देश के सबसे साफ शहर कहे जाने वाले इंदौर में दूषित पानी पीने से 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है, लेकिन सत्ता का जवाब आता है— “फोकट का सवाल मत पूछो… घंटा वहाँ होकर आए हो।” यह सिर्फ एक मंत्री की बदज़ुबानी नहीं, बल्कि सवालों से डरती सत्ता और चुप कराई जा रही पत्रकारिता की खौफनाक तस्वीर है।
NDTV के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग द्वारी ने जब ज़मीन से जुड़ा, आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा सवाल पूछा, तो मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय न सिर्फ मर्यादा भूल बैठे, बल्कि एक जिम्मेदार पत्रकार को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया गया। सवाल था— मौतों का मुआवजा, गंदे पानी की जिम्मेदारी और प्रशासन की जवाबदेही। जवाब मिला— “घंटा।”
इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध बन चुका है? और क्या सत्ता के सामने खड़े होने की हिम्मत अब सिर्फ कुछ गिने-चुने पत्रकारों तक सिमट कर रह गई है?
जब लोग मर रहे हों और जनप्रतिनिधि झूलों पर फोटो खिंचवा रहे हों, तब अनुराग द्वारी जैसे पत्रकारों का सवाल पूछना सिर्फ पत्रकारिता नहीं, लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है। आज सवाल यह नहीं है कि मंत्री ने क्या कहा—सवाल यह है कि क्या मीडिया अपने सवाल पूछने वाले पत्रकारों के साथ खड़ा होगा?
अजय प्रकाश-
10 लोगों की पानी पीने से मौत हो गई और जवाब मिला ‘घंटा’….आपको इस पत्रकार के साथ खड़ा होना चाहिए…सवाल पूछने वाले पत्रकारों की हिम्मत बनने का सबसे महत्वपूर्ण वक्त यही होता है…
राकेश कायस्थ-
प्रिंट, टेलिविजन और डिजिटल सारे माध्यमों को मिला-मिलाकर भारत में बहुत कम पत्रकार ऐसे हैं, हमेशा इस बात के लिए चिंतित रहते हैं कि उनकी न्यूट्रिलिटी पर कही से धब्बा ना लगने पाये। अनुराग द्वारी ऐसे ही पत्रकारों में एक हैं। मैं उन्हें बरसों जानता हूँ और ये भी जानता हूँ कि जमीन जुड़ी पत्रकारिता के लिए उन्होंने किस तरह मोटी सैलरी वाली नौकरियों के कई ऑफर ठुकराये।
आम आदमी के सरोकार से जुड़ा उनका एक सवाल सुनिये और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की बदत्तमीजी देखिये। यह न्यू इंडिया का एक प्रतिनिधि विजुअल है, जहाँ गुंडागर्दी के बल पर सत्ता की सीढ़ियां चढ़कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा एक आदमी देश के एक सम्मानित पत्रकार से कह रहा है” फोकट का सवाल मत करो। तुम घंटा वहाँ होकर आये हो।”
सवाल कथित तौर पर देश के सबसे साफ शहर इंदौर में गंदा पानी पीने से लोगों की मौत और उनके मुआवजे का था।
विजय अक्षित-
Anurag Dwary भैया, क्या ही बहादुर आदमी हैं आप। भाजपा के बदतमीज मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और उसके चमचे दोनों को जो औकात दिखाया वो गजब है। इसे कहते हैं पत्रकारिता। वैसे आप तो हमेशा अलग ही पत्रकारिता किए हो। लेकिन आज कैलाश विजयवर्गीय को पलट कर दिया गया तमाचा जीवन भर उस बदतमीज को याद रहेगा। क्या गजब औकात दिखाई इन्हें। एकदम आत्मसम्मान से समझौता नहीं करना है।
देश के सबसे साफ शहर में गंदा पानी पीने से 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिस शख्स पर लोगों को साफ पानी पिलाने का जिम्मा है वो सवालों को फोकट बता रहे हैं हमारे सवालों को “घंटे” में उड़ा रहे हैं, नील कुर्ते में जो शख्स चमचागिरी पर ज्यादा उतारू है इलाके का पार्षद है जहां इन बेगुनाह लोगों की मौत हुई है जब लोग मर रहे थे तो वो झूले में झूल कर तस्वीर खिंचवा रहा था.. – अनुराग द्वारी
शरद शर्मा-
NDTV के वरिष्ठ पत्रकार ने एक सामान्य और बेहद ज़रूरी सवाल पूछ लिया तो देख लो मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री तमीज़ से बात करना ही भूल गए।
गलती मंत्री की नहीं मीडिया की ही है क्योंकि सरकारों से सवाल करना ही भूल गए हैं। अचानक किसी ने सवाल पूछने की हिम्मत दिखा दी तो मंत्री भाषा की मर्यादा और तमीज़ ही भूल गए।
अब देखना है क्या NDTV अपने पत्रकार के लिए स्टैंड लेगा? बाक़ी Anurag Dwary आपने सही जवाब दिया मुँह पर और अच्छे से अपने सवाल पर अड़े रहे इसलिए आपको बधाई।
दीपेश पटेल-
पत्रकार – बहुत लोगों को अभी रिफंड का पैसा नहीं मिला है जो बोला गया था और पीने के पानी का ठीक व्यवस्था नहीं है।
कैलाश विजयवर्गीय – अरे छोड़ो यार तुम फोकट का प्रश्न मत पूछो
पत्रकार – मैं तो वहां होकर आया हूं
कैलाश विजयवर्गीय – क्या घंटा होकर आए हो।
सिर्फ 10 कीड़े मकोड़े से लोग मर गए हैं तो पत्रकार और कुछ देश के कुछ ज्यादा जिम्मेदार लोग सवाल उठा रहे हैं, क्यों देशद्रोही बनना चाहते हैं अगर दूषित पानी पीकर मर नहीं सकते हैं तो पाकिस्तान चले जाओ ना।।
कैलाश का माफीनामा…



