इतना कहकर वह सर्र से निकल गए। उधर बचे हम और भाई साब। वह भी मेरे चूतियापे पर मुस्करा रहे थे। मैंने ठान लिया था कि एकलव्य की तरह अंगूठा कुर्बान कर दूंगा पर द्रोणाचार्य इन्हीं को मानूंगा…

महेश शर्मा-
सुंदर नैन-नक्श, सोबर कलर की पतलून, कमीज इन रहती थी। ज्ञान के भंडार, सत्ता हो या विपक्ष या ब्यूरोक्रेट, वाजिब पर चुभने वाले सवालों की बौछार तो कोई उनसे सीखे। प्रेस क्लब अध्यक्षी के दौरान उन्होंने मानक बना रखा था कि नगर अध्यक्ष से नीचे वाले किसी भी पदाधिकारी को प्रेसवार्ता की अनुमति नहीं दी जाएगी। तब अनुमति विष्णु जी के हस्ताक्षर के बिना नहीं मिलती थी। फीस थी शायद 51 रुपया। बाद में डेढ़ सौ कर दी गयी थी।
प्रेस क्लब में प्रेसवार्ता की अनुमति लेने वाले लोग प्रोटोकॉल का पूरा ध्यान रखते थे। विष्णु जी की पोलिटिकल रिपोर्टिंग विशेषकर चुनाव के दौरान की रिपोर्टिंग पढ़ने योग्य हुआ करती थी। वह निर्वाचन क्षेत्र की पोलिटिकल हिस्ट्री जरूर बताते थे। कोशिश यह भी करते थे कि क्षेत्र का विधानसभा या लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने वालों का फोटो जरूर लगे। वह कहते हैं कि नई पीढ़ी को सूचनाओं से लैस करना भी हम पत्रकारों की जिम्मेदारी है। उनकी पकड़ नेताओं में भी काफी मजबूत थी। चौधरी नरेंद्र सिंह, हरीकिशन श्रीवास्तव सरीखे दिग्गज नेता उनके मित्र कहे जाते थे पर वह एक मर्यादित दायरा भी मेंटेन रखते थे। वाकपटुता में बेजोड़। यही सब सीखते हुए रिपोर्टिंग में मैं खुद को ढालता रहा। पत्रकारिता का यह सरमाया आज भी महफूज है।
शानदार, दमदार, खुद्दार विष्णु त्रिपाठी जैसे पत्रकार अब तो लुप्तप्राय प्राणी हो गए हैं। नेता, अफसर, पूंजीपतियों से नजदीकियां बनाने वाले चारण टाइप पत्रकारों की फौज से भगवान बचाये। ऐसे लोगों की आजकल भरमार है जिन्होंने पत्रकारिता को साधन बनाया है और उनका साध्यन कुछ और ही रहता है।
हम लोग नए नए फील्ड में आये थे तो विष्णुजी, योगेश भाई साब, नीरज वाजपेयी को इंटरव्यू , प्रेसवार्ता, रैली कवरेज करते हुए कभी कभार देखने का मौका मिलता तो खुद को धन्य समझते थे। सवाल पूछने का विष्णु जी का स्टाइल कुछ और ही था। बहुत विनम्रता से चुभने वाले सवाल उनके मुंह से सुनकर अच्छा लगता था। नकल की कोशिश करते रहते थे। कहते हैं कि अकल हो तो नकल चल जाती है। उनसे काफी कुछ सीखने को मिलता था। विष्णुजी कानपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष थे। भाई साब (योगेश वाजपेयी) महामंत्री। विष्णु जी के दूसरे चुनाव के आते-आते मैं प्रेस क्लब का सदस्य बन गया था। उनके मुकाबले वीरभद्र मिश्र जी लड़े थे जो हमारे संपादक (लोक भारती) थे। फिर भी न जाने क्यों विष्णु जी की चेलाही करने की तमन्ना पाल रखी थी। लगता था कि इनके नक्शे कदम पर चलकर पत्रकारिता में स्थापित हुआ जा सकता था। लेकिन उनके ट्रेड यूनियनी मिजाज से डर भी लगता था कि इनके साथ रहे तो नौकरी कौन देगा?
दैनिक जागरण में उनके कार्यकाल के चर्चे सुना करते थे। योगेश भाई साब के साथ कानपुर प्राणि उद्यान जाते वक्त मैंने इच्छा व्यक्त कर ही दी कि भाई साब विष्णु जी से मिलने व बातचीत करने का बहुत मन करता है। वे बोले, “इसमें मेरी क्या जरूरत। जाइये मिलिए जाकर। उनके सींगे थोड़े हैं कि देखते ही मार देंगे। मिलने-जुलने का कॉन्फिडेंस और नॉलेज चाहिए। पत्रकारिता की पहली शर्त ही यही है।”
खैर, दूसरे दिन प्रेस क्लब गया विष्णु जी और योगेश जी दोनों ही उपस्थित थे। उन्होंने ऐंठू नजरों से देखा। देखें भी क्यों न, अध्यक्ष का प्रोटोकॉल तोड़कर बिना ‘मे आई कम इन सर’ बोले ऑफिस में घुस गया। सीधे पांव छुए। इससे पहले की अपना परिचय दूं, योगेश भाई साब बोले, “महेश है महेश शर्मा लोक भारती में है। अभी नया है।” सुखी रहो कहकर वह कूछ पढ़ने लगे। इशारा पाकर मैं सामने पड़ी कुर्सी पर विराजमान हो गया। बहुत संक्षिप्त बातचीत हुई। आत्मविश्वास का मंत्र जाप करते हुए ज्ञान छौंकने के चक्कर में मैंने पूछ ही लिया, “ये पालेकर एवार्ड के बारे में कुछ बताइए?”
पत्रकारों की यूनियन के प्रदेश स्तर के नेता से मेरे जैसा कलम का दिहाड़ी मजदूर पालेकर एवार्ड (पत्रकारों का वेजबोर्ड) की जानकारी लेने की चेष्टा, शायद उन्हें अटपटी लगी। वह एकदम से खड़े हुए और योगेश वाजपेयी जी की तरफ मुखातिब होकर बोले, “योगेश इन्हें पालेकर एवार्ड के बारे में बता दीजियेगा।”
इतना कहकर वह सर्र से निकल गए। उधर बचे हम और भाई साब। वह भी मेरे चूतियापे पर मुस्करा रहे थे। मैंने ठान लिया था कि एकलव्य की तरह अंगूठा कुर्बान कर दूंगा पर द्रोणाचार्य इन्हीं को मानूंगा। धीरे-धीरे निकटता बढ़ती गयी। मुझे सिटी रिपोर्टर स्थापित होने में टाइम लगा, पर वरिष्ठों की सोहबत का लाभ भी मिला। काम सीखा, आचरण, व्यवहार, घटनाओं पर अपडेट रहने, लिखने पढ़ने की तरफ रुचि, होमवर्क करके प्रेस कान्फ्रेंस, इंटरव्यू में जाना यही सब सीखता गया। शुरू में फोकस लेबर इंडस्ट्री बीट की रिपोर्टिग में था। भारी उद्योगों की संख्या अधिक होने के कारण ट्रेड यूनियन आंदोलन कानपुर में खूब हुआ करते थे। हमारे मुकाबले राजेश द्विवेदी रिपोर्टर हुआ करते थे। एक प्रतिस्पर्धा का भाव था। मैंने भी ट्रेड यूनियन फील्ड में सेवायोजकों से संपर्क बनाए।
यूं तो मिल गेटों मीटिंगों का दौर हड़ताल, धरना, प्रदर्शन कवर करते थे पर असल परीक्षा की घड़ी तो तब आयी जब रेल का चक्का मजदूरों ने जाम कर दिया था।
पत्रकारिता में अभी दूध के दांत टूटे ही थे यानी प्रशिक्षु काल खत्म ही हुआ था कि टेक्सटाइल मजदूरों का रेल जाम आंदोलन आ गया। कवरेज के लिहाज से यह बड़ी चुनौती थी। दैनिक जागरण और आज सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार था। अखबारों के रिपोर्टरों को लगा दिया गया था पर दैनिक जागरण में राजेश द्विवेदी, अनूप वाजपेयी आदि प्रमोद तिवारी के नेतृत्व में धारदार काम करते रहे। आज ने भी बेहतरीन रिपोर्टिंग की थी। यहां संपादक शैलेंद्र दीक्षित जी और कमलेश त्रिपाठी खुद नेतृत्व कर रहे थे। हम लोग सेकेंड लाइन के थे। पर रुचि अधिक होने के कारण आंदोलन की बारीकियों को समझने का समय मिल गया। एक अपर श्रमायुक्त केके पांडे ने टेक्सटाइल मजदूरों का काम का बोझ बढ़ा दिया बिना पैसे बढ़ाए। इसे केके पांडे एवार्ड कहा गया।
ट्रेड यूनियन आंदोलन की आपसी प्रतिद्वंद्विता में दिखायी दिया कि मजदूरों की कीमत पर नेतागीरी चमकाने के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए जा चुके थे। कामरेड रवि सिन्हा, अंजनी मिश्रा, राजेंद्र सिंह, मोहम्मद शफी, रासबिहारी सिंह आदि गेटों पर जाकर पांडे एवार्ज की मुखाल्फत करके मजदूरों को एक करने में जुटे थे तो विमल मेहरोत्रा, सुभाषिनी अली सहगल, रविप्रताप नारायण सिंह, गणेश दीक्षित, शिवकुमार बेरिया (सब नाम लिखना संभव नहीं है) आदि कुछ बड़ा करना चाहते थे। विष्णु शुक्ला, विजय चावला, अभय शुक्ला, मोना सूर आदि को इस आंदोलन से दूर रखने की कोशिशें भी तेज हो गयीं।
शुरुआत गणेश दीक्षित से हुई वह एचएमकेपी के मजदूरों को साथ लेकर गोविंदपुरी स्टेशन के निकट पटरियों पर बैठ गए। धीरे-धीरे हुजूम जुड़ता रहा। रेलवे ट्रैक पर अफरातफरी का माहौल, दिल्ली-हावड़ा लाइन का चक्का जाम। कोई चार दिन तक आवागमन प्रभावित रहा। मजदूर जीते। यहां पर मुख्य धारा की रिपोर्टिंग में मेरा रोल बहुत ज्यादा नहीं रहा पर आंदोलन के भीतर तक की सूचनाएं मिलने लगी। जिन्हें आज अखबार लिखा करता था। विष्णु जी, योगेश जी से मिलने-जुलने का समय ही नहीं मिल पाता था। प्रेस क्लब ही कम जाना होता था।
रेल रोको आंदोलन के बाद मुझे बड़ा ब्रेक मिला और दैनिक जागरण ज्वाइन करने को प्रमोद तिवारी जी दफ्तर आकर बुला ले गए। बातचीत की। दूसरे दिन संपादक नरेंद्र मोहन जी ने इंटरव्यू लिया। और उधर रेलवे ट्रैक जाम तो इधर पत्रकारिता का शानदार ट्रैक मुझे मिल गया। दैनिक जागरण।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
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कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-2) : सिगरेट की डिब्बी में जुग्गी दादा की सिफारिशी चिट्ठी


