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मिथिला में नवजागरण के प्रथम शलाकापुरुष हैं लक्षमीनाथ गोसाईं: तारानंद वियोगी

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महापुरुषों के जीवन और कृतित्व की यह खासियत होती है कि वे एक ही साथ साधारण से साधारण व्यक्ति के लिए भी बोधगम्य और जीवनोपयोगी होते हैं तो दूसरी ओर उच्च कोटी के बौद्धिकों के लिए विमर्श की वस्तु होते हैं। यह विशेषता हमें लक्ष्मीनाथ गोसाईं के जीवन और कृतित्व मे मिलता है।

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महापुरुषों के जीवन और कृतित्व की यह खासियत होती है कि वे एक ही साथ साधारण से साधारण व्यक्ति के लिए भी बोधगम्य और जीवनोपयोगी होते हैं तो दूसरी ओर उच्च कोटी के बौद्धिकों के लिए विमर्श की वस्तु होते हैं। यह विशेषता हमें लक्ष्मीनाथ गोसाईं के जीवन और कृतित्व मे मिलता है।

गोसाईं जी का साहित्य विशुद्ध रुप से नवजागरण की देन है, जो उन्नीसवीं सदी के भारत के लिए एक विलक्षण जीवन मूल्य था। उनके भजनों में अंग्रेजी राजसत्ता के प्रति तीव्र घृणा और विद्रोह की भावना व्यक्त हुई है।

मिथिला के नवजागरण के प्रथम उदय के वे शलाका पुरुष हैं। धर्म, जाति, पंथ आदि तमाम चीजों से ऊपर जाकर उन्होंने न केवल अपनी भक्ति-रचनाएं लिखीं, अपितु दूर दराज के इलाकों में घूम-घूमकर विधेय जीवनमूल्यों को प्रचारित प्रसारित भी किया।

मैं इस बात की संभावना देख रहा हूँ कि जैसे स्वामी दयानन्द ने अवध के गांवों में भूमिगत रहकर अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 के विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार की थी, ठीक वही काम लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने भी किया। लक्ष्मीनाथ पौरूष के गीतकार थे। उनकी रचनाओं में हम सर्वत्र ओज और उत्साह का भाव पाते हैं। राम, उनके साथ ही मैथिली साहित्य में आये। वरना, राम की कोई विशेष प्रतिष्ठा मिथिला में नहीं थी। मिथिला ने परंपरागत रूप से राम को कभी अच्छा नहीं माना, क्योंकि उन्होंने मिथिला की बेटी सीता को सताया..

उपर्युक्त बातें साहित्य अकादेमी नई दिल्ली एवं गोस्वामी लक्ष्मीनाथ संगीत महाविधालय, परसरमा, सुपौल के संयुक्त तत्वावधान में रविवार 7 सितंबर को आयोजित ‘संत कवि लक्ष्मीनाथ गोसाईं पर केंद्रित परिसंवाद तथा कवि सम्मेलन’ कार्यक्रम में साहित्यकार तारानंद वियोगी ने कही।

कार्यक्रम मे अतिथियों का स्वागत करते हुए डॉ. देवेन्द्र कुमार देवेश (विशेष कार्याधिकारी, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली) ने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास के बाद लक्ष्मीनाथ गोसाईं एकमात्र समन्वयवादी कवि हुए जिन्होंने निर्गुण और सगुण का समन्वय किया। लक्ष्मीनाथ गोसाईं के साहित्य से हम काफी ऊर्जा और प्रेरणा पा सकते हैं। इस साहित्यिक आयोजन में उपस्थित होना मेरे लिए सौभाग्य का विषय है। कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ. तिलक नाथ मिश्र व साहित्य अकादेमी में मैथिली भाषा परामर्श मंडल की संयोजिका डॉ. वीणा ठाकुर ने दीप प्रज्जलित कर किया एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता मैथिली साहित्य अकादमी, बिहार के निवर्तमान अध्यक्ष कमलाकांत झा ने की।

इस उद्घाटन सत्र में बीज भाषणकर्ता धीरेंद्र ना. झा धीर एवं मुख्य अतिथि परमेश्वर झा थे। इस अवसर पर वीणा ठाकुर ने कहा कि साहित्य अकादेमी की स्थापना का उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं का विकास है। साहित्य संस्कृति का परिचायक होता है। इसलिए साहित्य के विकास बिना देश का विकास नहीं हो सकता। इस साहित्यक आयोजन में हम मुख्य रूप में भारतीय साहित्य में लक्ष्मीनाथ गोसाईं के योगदान विषय पर विमर्श करेंगे। लक्ष्मीनाथ गोसाईं के साहित्यिक योगदान का भारतीय दर्शन में क्या महत्व है हमें इसे समझना होगा। 

एक दिवसीय इस कार्यक्रम के प्रतिभागियों ने परिसंवाद को आगे बढ़ाते हुए डॉ. रामनरेश सिंह ने- 1857 ई. की क्रांति और लक्ष्मीनाथ गोस्वामी, डॉ. कुलानंद झा ने लक्ष्मीनाथ गोस्वामी के कृष्ण संबन्धी पद की विशेषता, अभयकांत ठाकुर ने परमहंस लक्ष्मीनाथ गोसाईं के जीवनवृत और योग साधना, सुनीता झा ने परमहंस लक्ष्मीनाथ गोसाईं की आध्यात्मिक चेतना एवं सामाजिक व्यवस्था, तद्विषय्क आलेख पाठ किया।
रामचैतन्य धीरज ने ‘संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं रचित प्राती में आध्यात्मिक दर्शन पर बोलते हुए कहाकि आज विज्ञान ने भी भारतीय आध्यात्म चिंतन- मुख्यत: वेदांत को प्रमाणित कर एक नया संदेश दिया है कि वेदांत का प्रमाण अकाट्य है। गोस्वामी लक्ष्मीनाथ जी ने वेदांत की परंपरा में ही चिंतन एवं योग प्रयोग किया। इनके आध्यात्मिक चिंतन में मुख्यत: प्राती मे योग दर्शन का प्रयोग अद्वितीय है।’

अरविन्द ठाकुर ने- संत लक्ष्मीनाथ गोसाईं के व्यवहारिक गीत में निगुण भाव पर आलेख पाठ करते हुए कहा कि लक्ष्मीनाथ गोसाईं को किसी वाद किसी धारा किसी पंथ से जोड़े बिना उन्हें एक भक्त कवि और उनकी रचनाओं को शुद्ध भजन-कीर्तन मानकर ही उनका सटीक साहित्यिक विश्लेषण, मूल्यांकन किया जा सकता है। अरविन्द ठाकुर ने लक्ष्मीनाथ गोसाईं जी को कर्मकंडी-कबीरपंथी की संज्ञा दी। उनकी लेखनी में सिद्धपंथियों, नाथपंथियों और सगुण-निर्गुण के विभिन्न धाराओं का प्रभाव रहा है। उन्होंने साहित्यकार हरिशंकर श्रीवास्तव ’शलभ’ को संदर्भित करते हुए कहा कि गोस्वामी जी बाग्कार कवि थे जो स्वयं गीतों की रचना करते, उन्हें राग-रागिनियों में बांधते तथा अपनी कीर्तन मंडली द्वारा उसे गवाते। यह उनका अद्भुत लोक संपर्क कार्य था। इस प्रकार वे अपने समय के महान जनकवि थे।

इसी सत्र में किसन संकल्प लोक, सुपौल द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’ (लेखक: मायानन्द मिश्र) का लोकर्पण साहित्यकार डॉ. तारानंद वियोगी एवं साहित्य आकादेमी, नई दिल्ली से पधारे डॉ. देवेंद्र कु. देवेश ने किया।

आयोजन का मुख्य आकर्षण कवि सम्मेलन भी रहा।जिसकी अध्यक्षता कमलकांत झा ने की एवं भारती झा, बिजली प्रकाश, लीना सिंह, गुंजन कुमारी, अमलेंदु शेखर पाठक, चंद्रमणि झा, विधाधर मिश्र व जयप्रकाश जनक ने काव्य पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। समारोह के आरंभ में रिशु मिश्र द्वारा प्रस्तुत भगवती वंदना ‘जय-जय भैरवि असुर भयावनि…’ एवं स्वागतगान हुआ।

समारोह में कोसी एवं मिथिला क्षेत्र के साहित्य प्रेमियों एवं कलमकारों की उपस्थिति जम कर रही। किसलय कृष्ण, रघुनाथ मुखिया, मयूख जी, सुरेन्द्र भारती, प्रतिभा, महेन्द्र ना. पंकज एवं अरविन्द श्रीवास्तव आदि की सक्रियता भी बनी रही। बुद्धिजीवियों ने साहित्य अकादमी का ऐसे आयोजन के लिए आभार व्यक्त किया।

 

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