विजय सिंह ठकुराय-
दिसंबर, 2024 में नौ देशों के प्रख्यात 38 वैज्ञानिकों ने 300 पन्ने का एक संयुक्त पेपर पब्लिश कर के सिंथेटिक बायोलॉजी में चल रहे एक प्रयोग पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने का आव्हान वैश्विक सरकारों से किया था। बकौल वैज्ञानिकों के – यह प्रयोग इतना खतरनाक है कि पृथ्वी पर जीवन के सफाए का कारण बन सकता है। आखिर क्या है यह खतरनाक प्रयोग, जिसके दुष्परिणामों ने वैज्ञानिकों की नींद उड़ाई हुई है?
सबसे पहले आप अपने लेफ्ट और राइट हाथ के पंजे को देखिए। दोनों हाथों की बनावट और शेप एक जैसी होने के बावजूद अगर दोनों को एक-दूसरे के ऊपर रखें तो अंगूठों की दिशा विपरीत होगी। अर्थात – अगर किसी चीज की परछाई (प्रतिलिपि) का ओरिएंटेशन मूल चीज से 180 डिग्री उलट हो तो यह गुण “Handedness” कहलाता है। “लेफ्ट और राइट” हैंडेडनेस की ओरिएंटेशन को बतलाती है।
जीवन मुख्यतः प्रोटीन और शुगर से मिलकर बना होता है। सभी प्रोटीन और शुगर भी “लेफ्ट और राइट” दोनों फ्लेवर में प्रकृति में पाए जाते हैं। लेकिन यह एक रहस्य है कि सभी जीवों का शरीर लेफ्ट हैंडेड प्रोटीन और राइट हैंडेड शुगर से बना होता है। प्रकृति अणुओं के एक विशेष ओरिएंटेशन के प्रति मुग्ध क्यों है, यह एक रहस्य ही है। वैसे अगर प्रकृति ने मौजूदा व्यवस्था के उलट राइट हैंडेड प्रोटीन और लेफ्ट हैंडेड शुगर का इस्तेमाल किया होता तो भी जीवन पर कोई खास असर नहीं पड़ता। ऐसा कोई जीव सामान्य जीवन ही जीता।
अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर… जैसा कि हमनें अभी पढा कि सभी जीवों की कोशिकाएं लेफ्ट हैंडेड प्रोटीन्स से बनी होती हैं। काफी समय से वैज्ञानिक “राइट हैंडेड प्रोटीन” से बनी दवाईयों के ह्यूमन ट्रायल कर रहे हैं। राइट हैंडेड प्रोटीन से बने होने के कारण हमारा पेट न तो ऐसी दवाईयों को गलाता है और हमारा इम्यून सिस्टम भी इन दवाओं पर मेहरबानी दिखाता है। अपने विशेष 3D स्ट्रक्चर के कारण ये दवाएं सिलेक्टेड सेल्युलर रिसेप्टर से बाइंडिंग कर के मनवांछित औषधीय परिणाम देने में भी असरदार रहती हैं।
पर राइट हैंडेड प्रोटीन्स को लैब में बना पाना एक खर्चीला काम है। तो क्यों न एक ऐसा सिंथेटिक बैक्टीरिया ही बना लिया जाए, जो मिरर इमेज आधारित राइट हैंडेड प्रोटीन का निर्माण करने में सक्षम हों? यह कुछ ऐसा ही है कि ऑक्सीजन लैब में बनाने की क्या जरूरत है, जब यह काम पेड़ लगा कर भी किया जा सकता है।
लैब में निर्मित ऐसा बैक्टीरिया स्वयं मिरर इमेज बायोलॉजी से ही निर्मित होगा – अर्थात उसके प्रोटीन राइट हैंडेड होंगे, और डीएनए को बनाने वाली शुगर लेफ्ट हैंडेड होंगी – बोले तो नॉर्मल बायोलॉजी से एकदम उलट। तो क्या ऐसा किया जा सकता है? जी हाँ, तकनीकी की रफ्तार को देखते हुए अगले 20 साल में ऐसा हो पाना संभव होगा।
और यही चीज, यानी – कृत्रिम आर्टिफिशियल कोशिका का निर्माण – ही वह चीज है, जिसके संभावित खतरों के प्रति वैज्ञानिकों ने आगाह किया है।
सोचिए, अगर ऐसा मिरर इमेज बैक्टीरिया किसी तरह लैब से निकल कर बाहरी दुनिया में पहुंच जाए तो इसके कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह बैक्टीरिया फ़ूड चेन की रेस में भागने वाला अपनी तरह का इकलौता खिलाड़ी होगा। इसका न कोई प्रतिद्वंद्वी होगा, न कोई खतरा। न इसे कोई खायेगा और न ही इसकी उपस्थिति को भांप पायेगा। ऐसा बैक्टीरिया सांस अथवा भोजन के जरिये जीवों के शरीर में पहुंच जाने पर इम्यून सिस्टम से पूरी तरह सुरक्षित रहेगा और अपनी जनसंख्या बढाते हुए सभी बायोलॉजिकल फंक्शन को ठप्प कर देगा। ये एक ऐसी अदृश्य आफत होगी, जिससे निपटने का कोई तरीका प्रकृति द्वारा ईजाद कर पाना लगभग नामुमकिन है।
प्रकृति में ऐसे तमाम न्यूट्रिएंट्स हैं, जो स्वयं किसी Handedness का पालन नहीं करते, अर्थात इस जीव को भोजन की कोई कमी नहीं ही होगी। उसके अलावा यह बैक्टीरिया एवोल्यूशन के जरिये “हमारे भोजन” को अपना भोजन बनाना सीख नहीं लेगा – ऐसी शर्त लगाना ही एक बेवकूफी होगी। तमाम बैक्टीरिया पहले से ही एन्टी-बैक्टेरियल दवाईयों को झांसा देने के लिये राइट हैंडेड प्रोटीन को जन्म देते देखे गए हैं। अर्थात “लेफ्ट को राइट” बनाने की बेसिक मशीनरी उनके भीतर पहले से मौजूद है, तो “राइट को लेफ्ट” बनाने की काबिलियत विकसित करना कौन सी बड़ी बात है – खासकर जब यह जीव हर 20 मिनट में अपनी प्रतिलिपि को जन्म देकर नए-नए म्यूटेशन पैदा करने में सक्षम है।
भविष्य में अगर किसी ऐसे जीव का सृजन किया जाता है तो अप्रिय परिस्थिति में यह जीव महज 72 घण्टों में पृथ्वी से जीवन का नामोनिशान मिटा देने में सक्षम होगा। शायद परिस्थिति की भयावहता ही है, जिसने दर्जनों वैज्ञानिकों को 20 बरस पहले ही ऐसे प्रयोगों के प्रति चेताने के लिए मजबूर कर दिया है।
उम्मीद करता हूँ कि मनुष्य चेतेंगे और जीवन का एक और वृक्ष निर्मित करने की बेवकूफी से तौबा कर लेंगे। क्या लगता है? कर पाएंगे?



