
उदय प्रकाश-
दोस्तो, मैंने कल रात आपसे कहा था कि आज मैं एक ऐसी सूचना दूँगा, जो रचना, रचनाकार, पात्र और कथानक की अ-विभक्त या अविभाज्य अंतरसंबंध का एक उदाहरण प्रस्तुत करेगी।
इसके पहले कि मैं वह सूचना आप तक पहुँचाऊँ, आपसे अनुरोध करूँगा कि ‘मोहन दास’ के कुछ अंशों को आप याद करें या अगर आपके पास वह किताब है, तो उसमें इन अंशों को एक बार फिर पढ़ लें।
‘1 : मुझे लगता है, हम पूँजी और सत्ता …कैपिटल एंड पॉवर के एक बिलकुल नये रूप के सामने हैं। मोहन दास इज़ बीइंग डिनाइड ऑफ़ अ सिंपल जस्टिस, क्योंकि वह न्याय को ख़रीद नहीं सकता! ओह!’
गजानन माधव मुक्तिबोध के माथे की नस फूल रही थी। उनकी उँगलियाँ काँप रहीं थीं। वे बेचैन होकर खड़े हो गये थे। उन्होंने बुझी हुई बीड़ी को देखा और ज़ेब से माचिस निकालकर उसे फिर सुलगाने लगे..
‘हर सिद्धांत ख़त्म हो सकता है। …किसी समय बहुत परिवर्तनकारी लगने वाली बौद्धिक और दार्शनिक संरचनाएँ बदले हुए समय में बिलकुल खोखले वाग्जाल, अनर्गल बकवास और ठगों के प्रवचनों में बदल सकती हैं। इतिहास में ऐसा बार-बार हुआ है। लेकिन …’
उन्होंने बीड़ी का एक बहुत गहरा कश भीतर खींचकर साँस थोड़ी देर के लिए रोक ली। शायद वे अपनी चढ़ती हुई बेचैन साँसों को निकोटीन के धुएँ से शांत करना चाहते थे। उन्हें खांसी आ गयी। बायें हाथ से उन्होंने अपनी छाती को कुछ देर तक दबाये रखा, फिर खरखराती आवाज़ में कहा:
‘लेकिन मनुष्य के भीतर एक चीज़ ऐसी होती है, जो कभी भी, किसी भी युग में, किसी भी तरह की सत्ता द्वारा मिटायी नहीं जा सकती! … और वह है …न्याय की आकांक्षा! डिज़ायर फॉर जस्टिस इज़ आलवेज़ इममॉर्टल …न्याय की आकांक्षा अमर है!’
2: मेरी आँखें ऊपर उठीं। सामने से वह लँगड़ाता हुआ चला आ रहा था। उसके शरीर पर पुरानी बेरंग, पैबंद लगी पैंट और चीथड़ा हो चुकी चौखाने वाली क़मीज़ नहीं, सिर्फ़ एक लँगोटी भर बची थी। उसके सिर के बाल गिर चुके थे और आँखों में गोल फ्रेम का सस्ता-सा चश्मा लगा था। वह धीरे-धीरे डगमगाता हुआ, लाठी के सहारे, किसी बीमार बूढ़े की तरह चल रहा था।
‘…काका, राम राम!’ उसने मुझे देखकर हाथ जोड़े। ….
लाठी टिकाकर वह वहीं ज़मीन पर बैठ गया। उसके गले से कराह के साथ भर्राई हुई आवाज़ निकली। लेकिन वह आवाज़ जिस भाषा में थी, वह भाषा थी ‘राजभाषा’ हिन्दी। उसने कहा :
‘मैं आप लोगों के हाथ जोड़ता हूँ। मुझे किसी तरह बचा लीजिये। मैं किसी भी अदालत में चलकर हलफ़नामा देने के लिए तैयार हूँ कि मैं मोहन दास नहीं हूँ। मेरे बाप का नाम काबा दास नहीं है। और वह मरा नहीं है, अभी ज़िंदा है। बहुत मारा है मुझे पुलिस ने बिसनाथ के कहने पर। सारी हड्डियाँ तोड़ डालीं। साँस तक लेने पर छाती दुखती है।
‘…जिसे बनना हो, बन जाये मोहन दास। मैं नहीं हूँ मोहन दास। मैंने कभी कहीं से बीए नहीं किया। कभी टॉप नहीं किया। मैं कभी किसी नौकरी के लायक़ नहीं रहा। बस मुझे चैन से ज़िंदा रहने दिया जाय। अब हिंसा मत करो। जो भी लूटना हो, लूटो। अपने-अपने घर भरो। लेकिन हमें तो मेहनत पर जीने दो। काका, आप लोग मेरा साथ दो।..’
तो अब है वह सूचना, जो ऐसी लाखों-करोड़ों अनगिनत सूचनाओं में से सिर्फ एक सूचना है, जो किसी भी टीवी न्यूज चैनल, अख़बार, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं इत्यादि में कहीं नहीं दिखाई देगी। जन-संचार माध्यम के किसी भी प्रारूप में कहीं नहीं मिलेगी। मेरे पास सिर्फ़ यही कुछ माध्यम हैं, जिसके द्वारा मैं वह सूचना आप तक पहुँचा रहा हूँ:
परसों, 23 नवंबर, 2024, दिन, शनिवार को कहानी के उस पात्र की मृत्यु किडनी फेलियर से हो गई, जिसका नाम कहानी में ‘मोहन दास’ था। इसकी सूचना और इसकी पुष्टि ‘मोहन दास’ कहानी के उस पात्र ने की, जिसने मोहन दास की मदद की और जो उसका वकील था। कहानी में उसकी मृत्यु एक ट्रक के नीचे आ जाने से पहले ही हो चुकी थी और जिसका नाम ‘हर्षवर्द्धन सोनी’ था।
मैं इस समय अपने गाँव में हूँ। मेरे साथ मोहन दास पर शोधकार्य करने वाली एक छात्रा भी हैं। उन्हें कल ‘मोहन दास’ से मिलने उसके गाँव जाना था, लेकिन रात 21.00 pm के आस-पास यह स्तब्ध करने वाली सूचना उन्हें मिली। हर्षवर्द्धन सोनी को भी इस सूचना ने स्तब्ध कर दिया।
“मोहन दास” 2005 में लिखी गई थी, 2006 में वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली से इसका पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था। ऊपर पोस्ट में जो अंश उद्धृत किए गए हैं, वे 2020 में प्रकाशित “मोहन दास” के छठवें संस्करण में से हैं।


