नई दिल्ली/उन्नाव। उन्नाव रेप केस के दोषी और पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत मिलने के बाद सियासी और मीडिया हलकों में नई बहस छिड़ गई है। इस फैसले को लेकर रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी खुलकर सामने आए हैं और उन्होंने न सिर्फ भाजपा, बल्कि न्यायपालिका को भी तीखे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
अर्णब गोस्वामी का करीब 9 मिनट से ज्यादा लंबा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वह बेहद आक्रामक अंदाज़ में कहते दिख रहे हैं कि “मामला सेटल नहीं हो पा रहा और सत्ता को शायद यह बात हजम नहीं हो रही।” अर्णब ने आरोप लगाया कि जिन मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलना चाहिए, वहां व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में खड़ी नजर आती है।
वीडियो में अर्णब गोस्वामी भाजपा पर निशाना साधते हुए कहते हैं कि पार्टी सार्वजनिक तौर पर भले ही कानून और न्याय की बात करे, लेकिन जब अपने नेताओं की बारी आती है, तो अलग मापदंड अपनाए जाते हैं। उन्होंने न्यायपालिका के फैसले पर भी असहज सवाल खड़े करते हुए कहा कि ऐसे निर्णय जनता के भरोसे को झकझोरते हैं।
अर्णब का यह बयान इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह लंबे समय से भाजपा समर्थक माने जाते रहे हैं। ऐसे में कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत मिलने के बाद उनका यह रुख कई लोगों को चौंका रहा है। सोशल मीडिया पर लोग इसे “अर्नब का बदला हुआ तेवर” बता रहे हैं, तो कुछ इसे सत्ता से बढ़ती दूरी के संकेत के तौर पर देख रहे हैं।
अपने वीडियो में अर्णब गोस्वामी ने यहां तक कहा कि अगर यही हाल रहा, तो पत्रकारिता फिर से यूट्यूब और डिजिटल प्लेटफॉर्म से निकलकर टीवी की ओर लौटने को मजबूर होगी, क्योंकि सत्ता और सिस्टम के खिलाफ सवाल उठाने की जगह लगातार सीमित होती जा रही है।
अर्णब की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे “देर से सही, लेकिन सही सवाल” बता रहा है, वहीं दूसरा वर्ग इसे राजनीतिक मजबूरी या रणनीतिक बदलाव से जोड़कर देख रहा है।
फिलहाल, भाजपा या न्यायपालिका की ओर से अर्णब गोस्वामी के बयानों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इतना तय है कि कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत और उस पर अर्णब का आक्रोश आने वाले दिनों में मीडिया और राजनीति दोनों में चर्चा का बड़ा मुद्दा बना रहेगा।
उन्नाव रेप केस: कब क्या हुआ?
उन्नाव रेप केस देश के सबसे चर्चित और भयावह मामलों में से एक रहा, जिसमें भाजपा के तत्कालीन विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी ठहराया गया।
जून 2017– उन्नाव की एक नाबालिग/युवती (पीड़िता) ने आरोप लगाया कि भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने उसके साथ रेप किया। परिवार का आरोप था कि स्थानीय पुलिस ने शिकायत दर्ज नहीं की।
अप्रैल 2018– न्याय न मिलने पर पीड़िता ने मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह की कोशिश की। इसके बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।
अप्रैल 2018– इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर मामला CBI को सौंपा गया। इसी दौरान पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत हो गई, जिस पर पुलिस पर मारपीट का आरोप लगा।
अप्रैल 2018– CBI ने कुलदीप सिंह सेंगर को गिरफ्तार किया। भाजपा ने भारी दबाव के बाद उन्हें पार्टी से निष्कासित किया।
जुलाई 2019– पीड़िता के साथ एक भयानक सड़क हादसा हुआ। कार को ट्रक ने टक्कर मारी, जिसमें पीड़िता की दो चाचियों की मौत हो गई। पीड़िता गंभीर रूप से घायल हुई। इस घटना को हत्या की साजिश माना गया।
अगस्त 2019– मामले की सुनवाई दिल्ली की विशेष CBI अदालत में ट्रांसफर की गई।
दिसंबर 2019– दिल्ली की अदालत ने, कुलदीप सिंह सेंगर को रेप का दोषी करार दिया, उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जुर्माना भी लगाया गया
2020– पीड़िता को अदालत के आदेश पर ₹25 लाख मुआवज़ा, सरकारी नौकरी, सुरक्षा प्रदान की गई
2021–2023– सेंगर जेल में बंद रहे। बीच-बीच में मेडिकल कारणों से पैरोल/इलाज की अनुमति मिली।
2024–2025– कुछ मामलों/आधारों पर जमानत/रिहाई से जुड़ी अदालती राहत मिलने की खबरें सामने आईं, जिस पर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हुई।
क्यों बना यह केस ऐतिहासिक?
- आरोपी सत्ता पक्ष का विधायक था
- पीड़िता और परिवार पर लगातार दबाव और हमले
- पुलिस और सिस्टम की भूमिका पर सवाल
- न्याय पाने के लिए पीड़िता का संघर्ष


