कितनों को मारोगे?

पुष्प रंजन-

कितनों को मारोगे? ये सर पर कफ़न बांधकर पत्रकारिता करने वाले कम नहीं होंगे.

” पत्रकार बिकाऊ है. गोदी वाला है. हिंदी में रिपोर्टिंग कहाँ होती है? ” ये वही लोग बोलते हैं, जो हिंदी की खाते हैं, और हिंदी वालों को गरियाते हैं. विदेश से पुरस्कार जुगाड़ लाते हैं, और विचारक बन जाते हैं. इनके भगत ताली पीटते हैं, “वाह…देखा …बीस कुमार ने आज खड़े-खड़े झाड़ दिया.”

मैं आज भी अपनी बात पर कायम हूँ, ज़मीन पर पेशे के प्रति ईमानदार, किसी से नहीं दबनेवाले पत्रकार अब भी हैं. गांव की गली से लेकर दिल्ली तक देख लो. वो न तो लुटियन में मिलेंगे, न किसी टीवी स्टूडियो में.

ग्राउंड ज़ीरो से सर पे कफ़न बांधकर काम करनेवालों की संख्या भले कम है, लेकिन समाप्त नहीं हुए हैं. नहीं भरोसा तो प्रतापगढ़ में शराबमाफिया से नहीं दबनेवाले टीवी पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की लाश देख लीजिये.

पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की रविवार रात एक ईंट भट्ठे के किनारे बेरहमी से मारा गया. पुलिस इस मौत को दुर्घटना बता रही थी. दबाव बढ़ा तो हत्या का मामला दर्ज़ करना पड़ा. सात साल में 20 भारतीय पत्रकारों की हत्या हो चुकी है. ये वो लोग थे, जो किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं रहे.

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें-

https://chat.whatsapp.com/CMIPU0AMloEDMzg3kaUkhs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *