यशवंत सिंह-
जब मामला सेटल हो चुका है तो फिर कृष्ण कल्पित को फाँसी देने के लिए कंगारू कोर्ट किसलिए? किसी को इतना ट्रोल न करो कि वो खुदकुशी कर ले! ऐसी घटनाएँ हो चुकी हैं।

“पटना कांड” मीडिया ट्रोलिंग, साइबर बुलिंग है दोस्तो।
नई धारा का वक्तव्य पढ़िए और अपने गाल पर तमाचे मार लीजिए! -पुष्पराज शांता शास्त्री
ओम थानवी- क्या आपने कल्पित की भाषा देखी है? मैंने प्रलेस का प्रेसनोट साझा किया था। मेरी राय के जवाब में संजीदा होने की जगह कहा “बेरोज़गार संपादक”! ट्रोलिंग और क्या होती है?
विमल कुमार- “नयी धारा” का बयान आ गया कि पीड़िता जांच से और नई धारा की कारवाई से संतुष्ट है! क्या पीडिता इस दावे की पुष्टि करेंगी और अगर वह वाकई संतुष्ट हैं तो हम लेखकों की सारी कवायद की हवा निकल गयी? अब क्या विराम मान लिया जाय? क्या कोई आंतरिक समझौता हो गया? इसमें यह नहीं बताया गया कि क्या करवाई हुई कि पीड़िता संतुष्ट हो गयी।
प्रवीण सिंह- बिहार ड्राई स्टेट में दोनों ने पी रखी थी। पुलिस के पास जाते तो उल्टा एफआईआर इन लोगों पर होती ड्रिंक करने के लिए। आयोजक भी लपेटे जाते।
कश्यप किशोर मिश्रा- …इस मामले पर भड़ास में अबतक कितनी पोस्ट आ चुकी है ? मटीरियल तो उसमें भी सारा का सारा कंगारू कोर्ट वाला ही है ।
यशवन्त सिंह– भड़ास ये प्रकरण कवर कर रहा है, इसलिए सारा कंटेंट देने की कोशिश है। मेरी राय भिन्न हो सकती है। अगर लड़की पुलिस में नहीं गई, आयोजकों ने लड़की के मन मुताबिक एक्शन ले लिया और अब बयान जारी कर पुष्टि कर दी तो फिर चैप्टर क्लोज समझना चाहिए।
असित नाथ तिवारी- पटना में अधिकतर साहित्यिक आयोजन जातीय वितृष्णा से भरे होते हैं। कृष्ण कल्पित पर लगे आरोप, आरोपों की जांच, गढ़ी गईं और गढ़ी जा रहीं तमाम कहानियां जातीय वितृष्णा से उपजी गोलबंदी की उपज हैं।
मदन तिवारी- किसी भी फोरम को संज्ञेय अपराध में समझौता कराने या कोई भी निर्णय लेने का अधिकार नही है बल्कि उस फोरम को घटना की जानकारी या शिकायत प्राप्त होते ही उसे पुलिस के पास मुकदमा दर्ज करने के लिये भेजना अनिवार्य है ! कोई अपराधी अपने अपराध के खुलने के भय से आत्महत्या कर ले तो उसके लिये दूसरा कोई दोषी नही हो सकता!



