
महेश शर्मा-
पत्रकार बनने का जुनून भले ही सिर पर लिए घूम रहे हों पर मैने सुन रखा था कि बिना गॉड फादर के अखबार में नौकरी पाना आसान काम नहीं है। हालांकि लोकभारती अखबार के लिए काम कर रहा था, पर बैनर बड़ा हो तो फिर क्या बात है। लिखने का मजा ही कुछ और होता है।
पिताजी के मित्र पन्नालाल त्रिपाठी यूपी इंडस्ट्रियल मजदूर फेडरेशन के महामंत्री थे। उन्हें मेरे पत्रकारीय जुनून का पता था कि अब यह लड़का पत्रकारिता के पेशे में जाना तय कर चुका है। उनके मित्र आर के शर्मा जो कि इलाहाबाद हाई कोर्ट में वकील थे, उनके हफ्ते में दो दिन कानपुर में बीतते थे। वह मुकदमे के सिलसिले में आते थे। मेस्टन रोड का हिमालय होटल उनका डेरा हुआ करता था। त्रिपाठी चाचा के साथ कभी-कभी उनके यहां जाया करता था।
मेरे शौक कह लो या जुनून का जब उन्हें पता चला तो उन्हें लगा कि ग्लैमर से प्रभावित होकर मैं इस पेशे में कदम रख रहा हूं। शर्माजी खुद हितवाद अखबार से जुड़े थे और पत्रकारिता का पेशा छोड़कर वकालत करना शुरू कर दिया था। उनकी सिफारिश पर मैं यशोदानगर के रमाकांत पांडे जी से मिला जिन्हें सब भैया कहते थे। सीधा-सीधा जगत भैया थे। पर आदमी जोरदार थे। वह हालांकि हाउसिंग सोसाइटी चलाते थे। अपनी मां के नाम पर यशोदानगर बसाया था। उनका समाचार पत्र लोक भारती निकलता था।
पहले यह यशोदानगर से ही रमतायोगी के नाम से प्रकाशित और मुद्रित होता था। इसके मालिक संजय शास्त्री हुआ करते थे। शास्त्री जी की बीमारी के दौरान भैया ने उनसे वादा किया था कि वह अखबार को अपने जीते जी बंद नहीं होने देंगे। भैया (रमाकांत पांडे) इलाहाबाद वाले वकील साहब शर्मा जी को बहुत मानते थे। उनके कहने पर मुझे रख लिया गया।
लोक भारती में एसएच नकवी, वीरभद्र मिश्र, पीयूष त्रिपाठी, फूलनारायण धर द्विवेदी, योगेश पांडे, मुन्ना चौहान, अनिल शुक्ला, अजय शुक्ला, भूपेंद्र तिवारी, सतींद्र वाजपेयी आदि दिग्गज पत्रकार डटे हुए थे। मेरी स्थिति दांतों के बीच लपलपाती जीभ की तरह थी। मैं वहां अपने लिए स्पेस तलाश रहा था। डेस्क पर मन नहीं लगता था। जमने के लिए अनुवाद का काम शुरू कर दिया था। चौर्य कला जानी और अंग्रेजी पत्र पत्रिकाओं से पीस उठाकर हिंदी में लिखकर दे देता था।
मेरे पहले समाचार संपादक पीयूष त्रिपाठी मुझे स्थापित करने में मदद करते थे। मेरी नजर में पीयूष त्रिपाठी भैया के खासुलखास थे। सो मैंने भी उनसे दोस्ती गांठ ली। यह सोचकर कुछ दिक्कत आएगी तो पीयूष मेरी रक्षा को आगे आएंगे। पीयूष आज भी मेरे पारिवारिक मित्र हैं। फिर नवीन मार्केट में लोक भारती के सिटी कार्यालय में बैठने लगा। शाम को भदई गुरू (चपरासी) साइकिल से न्यूज पैकेट ले जाया करते थे। नकवी साहब जिन्हें हम सब बाबा कहते थे। उनकी डांट के बाद उन्हें मनाने के लिए मैं चाय और एक सिगरेट लाकर उन्हें खुद दे आता था।
इसी दौरान वरिष्ठ पत्रकार योगेश वाजयेपी, दिलीप शुक्ला, दिनेश शर्मा आदि तमाम लोगों से मिलना जुलना हुआ। योगेश वाजपेयी टाइम्स ऑफ इंडिया के कानपुर ब्यूरो चीफ थे। पढ़ने-लिखने के शौकीन हरदोई जिले के रहने वाले योगेश जी उनके पारिवारिक और जिले-जवार के लोग जुग्गी दादा कहते थे। वह बेहतरीन इंसान हैं। हां, एक बात रह गयी। पत्रकारों से मिलने मिलाने की मजबूत कड़ी रहे अशोक यादव (दिवंगत.. जिन्हें एसपी सिंह, एमजे अकबर, संतोष भारतीय, राजीव शुक्ला (दिलीप जी के छोटे भाई) ये सब जानते थे।
योगेश भाई साहब की विजय सुपर स्कूटर अक्सर मैं ही चलाया करता था। उन्होंने कभी भी मेरी जेब से एक टका खर्च नहीं होने दिया। उनका वाइल्ड लाइफ प्रेम अक्सर कानपुर प्राणि उद्यान ले जाता था। जंगल जू नाम से उन्होंने वीडियो फिल्म 1986-87 के दौरान बनायी थी। मैं यूनिट में था। असिस्टेंट प्रोड्यूसर। बहरहाल योगेश भाई साहब की शागिर्दी काम आयी। वह जब पेग लगाने के मूड में होते थे तो मुझे पैसे देकर क्वार्टर और सिगरेट लेने भेज दिया करते थे। हां, मुझे मना करते थे। मैं उनका बहुत लिहाज करता था। अब तो सालों से मुलाकात नहीं हुई। वह कानपुर छोड़कर नोएडा में बस गए।
खैर, एक दिन मैंने उनसे डरते-डरते कहा कि भाई साहब कहीं ठीकठाक जगह लगवा दीजिए। मेहनत से काम करूंगा। अच्छा इधर प्रेसवार्ता, धरना, प्रदर्शन, नागरिक समस्याओं पर लिखा करता था तो थोड़ा आत्मविश्वास जग गया था। प्रेस क्लब (कानपुर) में भाई साहब सिप कर रहे थे और सिगरेट होठों पर दबी हुई थी। फ्रेंचकट दाढ़ी। उनका पूरा लुक पत्रकारों वाला था। लगता था जैसे जेएनयू से निकलकर दिल्ली पत्रकारिता करते हुए कानपुर आ गए हों। कुर्ता पतलून यही नहीं वह कुर्ता धोती भी जब तब पहन लिया करते थे।
तो भाई साहब ने मेरी फरियाद सुन ली। बोले, पेन और कागज लाओ। मेरे पास पेन था पर कागज नहीं। इस पर हल्की सी डांट और फिर बोलो सिगरेट की डिब्बी है। मैने जमीन से उठाकर दे दी। (सिगरेट खत्म होने के बाद उसे फर्श पर फेंक दिया था) विल्स फिल्टर की डिब्बी के अंदर फोल्डरनुमा हल्का मोटा कागज जिसमें सिगरेट रखी रहती थी, निकाला और उस पर लिखने लगे। दो लाइन की चिट्ठी थी। इबारत कुछ इस तरह थी, प्रिय वीरेंद्र, पत्रवाहक मेरे अनुजवत हैं। इन्हें समायोजित कर लें। (नीचे हस्ताक्षर) तुम्हारा, योगेश। मुझे चिट्ठी थमाते हुए बोले, कल लखनऊ चले जाओ और स्वतंत्र भारत के संपादक हैं वीरेंद्र सिंह, उनसे मिल लेना।
दूसरे दिन मैं दस बजे लखनऊ बस से जा पहुंचा। विधानसभा मार्ग पर पायनियर और स्वतंत्र भारत का कार्यालय था। जैपुरिया औद्योगिक घराना इसका संचालक था। पूरे एक घंटे तक इंतजार के बाद संपादक जी (वीरेंद्र सिंह) आए। उनसे मिलने वालों की पर्चियों में मेरी भी थी। दस-पंद्रह मिनट बाद बुलाया गया। दरवाजा खोलकर मैंने औपचारिकतावश पूछा, मे आई कम इन सर। (हाथ में वही सिगरेट की डिब्बी में लिखी सिफारिशी चिट्ठी को देखा और मुझे भी। बोले, आइए। बैठने का इशारा किया। थोड़ा सहमा-सहमा था। वह बोले, योगेश कैसे हैं। मैंने कहा, जी ठीक हैं। उन्हीं ने भेजा है। वह बोले, वो तो समझ गया। तुम शराब पीते हो, पहला सवाल। मैंने कहा, नहीं। उसके बाद बोले, जाइए कानपुर से रिपोर्ट भेजिए। फिर देखता हूं।
तब तक कानपुर से स्वतंत्र भारत का प्रकाशन नहीं हुआ करता था। नवीन मार्केट में ऑफिस था। प्रेम सक्सेना हेड थे। अक्सर कॉपी घर से या प्रेस क्लब में बैठकर लिखकर ऑफिस दे देता था। लॉन्चिंग स्टोरी में भाई साहब (योगेश वाजपेयी) ने मदद की थी। पेज वन बॉटम छपी तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। अंदर से लगा कि पत्रकारिता की मुख्यधारा में स्थापित हो रहा हूं।
नोट – इसके बाद क्रम से शैलेन्द्र दीक्षित, दिलीप शुक्ला, नरेंद्र मोहन, सत्यप्रकाश त्रिपाठी, अच्युतानन्द मिश्रा, डॉ वीरेन डंगवाल, प्रदीप कुमार, संजय गुप्ता, प्रताप सोमवंशी, अजय उपाध्याय, दिनेश जुयाल, बामापद त्रिपाठी (ओडिशा), सिद्धार्थ भट्ट, अंशुमान तिवारी, शम्भूदयाल वाजपेयी से जुड़े संस्मरण अपने अनुभव। डिजिटल पत्रकारिता में कूदफांद, एंकरिंग का चस्का।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
अगली किस्त जल्द ही- “पत्रकारिता के हिटलर”
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-1) : अथटर्न मिल में स्पोर्ट्स कोटे से बाबूगिरी की शुरुआत


