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आज के अखबार : जब ‘ट्रम्प का टैरिफ’ छाया हुआ है, दि एशियन एज ने अमित शाह की सेवा का रास्ता ढूंढ़ लिया

संजय कुमार सिंह

आज मेरे सभी अखबारों में ‘ट्रम्प का टैरिफ’ लीड है। ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही खबर सभी अखबारों में लीड हो और आठ दस अखबारों में पहले पन्ने पर ऐसी कोई खबर नहीं मिले जिसे लीड बनाने लायक कहा जा सके। आज मैं यही ढूंढ़ रहा था कि अगर टैरिफ की खबर किसी कारण (महामानव का निर्देश शामिल है) लीड नहीं लगानी होती तो मैं क्या करता। मुझे दो खबरें दिखीं और कुछ पैडिंग करके मैं लीड बना सकता था। एक खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड है। दूसरी अमर उजाला की सिंगल कॉलम। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार पूर्व तड़ी पार और मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य सभा में कहा है, मुझे यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि कोई भी हिन्दू कभी आतंकवादी नहीं हो सकता है। दूसरी खबर है, आज मालेगांव विस्फोट के मामले में फैसला आयेगा। फैसला आ गया है सभी अभियुक्त बरी हो गये हैं। विश्व हिन्दू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने कहा है, यह कांग्रेस के गाल पर करारा तमाचा है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को हाथ जोड़कर हिंदू समाज से माफी मांगनी चाहिए। उनकी स्टोरी फेल हो गई। हिंदुओं को आरोपी बनाने के चक्कर में असली गुनहगारों को बचा लिया गया। दोहरा पाप किया गया। कांग्रेस के पापों का घड़ा भर चुका है। कांग्रेस की धमाकों की सरकार थी। अभियुक्तों में पार्टी की पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी हैं। मुझे लगता है कि अमित शाह ने राज्यसभा में अपना बयान अंतिम मौका समझ कर न दिया हो। जो भी हो, मुझे याद आया कि हिन्दू तो मैं भी हूं और मेरी गारंटी वे क्यों ले रहे हैं। शायद वे सेकुलरों और अर्बन नक्सल को छोड़कर बोल रहे हों। जो भी हो, अगर वे भाजपा या संघ परिवार से जुड़े हिन्दुओं की बात कर रहे हों तो पिछले 10 साल में मुझे कई अपराध याद नहीं है जिसका आरोप किसी भाजपा नेता या उनके करीबी पर नहीं लगा हो।

इसके बावजूद अमित शाह को ऐसा दावा करने की जरूरत क्यों पड़ी वे जानें तथ्य यह है कि उमर खालिद की जमानत नहीं हो रही है बाबा राम रहीम जब चाहें पैरोल या फर्लो पा जाते हैं। इसी तरह, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में सभी अभियुक्त रिहा हो गये पर सरकार ने अपील नहीं की। पंचकूला की विशेष एनआईए कोर्ट ने सभी चार आरोपियों (असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान और राजिंदर चौधरी) को बरी कर दिया था। इस धमाके में 68 लोगों की मौत हुई थी जबकि 12 लोग घायल हुए थे। दूसरी ओर, मुंबई हाईकोर्ट ने मुंबई धमाके के सभी 12 आरोपियों – मोहम्मद साजिद मरगूब अंसारी, मोहम्मद माजिद, नवीद हुसैन खान, मो. फ़ैसल अताउर रहमान शेख, सुहैल महमूद शेख, आसिफ खान, एहतेशाम कुतुबुद्दीन सिद्दीकी, शेख मोहम्मद अली, जमीर अहमद, मुजम्मिल अताउर रहमान शेख, तनवीर अहमद और अब्दुल वहीद शेख को रिहा कर दिया तो महाराष्ट्र सरकार ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अपील की और स्टे जारी हो गया। हालांकि, अभियुक्तों को जेल नहीं भेजा गया है। केंद्र सरकार के वकील ने जो तर्क दिये और उन्हें मान लिया जाना भी दिलचस्प है लेकिन वह अलग मुद्दा है। अभी तो देखना है कि लोया होने का डर और करने की धमकी का कितना असर हुआ है।

मुझे नहीं लगता है कि यह असर ज्यादा है क्योंकि आज ही नवोदय टाइम्स में खबर है, बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या के सभी 38 आरोपी दोषी करार दिये गये हैं। हालांकि, इस फैसले के आधार पर यह मानना कि सब ठीक है, गलत भी हो सकता है क्योंकि बड़े और सरकार से संबंधित मामलों में सरकार हारती नहीं दिखती है। इसीलिये मालेगांव मामले का फैसला महत्वपूर्ण है। पहले अगर प्रभावशाली पद पर बैठा कोई व्यक्ति दोषी माना जाता था या उसपर आरोप लगता था तो उससे इस्तीफा ले लिया जाता था ताकि उसके पद का प्रभाव उसे खिलाफ कार्रवाई पर न पड़े। लेकिन इस्तीफे नहीं होते वाली वाशिंग मशीन पार्टी ने अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को सांसद बनाकर यह बता दिया था कि सरकार क्या चाहती है। पर अदालत ने दूसरा तरीका अपनाया और फैसला ही नहीं सुनाया। पर सरकार बनी रही। भले प्रज्ञा ठाकुर को दोबारा सांसद नहीं बनाया गया। गलत मत समझियेगा, काम होने के बाद उन्हें टिकट ही नही दिया गया। इसलिये आज का फैसला महत्वपूर्ण है। भले उसे ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाये या नहीं। आपने ऊपर पढ़ा कि मुंबई विस्फोट मामले में अभियुक्तों को बरी किये जाने पर महाराष्ट्र सरकार तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई लेकिन समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट मामले में उस समय के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने पहले ही कह दिया था कि सरकार अपील नहीं करेगी। यही हुआ। तब की सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने समझौता एक्सप्रेस विस्फोट मामले में स्वामी असीमानंद को सशर्त ज़मानत देने का आदेश पारित किया। एनआईए ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर करने की व्यवहार्यता की जाँच की और निर्णय लिया कि इस आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का कोई आधार नहीं है। बाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी कहा था, यूपीए शासन के दौरान दायर आरोपपत्रों में कोई ठोस सबूत नहीं थे। इस मामले में कुल आठ आरोपी थे। इनमें से एक की मौत हो चुकी है और तीन को भगोड़ा घोषित किया जा चुका है। इस धमाके में ज्यादातर पाकिस्तानी नागरिकों की जान गई थी। मारे गए 68 लोगों में 16 बच्चों समेत चार रेलकर्मी भी शामिल थे।  

इस क्रम में मुझे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा मामले में आज छपा मुख्य न्यायाधीश का यह कथन भी बताना है कि वे पोस्ट ऑफिस नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, उन्होंने कहा है कि न्यायपालिका के मुखिया के नाते देश के प्रति उनका एक दायित्व और जिम्मेदारी है। अगर मौजूद सामग्री के आधार पर उन्हें लगा कि (न्यायमूर्ति वर्मा को पद से हटाने की) सिफारिश करने की आवश्यकता है तो उन्हें ऐसा करने का अधिकार है। बेशक ऐसा है और उन्होंने जो सिफारिश की है उससे अलग, मेरा मानना है कि उनका दायित्व यह भी है कि अगर कोई कह रहा है कि उसकी गैर मौजूदगी में उसके घर के आउट हाउस में रखी नकदी उसकी नहीं है, उसे पता नहीं है तो यह आश्वस्त हो लिया जाये कि नकदी किसने रखी, किसकी थी किसी को फंसाने के लिए तो नहीं थी। आखिर घर का आउट हाउस बैंक, लॉकर या नकदी रखने का चेस्ट भी तो नहीं है। वैसे भी जब नकदी देखी गई तो वह वहां (शहर में) था भी नहीं। मैं नहीं जानता कानूनी और नैतिक स्थिति क्या है पर मैं यह जानता हूं कि जज बृजगोपाल हरकिशन लोया की संदिग्ध मौत के मामले में जांच की जरूरत नहीं समझने का एक कारण यह भी माना गया था कि अंतिम समय में वे साथी या भाई जजों के साथ थे। भाई जजों के साथ होने के कारण किसी की अचानक हुई मौत पर शक नहीं हो तो किसी के यह कहने पर शक क्यों हो कि नकदी उसकी नहीं है या उसे पता नहीं है कि किसकी है, किसने रखी। और बात इतनी ही नहीं है, जज लोया को अनुकूल फैसले के लिए 100 करोड़ रुपये की पेशकश थी और उन्होंने मना कर दिया था। उसके बाद उनका निधन तनाव से ही हुआ हो तो स्वाभाविक नहीं होगा जबकि ऐसी स्वाभाविक मौत से बचने के लिए किसी ने कह दिया हो कि आउट हाउस में रख दो या रखवा दो या रखवाते समय आंख मूंद लिया हो तो वह कितना दोषी है, तय करना होगा। खासकर तब जब मौजूदा समय में यह मुश्किल नहीं है। असंभव तो बिल्कुल भी नहीं है।

ऐसे समय में, इन खबरों (और इतिहास) को छोड़कर दि एशियन एज ने अमित शाह के इस आरोप को लीड बनाया है कि कांग्रेस ने पाक अधिकृत कश्मीर को पाकिस्तान के पास रहने दिया, भाजपा इसे वापस लायेगी (लेगी)। मैं नहीं जानता कि कांग्रेस ने 1947 में अगर ऐसा किया था तो कौन सा अपराध था। वैसे, किया था या अपने कब्जे में नहीं ले पाई थी इसे स्पष्ट करना चाहिये। संभव है यह वैसे ही हो जैसे 1947 में पाकिस्तान भारत के साथ रहने को तैयार नहीं हुआ था। उस समय व स्थितियों के अनुसार भले व सर्वश्रेष्ठ फैसला रहा होगा पर भाजपा को अब एतराज है तो कोई मतलब नहीं है और 10 साल माफ कीजियेगा 11 साल सत्ता में रहने के बाद नहीं ला पाये तो अब लाने का दावा कितना गंभीर है या इसे कितनी गंभीरता दी जानी चाहिये उसपर मुझे शक है और इसलिए मैं तो इसे लीड नहीं बनाता है। यह करके दिखाने वाली बात है और हाल के युद्ध के बावजूद नहीं किया जा सका तथा अचानक यु्द्ध विराम के कारणों पर सवाल का जवाब यह नहीं हो सकता है। जो भी हो, आज के अखबारों में खास बात यही है। जहां तक ट्रम्प के 25 प्रतिशत के टैरिफ की खबर है, दि एशियन एज ने इसे सेकेंड लीड बनाया है और शीर्षक है, भारत विकल्पों की जांच कर रहा है, अमेरिका एक अगस्त से 25 प्रतिशत टैरिफ की शुरुआत करेगा। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है और इसका शीर्षक है, ट्रम्प ने पेनल्टी की छड़ी उछाली। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, (अमेरिकी) राष्ट्रपति ने 25 प्रतिशत टैरिफ का खतरा भी दिखाया।  

आज हिन्दुस्तान टाइम्स में एक महत्वपूर्ण खबर है। इसके अनुसार, नोएडा के बहुचर्चित निठारी कांड के आरोपियों, सुरेन्द्र कोली और उसके नियोक्ता मोनिन्दर सिंह पंढेर को सुप्रीम कोर्ट से भी बरी कर दिया गया है। हत्या के 12 मामलों में इलाहबाद हाईकोर्ट पहले ही इन्हें बरी कर चुका है। अब सुप्रीम कोर्ट की भी पुष्टि हो गई। कोली को एक मामले में सजा हुई है। इसलिये वह जेल में ही रहेगा पर पंढेर को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया है। यह 2006 का मामला है और तमाम हत्याओं से जुड़ा हुआ था। पहले स्थानीय पुलिस और फिर सीबीआई ने जांच की और मामला अदालत में नहीं टिका। यह पुलिस और जांच एजेंसियों में व्यापत भ्रष्टाचार के कारण भी हो सकता है। अब यह सर्वविदित है कि पुलिस लोगों को भिन्न मामलों में फंसा देती है और यह वसूली के लिये भी होता है। कई बार पुलिस अपना काम ठीक से नहीं करती है और असली अपराधी को ढूंढ़ने की बजाय जो सामने दिखता है और दोषी ठहराया जा सकता है उसे नहीं फंसाने के पैसे मांगती है। पैसे न मिलें तो फंसा दिया जाता है और जाहिर है सबूत आदि न होने पर ऐसा आरोपी छूट जायेगा। दूसरी ओर पुलिस (जांच एजेंसी) अगर अभियुक्तों से पैसे लेकर पहले ही मामले को कमजोर कर दे अदालत में अपना आरोप साबित नहीं कर पायेगी। ऐसे तमाम मामले हैं और आरोपी अगर नाम से बच रहे हैं या सजा पा रहे हैं तो दोषी भी बच ही रहे होंगे। हालांकि हमारे यहां न्याय प्रक्रिया से गुजरना और निर्दोष साबित होना भी सजा ही है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामले बढ़े ही हैं। ऐसे पुराने और चर्चित मामलों में इसरो का जासूसी कांड भी था जो 1990 में सामने आया था। केरल पुलिस ने इसरो द्वारा विकसित स्वदेशी रॉकेट इंजन के डिज़ाइन वाले गोपनीय दस्तावेज़ों को बेचने के प्रयास के आरोप में कुछ वरिष्ठ एयरोस्पेस इंजीनियरों को गिरफ्तार किया। जो बाद में साबित नहीं हुआ और पता चला कि बिना बात मामला बनाया गया था।

दूसरी ओर, मुंबई ट्रेन धमाकों के मामले में मोहम्मद अली शेख को बॉम्बे हाई कोर्ट ने साजिश के आरोप से बरी कर दिया है। नवभारत टाइम्स डॉट इंडिया टाइ्म्स डॉट कॉम की एक पुरानी खबर के अनुसार, शेख ने टाइम्स ऑफ इंडिया के रिपोर्टर को बताया कि “हाई कोर्ट ने हमें रिहा कर दिया है। यह सत्य की जीत है। अगर जरूरत पड़ी तो हम सुप्रीम कोर्ट में भी अपनी लड़ाई लड़ेंगे और हमें यकीन है कि हम ही जीतेंगे।”  शेख ने एटीएस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “हमें झूठे मामले में फंसाया गया, प्रताड़ित किया गया और अपमानित किया गया। यहां तक कि मेरे 11 साल के बेटे को भी एक एटीएस अधिकारी ने थप्पड़ मारा था।” उन्होंने बताया कि “एटीएस अधिकारी मेरे घर आते थे और मेरे परिवार को परेशान करते थे। उन्होंने मुझे बंदूक दिखाकर धमकाया और सरकारी गवाह बनने के लिए कहा। उन्होंने 10 लाख रुपये, दुबई में नौकरी और 10,000 रुपये मासिक खर्च देने की पेशकश भी की, लेकिन मैंने स्वीकार नहीं किया क्योंकि हम निर्दोष थे।” खबर यह भी है कि गिरफ्तार होने के पहले सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद अली शेख अपने क्षेत्र में वीडियो पार्लर और जुआ जैसे अवैध धंधों को बंद करने के लिए लोगों को समझाते थे। इस कारण उनके क्षेत्र में तमाम वीडियो पार्लर और जुए के अड्डे बंद हो गये। इससे पुलिस को मिलने वाला हफ्ता बंद हो गया। इस वजह से उन्हें लगातार परेशान किया जाने लगा और किसी बड़े मामले में फंसाने की धमकी दी जाती थी। 11 जुलाई 2006 में मुंबई ट्रेन ब्लास्ट हो गया। इस ब्लास्ट की जांच कर रही एटीएस ने दावा किया था कि एक पाकिस्तानी व्यक्ति मोहम्मद अली शेख के घर पर आया था। उसने बम बनाए थे, जिन्हें 11 जुलाई 2006 को ट्रेनों में लगाया गया। पुलिस के पास इसका कोई सबूत नहीं था बल्कि उसके अनुसार यह बात शेख के एक रिश्तेदार ने बताया….बस इसी बात पर एक व्यक्ति को 19 साल जेल में बंद कर दिया। मुहम्मद अली शेख को बंदूक की नोक पर धमकाया गया, एनकाउंटर की धमकी दी गई मगर वे अडिग रहे। उनके सरकारी गवाह ना बनने के कारण ही सभी 12 लोग बाइज़्जत बरी कर दिए गए और वह खुद 21 जुलाई की शाम को नागपुर जेल से रिहा होकर 22 जुलाई को मुंबई के गोवंडी स्थित अपने घर आ गए।

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