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सुख-दुख

लैंडलाइन फोन की घंटी बजी, उधर से जीएम बोले- ‘तुमने फिर बवाल कर दिया, तुम तो जेल जाओगे ही साथ में अख़बार के मालिक को भी ले जाओगे!’

विमल दीक्षित-

पत्रकारिता जीवन में तमाम खट्टे मीठे अनुभव हुए। आज इन्हीं अनुभवों को लेकर जब सोचता हूं तो हंसी भी आती है और यह भी लगता है कि अखबार में काम करते कितना कुछ अकारण झेलना पड़ता है। एक ऐसा ही किस्सा आपको सुनाता हूं। जिसको सुनकर आपको आनंद भी आएगा और यह भी जान पाएंगे कि किस तरह से लोग बाग तीन तिकड़म करके किसी पत्रकार को नीचे गिराने की साजिश रचते थे।

यह किस्सा वर्ष 1997 का समय रहा होगा। शाम का वक्त था लैंडलाइन फोन की घंटी बजी तो हमने फोन उठाया। दूसरी तरफ देहरादून से टेलीफोन ऑपरेटर की आवाज सुनाई दी। दीक्षित जी जीएम साहब बात करेंगे। यह कहकर ऑपरेटर ने जीएमएस साहब को फोन कनेक्ट कर दिया। इधर से मैं कुछ बोल पाता कि जीएम के चीखने चिल्लाने की आवाज आई। तुम्हारी वजह से हमारा जीना हराम हो गया है। आए दिन मोहन बाबू हमको डांटते रहते हैं। जलील होना पड़ता है। खाना पीना दुश्वार हो गया है।

मैंने पूछा अब क्या हुआ। वे बोले तुम तो जेल जाओगे ही। और तुम्हारी वजह से मोहन बाबू भी जेल में चक्की पीसेंगे। साला रोज-रोज कोई ना कोई बवाल होता है और आफत हमारी आती है। हमें तो नौकरी करना मुश्किल पड़ गयी है।

मुझे तो समझ नहीं आता मैं क्या करूं। हमने कहा भाई साहब थोड़ा पानी पी लीजिए और ठंडा हो लीजिए तफसील से बात करते हैं ऐसा कुछ नहीं होगा। हमारी बात सुनकर वह और उत्तेजित हो गए। तुम्हें मजाक सूझा है। मजाक का भी समय होता है। इस समय हम सीरियस हैं। यह बताओ तुमने किसी से पैसे लिए जिसका विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ।

हमने छूटते ही बोला हमारा विज्ञापनों से क्या लेना देना। आपको मालूम है विज्ञापनों से एलर्जी है। और मैं यह काम नहीं करता। पता नहीं किसने विज्ञापन के पैसे लिए और किसने नहीं। हमें नहीं मालूम।

जीएम साहब का स्वर नरम हो गया। बोले यार दिल्ली एक सम्मन पहुंचा है। उसमें मोहन बाबू और तुमको आरोपी बनाया गया है। आरोप लगाया गया है कि तुमने अदालती नोटिस प्रकाशित करने के पैसे ले लिए और उसे अखबार में प्रकाशित नहीं किया जिसकी वजह से शिकायतकर्ता को भारी नुकसान हुआ। उसने फोरजरी का आरोप लगाते तुम दोनों को अभियुक्त बनाया है जिसकी तारीख अगले हफ्ते है। दोनों को अदालत के सामने हाजिर होना पड़ेगा।

हमने कहा मेरे पास तो ऐसा कोई सम्मन नहीं पहुंचा। जीएम साहब बोले नहीं पहुंचा तो पहुंच जाएगा। इस मैटर को सॉल्व करो अन्यथा तुम्हारी तो नौकरी गई, हम भी नहीं बचेंगे। यह कहकर जीएम साहब ने फोन रख दिया।

मुकदमे की बात सुनकर हमारी खोपड़ी खराब हो गई। सोचने लगा पता नहीं किसने पैसे लेकर खा लिए और मुकदमा फ्री में हम झेलेंगे। अगले रोज सुबह-सुबह कोर्ट से हमारे नाम का भी सम्मन आ गया। उसमें वही आरोप दोहराए गए थे जो जीएम साहब ने बताए थे।

हमने तुरंत ही फोन पर दो-चार वकीलों से बात करी। जिन वकीलों से भी बात की उन सभी को यह प्रकरण मालूम था। मुकदमे में शिकायतकर्ता बार एसोसिएशन का अध्यक्ष था। हमें भी जानता था। उसने जानते हुए भी मुकदमा ठोक दिया था। मैंने लगभग आधा दर्जन वकीलों से बात की। और कहा कि वह हमारे मुकदमे को देख लें तथा कोर्ट में खड़े हो जाएं। वकीलों ने कहा मामला बार अध्यक्ष से जुड़ा है। कोई भी वकील आपकी तरफ से नहीं खड़ा होगा। आपको मुकदमा खुद ही फेस करना होगा।

यह हमारे लिए एक नई मुसीबत थी। समस्या से निपटने के लिए मैंने जिस अदालत में मुकदमा था उसके जज से मिलने का फैसला किया। इसके अलावा मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था। पता किया तो मालूम हुआ कि जज साहब बहुत ईमानदार और कड़क आदमी हैं। और इन दिनों कोटद्वार गढ़वाल के सरकारी डाक बंगले में ठहरे हुए हैं।

मैंने उनसे मिलने का फैसला ले लिया था। मैं सीधे डाक बंगले पहुंचा और अपने नाम की पर्ची लिखकर भिजवाई। पर इससे पहले अर्दली ने यह चेता दिया कि अगर कोई सिफारिश लेकर आए हैं तो निराश होना पड़ेगा, हो सकता है आप सीधे जेल पहुंच जाए। हमने बोला कोई बात नहीं। आप यह पर्ची पहुंचा दें। जज साहब को मिलना होगा तो वे हमसे मिल लेंगे, नहीं तो हम वापस हो लूंगा।

जज साहब लान में बैठे धूप का आनंद ले रहे थे। उन्होंने हमको बुला लिया। मैं चेयर पर बैठ गया। मुस्कुराए और बोले कैसे आना हुआ। मैंने सारा किस्सा सुना दिया। वह बोले जब तुमने कुछ किया नहीं तो यह मुकदमा ही नहीं चलेगा। हमने यह भी बताया कि कोई भी वकील हमारे लिए वकालतनामा लगाने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं। आप सुबह 10 बजे कोर्ट में आ जाइएगा। पहली पुकार आपकी होगी। उसी समय डिसीजन भी हो जाएगा। मैं आश्वस्त होकर चला आया।

अगले रोज कोर्ट में पेशी थी। समय पर पहुंच गया था। 10 बजे कोर्ट में पुकार हुई और मैं कोर्ट में पेश हो गया। दूसरी तरफ से बार अध्यक्ष पेश हुए। जज साहब ने कागज पत्तर देखें। बार अध्यक्ष से बोले की आप आरोपित को जानते हैं। उन्होंने हां में सिर हिलाया। फिर जज साहब बोले आपने इनको या मोहन बाबू को विज्ञापन के लिए पैसे दिए थे। वकील साहब असमंजस में थे और उनको बोलना पड़ा की विज्ञापन के पैसे इनमें से किसी को नहीं दिए थे। इनके ऑफिस में एक आदमी काम करता है मैंने उसी को पैसे दिए और उसने विज्ञापन प्रकाशित नहीं किया जिससे कि हमारा मुकदमा कमजोर हो गया।

अब बारी जज साहब के नाराज होने की थी। वे चिल्लाए जब आपने विमल दीक्षित और मोहन बाबू को विज्ञापन प्रकाशित करने के पैसे नहीं दिए तो उन पर अनर्गल आरोप कैसे लगा दिया। आपने कोर्ट का समय खराब किया है क्यों ना आपके ऊपर एक्शन लिया जाए।

बार अध्यक्ष गिड़गिड़ाने लगे। जज साहब ने चेतावनी देते हुए मुकदमा खारिज कर दिया और हमसे कहा दीक्षित जी आप जाइए। इस तरह से यह अजीबोगरीब मसला निपटा। दफ्तर जाकर मैंने तुरंत जीएम साहब को फोन लगाया और बोला के मुकदमा खारिज हो गया है। इत्मीनान से आप चाय कॉफी पीजिए और दिल्ली फोन करके अखबार के प्रधान संपादक मोहन बाबू को यह खबर बता दें।

जीएम साहब बोले हम दोनों इस बड़ी मुसीबत से बच गए। वरना पता नहीं क्या होता। तो भैया जी पत्रकारिता जीवन में ऐसे तमाम किस्से होते रहते हैं। यहां वह कहावत चरितार्थ होती है कि करे कोई भरे कोई।

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