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माइक बंद करने और नहीं करने की ‘आतिशबाजी’ यानी हेडलाइन मैनेजमेंट

संजय कुमार सिंह

नीति आयोग असल में राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था है, आज की खबर ‘बदले हुए भारत’ की राजनीति है। ममता बनर्जी की राजनीति का जवाब देने के लिए सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग खबर नहीं है। इसमें पीआईबी की फैक्ट चेक यूनिट भी है जो ट्वीटर माफ कीजियेगा, एक्स का भी उपयोग करती है। द हिन्दू की खबर के अनुसार, सरकार ने तुरंत पलटवार किया। आधिकारिक पीआईबी फैक्ट चेक यूनिट ने एक्स पर पोस्ट किया कि दावा भ्रम फैलाने वाला (मिसलीडिंग) था। दिलचस्प यह है कि संपादकीय पूर्वग्रह दिखाने वाली यह खबर इस समय की भारतीय राजनीति की है जो देश सेवा के लिए परमात्मा प्रेषित होने का दावा करने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हो रही है। आप इसे अच्छा मानते रह सकते हैं, मैं सिर्फ तथ्य बता रहा हूं और तथ्य यह है कि आज अकेले हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक संपादकीय पूर्वग्रह से मुक्त है। जहां तक राजनीतिक खबरों की बात है, पंजाब के राज्यपाल का इस्तीफा छह महीने बाद मंजूर हुआ है पर यह शीर्षक भी नहीं है। नये राज्यपालों की नियुक्ति की खबर का पुछल्ला भर है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “विपक्षी नेताओं के बायकाट के बीच प्रधानमंत्री ने नीति (आयोग) की बैठक की अध्यक्षता की”। इंडिया गठबंधन को इंडी अलायंस बोलने और I.N.D.I.A लिखने वाले राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था को आराम से नीति आयोग लिखते, कहते हैं। यह वैसे ही है जैसे पहले के योजना आयोग का कुछ बेहतर, नया या बदला हुआ रूप हो। आप कह सकते हैं कि है ही। लेकिन जो है, वह यह कि कल उसकी नौवीं बैठक की खबर आज अखबारों में लीड है। इसकी खास बात यह है कि विपक्षी राज्यों के 10 मुख्यमंत्री इसमें नहीं आये। ममता बनर्जी ने जरूर हिस्सा लिया पर आरोप लगाया कि वे बोल रही थीं तभी उनका माइक बंद कर दिया गया। आज के अखबारों में खबर छपी है, (1) माइक बंद करने का आरोप गलत उचित समय दिया गया : निर्मला (अमर उजाला) (2) ममता को पूरा समय मिला, माइक बंद करने की बात गलत : सीतारमण (नवोदय टाइम्स)।

दोनों शीर्षक और ममता बनर्जी के आरोप से साफ है कि उन्हें उचित समय दिया गया और समय पूरा होने के बाद उन्हें रोकने के लिए माइक बंद कर दिया गया होगा। इसका पता अमर उजाला की खबर से भी लगता है, … हर सीएम को समय आवंटित था। दुर्भाग्यपूर्ण है उन्होंने माइक बंद करने का आरोप लगाया, जो सच नहीं है। वह अन्य सीएम की तरह समय बढ़ाने का आग्रह कर सकती थीं लेकिन उन्होंने इसे बहाने के रूप में इस्तेमाल किया। इससे स्थिति साफ हो जाती है। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी ने गलत नहीं कहा है और यह उनका अधिकार है। आप चाहें तो कह सकते हैं कि उनकी राजनीति है। उनका विरोध था। वित्त मंत्री को इसमें कूदने की कोई जरूरत नहीं थी और ऐसा करके सत्तारूढ़ दल ने अपना ओछापन दिखाया है। राजनीति में जरूरी नहीं है कि आप हर आरोप का जवाब दें, उसी समय दें। जनता को सब समझ में आता है। सरकार समर्थकों को अपने पाले में रखने के लिए सरकारी संसाधनों और ताकतों का यह प्रदर्शन सत्ता का दुरुपयोग है। मीडिया को इसे समझना चाहिये और खबर ही देनी चाहिये नेताओं की लड़ाई का विवरण खबर नहीं है। अगर आपको लगता है कि खबर है तो उसमें निष्पक्षता जरूरी है।

अमर उजाला की खबर के अनुसार, राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था यानी नीति आयोग के सीईओ वीवीआर सुब्रमण्यम ने कहा, ममता बनर्जी ने दोपहर के भोजन से पहले बोलने का अनुरोध किया था। इसे स्वीकार कर लिया गया (कितना अहसान किया गया) जब उनका समय खत्म हुआ तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने माइक को टैप किया और उन्होंने बोलना बंद कर दिया और बाहर चली गईं। मुझे लगता है कि आधिकारिक बयान से मामला पूरी तरह स्पष्ट है और इससे ज्यादा की जरूरत ही नहीं थी। पर संसाधन उपलब्ध हों तो दुरुपयोग आम बात है और चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड की जरूरत नहीं समझने वाले इस दुरुपयोग को भी नहीं समझ पायेंगे। वरना बैठक की पूरी खबर सरकारी है। उस दिन छपी है जिस दिन जरा सी बारिश होने से राजधानी के एक दफ्तर के बेसमेंट में पानी भर जाने से तीन मौतें हो गई। इसमें बात सिर्फ पानी भरने और मौत की नहीं है, वहां से निकलने के रास्ते की भी है और हर हादसे के बाद ऐसा कोई मामला पता चलता है लेकिन आगे के लिए कुछ किया नहीं जाता है।

इसके बावजूद आज एक शीर्षक है, “विकसित भारत हर भारतीय का लक्ष्य राज्यों की होगी सक्रिय भूमिका : मोदी” (अमर उजाला)। दूसरा नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, विकसित राज्य बनायेंगे विकसित देश। जब राजधानी दिल्ली में मुख्य सड़क के किनारे के बंगले या घर या दफ्तर के बेसमेंट में बारिश का पानी भर जा रहा है तो राज्य कब विकसित होंगे और देश कब विकसित होगा – यह मुद्दा ही नहीं है। प्रचार है और वह यह है कि जो हो रहा है, जो मिला है या उपलब्ध है वही सर्वश्रेष्ठ है। बेशक, यह राजनीति है पर मीडिया के सहयोग से निर्बाध जारी है। इंडियन एक्सप्रेस में भी आज यह खबर लीड है लेकिन शीर्षक है, “नीति (आयोग) की बैठक से ममता निकल गईं, कहा भाषण के बीच में माइक बंद कर दिया गया, वित्त मंत्री ने आरोप को खारिज किया”। अखबार में इस खबर का इंट्रो है, “मैं वहां विपक्ष की अकेली आवाज थी, केंद्र को भेदभाव नहीं करना चाहिये : मुख्यमंत्री”।

गौरतलब है कि विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने बैठक का बायकाट किया था। वे अकेले गई थीं। यह उनकी राजनीति हो सकती है लेकिन इसके लिए उनका अपमान तो नहीं किया जायेगा और ना ही यह उचित है कि जब विपक्ष का कोई था ही नहीं तो उन्हें बोलने देने के लिए समय की कमी होगी और जो हुआ वह होने दिया जाता। यही नहीं जब हो गया तो लीपापोती की सरकारी कोशिश में गैर जरूरी और अगंभीर राजनीति है। उसके खबर के रूप में प्रमुखता देना उसे बढ़ावा देना है और उसमें भी प्रचार वाले शीर्षक। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक के अनुसार, “प्रधानमंत्री ने कहा, विदेशी निवेश के अनुकूल नीतियां बनाने की जरूरत है”। गौरतलब है कि नरेन्द्र मोदी 10 साल प्रधानमंत्री रहने के बाद यह बात, राष्ट्रीय भारत परिवर्तन संस्था की बैठक में कर रहे हैं जहां विपक्ष की इकलौती मुख्यमंत्री कह रही हैं कि उन्हें बोलने नहीं दिया गया। इसलिए खबर क्या है इसे देखना समझना भी जरूरी है। ममता बनर्जी ने क्या बोला और उन्हें क्या बोलना था, जिससे रोक दिया गया यह खबर ही नहीं है।

ममता बनर्जी के आरोप के बाद जो सब हुआ वह निश्चित रूप से हेडलाइन मैनेजमेंट है और आज के अखबारों में उसका असर दिख भी रहा है। द टेलीग्राफ का शीर्षक ऐसा ही है। दो कॉलम की इस लीड का फ्लैग शीर्षक है, केंद्र ने माइक बंद किया के ममता के दावे को खारिज किया। मुख्य शीर्षक है, “दीदी नीति ने आतिशबाजी शुरू की”। द टेलीग्राफ ने एमके स्टालिन के ट्वीट को आज का कोट बनाया है, क्या यही सहकारी संघवाद है? क्या यह एक मुख्यमंत्री के साथ व्यवहार का तरीका है? केंद्र की भाजपा सरकार को समझना चाहिये कि विपक्षी दल हमारे लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं और उनके साथ शांत किये जाने वाले दुश्मन जैसा व्यवहार नहीं किया जाना चाहिये। अमर उजाला में इस ट्वीट की चर्चा तो नहीं दिखी अधीर ने कहा ममता झूठी : पेज 14 जरूरत हाइलाइट किया गया है।

द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, नीति (आयोग) की बैठक में प्रधानमंत्री ने राज्यों के मिले-जुले प्रयासों की अपील की। अकेले टाइम्स ऑफ इंडिया में आज यह खबर लीड नहीं है। अखबार ने कुपवाड़ा में एक सैनिक, राइफलमैन मोहित राठौड़ की मौत को जुलाई में जम्मू व कश्मीर में मारे गये 12वें सैनिक के रूप में खबर दी है और बताया है कि चौकी पर पाकिस्तानी टीम के हमले में तीन सैनिक घायल हो गये और इनमें मेजर भी हैं। द हिन्दू और हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सेकेंड लीड है। और भी अखबारों में पहले पन्ने पर है। इस तरह, आज की लीड यह खबर भी हो सकती थी लेकिन ज्यादातर अखबारों ने राजनीतिक आतिशबाजी को लीड बनाना पसंद किया। ऐसा नहीं है कि राजनीति की सभी खबरों को हमेशा प्राथमिकता और महत्व मिलता ही है। आज सिंगल की कॉलम की एक खबर से पता चला कि राष्ट्रपति ने पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। यह खबर नये बनाये गये राज्यपालों की सूची में आखिरी लाइन है।

राज्यपाल का इस्तीफा मंजूर किये जाने की यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह कई महीने पहले दिया गया था। आजतक डॉट इन की साइट पर यह खबर तीन फरवरी 2024 की है। तब उन्होंने कहा था, “अपने व्यक्तिगत कारणों और कुछ अन्य प्रतिबद्धताओं के कारण, मैं पंजाब के राज्यपाल और केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ के प्रशासक के पद से अपना इस्तीफा दे रहा हूं।” अगस्त 2021 में उन्होंने पंजाब के 36वें राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी। तब पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि शंकर झा ने शपथ दिलाई थी। इसके बाद किरण बेदी को पंजाब का राज्यपाल बनाये जाने की चर्चा थी। एक खबर के अनुसार, पंजाब भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. कमल सोई ने अपने ट्विटर हैंडल पर किरण बेदी को पंजाब का राज्यपाल बनाए जाने की बधाई दी थी पर बाद में इसे हटा दिया।

ना नया राज्यपाल बना और ना पुराने ने इस्तीफा दिया। कई महीने बीत गये ना कोई चर्चा ना खबर। रिपोर्टिंग में राजनीति को महत्व देने वाला मीडिया ऐसी खबरों पर चुप रह जाता है जिसमें भाजपा फंसी हुई या मुश्किल में दिखती है। मीडिया ने लगभग छह महीने इस बात की चर्चा नहीं की कि राज्यपाल को कार्य मुक्त नहीं किया जा रहा है क्योंकि  विकल्प नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की खबर और उसे स्वीकार किये जाने की फुर्ती किसे नहीं याद होगी। पर वह अलग मामला है। जहां तक भाजपा राज्य में राज्यपालों का मामला है, यह एक से बढ़कर एक कहानी है। आज ही खबर है कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली महिला ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से उनकी शिकायत की है। मामला पुराना है और राज्यपाल संवैधानिक पद पर होने के कारण सुरक्षित है। इस संबंध में भी एक मामला अदालत में लंबित है। 

बेमतलब की ‘खबर’ और अहम फैसला

अमर उजाला में आज पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, “अहम फैसला : अब थर्ड पार्टी बीमा के लिए पीयूसी प्रमाणपत्र जरूरी नहीं”। इसका उपशीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2017 के अपने ही आदेश में लगाई शर्त को हटाया”। 2017 में जब यह शर्त लगाई गई थी तब पुराने वाहन को सड़क पर चलाये जाने की अनुमति थी। वैसी हालत में इस आदेश का मतलब था क्योंकि पुरानी गाड़ियों से प्रदूषण होता है और इसलिए उन्हें प्रदूषण नियंत्रित का प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सकता था। लेकिन ऐसी गाड़ियों के सड़क पर चलने पर रोक नहीं थी। गाड़ियां चलती तो दुर्घटना हो सकती थी और इसलिए थर्ड पार्टी बीमा जरूरी था क्योंकि किसी भी गाड़ी को सड़क पर चलाने के लिए उसका थर्ड पार्टी बीमा होना जरूरी है। अगर नहीं हो तो गाड़ी जब्त की जा सकती है। इसका कारण यही था कि दुर्घटना की स्थिति में वाहन मालिक मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार होगा पर उसकी हैसियत नहीं हुआ तो मुआवजे का मामला लटक जायेगा। बीमा आसान विकल्प था सो सरकार ने कानूनन जरूरी कर दिया।

बाद में पुरानी गाड़ियों का प्रदूषण के कारण चलना रोक दिया गया। 1 अप्रैल 2024 से नियम है कि आपकी 15 साल से अधिक गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाएगा। इसके बाद आपकी गाड़ी सड़क पर नजर आई तो जब्त कर ली जाएगी। इसके साथ ही, पुरानी गाड़ी सड़क पर चलाने के एवज में आपको जुर्माने का भुगतान भी करना पड़ सकता है। प्रदूषण प्रमाणपत्र होने के बाद भी गाड़ी जब्त नहीं हो सकती है इसलिए ना प्रदूषण प्रमाणपत्र होगा ना बीमा होगा और यह तकनीकी मामला है। बिना सोचे-समय एक-एक कर जरूरत या सिफारिश के आधार पर नियम बनाने से ऐसी स्थिति आती है। इसे सुधार दिया गया और तकनीकी तौर पर जरूरी रहा होगा पर यह अहम फैसला तो नहीं है। अहम फैसला यह है (था) कि अब पुरानी गाड़ी नहीं चलाई जा सकती है और विन्टेज कारों का शौक मंहगा व मुश्किल हो गया है। खतरनाक पुश्तैनी घर में रहा जा सकता है, गिराने वाले दस्ते पर बल्ले से हमला किया गया तो कार्रवाई का पता नहीं है लेकिन चलती पुरानी गाड़ी को जब्त कर लिया जाये तो आपके पास कोई विकल्प नहीं है। यह दलील काम नहीं आयेगी कि पिताजी की गाड़ी से आप बहुत प्रेम करते हैं और चालू हालत में रखने के लिए चलाते हैं। आप प्रदूषण नहीं फैला सकते हैं भले राजधानी दिल्ली में ही कचरे के बदबूदार पहाड़ का कुछ नहीं किया जा रहा हो, प्रदूषित हवा से निजात नहीं हो और आतिशबाजी चलाने पर प्रतिबंध का कोई असर न हो और इसे तोड़ने वालों में सत्तारूढ़ दल के सांसद भी हों।

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