
संजय कुमार सिंह
“बिहार में वोट चोरी से जुड़े मामलों में भाजपा की भूमिका पर चुनाव आयोग की चुप्पी, मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और एसआईआर मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो बार ‘फेट एकम्पली’ (fait accompli) की स्थिति पैदा होने के बावजूद ‘सुशासन मॉडल’ का दावा और अमर उजाला में इसका बेशर्म प्रचार शर्मनाक है।” हिन्दुस्तान टाइम्स का कल का शीर्षक प्रधानमंत्री के ट्वीट से प्रेरित लगता है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उनका, पार्टी का सामान्य प्रशासन भी राजनीति से मुक्त नहीं लगता है।
आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, पीएम मोदी की बधाई पर कप्तान सूर्य बोले – जब देश का नेता फ्रंट फुट पर खेलता है, तो अच्छा लगता है। इसके बराबर में एक खबर का शीर्षक है, भाजपा सरकारों ने सुशासन का नया मॉडल दिया : मोदी। आज एक तरफ तो अमर उजाला का उपशीर्षक है, टीम इंडिया ने पाकिस्तानी गृहमंत्री ने से नहीं ली ट्रॉफी। समारोह के बाद भारत की ट्रॉफी अपने साथ ले गये नकवी। आईसीसी से शिकायत करेगा बीसीसीआई। दूसरी खबर का उपशीर्षक है, पीएम ने दिल्ली भाजपा कार्यालय का उद्घाटन किया और कहा, जीएसटी सुधारों का लाभ आम नागरिकों तक पहुंचे, सुनिश्चित करें कार्यकर्ता। पढ़ने-सुनने में आपको यह भले सामान्य लगे पर यह सामान्य प्रशासन में राजनीति घुसेड़ने की कला है।
भाजपा कार्यालय का उद्घाटन वैसे भी पार्टी का काम है। इस मौके पर जीएसटी के लाभ आम नागरिकों तक पहुंचाने में कार्यकर्ताओं के योगदान की अपेक्षा या अपील पार्टी की राजनीति है। यह दोनों का जबरदश्त घालमेल या गोलमाल है। प्रधानमंत्री का लगातार चुनावी मोड में रहना अब शर्मनाक हो गया है। खासकर इसलिये कि वे सुशासन का नया मॉडल देने का प्रचार कर रहे हैं और तथ्य यह है कि बिहार में वोट चोरी से संबंधित नए खुलासों पर सरकार या चुनाव आयोग ने जवाब नहीं दिया है। चुनाव आयोग का जवाब नहीं देना – वैसे प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी नहीं है लेकिन चुनाव आयुक्तों का चयन उन्हीं ने जबरन अपने बनाये कथित कानून के तहत किया है। इसलिये चुनाव आयुक्त की चुप्पी के लिए भी सरकार या प्रधानमंत्री ही जिम्मेदार हैं। वैसे भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और सुप्रीम कोर्ट पर सरकार का दबाव अब स्पष्ट हो चला है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और उससे संबंधित कानून पर फैसला नहीं हुआ। इसके बावजूद चुनाव आयोग के स्वतंत्र और संवैधानिक होने के दावों पर सुप्रीम कोर्ट का शांत (या किंकर्तव्यविमूढ़) रहना, एसआईआर के मामलों पर फैसला न देना और अगली तारीख सात अक्तूबर होना – जब चुनाव की घोषणा हो चुकी होगी या होने वाली होगी – फेट एकम्पली है।
यह प्रधानमंत्री के नेतृत्व में या उन्हीं के कारण है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री सुशासन का नया मॉडल देने की बात कर रहे हैं जिसमें सोनम वांगचुक जैसा नागरिक जब तक सरकार का प्रचार करता है ठीक होता है और जिस दिन उसके समर्थक हिन्सा कर देते हैं उसके साथ ही वह आतंकवादी करार दिया जाता है। एनएसए में निरुद्ध कर दिया जाता है और उसका एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है जो पहले भी तमाम नागरिकों के (लगभग 20 हजार के) रद्द किए जा चुके हैं या जिनका नवीनकरण नहीं हुआ है। खेलों में राजनीति घुसेड़ने की खबर नवोदय टाइम्स में भी लीड है। अंतर सिर्फ यह है कि यहां बेशर्मी थोड़ी कम है या कहिये कि नहीं ही है। जो हुआ उसे वैसे ही रख दिया गया है और कहा गया है, ऐसा कभी नहीं देखा। इसमें यह शामिल हो सकता है कि खेलों में ऐसी राजनीति कभी नहीं देखी या जो हुआ जैसे, एशिया कप विजेता टीम (भारत) को ट्रॉफी न देने से पाकिस्तान की किरकिरी। इसी के साथ बताया गया है कि टीम इंडिया के कप्तान सूर्य कुमार ने कहा है, प्रधानमंत्री फ्रंटफुट पर बैटिंग कर रहे हैं। खेल में राजनीति घुसेड़ने का यह खेल न तो खेलों के लिए अच्छा है और न राजनीति के लिये। इसका पता मुख्य खबर के नीचे के शीर्षक से लगता है, नकवी को पहले ही संकेत दे दिया था कि ट्रॉफी उनसे नहीं लेंगे। बेशक, यह भी ऐसा पहले नहीं देखा जैसा मामला है और आप पहले पढ़ चुके हैं कि नकवी ट्रॉफी अपने साथ लेते गये। जिसे ट्रॉफी दी जानी है वह नहीं लेने की राजनीति करे तो देने वाला क्या करे? राजनीति क्यों न करे या क्या करे जो किसी को शिकायत न हो खेल भावना के अनुकूल हो। मुझे लगता है कि अपने साथ ले जाना (या रखना) सर्वश्रेष्ठ विकल्प था और खेल भावना के अनुकूल है। उनके पास दूसरा विकल्प वहीं छोड़ देने (मेज, मंच या जमीन पर रख देने) का ही था। लेकिन इसे ट्रॉफी के अपमान से जोड़ा जा सकता था। मुझे लगता है कि उन्होंने जो किया वह सही है।
इंडियन एक्सप्रेस में भारतीय कप्तान सूर्य कुमार यादव के हवाले से खबर है। इसका शीर्षक है, वो ट्रॉफी लेके (लेकर) भाग गये। अखबार ने लिखा है, भारत ने एशियाई क्रिक्रेट के पाकिस्तानी प्रमुख को नीचा दिखाया। खबर के अनुसार, बीसीसीआई ने नकवी से यह कहा बताते हैं कि ट्रॉफी और मेडल वापस दें। आईसीसी से शिकायत करेंगे। टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर का शीर्षक है, भारत ने एशिया कप जीता, पीसीबी के प्रमुख टॉफी लेकर चले गये। इस खबर का इंट्रो है, टीम ने पाकिस्तान के मंत्री से पुरस्कार लेने से इनकार किया। खेल में राजनीति घुसेड़ने की खबर द हिन्दू में पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि, करुर की खबर चार कॉलम में दो कॉलम की फोटो के साथ है। इसका कैप्शन है, केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमन करुर के राजकीय मेडिकल कॉलेज असप्ताल में में भगदड़ की एक पीड़िता के साथ। लेह हिन्सा के पीड़ितों का हाल पूछने कोई गया या नहीं पता नहीं है जबकि वह केंद्र शासित प्रदेश है और दिल्ली के नेताओं की जिम्मेदारी भी। निर्मला सीतारमन का करुर जाना उनकी राजनीतिक मजबूरी हो सकती है और अगर ऐसा है तो जाहिर तौर पर वोटों की चिन्ता है और इसीलिए तमिलनाडु की खबर दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर छप रही है जबकि लेह की खबर ढूंढ़नी पड़ रही है।
हिन्दी के मेरे तीसरे अखबार देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। हालांकि, करुर हिंसा पर आज लगातार तीसरे दिन पहले पन्ने पर खबर है तो देशबन्धु में भी है। वैसे, पहले दिन देशबन्धु में तमिलनाडु के करुर की खबर नहीं थी। आज शीर्षक है, करुर भगदड़ पर पुलिस ने अभिनेता विजय को घेरा। पुलिस ने विजय पर जानबूझकर शक्ति प्रदर्शन का आरोप लगया। आज छपी एक खबर (दैनिक भास्कर) यह भी है कि, अभिनेता विजय जानबूझकर रैली में देरी से पहुंचे, बिना अनुमति रोड शो किया। कहने की जरूरत नहीं है कि जान बूझकर देर से पहुंचना अपराध नहीं है। उनके और उनके प्रशंसकों या रैली में आने वालों के बीच का मामला है। कोई शिकायत करे तो अलग बात होगी वरना इसमें प्रशासन, सरकार या मीडिया की कोई भूमिका नहीं है। अगर मामला भगदड़ का है तो देरी से आना और भगदड़ मचना दो अलग चीजें हैं। दोनों को जबरन एक-दूसरे से जोड़ा जा सकता है लेकिन बिना शिकायत पुलिस या मीडिया की क्या भूमिका। जो भी हो, अगर यह सब बिना अनुमति रोड शो होने से हुआ तो सवाल है कि बिना अनुमति रोड शो कैसे हो गया, किसने होने दिया और अनुमति ली ही नहीं थी तो देरी का क्या मतलब या भीड़ जुटने के बाद पता चलेगा तो भीड़ को शांत करने के लिए आना ही पड़ेगा, इसमें देरी होगी ही। मुझे मामला समझ में नहीं आ रहा है। और मैं लिखता रहा हूं कि यह दिल्ली के अखबारों के पहले पन्ने लायक खबर नहीं है। मेरा मानना है कि भाजपा अभिनेता विजय को बड़ा नेता बनाना चाहती है। भले बाद में उपयोग, दुरुपयोग या मोलभाव किया जा सके। मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। और इससे ज्यादा कुछ कहने-करने की जरूरत नहीं है।
हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में लेह की हिन्सा पर आज भी कोई खबर नहीं है। देशबन्धु में दो खबरें हैं – वांगचुक की गिरफ्तारी भारी पड़ रही है। सोशल मीडिया की खबरों के अनुसार अपेक्स बॉडी, लेह (एबीएल) ने कहा है, “लद्दाख के लिए ये जो इल्ज़ामात हैं कि सोनम वांगचुक एंटीनेशनल एक्टिविस्टीज़ में मुल्लविश हैं, हम बर्दाश्त नहीं करेंगे। आप इसका जो मतलब लगाइये, आपके चैनल दिखाएं या न दिखाएं, अखबारों में आपको मिले या नहीं मिले। इसका मतलब है। इसका पता देशबन्धु के इस शीर्षक से भी चलता है कि लेह हिन्सा ने लद्दाख पर्यटन की वाट लगा दी है। जो भी हो, इंडियन एक्सप्रेस की आज की लीड का शीर्षक है, लद्दाख पर वार्ता में कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि लेह अपेक्स बॉडी इससे अलग हो गई। द टेलीग्राफ में लेह की खबर का शीर्षक है, लद्दाख ने केंद्र की बात मानने से इनकार कर दिया। लेह की खबर दि एशियन एज में है और शीर्षक लगभग वही है जो इंडियन एक्सप्रेस में है। खेल में राजनीति की खबर दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।
लेखक संजय कुमार सिंह से [email protected] के ज़रिए संपर्क किया जा सकता है।


