पुष्य मित्र-
इस किताब का पहला अध्याय पढ़ते-पढ़ते यह ख्याल आया कि आज की दुनिया सचमुच PR यानी जनसंपर्क की दुनिया है। हो सकता है आप लोगों को पता होगा मगर मैं इसे पढ़ने से पहले बिल्कुल नहीं जानता था कि मुंबई की campa कोला सोसाइटी ने अपनी अवैध बिल्डिंग को बचाने और मीडिया के जरिए पूरे देश में इस बिल्डिंग के रहवासियों के प्रति सहानुभूति पैदा करने के लिए एक PR एजेंसी को हायर किया था।
सोशल मीडिया की बहसों में ऐसी कई घटनाएं सामने से गुजरी, बहसें तेज भी हुईं, मगर उनके पीछे किसी PR एजेंसी या IT सेल, फेक न्यूज के कारोबारी या ऐसी ही किसी ताकत का हाथ रहा होगा यह समझ नहीं पाया। हालांकि जैसा इस किताब को पढ़कर समझ आया कि उस दौर में भी अंग्रेजी के कई मीडिया संस्थानों ने उन मसलों पर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट किए थे, जो हमलोगों तक नहीं पहुंच पाए।
खैर, यह किताब मूलतः उन विषयों को उठाती है, जिनकी वजह से पिछले एक डेढ़ दशक में मीडिया और सोशल मीडिया की दुनिया बदली है। सूचना, शिक्षण और मनोरंजन के सहज कार्यों को संपादित करने के लिए जो मीडिया अस्तित्व में आया और जिस सोशल मीडिया के जरिए मीडिया की जड़ होती कमजोरियों के विकल्प तलाशे गए उसका इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां और कारोबारी किस तरह मुस्तैदी से अपने हित और बड़े फायदे के लिए करने लगे और मीडिया, सोशल मीडिया के पत्रकार और इन्फ्लूएंसर कैसे इनके उपकरण भर बनकर रह गए, यह किताब उसी की परतें खोलती हैं।
विनीत ने इस किताब के चार अध्यायों में क्रमशः PR एजेंसी, टीवी मीडिया, फेक न्यूज के कारोबारी और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर बारीकी से लिखा है। उन्होंने कुछ केस स्टडी के बहाने इन्हें उजागर किया है।
इस किताब में हाल के दिनों में मीडिया और सोशल मीडिया के बर्ताव पर लिखे गए कई किताबों के रेफरेंस हैं, जाहिर है इनमें से ज्यादातर किताबें अंग्रेजी में लिखी गई हैं।
इस किताब को पढ़ते हुए बार बार यह महसूस हुआ कि कभी सत्ता मीडिया को चाटुकारिता के लिए प्रेरित और मजबूर किया करती थी, अब नया ट्रेंड विपक्ष को हर चीज के लिए जिम्मेदार ठहरा देने और उसे दुत्कारते रहने की कुटिलता का है। दिलचस्प है कि इसमें प्रसार भर्ती जैसी संस्थाएं भी शामिल हो गई हैं।
मीडिया, सोशल मीडिया के हाल के व्यवहार को समझने के लिए यह जरूरी किताब है। हिंदी के पाठकों के लिए यह विशेष उपहार है। विनीत जी का शुक्रिया।
और हां, एक चीज बार बार खटकती है। इस किताब का गेट अप क्यों किसी टेक्स्ट बुक जैसा रखा गया। क्यों इसकी खूबियों का ठीक से प्रचार नहीं किया गया। जबकि यह आज के वक्त को समझने के लिए एक जरूरी किताब है।
फिर याद आता है कि यह सचमुच PR का जमाना है। PR exercise के बिना ऐसी जरूरी किताब भी लोगों का ध्यान खींच नहीं पाती। हालांकि ऐसा होना नहीं चाहिए था।
खैर, यह अलग विषय है। फिलहाल तो इस किताब को खूब पढ़े जाने और प्रोमोट किए जाने की जरूरत है।



