संजय कुमार सिंह
वैसे तो लेह में कर्फ्यू और कारगिल में धारा 163 लागू कर दी गई है। 40 लोगों की गिरफ्तारी के साथ ही लेह प्रशासन ने स्थिति नियंत्रण में बताई है। देशबन्धु की खबर के अनुसार, उमर फारूक ने कहा है कि लेह में जो हुआ वह एकतरफा फैसले का नतीजा है। फारुख अब्दुल्ला ने कहा है कि लद्दाख के लोगों से वादे पूरे नहीं किये गये हैं। द टेलीग्राफ की एक खबर के अनुसार लद्दाख का समर्थन करने के लिए घाटी के नेताओं ने अंतरविरोध छोड़ दिया है। पर सरकार हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी हुई है। फॉलोअप नहीं है और स्थिति यह है कि हिंसा हो गई तो सरकारी प्रचारकों ने राहुल गांधी और सोनम वांगचुक पर हमले शुरू कर दिये। यह सब चलता रहेगा तो वोट चोरी की खबर नहीं छपेगी। मुझे लगता है और पुराने उदाहरणों से कहा जा सकता है कि जब ऐसी खबरों और घटनाओं से हेडलाइन मैनेजमेंट हो सकता है तो भाजपा और उसकी सरकार कोई मौका नहीं चूकेगी। उसे अभी इसी की जरूरत है क्योंकि इससे वोट चोरी की खबर रोकी जा सकगी। इसके लिए कल मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि अब पोस्टल बैलट गिनने की व्यवस्था ठीक की गई है। इससे पहले हरियाणा के उचाना कलां विधानसभा सीट से जुड़ी चुनाव याचिका चर्चा में है। इसमें जीत‑हार का अंतर बहुत कम, सिर्फ 32 वोट है। आरोप है कि 215 पोस्टल वोट रद्द कर दिया गया। यही नहीं, 150 पोस्टल वोट के लिफाफे खोले ही नहीं गये। अदालत ने इसमें चुनाव अधिकारी को तलब किया है और अब चुनाव आयोग ने यह घोषणा की है। इससे पहले राहुल गांधी के आरोप के साथ क्या हुआ आप देख चुके हैं। अखबारों में जिन खबरों और घटनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है वह साफ बता रहे हैं कि सरकार के समर्थन में जबरदस्त हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है।
उचाना कलां विधानसभा सीट से जुड़ी चुनाव याचिका चर्चा में है। इसमें जीत‑हार का अंतर बहुत कम, सिर्फ 32 वोट है। आरोप है कि 215 पोस्टल वोट रद्द कर दिया गया। यही नहीं, 150 पोस्टल वोट के लिफाफे खोले ही नहीं गये। अदालत ने इसमें चुनाव अधिकारी को तलब किया है और अब चुनाव आयोग ने यह घोषणा की है। इससे पहले राहुल गांधी के आरोप के साथ क्या हुआ आप देख चुके हैं। आज जब हिंसा का फॉलोअप जरूरी था तो सरकार का यह प्रचार लीड है कि जीएसटी से लोगों की जेब में पैसा बढ़ा। इसमें यह दिलचस्प है कि जब यह टैक्स लगाया गया था तब भारत बढ़ा, मंहगाई आई, बचत कम हुआ जैसा कोई दावा नहीं किया गया। 12 रुपये की लूट को 5 रुपये किये जाने का प्रचार है और नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने जीएसटी में और सुधार की संभावना जताई है तथा कहा है कि करों का बोझ और कम होना संभव है। आप समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री क्या बोल और कर रहे हैं। टैक्स लगाकर कम करने का प्रचार और फिर यह प्रचार कि और कम किया जा सकता है। इसमें बिना कहे यह संदेश है कि, मैं कुर्सी पर रहा तो और कम हो सकता है। वैसे तो यह चुनावी कदाचार है लेकिन लोट चोरी पर मौन साधे लोग इसपर क्या बोलेंगे।
लेह की हिंसा के बाद प्रचारकों ने राहुल गांधी को निशाना बनाना शुरू कर दिया था। सरकार ने सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया और पुराने व देसी तरीके से कार्रवाई शुरू कर दी। लेकिन लेह पटना या दिल्ली नहीं है। कार्रवाई वैसी नहीं है जैसी होनी चाहिये और इसमें सबसे बड़ी बात है, सोनम वांगचुक के एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस निरस्त (रद्द) किया जाना। आज यह बड़ी खबर है लेकिन मैं बताता हूं कि कैसे यह कोई कार्रवाई नहीं है या बहुत आम है। हिन्सा के लिए बिल्कुल अपर्याप्त पर सिस्टम को इससे बेहतर कुछ आता ही नहीं है।
भाजपा आईटीसेल के प्रवक्ता अमित मालवीय ने कल 2007 की एक सरकारी चिट्ठी साझा करते हुए लाइसेंस निरस्त करने की सूचना दी और कहा कि यह लाइसेंस तो बहुत पहले रद्द कर दिया जाना चाहिये था। लेह के उपायुक्त की यह चिट्ठी 28 फरवरी 2007 की है। मैं इसे ताजा आदेश समझ रहा था। ऑन स्क्रीन पढ़ते हुए गच्चा खा गया। अंग्रेजी में लिखी इस चिट्ठी में कहा गया है, हाल ही में आपके और आपके एनजीओ के खिलाफ निम्नलिखित गंभीर आरोप लगे हैं 1. आप सरकारी कर्मचारियों का मनोबल गिरा रहे हैं, क्षेत्रीय शिक्षा कार्यालय आदि जैसे प्रशासनिक कार्यालयों की अनदेखी कर रहे हैं, अशोभनीय भाषा और टिप्पणियों का प्रयोग कर रहे हैं, और विभाग तथा उसके पदाधिकारियों पर निराधार आरोप लगा रहे हैं। 2. आप सरकार को बकाया राशि का भुगतान किए बिना 200 कनाल भूमि पर कब्जा किये बैठे हैं। 3. आप विदेशी अंशदान अधिनियम के प्रावधानों का दुरुपयोग कर विदेशी अंशदान से प्राप्त धन का दुरुपयोग कर रहे हैं। 4. चीन और अन्य स्थानों में आपके राष्ट्र-विरोधी संबंध रहे हैं, जिनका उपयोग राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए किया गया है या किया जा सकता है। 5. आप समय-समय पर परिषद और जिला प्रशासन को प्रतिकूल टिप्पणियों और क्षेत्र के सौहार्द को बिगाड़ने वाले परिणामों की धमकी देकर धमकाते रहे हैं। ये सभी आरोप बहुत गंभीर हैं और प्रशासन तथा और क्षेत्र की शांति के लिए गंभीर खतरा हैं। आपके एनजीओ और विशेष रूप से आपके व्यक्तिगत क्षमता के विरुद्ध सभी मामलों में कार्रवाई शुरू करने के लिए आपको नोटिस दिया जाता है ताकि क्षेत्र में किसी भी गड़बड़ी को रोकने के लिए निवारक सुरक्षा उपाय किए जा सकें।
आप इस पत्र को चाहे जैसे देखिये मैं समझता हूं और ऐसा लिखा भी है कि इसके लिये कार्रवाई की जा सकती है। आरोपों से साफ है कि इनमें कोई गैर कानूनी नहीं है, अगर हो तो पुख्ता सबूत नहीं है और है भी तो यह चेतावनी ही दी गई है। अमित मालवीय के जरिये भाजपा और सरकार यह प्रचारित कर रही है कि सोनम वांगचुक ऐसे ही हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई तो बहुत पहले हो जानी चाहिये थी, अब की गई है। पर मुद्दा यह है कि पहले की सरकार ने चेतावनी दी, असर हुआ या नहीं हुआ मैं नहीं जानता पर सोनम वांगचुक जो कर रहे थे वह ऐसा नहीं था कि उसके लिए ऐसी कार्रवाई की जाती जो अब की गई है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि पहले की सरकार आंदोलनों, विरोध और अमर्यादित भाषाओं को झेलती, बर्दाश्त करती थी और इसे लोकतंत्र का हिस्सा मानती थी। संभव है, सोनम वांगचुक इस चेतावनी से सुधर गये हों। दोनों स्थितियों में कार्रवाई नहीं हुई और अब सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि सोनम वांगचुक ऐसे ही हैं और जो हुआ उन्हीं की वजह से हुआ। और सरकार ने कार्रवाई कर दी। पर मुद्दा यह है कि सोनम वांगचुक अगर ऐसे ही थे और उन्हीं की वजह से हिंसा हुई तो क्या सब एक दिन में हो गया। पिछली सरकार ने कार्रवाई नहीं की तो इस सरकार ने क्यों नहीं की। अब तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि सरकार को पता नहीं था क्योंकि सरकार तो छोड़िये, अमित मालवीय को भी पता था।
ऐसे में जाहिर है, सरकार ने सोनम वांगचुक के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं की और ऐसा दिखाया जा रहा है कि हिन्सा इसी कारण हुई। अगर ऐसा है तो गलती सरकार की नहीं है? सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की और 2014 में सत्ता में आने के बाद से अभी तक क्या ऐसा कोई मौका नहीं आया कि इसकी जरूरत लगती। अगर नहीं आया और अब हिन्सा हो गई तो इस पुरानी चिट्ठी का क्या मकसद और सरकार चलाने में यह राजनीति क्यों घुसेड़ी जा रही है। यह सवाल मीडिया को करना चाहिये। या खबर देनी चाहिये। ज्यादातर अखबारों में दोनों नहीं है। ना सवाल ना सच्चाई ना यह खबर कि ठेठ प्रशासनिक मामले में अमित मालवीय क्यों सूचना देते हैं? या सरकारी चिट्ठी साझा करते हैं। इसका जवाब भले सभी अखबारों में नहीं है, द टेलीग्राफ की खबर से मामला समझ में आ जाता है। टेलीग्राफ का शीर्षक है, मोदी के प्रशंसक आतंकवादी हो गये। कार्रवाई नहीं होने का कारण इतने से ही समझ में आ जाता है और अगर यह तथ्य है तो सरकार की कार्रवाई की सूचना के साथ यह भी खबर है। लेकिन अमर उजाला ने इस टॉप पर आठ कॉलम में छापा है। यह इतनी महत्वपूर्ण जानकारी नहीं है। अगर छोटे फौन्ट में हो भी तो यह सूचना ऐसी नहीं है कि हाईलाइट नहीं की जाये। भारतीय मीडिया अब ऐसी जानकारी नहीं देता है। यही चिन्ता की बात है और सरकार की कार्यशैली पर सवाल। जेन जी के आंदोलनों से डर स्वाभाविक है, उन्हें उकसाना भड़काना गलत है लेकिन उन्हें शांत करने के लिए, उनका गुस्सा कम करने के लिए सरकार क्या कर रही है और जो दिख रहा है वह यही कि राहुल गांधी या किसी और पर आरोप मढ़ना। राहुल गांधी पर जो आरोप लगाये जा रहे हैं उसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। सोनम वांगचुक को फंसाने की कोशिश आज अखबारों में दिख ही रही है। सोशल मीडिया पर भारतीय जनता पार्टी का प्रचारक गिरोह किसी की फोटो को किसी और का बता रहा है। उसे कांग्रेस नेता, राहुल गांधी का करीबी बता रहा है। जो गलत है।
सोनम वांगचुक का एक ट्वीट शेयर कर पूछा जा रहा है कि सोनम वांगचुक तो केंद्र शासित प्रदेश की मांग कर रहे थे अब क्यों नाराज हैं, आंदोलन खड़ा किया। संयोग से यह ट्वीट 5 अगस्त 2019 का है जिस दिन 370 हटाया गया था और जम्मू व कश्मीर के दो टुकड़े करके उसे राज्य का दर्जा दे दिया गया। इससे और चाहे जो जाहिर होता हो, यह भी जाहिर होता है कि हिन्सा या सोनम वांगचुक की नाराजगी के कारण 5 अगस्त 2019 के बाद पैदा हुए। अगर सोनम वांगचुक अपनी मांग पूरी होने के बावजूद विरोधी हो गये, राहुल गांधी का समर्थन करने लगे तो नाराजगी सरकार से ही है और इसी सरकार से है। भले खबरें कम छपी पर नाराजगी की खबरें तो छपती रही हैं। सोनम वांगचुक के गांधीवादी आंदोलनों की खबरें भी आई हैं। जिस दिन हिन्सा हुई उस दिन भी सोनम वांगचुक ने (या किसी और ने) कहा था कि लड़के इंतजार करते रहे कि उन्हें बातचीत के लिए बुलाया जायेगा। जब नहीं बुलाया गया और कई दिनों तक नहीं बुलाया गया तो उनका गुस्सा फूटा। फिर भी हिन्सा का कोई समर्थन नहीं करता है। रोकना सरकार का काम है और इसमें आंदोलनकारियों या विरोधियों को कुचल देना, गोली मार देना, जान ले लेना या जेल में बंद रखने का भी समर्थन नहीं किया जा सकता है। पर हो रहा है और सोनम वांगचुक गवाह हैं कि सरकार अपने समर्थकों और प्रशंसकों की भी नहीं सुनती। विरोध करने पर नहीं, गांधी वादी तरीकों से भी नहीं। अब जब सोनम वांगचुक का एफसीआरए लाइसेंस निरस्त कर दिया गया है और अमर उजाला के लिए इतनी बड़ी खबर है तो यह भी बताना जरूरी है कि सोनम वांगचुक ऐसे थे तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई।
यह सरकार की राजनीति का हिस्सा है। जीएसटी के कुछ प्रावधानों (जिन्हें बाद में हटा लिया गया) और जिनके एफसीआरए लाइसेंस रद्द हुए हैं उसके आधार पर कहा जा सकता है कि सरकार स्वतंत्र रूप से ठीक ठाक कमाने वालों को भी अपना संभावित दुश्मन मानती रही है। वरना 2007 में सोनम वांगचुक को चेतावनी देने के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। तब दूसरी सरकार थी उसका मामला है। अब नहीं होने का कारण यह भी हो सकता है कि वे समर्थन कर रहे थे। विरोध करना शुरू किया तो माना नहीं गया कि इतने विरोधी हो जाएंगे या कुछ कर सकेंगे। तथ्य है कि वर्ष 2015 से अब तक 16,000 से अधिक एनजीओ का एफसीआरए पंजीकरण उसके नियमों और शर्तों के ‘उल्लंघन’ के कारण रद्द कर दिया गया है या नवीकरण नहीं हुआ या पंजीकरण ही नहीं हुआ है। दूसरी ओर इस पंजीकरण और चंदे को मोटे तौर पर ऐसे देखा जाना चाहिये कि यह भारत में खर्च होता हैं। इसलिये इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष का परोक्ष रूप से पड़ेगा ही। इन पैसे से जो भी काम किये जाते हैं उससे लोगों को रोजगार मिलता है और ज्यादातर समाज सेवा के काम करते हैं। उससे समाज का भी भला होता है। इसके बावजूद सरकार ने 16,000 से अधिक एनजीओ के लाइसेंस रद्द किये हैं, पंजीकरण नहीं हुआ है या लाइसेंस का नवीकरण नहीं हुआ है। इसमें दिलचस्प यह है कि सोनम वांगचुक का रद्द नहीं हुआ था, अब हुआ है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, अप्रैल 2024 तक 20701 एनजीओ के लाइसेंस रद्द हुए हैं। अगर लाइसेंस रद्द करना इतना ही आम है तो आज सोनम वांगचुक का लाइसेंस रद्द होना इतनी बड़ी खबर क्यों है? या इससे क्या हो जायेगा? जिनके लाइसेंस रद्द हुए हैं उनमें सेटर फॉर पॉलिसी रिसर्च शामिल है और तब खबर छपी थी, कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी के एनजीओ का लाइसेंस रद्द। अब आप सोचिये कि जो कार्रवाई तब की गई थी वही अब लेह की हिन्सा के बाद की गई है। कितनी सही, जरूरी या उपयुक्त होगी। मदर टेरेसा के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के लाइसेंस का नवीकरण भी रोक दिया गया था या रुक गया था जबकि देशभर में इसके सैकड़ों वृद्धाश्रम, अस्पताल और अनाथालय हैं।
जाहिर है, हिन्सा सोनम वांगचुक के कारण नहीं हुई और हुई तो उसके लिए सरकार जिम्मेदार है। लेकिन वह मुद्दा नहीं है, खबर भी नहीं है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में लेह की खबर लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड आत्मनिर्भरता है। प्रधानमंत्री ने जोर दिया भारत ने रूस से संबंधों की प्रशंसा की। इंडियन एक्सप्रेस की लीड अमित शाह की कोशिश है। उन्होंने कहा है, भारत के बैंकों को दुनिया भर में शिखर के 10 बैंकों में शामिल होने के लिए काम करना चाहिये। आप जानते हैं कि नोटबंदी से बैंकों का क्या हुआ और नोटबंदी से नहीं हुआ तो तथ्य है कि 2014 के बाद से देश के कई बैंक बंद होगये, कइयों का दूसरे बैंकों में विलय होगा और इसके ढेरों कारण हो सकते है। ऐसे समय में कौन सा भारतीय बैंक दुनिया के 10 शिखर के बैंकों में शामिल हो जायेगा। वह भी तब जब उनके मंत्रालय ने विदेशी सहायता लेना इतना मुश्किल कर दिया है कि पिछले 10 साल में 20,000 से ज्यादा एनजीओ के लाइसेंस रद्द हुए या उनका नवीकरण नहीं हुआ। इस तरह देश में आने वाला कई हजार करोड़ भारत नहीं आया होगा, जरूरी काम नहीं हो पा रहे होंगे ऐसे समय में बैंक अपने स्तर पर दुनिया भर के टॉप 10 में शामिल होने के लिए क्या कर सकते हैं? दि एशियन एज की लीड जीएसटी सुधार जारी रहेगा, है। लेह की खबर सभी अखबारों में है लेकिन यह नहीं बताते कि हिन्सा क्यों भड़की होगी, नाराज युवकों की क्या मांग है या सरकार उसके लिये क्या कर रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


