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सियासत

जस्टिस स्वर्ण कांता तो बहुत ढीठ निकलीं, केजरीवाल वाला केस कतई नहीं छोड़ेंगी!

संजय कुमार सिंह-

इधर प्रशांत, उधार बांसुरी – मामला फिर साफ है, पूरी तरह!

बांसुरी स्वराज ने अरविन्द केजरीवाल पर आरोप लगाया है कि वे बुली (Bully) हैँ। आपने इस देश की माननीय न्यायपालिका की एक महिला सदस्य पर दबाव डालने की कोशिश की है। पर मामला बिल्कुल अलग है। केजरीवाल ने सिर्फ आशंका जताई है। यह दबाव हो ही नहीं सकता है। दबाव तब होता जब आम आदमी पार्टी के लोग अदालत के बाहर वह सब कहते जो उन्होंने अदालत में माननीय जज साहिबा के समक्ष स्वयं कहा है। अगर कोई वकील कहता तो भी कहा जा सकता था कि दबाव डालने के लिए वकील की सेवा ली। पर ऐसा नहीं है। मोटे तौर पर मामला केंद्र सरकार का, सीबीआई और एलजी के जरिए, पीएमएलए कानून के दुरुपयोग से विपक्षी दल और नेता को बदनाम करने का लगता है। वरना मुख्य मंत्री (और सरकार तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों) के खिलाफ स्पष्ट सबूत के बिना रिश्वत लेने या भ्रष्टाचार के आरोप लगाए ही नहीं जाने चाहिए। जांच और गिरफ्तारी तो बहुत दूर की बात है। अगर केजरीवाल ने पैसे लिए तो इलेक्टोरल बांड से क्या हुआ, पीएम केयर्स के चंदे कैसे आए? बिना जांच सब ठीक मान लिया जाए और मान लिया गया ही है। लेकिन केजरीवाल के खिलाफ जांच-कार्रवाई सब जरूरी है उस जज की अदालत में जिनके बच्चों को केंद्र सरकार से पैसे मिल रहे हैं।

कहने की जरूरत नहीं है कि बांसुरी स्वराज न्यायमूर्ति की ओर से हो नहीं सकती हैं। होना भी नहीं चाहिए इसलिए भाजपा की ओर से हैं और यह भी भाजपा के इरादों (और प्रयासों अगर कोई हो) की पुष्टि करता है। बांसुरी स्वराज भाजपा नेता की बेटी हैं, सांसद हैं इसलिए स्वतंत्र तो नहीं मानी जा सकती हैं। दूसरी ओर प्रशांत किशोर ने कहा है, स्पष्ट रूप से न्यायमूर्ति शर्मा ने किसी मामले से जजों के अलग होने (recusal) संबंधी कानून को नहीं समझा है। किसी केस से जज के अलग होने का मामला तब बनता है जब वादी को पक्षपात का उचित संदेह हो। वास्तविक पक्षपात साबित करना आवश्यक (ही) नहीं है। इस मामले के कई तथ्य केजरीवाल के मन में पक्षपात का वाजिब संदेह पैदा करेंगे। गौरतलब है कि प्रशांत भूषण मोदी विरोधी जरूर हैं लेकिन केजरीवाल के प्रचारक नहीं हैं। तथ्य है कि वे केजरीवाल के साथ थे और बहुत समय बाद सार्वजनिक रूप से कुछ ऐसा कहा है जो केजरीवाल के पक्ष में है।

कानून और राजनीति को समझने वाले निष्पक्ष नहीं तो मोदी विरोधी कहे जा सकने वाले राजदीप सरदेसाई ने लिखा है, दिल्ली हाई कोर्ट की जज ने केजरीवाल मामले में खुद को अलग करने से इनकार कर दिया। है ना आश्चर्य की बात? हाई कोर्ट की जज खुद ही अपने मामले में प्रतिवादी और जज बन गई थीं, क्योंकि उन्हीं की तरफ से खुद को अलग करने की अपील की गई थी। और वादी, जो पूर्व मुख्यमंत्री हैं, को बिना किसी आपत्ति के फैसले को स्वीकार करना होगा। जैसा कि हम सभी को करना चाहिए। लगता है न्यायपालिका अपने नियम खुद बना सकती (रही) है। ऐसा ही पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के मामले में हुआ था। उनपर एक महिला कर्मचारी ने आरोप लगाए थे, तब नारी शक्ति वंदन ऐसे हुआ कि अपने मामले में फैसला जज साब ने खुद ही किया, फिर राम मंदिर का फैसला हुआ और राज्यसभा की सदस्यता ईनाम में मिली। इसके बाद भी बांसुरी कह रही हैं कि केजरीवाल बुली कर रहे हैं।

जज साहिबा का बचाव भाजपा, केंद्र सरकार उसके लोग, सीबीआई, सीबीआई के वकील कर रहे हैं। बच्चों के जरिए उन्हें सरकारी लाभ मिल रहे हैं। केजरीवाल सत्ता की ताकत के कारण जेल रहे, सरकार गई, चुनाव हार गए फिर भी बुली कर रहे हैं। बांसुरी स्वराज वंशवाद विरोधी पार्टी औऱ नेता की बनाई सांसद हैं। आगे क्या कहूं? हे राम!


नरेश घोष-

न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा का बयान न्यायिक साहस पर एक प्रवचन जैसा लगता है- “मैंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता करना नहीं सीखा,” “मैं किसी दबाव में नहीं झुकूंगी।” ये शब्द भारी भरकम हैं, लेकिन तथ्य एक बिल्कुल अलग कहानी बताते हैं।

कल ही सुबह उन्होंने नरेश बालियान के मामले से स्वयं को अलग (recuse) कर लिया। तब उस अडिग “कर्तव्य-बोध” का क्या हुआ ? उस स्थिति में किसने दबाव डाला था? या फिर जब परिस्थितियाँ अनुकूल लगीं, तो अलग हो जाना स्वीकार्य हो गया ?

अगर एक मामले में अलग होना “न्यायिक विवेक” कहलाता है, तो दूसरे मामले में इसी तरह के अनुरोध को “न्यायाधीश पर दबाव” क्यों बताया जाता है? यह सिद्धांत नहीं- यह स्पष्ट दोहरा मापदंड है।

ऊँचे-ऊँचे आदर्शों की बातें करना आसान है, लेकिन निरंतरता और पारदर्शिता ही ईमानदारी की असली कसौटी हैं। जब सिद्धांत मामले के अनुसार बदलते दिखते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

न्यायपालिका की विश्वसनीयता बड़े-बड़े बयानों पर नहीं, बल्कि भरोसे पर टिकी होती है। और ऐसे विरोधाभास उस भरोसे को गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाते हैं।


गिरिजेश वशिष्ठ-

मैंने आदेश नहीं पढ़ा लेकिन अखबारों में जो छपा है उसके अनुसार केजरीवाल के मामले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को स्वैच्छिक रूप से केस से हट जाना चाहिए था. केजरीवाल के निजी संबंधों और कनफ्लिंक आफ इनट्रस्ट वाले आरोपों का तो उत्तर दिया गया है. लेकिन जस्टिस साहिबा ने जो आधार लिया वो पर्याव्त नहीं है. उन्होंने कहा कि ठोस सबूत चाहिए. उसके बगैर रिक्यूजल नहीं हो सकता. ये रिक्यूजल है रिमूवल तो है नहीं. ठोस सबूत अगर पक्षपात के मिले तो रिमूवल का केस बन जाएगा.

केजरीवाल ने जिन तर्कों का सहारा लिया वो जीत ठाकुर बनाम भारत संघ (1987) से जुड़े थे. सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले में कहा गया था कि यदि किसी पक्ष को पक्षपात की “वाजिब आशंका” हो, तो जज को खुद को अलग कर लेना चाहिए.

न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए यह न्यायिक प्रक्रिया का एक मूल सिद्धांत है. अगर एक पक्ष को आप पर भरोसा ही नहीं. आप संघ के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हो. आप बता दो कि कांग्रेस के कितने वकीलों के संस्थानों में आप गए. आप अगर छात्रों से संवाद के लिए जाते हो तो वहां भी गए होगे.

सबसे ठोस तर्क था कि निचली अदालत के जिस विस्तृत आदेश (40,000 पन्नों की समीक्षा के बाद आया डिस्चार्ज ऑर्डर) को जस्टिस शर्मा ने महज 5 मिनट में प्रभावी रूप से पलट दिया, वह न्यायसंगत नहीं लगता

केजरीवाल ने दावा किया कि इस मामले से जुड़े अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर जस्टिस शर्मा ने जो सख्त टिप्पणियां की थीं, उनसे ऐसा लगा मानो उन्हें पहले ही दोषी मान लिया गया हो

उन्होंने दलील दी कि जस्टिस शर्मा द्वारा दिए गए पिछले कई आदेशों को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया है, जो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हैं .

केजरीवाल ने दलील दी कि जस्टिस शर्मा द्वारा पिछले आदेशों में दी गई सख्त टिप्पणियों से ऐसा आभास होता है कि मामला सुनने से पहले ही एक राय बना ली गई है, जिसे कानून में ‘न्यायिक हठ’ (Judicial Obstinacy) कहा जाता है

उन्होंने 2022 के उस अदालती आदेश का हवाला दिया जिसमें ईडी की मांग पर सत्येंद्र जैन के मामले में ट्रायल जज को बदल दिया गया था। केजरीवाल ने तर्क दिया कि उनका मामला उस स्थिति से भी अधिक मजबूत है

तो इन सभी तर्कों पर कही कुछ प्रकाशित नहीं हुआ. सत्येन्द्र जैन के मानले में ज़रूर उन्होने कहा कि दोनों मामले अलग थे. लेकिन सत्येन्द्र जैन के मामले में रवैया अलग नहीं था.

बेहतर ये होता कि जज साहिबा स्वेच्छा से रेक्युजल ले लेतीं अब बात न्याय पालिका की नाक की हो गई है. अदालतों के रवैये अड़ियल होंगे क्यंकि एक केस के लिए न्याय पालिका की साख को तो दांव पर लगाया नहीं जाएगा. अदालत की कार्रवाई के वीडियो सोशल मीडिया से हाईकोर्ट ने हटवा ही दिये है ताकि जनता भी फैसला कर सके. पर बेहतर होता कि केजरीवाल के इन आरोपों पर अदालत ने ज्यादा डिटेल्ड उत्तर दिए होते. बताया होता कि सीबीआई पर टिप्पणियां, खराब जांच के लिए दंड के आदेश बगैरह क्यों अदालत को प्रथम दृष्ट्या गलत लग गए. जो भी है ये न्यायपालिका के लिए अच्छा समय नहीं है.

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