आप बाल-बाल बच गए हैं सर और इस वजह से हम प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल-बाल बचे!

19 जून को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो मजीठिया वेज बोर्ड का फैसला सुनाया था, उसमें मालिकान तो बाल-बाल बचे ही, मालिकानों के खास प्यादे भी बाल बाल बचे और ईश्वर को धन्यवाद किया. 19 को माननीय सुप्रीम कोर्ट की मीडिया पार्क में देश के तमाम मीडिया कर्मी आये हुए थे। सभी अपने अपने तर्कों से लैस थे। हर कोई अपनी बात को सच साबित करने में जुटा था। अभी दोपहर के बाद का 3 बजकर 20 मिनट हुआ था, देखा की कोर्ट के में गेट से सबसे पहले दैनिक जागरण के एक वकील और 2 प्यादे ऐसे बाहर निकले जैसे उनकी जान कोर्ट ने बख्श दी हो। तीनों के चेहरे पर बाल बाल बचने का भाव स्पष्ट दिख रहा था। वे सब यही सोचते आगे भाग रहे थे, क़ि यह खबर जल्दी से संजय गुप्ता को दें कि आप बाल बाल बच गए हैं सर और आपके बाल बाल बचने के साथ ही हम सब आपके प्यादे भी आपकी लात खाने से बाल बाल बचे।

देखें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट से जो फैसला मजीठिया के बारे में आया है, उससे अभी तो8 मालिक बच गए हैं और इसी वजह से कर्मचारियों में निराशा का भाव है, क्योंकि उनका सोचना था कि इस मामले में मालिकानों में से कुछ को कोर्ट ज़रूर टांग देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वे बाल बाल बच गए। यहाँ उल्लेखनीय है कि मजीठिया देने से मालिकान बाल बाल नहीं बच पाएंगे। कल ये एकधारी तलवार पर चल रहे थे, अब ये दोधारी तलवार पर सवार हैं, जिसके डर से मालिकों की नींद फिर से जाने वाली है और मालिकों के प्रिय प्यादों को एक बार फिर जुगत ढूंढनी होगी बाल बाल बचने की। कुल मिलाकर यह तय है कि जब तक मजीठिया का मामला कोर्ट में रहेगा, मालिकान तो पैसा बचाने के लिए परेशान रहेंगे ही, उनके प्रिय प्यादे भी बाल बाल बचने के लिए सतर्क रहेंगे। क्योंकि कोर्ट ने प्यादों की स्थिति उस कटहर यानि कटहल जैसी बना दी है, जिसे पच्चर पका देता है। मालूम हो कि जब कटहल को अपने मन से पकाना होता है तो उसमें पच्चर यानि एक मोती कील नुमा लकड़ी खोंस यानि ठोंक देते हैं, जिससे कटहल तुरंत पक जाता है।

अब ये प्यादे जरा सा भी नौटंकी किये या सीनियर होने की हेकड़ी दिखाये, तो सभी कर्मचारी सीना तान के उनसे भिड़ जायेंगे कि रखो अपनी नौकरी, हम चले केस करने। चाहे वह कॉन्ट्रैक्ट वाला हो या वेज बोर्ड वाला या कोई भी। अब जाहिर है कि ऐसी स्थिति में कम्पनी के प्रिय प्यादों को अपनी नौकरी बाल बाल बचानी मुश्किल होगी। यहाँ उल्लेखनीय बात यह भी है कि जो कर्मचारी, चाहे वह दैनिक जागरण, भास्कर, राजस्थान पत्रिका, हिंदुस्तान आदि का हो, अगर उसने 3 साल से अधिक समय गुजार लिया है, तो वह इस लड़ाई को बड़े मज़े से अंजाम दे सकता है। बस थोड़ा संयम से काम लेना होगा। यह कैसे संभव होगा या कैसे अच्छा होगा वर्कर के लिए, इस बारे में बात फिर कभी। फ़िलहाल यह तय है कि अब ये मालिकानों के प्यादे किसी कर्मचारी को डांटने, प्रताड़ित करने से बाल बाल बचेंगे और दिन रात अपना समय अपनी नौकरी बचाने में लगाएंगे।

मजीठिया क्रन्तिकारी और वरिष्ठ पत्रकार रतन भूषण की फेसबुक वॉल से.

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