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आज के अखबार, खबरें बता रही हैं कि इस व्यवस्था में ईमानदार और निष्पक्ष पत्रकारिता हो ही नहीं सकती

संजय कुमार सिंह

आइये, आज देखें कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग का बचाव कैसे किससे करवा रही है। मोटे तौर पर इसका सार है, प्रधानमंत्री 75 के, प्रिय प्रवक्ता और प्रचारक 38 का। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार जब मुश्किल में हैं तो उनके शिक्षा संस्थान ने उन्हें डिस्टिंग्यूश्ड अल्मुनाय अवार्ड (डीएए) यानी विशिष्ट पूर्व छात्र सम्मान देने की घोषणा की है। मेरी चिन्ता यह है कि क्या प्रधानमंत्री के साथ भी ऐसा होगा या कब होगा और नहीं होगा तो क्या होगा? आज देश के दो नेताओं – एक साठ एक चालीस भी नहीं (38) की चर्चा करूंगा और बताउंगा कि भाजपा कैसे पद और प्रतिष्ठा का लालच देकर लोगों को अपने पाले में करती है अपना काम करवाती है। यह पैसे देकर दल-बदल करवाने या काम करने वालों को ईनाम देने के अलावा है। अगर कोई ‘लोया होने’ से भी न डरे तो उसके घर पूजा करने पहुंच जाना और रिटायरमेंट के बाद विशेष अनुरोध पर बंगला देने की अपील मान लेना, समय पर न देना और फिर बंगला खाली न करने की खबर छपना, बदनाम करना और दबाव में लेने की कोशिश सब सार्वजनिक है। मध्य प्रदेश की सरकार गिराने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का दल बदल करना उनका मंत्री बनना किससे छिपा है। यह भ्रष्टाचार का खुला खेल है पर मुद्दा ही नहीं है। बहाना यही कि पहले भी होता था लेकिन राहुल गांधी ऐसे नहीं हैं, उन्हें अपने जैसे लोग नहीं मिल रहे हैं तो उसकी आलोचना और इसे उनकी कमजोरी बताने की राजनीति भी चर्चा का मुद्दा नहीं है। राहुल गांधी के समर्थन में लिखी गई एक किताब नहीं बिकी, ईवीएम पर मेरी किताब की कोई पूछ नहीं है लेकिन नरेन्द्र मोदी पर किताबों की गिनती नहीं है। इनमें पूर्व चुनाव आयुक्तों की किताब शामिल है और पूर्व सेना प्रमुखों की किताबों को रोका जाना भी सर्वविदित है लेकिन यह सब भी (मीडिया के लिए) मुद्दा नहीं है।

आज की दो बड़ी खबरें हैं- लद्दाख में जेन जी की भारी हिन्सा, 4 की मौत और 100 का जख्मी या घायल होना (हिन्दुस्तान टाइम्स), भाजपा का दफ्तर जला दिया जाना और इसे प्रमुखता से सच्चाई के साथ पूरी खबर निष्पक्ष रूप से बताना। मुझे लगता है कि अलग-अलग अखबारों में और ज्यादातर में यह खबर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का बचाव करते हुए लिखी और पेश की गई है। अगर मैं गलत हूं तो जो स्थितियां हैं उसमें यह चर्चा का विषय तो है ही। पर स्थितियां ऐसी नहीं है कि इस पर चर्चा हो सके या कोई करवा सके। होने को तो स्टैंड अप कॉमेडी नहीं हो पा रही है और जो हुई है उसके लिए तोड़-फोड़, करने-कराने वालों को परेशान किये जाने की शिकायतों पर लगभग कुछ नहीं हुआ है। जो हो रहा है उसमें शक्तिशाली लोगों से बचने या उन्हें नाराज नहीं करने के उपाय साफ दिखते हैं। पर मुद्दा यह भी नहीं है कि कांग्रेस ने बहुमत में होने पर यही किया होता तो भाजपा कहां होती। आरएसएस पर प्रतिबंध तो स्वतंत्रता के बाद ही लग गया था। हालांकि आज यह भी मुद्दा नहीं है। आज की दूसरी खबर है, पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और उसमें पारित प्रस्ताव। उसकी खबर जो देशबन्धु में लीड की तरह छपी है और बाकी कई अखबारों से गायब है। दि एशियन एज में यह खबर लीड है लेकिन पटना डेटलाइन से नहीं है। हालांकि, शीर्षक समेत खबर ठीक ही कही जायेगी। दिल्ली में बैठकर किसी संवाददाता ने टेलीविजन और सोशल मीडिया समेत दूसरे माध्यमों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर लिखी होगी। नवोदय टाइम्स में पटना डेटलाइन से एजेंसियों की खबर है। इसका शीर्षक है, राहुल गांधी ने कहा, आरक्षण की 50 फीसद सीमा तोड़ेंगे। खबर के पहले पैरे में नही लिखा है कि यह कांग्रेस कार्य समिति की बैठक की है। देशबन्धु में आज यह खबर लीड है और छह कॉलम का इसका शीर्षक है, देश में सुनियोजित तरीके से हो रही है वोट चोरी

अमर उजाला में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक पहले पन्ने पर नहीं है और लीड के ऊपर टॉप पर छपी खबर का शीर्षक है, एक्स को मानना होगा कानून, सोशल मीडिया का नियमन जरूरी। यह कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश है और कानून का पालन किसी को भी करना होगा – सर्वविदित सत्य है। इसमें खबर क्या है और इतनी प्रमुखता देने का मकसद शीर्षक के दूसरे हिस्से में है – सोशल मीडिया का नियमन जरूरी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह भारतीय जनता पार्टी के एजंडा में से एक है और हाईकोर्ट ने कहा है तो इसे सरकार के समर्थन के रूप में पेश करने के लिए प्रमुखता देकर सरकार की सेवा कई गई है या करने की मंशा होगी या विचारधारा ऐसी ही है। भले ही इसे पत्रकारिता नहीं कहने या मानने का कोई कारण मेरे पास नहीं है। मेरे तीन हिन्दी अखबारों में पटना में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की खबर का हाल जानने के बाद आपको यह भी जानना चाहिये कि अंग्रेजी के मेरे छह अखबारों में से तीन में पहले पन्ने पर, या उससे पहले के अध पन्ने पर यह खबर नहीं है। इनमें एक कोलकाता का टेलीग्राफ है जो सरकार विरोधी होते हुए भी पहले पन्ने पर आधे पन्ने का विज्ञापन रोज पाता है। भले सरकारी अखबारों की तरह अक्सर विज्ञापनों का जैकट नहीं पहनता है। सेवा में बिछे अखबार को एक दिन में एक से ज्यादा जैकेट भी पहनते हैं लेकिन खबरें ठीक से छापते तो मुझे चिन्ता नही होती। खबरों के साथ खिलवाड़ का कारण चाहे जो हो, भारी विज्ञापन भी हो और लीड लद्दाख की खबर को बनाना तय किया हो तो अंदर विवरण वाली खबरों में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक, खास कर चुनाव चोरी का मुद्दा जरूर होना चाहिये था। नहीं होने का मतलब और कारण समझने या उसका अनुमान लगाने के लिये आप स्वतंत्र हैं।

मोटे तौर पर आज के अखबारों की खबर यही है कि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक की खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि उसका एक शीर्षक वोट चोरी पर हो सकता है। यही नहीं, पास किये गये दो प्रस्तावों में एक वोट चोरी है। कुल मिलाकर, यह वोट चोरी के आरोपों को गंभीरता नहीं देना और इसमें सरकार व चुनाव आयोग के साथ मिलीभगत का बहुत साफ सा मामला है। भाजपा के लोग और भाजपा या नरेन्द्र मोदी से ईनाम पाने या पाने की उम्मीद करने वाले लोग ऐसा करें तो बात समझ में आती है। नौकरी करने वाले लोग क्यों कर रहे हैं और क्या अखबारों के मालिक, संपादक सरकार से मिलने वाले लाभ के फेर में इस हद तक गिर या फंस गये हैं कि अपने कर्मचारियों को भी पक्षपात करने के लिए मजबूर कर रहे हैं या पक्षपातियों को ही नौकरी में भर लिया है। पूरा मामला जो भी हो, स्थिति बहुत ही गंभीर है और ताज्जुब की बात है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र होने या दिखने वाले लोग, संस्थान भी पूरी बेशर्मी से सरकार और इस सिस्टम का बचाव कर रहे हैं उनका पक्षपात कर रहे हैं। तथ्य यह है कि वोट चोरी पर कांग्रेस के प्रस्ताव और पार्टी की खुली घोषणा से घबराई सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने अपना बचाव भी बढ़ा दिया है। उसके प्रवक्ताओं में एक, शहजाद पूनावाला ने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने के प्रोपगंडा करार दिया है। भाजपा ने इसे हर तरह से महत्व दिया है और इसका पूरा प्रचार किया है। आज अखबारों में यह खबर पढ़ते ही ध्यान में आया कि एक तरफ तो प्रधानमंत्री 75 पार के लिए मार्गदर्शक मंडल में जाने का अपना ही नियम नहीं मान रहे हैं और झोला उठाकर चल देने के अपने प्रचार पर अमल नहीं कर रहे हैं। चौकीदार होने का दावा करते हुए वोट चोरी के आरोपों के बावजूद ढिढाई से कुर्सी पर जमे हुए हैं। मुझे उनका यह सब करना परेशान नहीं करता है जितना उन लोगों की अंधभक्ति जो कांग्रेस विरोध में, हिन्दुत्व की रक्षा के लिए या किसी और कारण से इस सरकार या व्यवस्था का समर्थन कर रहे हैं।

ऐसे तमाम लोगों में एक, जनसत्ता से बाला साहब की शिवसेना में और फिर कांग्रेस होते हुए अब शिन्दे सेना के लिए बैटिंग कर रहे पूर्व सांसद और पत्रकार संजय निरुपम भी हैं। 6 फरवरी 1965 को रोहतास, बिहार में जन्मे संजय निरुपम ने पटना के एएन कॉलेज से शिक्षा पाई है। 1990 के दशक में शिवसेना से जुड़े, हिन्दी सामना के संपादक रहे और राज्यसभा के सदस्य बना दिये गये। इस दौरान शिवसेना के हिन्दी भाषी चेहरा रहे और उत्तर भारतीयों के बीच उनकी पहचान पार्टी में या बाला साहब ठाकरे तक पहुँच रखने वाले के रूप में बनी। 2005 में संजय निरुपम ने शिवसेना छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गए। 2024 से वे शिवसेना शिन्दे के साथ हैं। इस बीच वे 1996 से 2005 तक शिवसेना और कांग्रेस की ओर से राज्य सभा में रहे। 2009 से 2014 तक वे मुंबई नॉर्थ से कांग्रेस के सांसद रहे हैं। यही नहीं, वे मुंबई क्षेत्र कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव भी रहे हैं। अप्रैल 2024 में कांग्रेस ने उन्हें “अनुशासनहीन टिप्पणियाँ” और पार्टी नेतृत्व के साथ असहमति के कारण 6 वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया। 2014 के बाद से सांसद नहीं बने। संजय निरुपम के बारे में मोटा-मोटी यह जानकारी मुझे इसलिये है कि नाम राशि होने के साथ वे न सिर्फ बिहार से हैं, जनसत्ता में भी रहे हैं। मित्रता, मुलाकात बहुत नहीं है पर हम दोनों एक दूसरे को जानते तो हैं हीं। हाल में उन्होंने ट्वीट किया था जिसपर मैंने लिखा, टैक्स कलेक्शन कम करके वोट बटोरने के उपाय, उद्योग धंधे के फायदे की स्थिति बनाना देश के कानूनों के अनुसार भ्रष्टाचार होता था। (कल इस बारे में) लिख चुका हूं। तमाम लोगों पर इसी सरकार ने आरोप लगाये हैं। अब आप ज्ञान देने के बदले राज्य सभा चले जायें तो वह भी भ्रष्टाचार होगा। जोर से बोलिये जयश्रीराम।

भारतीय लोकतंत्र के लिए संजय निरुपम और शहजाद पूनावाले जैसे लोग बहुत खतरनाक हैं और ऐसे लोगों की भरमार है। ऐसे लोग तरक्की पाने तो छोड़िये नजर में आने के लिए भी कुछ भी करते हैं। निशिकांत दुबे ऐसे ही लोगों में हैं और पार्टी में ऐसे लोगों को महत्व मिलता है कहने का आधार यह है कि रुद्र प्रताप रुड़ी का हाल देख लीजिये। पहले लगता था कि यह सब भ्रष्टाचार के आरोप और योग्यता के आधार पर होता है लेकिन पार्टी पदों के लिए आरएसएस के लोगों से ज्यादा जिन्हें प्राथमिकता मिली है, देख लीजिये. सब कुछ स्पष्ट हो जायेगा। हालत ऐसी है कि भाजपा अपना अध्यक्ष तय नहीं कर पा रही है और कांग्रेस के अध्यक्ष को लेकर नरेन्द्र मोदी ही नहीं, पूना वाला भी जो कह कर चुके हैं वह मुद्दा नहीं है। कुल मिलाकर, स्थिति बहुत ही गंभीर, चिन्ता और परेशानी का विषय है। आज के ज्यादातर राजनेताओं की कोई विचारधारा नहीं है – यह तो सत्य है लेकिन भाजपा को उससे मतलब नहीं है और संघ को हो तो वह कुछ कर नहीं पा रहा है। यू-टर्न आम बात है और मामूली फायदे के लिए भी लोग किसी भी तरह की बेशर्मी करने के लिए तैयार रहते हैं। झूठ बोलना बहुत आम नहीं था लेकिन नरेन्द्र मोदी ने उसका भी रिकार्ड तोड़ दिया। बचपन में पंच परमेश्वर की कहानी पढ़ चुके हमलोग देख रहे हैं कि न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई और न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ जरूरी है। ऐसी या इतनी कि जगदीप धनखड़ जैसे उपराष्ट्रपति भी नप गये और उनकी जगह आरएसएस से जुड़ी ऐसी हस्ती को उपराष्ट्रपति बना दिया गया जो भिन्न कारणों से पूर्व में केंद्रीय मंत्री बनने से रह गये।

वे जो काम करेंगे उसकी चर्चा वह समय आने पर करूंगा लेकिन आज जब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी चुनाव आयोग का बचाव कर रही है। और यह काम ऐसे ही एक युवा दलबदलू से करवाया जा रहा है तो देश को चाहिये कि वह चीजों को समग्रता में देखे। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और भारत सरकार उसे प्रतिभाशाली प्रवक्ता रखने के लिये पर्याप्त धन दे सकती है। भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी उसके प्रवक्ता का काम करते रहे हैं। आईआईटी के प्रतिभाशी छात्र रहे रिटायर आईएएस मुख्य चुनाव आयुक्त हैं और इस सरकार ने उन्हें यह सुरक्षा दी हुई है कि पद पर रहते हुए वे जो कुछ भी करेंगे उसके लिये जीवन पर्यन्त उनके खिलाफ मुकदमा नहीं हो सकेगा यानी कार्रवाई नहीं हो सकेगी। ठीक-ठीक यह चाहे जो हो, मोटे तौर पर यही है। इसी दम पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में तरह-तरह के दावे किये हैं और इतवार को प्रेस कांफ्रेंस करने का दुर्लभ कारनामा किया है। पर वह सब मुद्दा नहीं है। अभी मुद्दा यह भी नहीं है कि मोदी सरकार के सत्ता में रहते चुनाव संबंधी अदालत के आदेश नहीं माने गये हैं, कानून भी बदल दिये गये हैं। मुद्दा यह है कि चुनाव आयोग का बचाव भाजपा क्यों कर रही है और चुनाव आयोग खुद अपना बचाव क्यों नहीं कर पा रहा है। वह भी तब जब मुख्य चुनाव आयुक्त के शिक्षा संस्थान कानपुर आईआईटी ने उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाये जाने, वोट चोरी के आरोप, प्रेस कांफ्रेंस के उनके शानदार प्रदर्शन के बाद फैक्टचेक, इनकरेक्ट के ठप्पे के बाद हाल में उनके शिक्षा संस्थान ने उन्हें डिस्टिंग्यूश्ड अल्मुनाय अवार्ड (डीएए) यानी विशिष्ट पूर्व छात्र सम्मान देने की घोषणा की है। इसके बावजूद चुनाव आयोग का बचाव भाजपा के लोग कर रहे हैं।

इनमें एक भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हैं। भाजपा के वेबसाइट पर उनके परिचय में इतना ही लिखा है। ऑर्डर, जिसका अर्थ मैं क्रम संख्या मान रहा हूं, 70 है। दूसरी जगह, भाजपा प्रवक्ताओं की सूची में उनका नाम 22 वें नंबर पर है और यह नामों के अंग्रेजी या हिन्दी वर्णमाला क्रम के अनुसार नहीं है। यहां इनका साउथ एक्सटेंशन का पता है और ई-मेल आईडी याहू की है। इनसे पहले श्रीमती भारती घोष और सैयद शाहनवाज हुसैन का नाम है। मैंने शाहनवाज हुसैन और पूनावाला को तो प्रवक्ता के रूप में काम करते खूब देखा है लेकिन श्रीमती भारती घोष को नहीं देखा। शायद वे बंगाल में या बांग्ला में काम करती होंगी। उनका पता भी कोलकाता का ही है। मकसद सिर्फ यह बताना है कि भाजपा प्रवक्ताओं का यह क्रम किस आधार पर है वह समझ में नहीं आया। विकिटिया के अनुसार शहजाद पूनावाला ने 2008 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और कांग्रेस मीडिया सेल की शोध टीम में काम किया। कांग्रेस के साथ मतभेदों के बाद, शहजाद ने 2017 में कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। शहजाद ने तर्क दिया कि कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में राहुल गांधी के चुनाव में धांधली हुई थी, इसे “दिखावा” कहा। पूनावाला ने पुणे के भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ (एनएसयूआई) के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य किया है। 2017 में, पूनावाला ने कांग्रेस पार्टी की आंतरिक चुनाव प्रक्रिया पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाकर राष्ट्रीय सुर्खियाँ बटोरीं, इसे “धांधली” बताया और यह संकेत दिया कि राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना पहले से तय था। उन्होंने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को “ढोंग” करार दिया, जिसकी वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और उनके अपने भाई तहसीन पूनावाला ने आलोचना की। उन्होंने इस टिप्पणी से खुद को अलग कर लिया और इसे परिवार और पार्टी की वफादारी के साथ विश्वासघात बताया। कांग्रेस पार्टी की आलोचना के बाद, शहज़ाद को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ जुड़ते हुए देखा जाने लगा, हालाँकि उन्होंने कहा कि उस समय वे स्वतंत्र रूप से काम कर रहे थे। बाद के वर्षों में वे आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी के प्रमुख मीडिया पैनलिस्टों में से एक बन गए, और अक्सर राष्ट्रीय टेलीविजन पर आक्रामक बहसों में शामिल होते रहे हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


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