कन्हैया की राजनीति को समझिए

कन्हैया की राजनीति को समझिए। वो aisf का सदस्य है। aisf, cpi का छात्र विंग है। cpi आजादी के पहले से ही भारत में सक्रिय है। १९६४ में इसमें विभाजन हुआ। जो अधिक क्रांतिकारी थे, वो चीन के सवाल पर cpm में चले गए। १९६७ में cpi ml बना। चारू मजुमदार नेता थे। नक्सलवाद इन्हीकी विचारधारा को कहते हैं। इन्होने बहुत ही हिंसक रास्ता लिया। ७५ में इनकी मृत्यु के पहले ही ये दल छिन्न भिन्न होने लगा था। सब भूमिगत होकर बिखर गए यहाँ वहाँ। उनमें से एक दल ने भूमिगत रास्ते की व्यर्थता को समझा और छोड़ दिया और जनसंगठन बनाकर पूरी तरह खुली राजनीति करने लगे। इनके छात्र संगठन का नाम पहले पीएसओ था। मैं अपने छात्र जीवन में उसका सदस्य था।

१९९० में इसका नाम बदलकर aisa हो गया। १९९६ में इस दल ने पूरी तरह हिंसा का रास्ता छोड़ दिया और संसदीय राजनीति में आ गया। तब से चुनाव आयोग द्वारा प्रमाणित राजनैतिक दल है। बिहार और झारखंड विधान सभा में इनके सदस्य चुनकर जाते हैं। आज की तारीख में cpi, cpm, cpiml, तीनों भारत के संविधान के भीतर रहकर संसदीय राजनीति ही करते हैं। भारत में केवल एक दल है जो भारत के संविधान को नकार कर हिंसक क्रांति करने के पक्ष में हैं- cpi maoist. कहा जा रहा है उमर खालिद उस संगठन का है। कन्हैया cpi की धारा का है। जो कि सबसे कम क्रांतिकारी धारा है। कन्हैया और उमर खालिद में बहुत गहरा भेद है। दोनों वामपंथ के दो छोर पर हैं। लेकिन वो दोनों एक ही कैम्पस में हैं। कन्हैया उमर खालिद के अभिव्यक्ति के अधिकार के लिए लड़ रहा है। उसकी किसी हिंसक गतिविधि, जो उसने की हो सकती हो, का समर्थन नहीं कर रहा। और, यह उसका फर्ज़ है- वो छात्र संघ का अध्यक्ष है। वो नहीं लड़ेगा तो कौन लड़ेगा?

यदि उमर खालिद के केस में उसके खिलाफ राज्य के तख्तापलट की कोशिश का कोई सुबूत मिलेगा तो राज्य को पूरा अधिकार होगा कि वो उसको सजा दे। मगर केवल मुर्दाबाद जिन्दाबाद कहने भर से किसी का राजद्रोह सिद्ध नहीं होता। आप इससे, उनसे, किसी से, कुछ भी मतभेद रख सकते हैं। बहस मुबाहिसा कर सकते हैं- आप के देश के ही लोग हैं। पर राज्य ने उनको मारने पीटने, बदनाम करने का हक आपको नहीं दिया। हर व्यक्ति को बोलने का अधिकार है। कोई इंशाअल्ला बोलता है तो आपको लगता है कि हनुमान जी की दया से क्यों नहीं बोलता। तो इसमें आपकी गलती है। आप हनुमान जी का प्रचार नहीं कर पाए ठीक से। आप अपनी गलती के लिए किसी दूसरे को कैसे पीट सकते हैं? दूसरी लाइन को काटने से कोई लाइन बड़ी नही होती। अपनी लाइन पर काम करने से अलबत्ता होती है। शुभमस्तु!

लेखक अभय तिवारी मुंबई में रहते हैं. छात्र जीवन में कामरेड रहे अभय रंगकर्म से लेकर सिनेमा समेत कई किस्म की रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं.

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Comments on “कन्हैया की राजनीति को समझिए

  • Logo ko problem ye nahi ki .. Inshallah bola.
    Logo ko problem is bat se hai ki .. Usse pehle ..” Bharat ke 100 tukde honge bola”.
    Bat ko ghumaiye nahi.

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  • Tiwari ji, Aap jaise Hinduon ki wajah se aaj Hindu Bantey hue hain aur “Ugrawad ke samarthan me narey laga rahey hain”, “Desh ko Gariya rahey hain”. Kya yahi hai Rashtrabhakti…? JNU jaise sansthan me padhney aap gaye hain, na ki “Pakistan Zindabad, Afzal Guru Zindabad” kerney gaye hain… Ye kya hai bhai sab? Sharm Kijiye aur mujhey aur sarey hinduon ko Sharm aati hai ki aap Brahman Hindu hote hue bhi “Unn Naron ki baat nahi ker rahey, balki Kanhaiya jaise logon ki Madad ker rahey hain Desh me Sendh Laganey ke liye… Aap se behtar to wo Muslim hi hain, jo kam se kam Khul ker Afzal Guru aur desh ke khilaf narey nahi laga rahey. Aur jo laga rahey, wo bhi aapke kanhaiya jaise hi Rashtradrohi kahey jatey hain…

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