लखनऊ/इटावा | चंबल की कुख्यात ‘दस्यु सुंदरी’ कुसुमा नाइन का शनिवार रात लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमयू) में इलाज के दौरान निधन हो गया। 65 वर्षीय कुसुमा नाइन पिछले 20 वर्षों से इटावा जिला कारागार में उम्रकैद की सजा काट रही थीं।
कुसुमा नाइन, जालौन जिले के टिकरी गांव की निवासी थीं, और चंबल के कुख्यात डकैत राम आसरे उर्फ फक्कड़ की सहयोगी रही थीं। 1996 में भरेह इलाके में दो मल्लाहों की आंखें निकालकर उन्हें जिंदा छोड़ देने की घटना ने प्रदेशभर में हड़कंप मचा दिया था। उन पर उत्तर प्रदेश में 200 से अधिक और मध्य प्रदेश में 35 अपराधों में शामिल होने का आरोप था। 2004 में कुसुमा ने अपने गिरोह के साथ मध्य प्रदेश के भिंड जिले के दमोह पुलिस थाने की रावतपुरा चौकी पर आत्मसमर्पण किया था।
2017 में उपनिदेशक गृह की हत्या और अपहरण के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट-52 ने कुसुमा नाइन और फक्कड़ को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। डकैतों ने अफसर के बेटे से 50 लाख रुपये की फिरौती मांगी थी, और फिरौती न देने पर इटावा के सहसो थानाक्षेत्र में अफसर का शव मिला था।
कुसुमा नाइन की मौत के बाद उनके गांव में जश्न का माहौल देखा गया। औरैया जिले के अस्था गांव में उनके निधन पर लोगों ने घी के दिए जलाए और मिठाइयां बांटी। गांववालों का कहना है कि कुसुमा के आतंक के कारण उन्होंने लंबे समय तक भय में जीवन व्यतीत किया था, और अब उनके निधन से वे राहत महसूस कर रहे हैं।

दिनेश शाक्य-
कुसमा नाइन! इस नाम के बिना चंबल घाटी में डाकुओं की कहानी अधूरी सी लगेगी। अपने आतंक का डंका बजाने वाली क्रूर महिला डाकू कुसमा नाइन खामोश हो गई।
उम्रकैद की सजा काट रही कुसमा की टीबी रोग से ग्रसित थी,इसी साल एक फरवरी को जिला जेल में तबियत बिगड़ने पर कुसमा को जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां से सैफई मेडिकल यूनिवर्सिटी और उसके बाद एसजीपीजीआई लखनऊ ले जाया गया,शनिवार दोपहर बाद कुसमा नाइन की मौत हो गई।
कुसमा नाइन के नाम ऐसे ऐसे कारनामे दर्ज है जिनको सुनने के बाद किसी का भी जहन हिल जायेगा। लालाराम श्रीराम गैंग के रास्ते बीहड़ का रास्ता तय करने वाली कुसमा ने राम आसरे फक्कड़ के साथ अपनी डाकू पारी की जारी रखी की।
1981 में फूलन देवी के बेहमई कांड के विरोध में कुसमा का मई अस्ता कांड कोई भूल नहीं सकता।
बेहमई में जहां 22 ठाकुरों का खून बहाया गया वही दूसरी ओर मई अस्ता में 14 मल्लाह बिरादरी के लोगों को आग के हवाले का मौत के घाट उतारा गया। 1984 में हुए मई अस्ता कांड की याद सालों तक लोगों के जहन से दूर नहीं हुई।
मुखबिरी के शक में कुसमा नाइन ने मल्लाह बिरादरी के संतोष और राजबहादुर की आंखे निकाल उनकी रोशनी छीन ली।
औरैया जिले के असेवा गांव से पकड़ कर संतोष ओर राजबहादुर मल्लाह नामक युवकों को इटावा के भरेह इलाके तक लाया गया जहां दोनों की आँखें निकल ली। चंबल घाटी में आंखों को निकाले जाने की घटना वीभत्स घटनाओं में से एक मानी जाती है।
1998 में एक संसदीय उम्मीदवार के पक्ष में जमकर चुनाव प्रचार कर उनको संसद तक पहुंचाने का काम भी किया।
2003 में फक्कड़ कुसमा नाइन में समर्पण की पेशकश की,जून 2004 में अपने गैंग के 9 डाकुओं के साथ मध्यप्रदेश के भिंड में आत्म समर्पण कर दिया।
कानपुर रेंज के डीआईजी दिलीप त्रिवेदी तक फक्कड़ कुसमा नाइन से मुलाकात करने उनके अड्डे पर पहुंचे ।
साल 2003 में कुसमा फक्कड़ से मैने चंबल के बीहड़ों में लंबा इंटरव्यू किया,जिसे सहारा समय न्यूज चैनल पर काफी समय तक टेलीकास्ट किया,किसी भी डाकू का बीहड़ में इंटरव्यू करने का मेरा यह पहला अनुभव था। इससे पहले मैने किसी भी डाकू का कभी कोई इंटरव्यू नहीं किया था।
फक्कड़ और कुसमा नाइन के इंटरव्यू के बाद जब सहारा समय न्यूज चैनल पर टेलीकास्ट शुरू हुआ तब कानपुर के डीआईजी बाबूलाल यादव ने बताया था कि जब उनकी तैनाती झांसी में एसएसपी के रूप में थी तब फक्कड़ ने अपने गैंग के साथ समर्पण की पेशकश की थी जाहिर है कि फक्कड़ कुसमा काफी से समय से आत्मसमर्पण की फिराक में थे,लेकिन दोनों का समर्पण साल 2004 में संभव हुआ।


केपी सिंह-
कुसुमा नाइन पर मेरी स्टोरी 1988 में साप्ताहिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुई थी. तब कुसुमा पर किसी पत्रकार की यह पहली स्टोरी थी.
1992 में उसके सन्देश पर आत्म समर्पण की बात करने के लिए मैं बरसती रात में रामपुरा थाने के मडइयां गांव के बियाबान बीहड़ में उसकी बाट जोहता रहा. बहुत डरावना माहौल रहा था.

बाद में पता चला कि सामने मध्यप्रदेश के एक गांव में ठाकुरों ने किसी बनिया की हत्या कर दी थी जिसके कारण वहां की पुलिस का एस ए एफ के साथ बड़ा लाव लश्कर रात भर जमा रहा. गैंग को इस कारण क्षेत्र से खिसक जाना पड़ गया था.
तत्कालीन एस एस पी डॉ ए के सिंह इस प्रयास के राजदार थे. उनकी किताब में इसका जिक्र है. फिर 1993 में एक मौका फिर आया जब उसके बुलाबे पर मैंने औरैया के पास बीहड़ों में पहुंच कर प्रयास किया. मेरे साथ श्री नीरज बंसल थे. मैं शाम को पहुँच गया था. लेकिन कुसुमा चकमा देती रही और जब बहुत रात हो गयी तब उसने मुलाक़ात की.
अस्ता काण्ड में 13 मल्लाहों की हत्या हुई थी जिसका पेंच समर्पण में बाधक था क्योंकि फूलन देवी को रिहाई दिला कर उस समय के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह निषादों के भगवान् बन गए थे जिसकी वजह से कुसुमा के समर्पण का काम उनके लिए दुस्साहसिक साबित हो सकता था.फिर भी कोशिश जारी रखी जानी थी लेकिन मैं उरई लौटा तो पता चला कि झांसी रेंज के डी आई जी बी एल यादव जिनकी इसमें मदद थी उनका आगरा रेंज के लिए ट्रांसफर हो गया है. मिशन अधर में लटक गया.
इसकी जानकारी पूर्व पुलिस महा निदेशक मुकुल गोयल को भी है जो अब रिटायर हो चुके हैं. बाद में कुसुमा ने मध्य प्रदेश में समर्पण किया. सोनी चैनल ने कुसुमा पर सीरियल के लिए अनुबंधित करना चाहा. उनकी टीम के साथ मैं टिकरी, कुरौली और अन्य स्थानों पर गया पर अपनी सहमति देने के लिए कुसुमा द्वारा मांगी गयी रकम को ले कर सोनी वालों ने असमर्थता जता दी और बात आयी गयी हो गयी.


