ये ‘लंपट एंकर’ कौन है?

शशि शेखर

Shashi Shekhar : मदमस्त सत्ता का अंकुश शब्द ही है, इसलिए लिखते रहिए, अंतिम पाठक के बचे रहने तक… हालिया चुनाव परिणाम का सिर्फ एक ही संकेत है, सत्ता काम करने के लिए दिया था, बकैती के लिए नहीं. जनता राष्ट्रवादी सदैव थी, ओवरडोज तो दवा का भी रिएक्ट कर देता है. सो, 370 पीएमसी बैंक घोटाला पीडितों का मलहम नहीं हो सकता थ. और न ही 35 (ए) हरियाणा के युवकों को मन्दी की मार से बचाने का एंटीबायटिक. नतीजा, परिणाम आने से 1 दिन पहले ही और एक्जिट पोल में 90 में 85 सीट दिए जाने के बाद भी, केन्द्र सरकार ने एक दिन पहले ही दिल्ली की अनाधिकृत कॉलोनी को रेगुलराइज करने का निर्णय ले लिया और सुना है कि अब 25 हजार होमगार्ड जवानों की नौकरी भी जाने से बच गई है. तो भारतीय जनता कैटल क्लास तो हो सकती है लेकिन वो पक्की “फैमिली मैन” भी है. प्रियजनों की मौत पर गुस्सा हो कर लोग अपने पूजा घर से देवताओं की मूर्तियां तक हटा देते है, अब ऐसी जनता सदैव राष्ट्रवाद की खुमार में डूबी रहे, मुझे भरोसा नहीं है.

लेकिन सवाल दूसरा है. किसी नशा का लंबे समय तक सेवन खतरनाक हो सकता है, ये बताने की जिसकी जिम्मेवारी थी, वो खुद ही नशे की गिरफ्त में है. यानी, मीडिया. सबसे तेज चैनल के एक लंपट एंकर की तस्वीर आज सोशल मीडिया पर देखी. पटाखे जलाते हुए, मानो वो भारतीय कानून व्यवस्था को चुनौती दे रहा है, ठीक उसी तरह, जैसे शराब पी कर एक मदमस्त इंसान ने पास से गुजरते राजा की हाथी को खरीदने की चुनौती दे डाली थी. ये अलग बात है कि अगली सुबह उसने ये कहते हुए जान बचाई कि हुजूर, हाथी खरीदने वाला तो कल रात ही मर गया था. अब दिल्ली में पटाखा बैन हे तो किसी भारतीय कानून /व्यवस्था के तहत ही ऐसा किया गया होगा, आम लोगों की भलाई के लिए. लेकिन, ये लंपट एंकर ओवरडोज का शिकार है. तो ऐसे लंपट पत्रकार, जनता को क्या बताएंगे कि क्या सही है, क्या गलत?

लेकिन, जैसाकि मैं हमेशा कहता हूं, दुनिया विकल्पहीन नहीं. देयर इज नो टीना फैक्टर. असल में ये टीना फैक्टर भी मदमस्त सत्ता और पूंजीवाद का इजाद किया हथियार है, जनता के खिलाफ. जैसे, “मोदी नहीं तो कौन?” अरे भाई, सबका बाप आईएएस ही होता है क्या? किसान का बेटा भी तो आईएएस बनता है, बन सकता है. अब बेटा ये तो नहीं कहता कि मेरा बाप आईएएस होगा तभी मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी करूंगा. खैर, तो टीना फैक्टर को एक बार फिर धत्ता बताते हुए, जनता ने, जनता के बीच के लोगों ने आम जनता को सूचित करने का जो महती काम किया है. उसके लिए सबको बधाई.

ये ऐसे लोग है, जो आम है लोग है, न किसी दल से संबंधित, न किसी विचारधारा से प्रेरित. इनकी विचारधारा है, जनता का हित और जो ये मानते है कि राष्ट्र का प्रथम और अंतिम अर्थ इस राष्ट्र के लोग ही है, न कि कोई भौगोलिक सीमा. हां, आपमें से कुछ लोगों को ये लग सकता है कि ऐसे लोग कामी-वामी-सेकुलर-लिबरल है. तो लगे, क्योंकि ऐसा लगने के लिए आपको भी ओवरडोज का शिकार बनाया जा चुका है. आप जिस दिन नशे से बाहर निकलेंगे, आपको सेकुलर-लिबरल होने के मायनो का पता चलेगा. तब आप्को एहसाह होगा कि बिना किसी उचित-अनुचित लाभ की उम्मीद किए, बिना अपनी नौकरी बचाने की चिंता किए, ऐसे लोगों ने अपनी लेखनी से कितना बडा काम किया है.

ल्ंपट एंकरों-पत्रकारों की पत्रकारिता देखिए, किसी भी चौक चौराहे पर बैठे निठल्लों की चर्चा के स्तर को पार कर रहा है. विपक्ष के नेताओं को गाली देते हुए, ये हर एक घटना के लिए गान्धी-नेहरू को जिम्मेवार बता रहे है. 6+6 साल की सत्ता की जैसे कोई जिम्मेवारी नहीं है. ऐसी स्थिति में, फेसबुक पर चन्द लोगों ने जिस तरह से सच को सच के रूप में जनता के सामने रखा है, उसे आज से 15-20 साल बाद मौजूदा इतिहास का सबसे सशक्त दस्तावेज माना जाएगा. मेरे फेसबुक मित्र, Girish Malviya गिरिश मालवीय ने देश की आर्थिक व्यवस्था से जुडे मुद्दों को जितनी सरलता से हिन्दी भाषा में लोगों के समक्ष रखा, वो अतुलनीय है. खुद मेरी अर्थिक समझ बहुद हद तक उनके पोस्ट्स को पढ कर बनी है. Nitin Thakur ने जिस बेबाकी से विभिन्न मुद्दों पर लिखा है, वो काबिलेतारीफ है. वरिष्ठ पत्रकारों में अजित अंजुम या Punya Prasun Bajpai जी ने अपनी बात रखनी जारी रखी, बिना ये चिंता किए कि मेरा करियर क्या होगा, कैसा होगा. मुजफ्फरपुर बच्चों की मौत को जैसे Ajit Anjum अजीत अंजुम जी ने राष्ट्रीय मुद्दा में तब्दील किया और मैं समझता हूं कि शायद उसका परिणाम भी झेलना पडा, वो अद्भुत है. वर्ना, मौजूदा दौर में पत्रकारिता के छात्रों तक को गुमराह कर देने वाले लंपट एंकरों से क्या उम्मीद की जा सकती थी?

राम मन्दिर पर सुनवाई के 40 दिन भारतीय मीडिया की प्रतिभा/क्षमता को एक्सपोज कर गया. क्या रिपोर्टर, क्या एंकर, सब खुद को सबसे बडा नशेडी और ड्रगिस्ट साबित करने पर तुले थे. लेकिन, मेरे एक प्रिय मित्र, Prabhakar Mishraप्रभाकर मिश्रा ने जिस संतुलन और क्षमता के साथ कोर्ट रिपोर्टिंग को टीवी और फेसबुक पर पेश किया, वो अद्भुत था मेरे लिए. कई बातें सीखी मैंने और सबसे बडी बात ये कि उन्होंने नजीर पेश किया कि रिपोर्टिंग करते वक्त रिपोर्टर को क्या और कैसे रहना चाहिए, बिना इस बात की चिंता किए कि कहीं आग न उगलने के कारण उनका संपादक उनसे नाराज तो नहीं हो जाएगा. उनके 40 दिनों की रिपोर्टिंग पत्रकारिता के छात्रों के लिए एक पुस्तक के तौर पर उपलब्ध कराई जा सकती है, यदि वे चाहे तो. राजनीति में क्या चल रहा है, ताजा घटनाक्रम के सही अर्थ और सकेत क्या है, तो मित्र Sumit Kumar Dubey सुमित दुबे की रिपोर्टिंग देखे न देखे, एफबी पोस्ट देख लीजिए. बिल्कुल सटीक सूचना, अचूक संकेत. जनसमस्याओं, पर्यावरण के मुद्दों को जिस शिद्दत से पटना के वरिष्ठ पत्रकार Pushya Mitra पुष्यमित्र जी उठाते है, उसका असर भी देखने को मिलता है.

आजकल के सारे एंकर-पत्रकार हिन्दू-मुसलमान नामक बीट के स्वघोषित एक्सपर्ट हो गए है और अदद एक मौका की तलाश में रहते है, बाज की तरह, कि मौका मिले तो आज मुसलमानों पर परमाणु बन गिरा ही देना है, वैसे दौर में Mohd Zahid मोहम्मद जाहिद की लेखनी पढ कर थोडा सकून मिलता है. यकीन होता है कि नहीं, अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है. भडास वाले यशवंत सिंह Yashwant Singh है, जो किसी को नहीं छोडते, अगर सबूत हो, तथ्य हो. वे मोदी की आलोचना भी उसी ताकत से करते है, जिस ताकत से केजरीवाल की और सराहना भी दोनों की उसी अन्दाज में करते है, बिलकुल ताल ठोक के. ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर वाला स्टाइल. असल में हम सभी भारतीय नागरिकों को, मतदाताओं को इसी निस्पृह भाव को अपनाना भी चाहिए.

ये लिस्ट बहुत लंबी तो नहीं है, हां अधूरी हो सकती है. जितना समझा, जितने नाम मिले, जितना वक्त मिला, लिख दिया. बाकि, और भी मेरे कई मित्र है, जो क्षमतावान है, लिखना चाहते है, लेकिन इस डर से भी सच नहीं लिखते कि पता नहीं गाली मिलेगी या कोई और नुकसान न हो जाए. ऐसे मित्रों से यही कहना है, आग लगेगी तो आप ही कहां बच पाओगे और क्या बिगाड की डर से ईमान की बात न बोलोगे. बोलिए, लिखिए, आपके लिखने से आग बुझे न बुझे, कम से कम पानी में इतना जोश तो पैदा हो कि आग के लिए भय बन जाए….

युवा पत्रकार शशि शेखर की एफबी वॉल से.

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