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मीडिया बनाम पत्रकारिता : दो शब्द, दो अर्थ, दो रास्ते!

न्यूज़ रूम में सत्य की जगह स्पॉन्सर्ड नैरेटिव हावी है। समय आ गया है कि हम मीडिया और पत्रकारिता के मूल अंतर को स्पष्ट समझें, क्योंकि मीडिया एक व्यवसाय हो सकता है, पर पत्रकारिता एक मूल्य है; मीडिया बदल सकता है, लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं। लोकतंत्र की सांसें इसी पर निर्भर हैं कि इस भीड़ में पत्रकारिता को उसकी पहचान और गरिमा वापस मिले। मतलब साफ है “मीडिया और पत्रकारिता एक नहीं हैं। मीडिया केवल मंच है, व्यवसाय है, लेकिन पत्रकारिता समाज की आवाज़ है, लोकतंत्र की चौथी शक्ति है। अगर इसे हम भूल जाएँ, तो लोकतंत्र ही कमजोर पड़ जाएगा”

सुरेश गांधी

भारत में “मीडिया” शब्द आज एक ऐसी भीड़ भरी बॉम्बे लोकल ट्रेन जैसा प्रतीत होने लगा है, जिसमें जो भी आता है, बिना टिकट-बिना मंज़िल चढ़ जाता है। किसी के पास कैमरा हो या बस एक माइक्रोफ़ोन-बोर्ड, वह खुद को पत्रकार मान बैठता है। सोशल मीडिया की क्रांति ने इसे और आसान कर दिया है, हर हाथ में मोबाइल और हर चैनल पर चीखते एंकर। ऐसे में मूल प्रश्न उभरता है, क्या मीडिया और पत्रकारिता एक ही चीज़ हैं? निश्चित रूप से नहीं। बल्कि सच्चाई यह है कि मीडिया और पत्रकारिता में उतना ही अंतर है जितना शोर और संवाद में, जितना प्रचार और सूचना में, और जितना पक्षधरता और निष्पक्षता में। मीडिया बनाम पत्रकारिता, दो शब्द, दो अर्थ, दो रास्ते. मीडिया एक “माध्यम” है, तकनीक, मंच, संचार का साधन। लेकिन पत्रकारिता एक “धर्म” है, नैतिकता, सत्य-खोज और समाज के प्रति उत्तरदायित्व। बीते वर्षों में यह दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है कि मीडिया का व्यवसाय पत्रकारिता की मूल आत्मा को पचा गया, और बाजारवाद, टीआरपी, राजनीतिक ध्रुवीकरण तथा विचारधारा-चालित निवेशकों के हित मीडिया पर हावी हो गए।

आज न्यूज चैनल खोलना आसान है, पैसा हो, टीम बना लें, किसी विचारधारा का झंडा पकड़ लें, और ‘सत्य’ को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ने की कला आ जाए, तो मीडिया का नया साम्राज्य खड़ा हो जाता है। पर क्या यह पत्रकारिता है? क्या यह वही पेशा है, जो कभी गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक, या रघुवीर सहाय की कलम की गरिमा से पहचाना जाता था? उत्तर स्पष्ट है, नहीं। पत्रकारिता वह है जो सत्ता से सवाल पूछे, न कि सत्ता की ढाल बने. लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका हमेशा से “चौथी सत्ता” की रही है, एक प्रहरी, जो समाज की आवाज़ को सत्ता तक पहुंचाता है, और सत्ता के निर्णयों की समीक्षा जनता तक। लेकिन जब पत्रकारिता की जगह “मीडिया” ले लेता है, और मीडिया किसी राजनीतिक दल, कॉर्पोरेट घराने, विदेशी फंडिंग या विचारधारा का मुखपत्र बन जाता है, तब सवाल उठते ही नहीं, बल्कि सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। टीआरपी आधारित बहसों ने पत्रकारिता का चरित्र बदल दिया। अब मुद्दों की जगह मसाला बिकता है। तथ्यों की जगह धारणा। और संवाद की जगह शोर-शराबा। चैनलों के स्टूडियो युद्धभूमि बने नजर आते हैं, जहां एंकर ‘न्यायाधीश’ के रूप में बैठे ह

जब हर व्यक्ति पत्रकार बन जाए तो पेशा नहीं, पेशे की गरिमा खतरे में पड़ती है. आज ऐसी स्थिति है कि कोई यूट्यूबर पत्रकार बन बैठा है, कोई ब्लॉग चलाने वाला खुद को संपादक, और कोई भी माइक्रोफोन पकड़ कर सड़क पर खड़ा हो जाए तो वह ‘मीडिया वाला’ कहलाने लगता है। मीडिया की यह भीड़ पत्रकारिता की गरिमा को खा रही है। समस्या यह नहीं कि नए प्लेटफ़ॉर्म आए हैं, यह स्वागत योग्य है, समस्या यह है कि पत्रकारिता की मूल ट्रेनिंग, नैतिक जिम्मेदारी और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता खत्म होती जा रही है। जो काम वर्षों की मेहनत, अध्ययन, अनुभव और नैतिक अनुशासन से बनता है, वह अब बिना किसी समझ के, बिना किसी जिम्मेदारी के किया जा रहा है। इसीलिए समाज में भ्रम बढ़ रहा है, कौन पत्रकार है और कौन सिर्फ मीडिया का व्यापारी? आज अनेक चैनल खुलेतौर पर एक विचारधारा का प्रचार करते दिखाई देते हैं। कुछ चैनल किसी एक पार्टी की तारीफ़ में समर्पित हैं, तो कुछ दूसरी पक्ष की आलोचना को अपना मिशन मानते हैं। ‘खबर’ की जगह ‘नैरेटिव’ बिकता है। ‘रिपोर्टिंग’ की जगह ‘राय’ परोसी जाती है। और जनता सोचती रह जाती है कि सच्चाई किसको माने? पत्रकारिता विचारधारा नहीं, विवेक की मांग करती है। लेकिन मीडिया में विचारधाराओं की दुकान इतनी बड़ी हो चुकी है कि पत्रकारिता एक कोने में सिमटती जा रही है। इसे रोकना होगा।

पत्रकार का काम सिर्फ खबर देना नहीं, समाज के विवेक को दिशा देना भी है. पत्रकार सिर्फ सूचनाएं देने वाला नहीं होता, वह समाज का दर्पण होता है। उसकी कलम लोकतंत्र के स्वास्थ्य का पैमाना होती है। लेकिन जब वह दर्पण धुंधला हो जाए, जब उस पर विचारधारा की धूल जम जाए, जब उस पर बाजारवाद का तेल लग जाए, तब समाज का चेहरा भी विकृत दिखने लगता है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है, तथ्य की खोज, सत्ता की समीक्षा, समाज का मार्गदर्शन, पीड़ितों की आवाज बनना और सत्य के प्रति निष्ठा. मीडिया का उद्देश्य है, प्रसारण, प्रस्तुति, वितरण, दृश्यता, और व्यापारिक विस्तार, ये दोनों अलग हैं, और अलग ही रहने चाहिए। मीडिया पत्रकारिता का साधन है, उसका पर्याय नहीं। जब पत्रकारिता निष्पक्ष होती है, तो समाज संतुलित होता है, आज समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा है। लोग सोशल मीडिया पोस्ट, टीवी डिबेट, कटे-सटे वीडियो से अपनी राय बना लेते हैं। फेक न्यूज का साम्राज्य अलग से फूला-फला है। इस माहौल में पत्रकारिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ गई है। लेकिन विडंबना यह है कि जब समाज को निष्पक्ष पत्रकारिता सबसे ज्यादा चाहिए, तभी पत्रकारिता सबसे कमजोर स्थिति में है। इसके पीछे कई कारण हैं…

  • कॉर्पोरेट नियंत्रण: कई बड़े मीडिया हाउस भारी पूंजी निवेश पर चलते हैं। पूंजीदाता अक्सर अपने हितों को प्राथमिकता देते हैं।
  • राजनीतिक दबाव: विचारधारा आधारित चैनल या तो सत्ता के करीबी हैं या सत्ता के विरोधी। बीच का संतुलित मंच गायब।
  • टीआरपी की होड़: शोर बिकता है, शोध नहीं। बहस बिकती है, रिपोर्टिंग नहीं। सोशल मीडिया की गति: स्पीड बढ़ी, सटीकता घट गई। हर ब्रकिंग न्यूज “रबर की ब्रेकिंग न्यूज” बन गई है।

भारतीय लोकतंत्र हमेशा पत्रकारिता के दम पर मजबूत हुआ है। चाहे स्वतंत्रता संग्राम का दौर हो, चाहे आपातकाल, चाहे सामाजिक संघर्ष। पत्रकारों ने हमेशा जोखिम उठाकर सच्चाई को सामने रखा। लेकिन आज उस परंपरा को बाजारवाद और विचारधारा आधारित मीडिया ने धकेल दिया है। इसलिए हमें यह स्पष्ट करना होगा, पत्रकारिता प्रचार का मंच नहीं। पत्रकारिता किसी दल की बैसाखी नहीं। पत्रकारिता किसी विचारधारा की दासी नहीं। पत्रकारिता सिर्फ सत्य की आवाज़ है, और रहेगी। यदि पत्रकारिता को बचाना है, तो कुछ कदम समाज और संस्थानों को मिलकर उठाने होंगे, पत्रकारिता की स्वतंत्र संस्थाओं को मजबूती, संपादकीय स्वतंत्रता केवल शब्द न रहे, बल्कि व्यवहार में लागू हो। न्यूज़ रूम में नैतिक प्रशिक्षण, नए पत्रकारों को बताया जाए कि न्यूज और व्यूज में क्या अंतर है। फील्ड रिपोर्टिंग को प्रोत्साहन: स्टूडियो आधारित बहसें कम हों, जमीनी सच्चाई अधिक दिखाई जाए। फेक न्यूज के खिलाफ कठोर नीति: गलत सूचना फैलाने वालों को कानूनी और पेशेवर कार्रवाई का सामना करना पड़े। मीडिया साक्षरता का विस्तार: जनता को भी यह सिखाया जाए कि मीडिया और पत्रकारिता में अंतर है।

पत्रकारिता का आधार जनता का विश्वास है। यदि वही ढह जाए, तो किसी भी लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाती है। आज आवश्यकता है कि पत्रकार अपनी भूमिका को समझे, वह केवल खबरों का व्यापारी नहीं, बल्कि लोकशक्ति और लोकमत का वाहक है। सत्य, साहस और समर्पण यही पत्रकारिता के तीन स्तंभ हैं। इनकी रक्षा करना केवल पत्रकार की नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है। मीडिया बढ़ेगा, तकनीक के साथ और भी तेज। लेकिन पत्रकारिता तभी बचेगी जब हम दोनों के बीच सच का सामंजस्य बिठाएंगे।

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