व ऐसा नहीं है इसलिए उन्हें राहत की खबर छोटी है (राहत भी छोटी है) और परेशान किए जाने के मामले पर ध्यान नहीं है। दूसरी ओर गुजरात चुनाव के कारण और पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार होने के कारण उसे जमानत मिलने का महत्व है और इसलिए खबर बड़ी है। खबर को महत्व भी ज्यादा मिला है। इसमें कुछ गलत नहीं है। लेकिन इन दोनों खबरों से जो साबित होता है वह भी खबर है और वह ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन उसे महत्व नहीं मिला है या वह खबर ही नहीं है। भारतीय मीडिया में यह वोट चोरी से लेकर एपस्टीन फाइल में नाम होने और हरदीप पुरी की संदिग्ध भूमिका तक के मामले में है। वोट चोरी पर  विशिष्ट नागरिकों की भूमिका और उनमें नंबर एक का मुख्य न्यायाधीश के मामले में पूर्व में की गई टिप्पणी पर चर्चा भी नहीं होना चौंकाने वाला है।     

दूसरी ओर, सच्चाई यह है कि भाजपा केंद्र सरकार अपने विरोधियों के खिलाफ कानून और संवैधानिक एजेंसियों का उपयोग खुलकर करती दिखती है। लेकिन मीडिया में खबर नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट का रुख भी ढीला लगता है। असम के मुख्यमंत्री के मामले में ऐसा हुआ और हो रहा है। प्रथमदृष्टया लगता है कि दिल्ली के पूर्व और झारखंड के मुख्यमंत्री के मामले एक से हैं और दोनों को बदनाम व परेशान करने के लिए मुकदमे चलाए जा रहे हैं। ठीक है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं लेकिन मुख्यमंत्री को जेल में रखकर जांच करना क्यों जरूरी है और अगर है तो सबके लिए होना चाहिए। अपराध साबित हो जाए तो सजा होनी ही चाहिए लेकिन मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद जेल में रखा जाए और कार्यकाल खत्म हो जाए या चुनाव हार जाए तो अदालत कहे कि मामले में दम नहीं है तो? सवाल जितना गंभीर है उतनी गंभीरता से उठाया नहीं गया है। सच्चाई यह है कि ऐसा आम आदमी के साथ भी नहीं होना चाहिए पर आम आदमी या अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण लोगों की तो पूछ ही नहीं है। लोग पांच साल से जेल में हैं। ना जांच हो रही है ना अपराध साबित हो रहा है। यह अलग बात है कि सर्वोच्च अदालत भी जमानत नहीं देती है। केजरीवाल और सिसोदिया को भी नहीं मिली और अब अदालत कह रही है कि मामला चलने लायक ही नहीं है। यह सब कैसे हुआ, न्यायिक भ्रष्टाचार का मामला है कि नहीं इसकी जांच की मांग कैसे की जाए जब इसकी चर्चा भर से मुख्य न्यायाधीश नाराज हो गए। खबर इसकी भी हो सकती थी। समाज की चिन्ता तो यह है ही।

इंडियन एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड में दिल्ली आबकारी नीति मामले को सोहिनी घोष ने विस्तार से समझाया है। इसका शीर्षक है, ‘सोचा-समझा प्रयास’: सीबीआई का मामला ऐसे चित्त हो गया। इसमें नीति की प्रक्रियागत ईमानदारी के तहत कहा है – अभियोजन का मामला यह है कि आबकारी नीति में कथित तौर पर “छेड़छाड़ और बदलाव” किया गया था, ताकि “साउथ ग्रुप” और उससे जुड़े बिचौलियों के तौर पर बताए गए कुछ खास लोगों/एंटिटी को गलत फायदा पहुंचाया जा सके। कोर्ट ने कहा कि उसे इस दावे को सपोर्ट करने के लिए कोई सबूत नहीं मिला। इसके उलट, रिकॉर्ड से पता चलता है कि जो नीति बनाई गई थी वह सोच-समझकर, सलाह मश्विरे के बाद बनाई गई थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि इसके लिए दिल्ली के उपराज्यपाल के सुझाव लेने की कोई कानूनी या संवैधानिक जरूरत नहीं थी फिर भी, “फाइल नोट्स साफ तौर पर दिखाते हैं कि सुझाव मांगे गए, जांचे गए और शामिल भी किए गए थे”। कोर्ट ने कहा, “पॉलिसी बनाने में हेरफेर या लागू करने में भ्रष्टाचार दिखाने वाले किसी भी मटीरियल के बिना, ऐसे आरोप टिक नहीं पाते। वैसे भी, स्वतंत्र जांच करने पर, इस कोर्ट को पता चलता है कि पेमेंट की पूरी कथित चेन ज़्यादातर कुछेक फर्मों की तथाकथित अनगड़िया (हवाला) फर्मों की पावती एंट्री जैसे दस्तावेजों पर टिकी है जो कानून में मान्य नहीं हैं। इसी तरह अप्रूवर जैसे बयान हैं जिनका तथ्यों से मिलान नहीं किया गया है। ये कमियां सिर्फ़ ऊपरी नहीं हैं; ये अभियोजन के मामले की जड़ पर हमला करती हैं और इस कारण यह शुरुआती स्तर पर भी टिकने लायक है।” अखबारों ने यह नहीं बताया है कि जो मामला चलने लायक नहीं है उस मामले में जमानत कैसे नहीं मिली या नहीं मिली थी। जो भी हो, जमानत नहीं मिलने के अलग मामले हैं। वह अभी मुद्दा नहीं है।

आज की मुख्य खबर के साथ सीबीआई हाईकोर्ट पहुंची भी दिलचस्प मामला है। अमर उजाला की खबर के अनुसार, सीबीआई ने आरोपियों को आरोप मुक्त करने की चुनौती दी है और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द करने की मांगी की है। मोटे तौर पर मामला यह है कि दिल्ली सरकार की आबकारी नीति में भ्रष्टाचार और पीएमएलए का मामला होने का सबूत सीबीआई के पास है। इसके आधार पर सीबीआई ने नियमानुसार सरकार से मुकदमा चलाने की अनुमति मांगी होगी और अब जब अदालत ने कहा कि सबूत पर्याप्त नहीं हैं तो सीबीआई को मान लेना चाहिए। अगर और सबूत इकट्ठा हो सकें तो करना चाहिए और फिर अपील की जा सकती है। उसी सबूत पर हाईकोर्ट में अपील सरकार की अनुमति के साथ या बिना – अदालत पर दबाव डालना ही होगा। पता नहीं कानूनन यह कितना सही है लेकिन एक और मामला दिलचस्प है। आपको याद होगा, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम के खिलाफ भी एक मामला था और 2019-20 में वे 100 दिन से ज्यादा जेल में रहे थे। कई वर्षों बाद अब खबर आई है कि उनके मामले में सरकार से अनुमति मिल गई है। यह अनुमति केंद्र सरकार को देनी थी, गृहमंत्री तब भी अमित शाह थे अब भी हैं, सीबीआई इसी सरकार के लोग चलाते हैं फिर इतना समय क्यों लगा? जाहिर है, खबर में यह नहीं बताया गया है लेकिन तथ्य है कि तमिलनाडु में चुनाव है। भाजपा वहां के चुनाव में भी जोर लगा रही है और चिदंबरम का मामला काम आ सकता है। यही नहीं, केजरीवाल के मामले में एक ‘साउथ ग्रुप’ भी था। (समाप्त)

पहला भाग भी पढ़िए –  आज के अखबार : अपनी राजनीति चमकाने, आर्थिक हित साधने – में अंधे हैं या नंगे हुए आप तय कीजिए

लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/apnee-rajneeti-chamkane-aarthik-aur-niji-hit-sadhne/  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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