चंद्र भूषण-
ममता को हद में ही रखे इंडिया समूह….
नेताओं के बारे में मेरी राय सही या गलत हो सकती है लेकिन संसदीय चुनावों या उनके नतीजों से वह बहुत कम, न के बराबर ही प्रभावित होती है। मसलन, ममता बनर्जी को मैं विचारशून्य और खतरनाक हद तक अवसरवादी नेता मानता रहा हूं। सत्ता के लिए मोदी की तरह वह भी किसी का गला काट सकती है। अतीत में एक-दो बार यह बात कही भी है। इसको मेरी वाम दृष्टि से जोड़कर न देखा जाए, क्योंकि बंगाल के सरकारी वाम का विरोध करने के क्रम में ही मेरे वाम संस्कार विकसित हुए हैं।
बिल्कुल संभव है कि कल को ममता बनर्जी इंडिया गठबंधन में शामिल होकर देश भर में मोदी-शाह गिरोह के प्रतिरोध का नेतृत्व करने लगें, लेकिन उनके बारे में मेरी राय तब भी ऐसी ही रहेगी और इंडिया गठबंधन से मेरी निराशा थोड़ी और बढ़ जाएगी। आगे कुछ कहने से पहले एक-दो बातें ममता को लेकर अपनी राय बनने की प्रक्रिया के बारे में।
अटल सरकार में ताकतवर मंत्री रही ममता ने दूसरी मनमोहन सरकार में वैसी ही जगह हासिल की, लेकिन बंगाल पर असल धावा बोलते हुए सरकारी वाम से निपटने के क्रम में उन्हें दो ताकतों की मदद लेनी पड़ी। दक्षिणी बंगाल में नई-नई आकार ले रही माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी से और पूर्वी बंगाल में बहुत सड़े मिजाज की इस्लामी ताकतों से।
ऐसा करते हुए उन्होंने मनमोहन सरकार के सामने कई धर्मसंकट खड़े किए। इनमें सबसे बुरा था माओवादियों द्वारा कराई गई एक भीषण ट्रेन दुर्घटना के बाद अपनी पार्टी के केंद्रीय रेलमंत्री को दुर्घटना स्थल पर न जाने देना। यह, और ऐसी कई सारी और घटनाओं ने यूपीए की पॉलिसी पैरालिसिस वाली छवि को देश -दुनिया में पुख्ता कर दिया।
सरकार में आते ही ममता ने माओवादियों के खात्मे की शुरुआत भी बंगाल से ही की, जो अभी अमित शाह के रास्ते अपने अंजाम पर पहुंच रही है। रही बात उनके कथित मुस्लिम-पक्षधर रुख की, तो इसके बारे में कुछ कहने की जरूरत ही नहीं है। पश्चिम बंगाल की उर्दू एकेडमी के एक बड़े कार्यक्रम में जिस तरह शायर और चिंतक जावेद अख्तर को घुसने नहीं दिया गया, वह सिर्फ इस बात का एक नमूना है कि ममता सरकार मुस्लिम सांप्रदायिक पोंगापंथ पर किस हद तक निर्भर हो चुकी थी।
अतीत में वाम हुकूमत बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन के बारे में इससे भी बुरा रवैया अपना चुकी है, लिहाजा उस धारा का तो कुछ बोलने का मुंह ही नहीं है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता को लेकर गंभीर दृष्टि रखने वाले लोगों को इन खतरनाक अवसरवादियों को ज्यादा इज्जत अभी तो नहीं ही देनी चाहिए। फ़ासिस्टों से ये लोग जब लड़ेंगे तब लड़ेंगे, पहले कुछ दिन खुद से तो लड़ लें।
रही बात जमीनी गुंडई और भद्रलोक छवि के अचूक संतुलन की तो सरकारी वाम और ममता ने कमोबेश एक-से तौर-तरीकों के जरिए लगभग आधी सदी तक इसको साधे रखा, लेकिन कभी न कभी तो यह हकीकत बेपर्दा होनी ही थी। गुंडई को यहां से आगे हिंदू सांप्रदायिकता की चादर मिल जाएगी (मिल ही गई है) और उसके नेताओं को अंग्रेजी में बंगाली भद्रलोक जैसी महीन वैचारिक जुगाली भी नहीं करनी पड़ेगी।
लेकिन अगर किसी को लगता हो कि गुजराती, पारसी और नए सॉफ्टवेयर पूंजीपति यहीं से बंगभूमि में अपनी पूंजी लगाना शुरू कर देंगे, तो उसे अपने उत्साह को साल भर नियंत्रित रखना चाहिए। यूपी की योगी गुंडा फैक्ट्री को नोएडा का जो वरदान प्राप्त है, वह बंगाल के भाग्य में नहीं है, लिहाजा धंधे का पॉज बटन तबतक दबा ही रहेगा, जबतक भाजपा सचेत ढंग से अपने इन लाडलों को कोई और रास्ता नहीं दिखाती।
अगले दस साल या बीस साल फ़ासिज़्म से मुकाबले की जो भी लड़ाई भारत में चलनी है, उसकी मेनस्ट्रीम में ममता जैसी ताकतों की सीट अभी फ्रंट रो में तो नहीं होनी चाहिए। कुछ हद तक यह बात डीएमके के बारे में भी कही जा सकती है, हालांकि करुणानिधि जैसी भ्रष्टाचार के मुखर प्रवक्ता वाली छवि स्टालिन की नहीं है।
डीएमके तमिलनाडु में दबंग पिछड़ों की पार्टी है और थोड़ा भी खुला हाथ मिलने पर उसकी कतारें समाज के कमजोर तबकों पर कहर बरपा कर देती हैं। फिर भी स्टालिन कुछ जरूरी मुद्दों पर अच्छा स्टैंड लेने वाला नेता है और इंडिया ग्रुप को उससे अपनी दूरी एक हद से ज्यादा नहीं बढ़ने देनी चाहिए। फ़ासिज़्म से मुकाबले की नई सामाजिक ताकतें धीरे-धीरे देश में खड़ी हो रही हैं। नेताओं का मुंह देखे बगैर उन्हें हिम्मत देना और गोलबंद करना ही असल चीज है।



