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आज के अखबार : मेहुल चोकसी की गिरफ्तारी को सरकारी प्रचार तो बनाया पर मोदी के स्तर तक नहीं गिरे

संजय कुमार सिंह

संशोधित वक्फ कानून के खिलाफ आंदोलन की खबर को कम महत्व देकर आज अखबारों ने बेल्जियम में मेहुल चोकसी की गिरफ्तारी और प्रत्यर्पण की उम्मीद जताकर सरकार का प्रचार किया है लेकिन वोट बटोरने के लिए प्रधानमंत्री ने जिस स्तर और किस्म के बयान दिये हैं उन्हें ज्यादातर अंग्रेजी अखबारों ने पहले पन्ने पर नहीं रखा है। कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री की राजनीति का स्तर जिस तेजी से गिर रहा है उसमें उसे संभालने का काम अखबारों के लिए भी मुश्किल होता लग रहा है। कल आपने पढ़ा कि बिहार दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पसमादा मुसलमानों को इसके फायदे बतायेंगे। आमतौर पर इसे मुसलमानों को बांटने की प्रधानमंत्री की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है और पहले महिलाओं को खुश करने के बाद अब यह मुसलमानों के एक वर्ग को खुश करने की कोशिश लगती है। फिर भी आज के (अंग्रेजी) अखबारों में यह सब पहले पन्ने पर नहीं है। संभव है, अखबार प्रधानमंत्री की ऐसी बातें पहले पन्ने पर रिपोर्ट करके अपना स्तर खराब नहीं करना चाहते हों। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों की बात अलग है। नवोदय टाइम्स की सेकेंड लीड का शीर्षक है, “वक्फ का सही इस्तेमाल होता तो पंक्चर न बना रहे होते मुस्लिम युवा”।

कहने की जरूरत नहीं है कि खुलेआम हिन्दू-मुसलमान करके सत्ता में आये नरेन्द्र मोदी के समर्थक सरकार को हिन्दुओं का भला करने वाला बताते रहे हैं। स्वयं मोदी जी भी पहले की कांग्रेस सरकारों द्वारा मुसलमानों के हित में किये गये काम को तुष्टिकरण कहते रहे हैं और खुद संतुष्टिकरण करते रहे हैं। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में सीटें कम हुईं तो विधानसभा चुनाव के लिए अलग उपाय किये गये और उसी को आगे बढ़ाते हुए अब यह दावा किया गया लगता है। लेकिन सच्चाई है कि मुस्लिम युवा अगर पहले से पंक्चर लगा रहे थे तो नरेन्द्र मोदी ने 10 साल में उनके लिये क्या किया जबकि आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानने का दावा कर चुके हैं। यही नहीं, मुसलमानों के भले के लिए लाये गये तीन तलाक और दूसरे कानूनों से उन्हें क्या लाभ हुआ और वक्फ कानून (संशोधन) अब क्यों आया। फिर भी प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है और नवोदय टाइम्स को ठीक लगा तो सेकेंड लीड है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। मैं यह रेखांकित करना चाहता हूं कि इसे अंग्रेजी के मेरे किसी भी अखबार ने पहले पन्ने पर नहीं रखा है।  

इसी तरह की दूसरी घटिया खबर अमर उजाला में टॉप पर आठ कॉलम में छपी है। शीर्षक है, कांग्रेस ने वक्फ को संविधान से ऊपर कर फैलाया वोट का वायरस : मोदी। यहां भी सवाल वही है, 10 साल से आप क्या कर रहे थे? आपकी नीन्द अब क्यों खुली? हालांकि, एक देश एक कानून और संविधान में सबको बराबर मानने के नियम के साथ संविधान सबको अपने धर्म का पालन करने की छूट भी देता है। इसीलिये भिन्न धर्मों की शादियां अलग तरीके से होती हैं और मुसलमानों में तलाक का नियम था तो मुसलिम रीति से हुई शादी में तलाक मुस्लिम नियमों के अनुसार होने चाहिये। उसे बदलकर या तीन तलाक खत्म करके पहले मुस्लिम महिलाओं का  तुष्टिकरण किया गया और संतुष्टिकरण करने का दावा खुद करते रहे हैं। नरेन्द्र मोदी कांग्रेस पर हिन्दुओं का ख्याल नहीं करने का आरोप लगाकर खुद संतुष्टिकरण का दावा करते रहे हैं अब वक्फ बोर्ड के मामले में दखल किया है तो उसका विरोध हो रहा है और उससे राजनीतिक तौर पर निपटने की बजाय कांग्रेस पर यह आरोप लगाया गया है कि कांग्रेस ने वक्फ को संविधान से ऊपर कर दिया।

जाहिर है, यह मामला इतना सीधा नहीं है और इसका मकसद कांग्रेस को बदनाम करने के साथ-साथ येन-केन प्रकारण वोट पाना और चुनाव जीतते जाना है। इस तरह के चुनाव प्रचार या चुनावी रणनीति पर नियंत्रण लगाना चुनाव आयोग का काम है लेकिन वह पहले से सरकार के नियंत्रण में है। इसलिए यह समझना मुश्किल है कि चुनाव आयोग मजबूरी में चुप है या इसपर कुछ बोलने-करने की जरूरत नहीं है। मीडिया का काम है कि संतुष्ट हुए और सुनिश्चित किये बगैर इस तरह के आरोपों का प्रचार नहीं करे तो उसने इस पर ध्यान नहीं दिया है। इसे आठ कलम में छापना खबर देना नहीं, भाजपा या नरेन्द्र मोदी का प्रचार है। इसके बावजूद नैतिकता का तकजा था कि इसके साथ कांग्रेस का पक्ष भी छापा जाता। जो भी हो, अमर उजाला की आठ कॉलम की यह खबर न सिर्फ भाजपा का प्रचार और कांग्रेस का विरोध है बल्कि निष्पक्ष पत्रकारिता भी नहीं है। हालांकि, आज का इसका बॉटम, एनसीईआरटी ने अंग्रेजी माध्यम की पुस्तकों को दिये हिन्दी नाम, द टेलीग्राफ की कुछ दिन पहले छपी खबर का फॉलो अप है। इससे आप समझ सकते हैं कि नरेन्द्र मोदी की सरकार का काम काज कितना ढीला या हिन्दी को थोपने वाला है।

आज की तीसरी चुनावी और घटिया खबर, दि एशियन एज में है। यहां तीन कॉलम की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा, कांग्रेस ने  एससी, एसटी, ओबीसी को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, “वक्फ कानून का विरोध करने के लिए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर निशाना साधा : वे वोट बैंक का वायरस फैलाते हैं”। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री का यह बयान भी चुनावी है और कांग्रेस पर आरोप है जबकि उन्हें अपनी बात कहनी चाहिये और अखबारों को उसी को महत्व देना चाहिये। कांग्रेस तो 10 साल से सत्ता में नहीं है। फिर उसने यह सब कैसे किया और पहले किया था तो आपने अब तक ठीक क्यों नहीं किया। आपके प्रधानमंत्री रहते किया तो आप रोक क्यों नहीं पाये या रोका क्यों नहीं? जो भी हो, अखबार ने बताया है कि केरल को नजर में रखते हुए उन्होंने जालियांवाला बाग में भूमिका के लिए शंकर नायर को याद किया और उन्हें सम्मान दिया। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने कल बीआर अंबेडकर को उनके जन्म दिन पर श्रद्धांजलि भी दी और कल अखबारों में इस आशय का विज्ञापन भी छपा था। सबको पता है कि नरेन्द्र मोदी और भाजपा की राजनीति हिन्दुत्व वाली है और योगी आदित्य नाथ इसे अस्सी बीस भी कहते हैं। ऐसे में कांग्रेस ने राजनीतिक मुकाबले के लिए जाति की बात छेड़ी और भाजपा पर यह आरोप लगाया कि वह हिन्दुओं की पार्टी होने का दावा तो करती है लेकिन भिन्न जातियों-वर्गों का ख्याल नहीं रखती है और इसका पता आरक्षण के उसके विरोध (या इसके प्रति रुख) तथा दूसरे कामों से चलता है।

कहने की जरूरत नहीं है कि अस्सी बीस की राजनीति में दूसरे दलों की कोई भूमिका ही नहीं है और नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात की ही थी। लेकिन राहुल गांधी ने भाजपा मुक्त भारत की बात नहीं की और खुलकर कहा कि वे भाजपा को हरायेंगे। उसके लिए अपने हिसाब से काम भी कर रहे हैं जो आपको गलत भी लग सकता है। भाजपा, संघ परिवार और नरेन्द्र मोदी अपने ढंग से निपट रहे हैं लेकिन कांग्रेस जो भी मुद्दा उठाती है संविधान के दायरे में रहकर लेकिन भाजपा तो पहले से जाति धर्म और दंगे आदि की बातें खुलकर करती रही है। ऐसे में राहुल गांधी ने जाति की बात आरक्षण और जातिवार जनगणना जैसे विषयों से की। इससे भाजपा का परेशान होना स्वाभाविक था और नरेन्द्र मोदी के न सिर्फ तेवर बल्कि उनकी राजनीति भी बदल गई। कांग्रेस ने भाजपा पर संविधान विरोधी होने का घोषित और सर्वविदित आरोप लगाया तो भाजपा वैसे परेशान नहीं हुई जैसे दलितों की बात करने से हुई। यह आरोप उसी का नतीजा है और आप देख रहे हैं कि पहले देश को धर्म के नाम पर (खुलकर) बांटने वाली पार्टी अब मुसलमानों की न सिर्फ भलाई कर रही है बल्कि कांग्रेस पर आरोप भी लगा रही है। ऐसा नहीं है कि भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगा रही है यह कोई नई बात है। नई बात उसके नये आरोप हैं। मीडिया उनकी बातों को जस का तस रखकर उनका प्रचार कर रहा है और उनकी सहायता कर रहा है जो साफ दिख भी रहा है। इसमें अमित शाह का वह बयान शामिल है जिसमें उन्होंने कहा था कि जितना नाम अंबेडकर का लेते हैं उतना भगवान का लेते तो ….। सबको पता है कि जो अंबेडकर को मानते हैं उनके लिए वे भगवान से कम नहीं हैं। इसके लिए अमित शाह का विरोध भी हुआ पर अब मोदी कांग्रेस पर ही आरोप लगा रहे हैं और वह मेरे छह में से सिर्फ एक अखबार में लीड है।  

द टेलीग्राफ ने आज बताया है कि कल जो लोग पलायन कर गये थे उनमें से 19 वापस आ गये हैं और ऐसा पुलिस के आश्वासन से हुआ है। दूसरी ओर, शहर की सीमा पर पुलिस को भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया के शीर्षक के अनुसार 16 पुलिस वाले जख्मी हुए हैं। वक्फ कानून के विरोध में अगर बंगाल में हिंसा हो रही है तो यह भाजपा की राजनीति के कारण है और संभव है डबल इंजन वाले राज्यों में नहीं होने का कारण भी यही हो। हालांकि, कल असम में अशांति की खबर थी लेकिन आज नहीं दिख रही है। आज नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर खबर है, वक्फ को लेकर अब सुलगा बंगाल का 24 परगना। अमर उजाला में यह खबर दो कॉलम में है। अब दक्षिण 24 परगना में हिंसा, पथराव व आगजनी। आप जानते हैं कि बंगाल में हिंसा और उसे नियंत्रित नहीं किया जाना तृणमूल सरकार की कमजोरी के रूप में देखा जायेगा। इसलिए हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में यह खबर पहले पन्ने पर है लेकिन मणिपुर की खबर पहले पन्ने पर न पहले होती थी न अब है। आज दि एशियन एज में पांच कॉलम की खबर है जो बताती है कि कुकी-जो महिलाओं ने मेइतियों के तीर्थ मार्ग बाधित किये। खबर के अनुसार, मणिपुर के चुराचांदपुर इलाके में धरना दिये जाने से तनाव बढ़ गया था। टेलीग्राफ की खबर से नहीं लगता है कि बंगाल में कानून-व्यवस्था अनियंत्रित है। दूसरे अखबारों में भी हिंसा की खबर ज्यादा नहीं है लेकिन उसे प्रमुखता मिली है और पहले पन्ने पर है। इंडियन एक्सप्रेस में आज भी बंगाल की खबर ग्राउंड जीरो से है। इसका शीर्षक है, “हम अपने ही राज्य में शरणार्थी बन गये हैं…. हम शायद कभी न लौट पायें”। इस शीर्षक में दूसरे शीर्षक से अलग, आक्रामकता की बजाय पीड़ा है। इसके साथ एक शिविर में खाना खाते लोगों की तस्वीर है। इसमें बच्चे औऱ महिलायें भी हैं। कैप्शन में बताया गया है कि करीब 400 लोगों ने मालदा जिले के एक स्कूल में शरण ली है। द हिन्दू की लीड पश्चिम बंगाल में वक्फ कानून पर हिंसा की खबर है। शीर्षक है, बंगाल के भांगर में वक्फ कानून पर हिंसा।     

दूसरी ओर, मेहुल चोकसी को भारत लाये जाने की संभावना को मजबूत दिखाने के लिए आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, बेल्जियम ने मेहुल चोकसी की गिरफ्तारी की पुष्टि की, भारत ने प्रत्यर्पण आग्रह किया। फ्लैग शीर्षक है, 13,000 करोड़ के पंजाब नेशनल बैंक के लोन फ्रॉड के मामले में वांछित। उपशीर्षक है, वरिष्ठ अधिकारियों का बेल्जियम जाना तय; वकीलों ने कहा अपील दाखिल करेंगे। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में चोकसी की गिरफ्तारी लीड है। नवोदय टाइम्स में यह तीन कॉलम में है। अमर उजाला में यह खबर चार से ज्यादा पांच से कम कॉलम में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, चोकसी बेल्जियम में गिरफ्तार, भारत प्रत्यर्पण की मांग करेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी चोकसी की खबर है। शीर्षक है, चोकसी बेल्जियम में गिरफ्तार पर वापसी एक चुनौती। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, प्रत्यर्पण के लिए भारत के दबाव के बीच चोकसी बेल्जियम में गिरफ्तार। द टेलीग्राफ में भी यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, भगोड़ा चोकसी बेल्जियम में गिरफ्तार। उपशीर्षक है, हमारे मेहुल भाई : आखिर पकड़े गये? दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, चोकसी बेल्जियम में गिरफ्तार, भारत प्रत्यपर्ण चाहता है। स्पष्ट है कि सभी अखबारों ने प्रत्यर्पण को लेकर अलग स्थिति बताई है। इसका कारण एक ही है, सरकार ने अधिकृत तौर पर कुछ नहीं बताया है।

अखबारों ने किसी तरह पूछकर, सूत्रों की जानकारी के आधार पर खबर दी है। इसके साथ ही, आप जानते हैं कि नोटबंदी के बाद देश में अचानक उद्योग, व्यापार, कारोबार, व्यवसाय सब मंदा पड़ गया था और ईएमआई देना किसी के लिए भी मुश्किल था। उसमें कुछ व्यवसायी (जो सरकार के करीबी थे) भारत छोड़कर भागने में कामयाब रहे। उनमें से किसी को वापस नहीं लाया जा सका है। मेहुल भाई के साथ खासियत यह है कि उन्हें विदेशी नागरिकता भी मिल गई है। उन्हें यह नागरिकता भारत की आपत्ति के बावजूद मिली है या अनापत्ति पत्र के बिना मिल गई है अथवा अनापत्ति पत्र के बाद मिली है, पता नहीं है। जो भी है, उन्हें गिरफ्तार कर लाने की स्थिति एक बार और बनी थी। तब भारत से उन्हें लाने के लिए एक जेट भी भेजा गया था। हालांकि यह जेट वापस आ गया था। ऐसे में बेल्जिम में गिरफ्तारी भले बड़ी खबर हो, सरकार ने इस बारे में कुछ अधिकृत तौर पर नहीं बताया है और बताया है तो सबमें अलग खबर क्यों है – कौन बतायेगा? तब तक इस खबर से बहुत उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। पर खबर तो है ही। यह अलग बात है कि सारी खबरें अलग हैं। दि एशियन एज की मानें तो मेहुल को लाने के लिये टीम ब्रसेल्स जा चुकी है। 

आज एक खबर यह भी है (हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड) कि कर्नाटक में जातिवार गणना के आधार पर नतीजे आ गये हैं। भाजपा इसे वैज्ञानिक सर्वेक्षण नहीं मानती है और कर्नाटक भाजपा के पूर्व प्रमुख ने कहा है कि फिर से वैज्ञानिक तौर पर सर्वेक्षण होना चाहिये। उधर, सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल है जिसके अनुसार दिल्ली के एक कॉलेज की प्रिंसिपल कक्षा को गोबर से लीप रही हैं क्योंकि गोबर से लीपे हुए क्लासरूम ठंडे रहेंगे। इस खबर के साथ छपी खबर के अनुसार, तेलंगाना ने कोटा में उपवर्गीकरण के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू कर दिया है। आप जानते हैं कि तेलंगाना में कांग्रेस की सरकार है और रेवंत रेड्डी मुख्यमंत्री हैं। जाहिर है, जो खबर है, सरकार छपवाना चाहती है, विवरण दे रही है उसे प्राथमिकता नही मिल रही है और जिसे मिल रही है वह प्रचार है और उसमें भी अधिकृत तौर पर अधिकृत शैली में दिये बगैर।

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