मनीष पांडेय-
समय का चक्र भी कितना अद्भुत होता है ना… कब किसकी परिस्थितियां, पद और प्राथमिकताएं बदल जाएं, कोई नहीं जानता।
कुछ दिन पहले मैं और मनोज पाण्डेय जी उत्तर प्रदेश के एक बेहद भारी-भरकम विभाग के प्रमुख सचिव साहब के कार्यालय गए थे। प्रमुख सचिव साहब ने तो बड़े सम्मान से अंदर बुला लिया, लेकिन अंदर पहले से बाँदा वाले विधायक जी विराजमान थे।
हम लोग जैसे ही कमरे में दाखिल हुए, बैठने तक का अवसर नहीं मिला। विधायक जी तुरंत बोले “प्लीज़ आप लोग थोड़ी देर बाहर बैठ जाइए, मैं साहब से ज़रूरी चर्चा कर रहा हूं।”
अब विधायक जी अपने बड़े भाई जैसे हैं, इसलिए बिना किसी प्रतिक्रिया के हम दोनों बाहर आ गए। लगभग 20 मिनट इंतजार करने के बाद जब विधायक जी बाहर निकले, तब जाकर हम लोग अंदर पहुंचे। मनोज पाण्डेय जी ने अपनी विधानसभा से जुड़ा विषय प्रमुख सचिव साहब के सामने रखा और फिर हम लोग वापस लौट आए।
सच कहूं तो उस दिन ये बात मुझे थोड़ी खटकी जरूर थी। राजनीति और सत्ता में व्यवहार भी आदमी की पहचान बन जाता है।
लेकिन आज जब ये तस्वीर देखी तो बरबस वही घटना याद आ गई। तस्वीर में वही विधायक जी, अब मंत्री जी बन चुके मनोज पांडेय जी के सामने अपना परचा लेकर विनम्र भाव से अनुरोध करते दिखाई दिए।
तभी तो कहा गया है- “त्रिया चरित्रम् पुरुषस्य भाग्यं, देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।”
अर्थात् मनुष्य का भाग्य और परिस्थितियों का फेर तो देवता भी नहीं जान सकते, फिर साधारण मनुष्य की क्या बिसात।
जिस नेता को कभी अपने प्रभाव और व्यस्तता के आगे 20 मिनट बाहर बैठा दिया गया था, समय ने ऐसा चक्र घुमाया कि आज उसी नेता के पास स्वयं आग्रह लेकर पहुंचना पड़ा।
खैर… राजनीति में यही सबसे बड़ा सत्य है। आज जो दरवाजे के भीतर बैठा है, कल वही बाहर प्रतीक्षा करता मिल सकता है।
और ब्राह्मण नेता वैसे भी बड़े कोमल स्वभाव के होते हैं… छोटी-मोटी बातों को दिल से नहीं लगाते
उम्मीद है मनोज पाण्डेय जी ने भी उस दिन की घटना को मुस्कुराकर भुला दिया होगा। पर मुझे याद आ गई इसलिए सार्वजनिक कर रहा हूँ।



