महाराष्ट्र का सबसे बड़ा अखबारी ब्रांड होने का दम भरने वाला ‘लोकमत समूह’ अक्सर गर्व से खुद को “लोकमत-परिवार” कहता है. बड़े-बड़े जलसे, गगनभेदी भाषण और दिल को छू लेने वाले वीडियो – इन सबमें ‘परिवार’ की महिमा गाई जाती है. लेकिन जब धूल छँटती है और ज़मीन की सच्चाई सामने आती है, तब ये ‘परिवार’ शब्द कागज़ पर लिखे एक औपचारिक संबोधन से ज़्यादा कुछ नहीं लगता.
दशकों में यह पहली बार नहीं है जब किसी कर्मचारी को दूध में गिरी मक्खी की तरह बाहर कर फेंका गया हो. एक के बाद एक ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने इस ‘परिवारवाद’ के खोखलेपन को नंगा कर दिया है. लेकिन बात यहीं नहीं थमती.
अभी हाल ही में, समूह के शीर्ष कर्ताधर्ता के 75वें जन्मदिवस के मौके पर एक विशेष मुहिम चलाई गई – अंगदान संकल्प. कर्मचारियों और उनके परिवारों से अपील की गई कि वे संकल्प-पत्र भरें और इस पुण्य कार्य में भाग लें. कुछ यूनिट्स ने वाकई इस अपील को मान देकर अपने लक्ष्य पूरे किए. लेकिन कुछ यूनिट्स, जिनका आंकड़ा कम रहा, उन्हें क्या मिला? शाबाशी? नहीं. संवेदना? नहीं. मिला तो बस ज़ूम-मीटिंग में फटकार, दबाव और अल्टीमेटम.
सूत्र बताते हैं कि बैठक में जिन यूनिट प्रमुखों ने अपेक्षित संकल्प पत्र नहीं जुटा पाए, उन्हें बुरी तरह लताड़ा गया. कहा गया कि जल्द से जल्द लक्ष्य पूरा करो – नहीं तो परिणाम भुगतने को तैयार रहो. अब हालत यह है कि कुछ यूनिट हेड्स आपस में कहते पाए गए – “क्या अब लोगों के घर-घर जाकर फार्म भरवाना होगा? क्या कर्मचारियों के निजी निर्णयों में भी हम दखल देंगे?”
अंगदान, रक्तदान – निस्संदेह ये परमार्थ के कार्य हैं. और किसी को इसके लिए प्रेरित करना प्रशंसनीय भी है. लेकिन प्रेरणा और दबाव – इन दोनों के बीच एक महीन रेखा होती है. और जब वही रेखा किसी ‘परिवार’ द्वारा लांघ दी जाए, तो सवाल उठना लाज़मी है – क्या यह प्रेरणा है या आदेश? क्या यह भावनात्मक जुड़ाव है या एक संगठनात्मक लक्ष्य?
यदि कोई संस्था अपने सर्वोच्च नेता के जन्मदिवस पर ’75 अंगदान संकल्प पत्र’ एक KPI (Key Performance Indicator) की तरह थोप दे, और उसकी पूर्ति न होने पर फटकारे – तो क्या वह वास्तव में ‘परिवार’ कहलाने की हकदार है?
क्या ‘परिवार’ का मतलब सिर्फ तब होता है जब तालियाँ बज रही हों, जब रंगीन पोस्टर छप रहे हों, जब मंच पर फूल बरसाए जा रहे हों? और जब बात संवेदनशील निजी निर्णयों की हो – तब वही परिवार एक शुष्क संस्था बन जाए? यह विज्ञप्ति उन सभी कर्मचारियों की ओर से है जो अब भी यह सवाल मन में लिए बैठे हैं – “क्या हम वाकई किसी परिवार का हिस्सा हैं, या फिर बस एक लक्ष्य-पूर्ति का औज़ार?”
एक यूनिट हेड ने नाम न छापने की शर्त पर भड़ास को बताया कि, “जब हमने इस समूह को ‘परिवार’ कहा था, तब सोचा था कि यहां हमारे फैसलों का सम्मान होगा, हमारी भावनाओं को समझा जाएगा. पर अब लगता है, संकल्प-पत्रों के आंकड़ों में हमारी संवेदनाएं गिनती ही नहीं रखतीं. अंगदान जैसा व्यक्तिगत और पवित्र निर्णय भी अब KPI बन गया है.”
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