वरुण उपाध्याय-
इलाहाबाद हाईकोर्ट की उस टिप्पणी ने नई बहस छेड़ दी है, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई विवाहित पुरुष किसी बालिग महिला के साथ उसकी सहमति से लिव-इन संबंध में रहता है तो इसे अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने साफ कहा कि कानून और नैतिकता अलग-अलग विषय हैं और सामाजिक धारणाएं न्यायिक फैसलों का आधार नहीं बन सकतीं। इसी एक टिप्पणी ने वैवाहिक संबंधों, महिलाओं की सुरक्षा और परिवार संस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन विवाहित महिलाओं पर पड़ता दिख रहा है, जिनके पति वैवाहिक संबंध कायम रहते हुए किसी दूसरी महिला के साथ रहने लगते हैं। अब तक ऐसे मामलों में पत्नी के पास सामाजिक दबाव और कुछ कानूनी धाराओं का मनोवैज्ञानिक सहारा रहता था, लेकिन अदालत की इस टिप्पणी के बाद पति पक्ष को एक तरह की कानूनी राहत मिलती दिखाई दे रही है। इससे पत्नी के लिए अपने वैवाहिक अधिकारों की रक्षा और भी जटिल हो सकती है।
महिला अधिकारों से जुड़े जानकारों का मानना है कि यह फैसला पुरुषों को विवाहेतर संबंधों के लिए खुली छूट जैसा संदेश दे सकता है। भले ही अदालत ने इसे केवल अपराध की परिभाषा तक सीमित रखा हो, लेकिन सामाजिक स्तर पर इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि शादीशुदा पुरुष अब दूसरी महिला के साथ रहने के लिए कानून की आड़ ले सकता है। इसका सीधा असर पत्नी के मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक सम्मान और पारिवारिक स्थिरता पर पड़ सकता है।
भारतीय परिवार व्यवस्था में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारियों का ढांचा भी है। ऐसे में यदि पति बिना तलाक लिए किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन में रहने लगे और इसे अपराध न माना जाए, तो सबसे ज्यादा असुरक्षा पत्नी को महसूस होगी। उसे भावनात्मक आघात के साथ-साथ बच्चों, संपत्ति, भरण-पोषण और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े सवालों का भी सामना करना पड़ सकता है।
कानूनी विशेषज्ञ यह भी याद दिला रहे हैं कि अदालत ने नैतिकता और अपराध को अलग रखने की बात कही है, इसका अर्थ यह नहीं कि विवाह संस्था के भीतर पत्नी के अन्य कानूनी अधिकार समाप्त हो गए हैं। पत्नी अब भी तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, मानसिक क्रूरता और संपत्ति से जुड़े अधिकारों के तहत न्याय मांग सकती है। फिर भी इस टिप्पणी ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या भारतीय कानून में विवाहेतर सहजीवन के सामाजिक परिणामों को लेकर महिलाओं के हितों की पर्याप्त सुरक्षा मौजूद है।
यह फैसला एक बार फिर उस पुराने सवाल को सामने लाता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अदालत ने जहां दो बालिगों की सहमति को प्राथमिकता दी है, वहीं सामाजिक यथार्थ यह है कि ऐसे फैसलों का भावनात्मक और व्यावहारिक बोझ अक्सर विवाहित महिलाओं को ही उठाना पड़ता है। यही वजह है कि यह टिप्पणी केवल एक कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि परिवार और महिलाओं के अधिकारों पर दूरगामी असर डालने वाली बहस बन गई है।


