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सियासत

अखबारों और न्यूजसाइटों के पत्रकारों को किसी भी घटनास्थल का निर्बाध एक्सेस मिलना चाहिए!

रंगनाथ सिंह-

मीडिया एक्सेस रोकने से घटनाओं का सच नहीं दबाया जा सकता। किसी भी घटना स्थल पर टीवी और यूट्यूबर को रोकने का मैं समर्थक हूँ क्योंकि सेंसेशनल विजुअल के लिए ये जमात किसी भी सीमा तक जा सकती है। मगर अखबारों और न्यूजसाइटों के पत्रकारों को किसी भी घटनास्थल का निर्बाध एक्सेस मिलना चाहिए। प्रिंट और डिजिटल पत्रकारों को भी विचलित कर देने वाली तस्वीरों के इस्तेमाल से परहेज की पुरानी परिपाटी निभानी चाहिए। अखबारों में भी केवल उनको एक्सेस नहीं मिलना चाहिए जो प्रो-बीजेपी माने जाते हैं, जो एंटी-बीजेपी अखबार माने जाते हैं उन्हें भी एक्सेस मिलना चाहिए।

घटनास्थल तक मीडिया को एक्सेस देकर कोई सरकार मीडिया पर कोई अहसान नहीं करती है। जनता तक सटीक सूचना पहुँचने से झूठ और अफवाह को जगह नहीं मिलती। जैसे कुम्भ में हुई भगदड़ में ही शोक-संतप्त पीड़ितों के अतिभावुक टिप्पणियों के सहारे ज्यादातर गैर-जिम्मेदार पत्रकारों और कुछ आईटी सेल के पत्रकारों ने पहले सैकड़ों लिखा, फिर वही लोग हजारों लिखने लगे! क्योंकि उनसे बबलू ने ऐसा बताया और पप्पू भी कह रहे थे! मीडिया को एक्सेस न देने से ऐसे लोग सनसनीखेज दावों की खेती करने लगते हैं।

मीडिया के अनुसार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पीआरओ ने पहले भगदड़ में हुई मौतों को नकारने का प्रयास किया। यदि यह सच है तो ऐसे पीआरओ को तत्काल विदा करना चाहिए था मगर ऐसा होता नहीं दिख रहा है।

कुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई के मामले में भी सरकार पिटे हुए डिफेंस “जाँच की जाएगी” से काम चला रही है। कुर्सी पर बैठे नेता अपने फेवरेट अफसरों के रक्षक के रूप में नजर आने लगते हैं। जनता के आक्रोश के शमन के लिए सरकार को कुछ प्रतीकात्मक कदम भी उठाने होते हैं मगर सत्ता के अहंकार में कई बार सरकार जनता को हल्के में लेने लगती है।

भारतीय समाज के बड़े हिस्से को लोकतंत्र की लत लग चुकी है तो वह सरकार की ऐसी हरकतों को एक सीमा से आगे बर्दाश्त नहीं करती है। मीडिया एक्सेस रोकने जैसी हरकतों से सरकार सीधे-सीधे संदिग्ध नजर आने लगती है।

मीडिया एक्सेस पर कोई तार्किक सीमा लगायी जाए तो समझ में आता है जैसे मैंने टीवी वालों और यूट्यूबरों के लिए लिखा है मगर अखबारों के पत्रकार का एक्सेस रोकने के प्रयास से यही सन्देश जाएगा है कि सरकार सनसनी या गैर-जिम्मेदारा कवरेज रोकने के लिए नहीं बल्कि घटना से जुड़े सच को दबाने के लिए ऐसा कर रही है।

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