किसान आंदोलन और गोदी मीडिया : …तब टीवी एंकरों को शर्म नहीं महसूस हुई!

नवीन कुमार-

टीवी एंकर आज संविधान की दुहाई दे रहे हैं। शर्मसार महसूस कर रहे हैं। 60 से ज़्यादा किसानों की कड़कड़ाती हुए सर्दी में तड़प तड़प कर मौतों पर कभी शर्मसार महसूस करते नजर नहीं आए।

24 साल के एक किसान की लाश अभी भी ITO पर रखी हुई है। किसान आरोप लगा रहे हैं कि उसके माथे पर गोली मारी गई है। थोड़ा शर्मसार इसपर भी महसूस कर लेते।


जितेंद्र कुमार-

किसी भी टी वी चैनल को खोल लीजिएः सब एक सुर में कह रहा है कि किसान दिल्ली में अराजकता फैला रहा है. पिछले दो महीने से किसान दिल्ली की सड़कों पर बैठे हैं, सरकार ने उनके साथ जितना दुर्व्यवहार किया है वह शर्मनाक है. 70 से अधिक किसान इस आंदोलन के दौरान शहीद हो गए हैं, मोदी जी और उनके कुनबे के मुंह से आह तक नहीं निकला है.

ब्राह्मणवादी मीडिया किसानों को पहले दिन से देशद्रोही से लेकर खालिस्तानी बता रहा है, लेकिन किसान शांति से अपनी बात रख रहे हैं। इसलिए मुझे लगता है कि आज मतलब 26 जनवरी 2021 के बाद भारत का गणतंत्र संभवतः अधिक समावेशी होगा. और यह परिवर्तन सिर्फ किसानों के चलते हो पा रहा है. किसानों को सलाम!


प्रभात रंजन-

लालक़िले पर जो हुआ उसका समर्थन कोई नहीं कर सकता लेकिन एक शांतिपूर्ण आंदोलन अचानक ऐसे हिंसक कैसे हो गया यह सोचने की बात है। मैं दिल्ली-नोएडा सीमा पर रहता हूँ। वहाँ ट्रैक्टर के साथ मौजूद किसानों की फोटो भी मैंने साझा की है। वहाँ आंदोलन पूरी तरह से शांतिपूर्ण चल रहा है। पहले भी और अभी भी। लेकिन मीडिया उसको नहीं दिखा रही।

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