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सियासत

मोदी सरकार अब भारतीय सेना को भी बाबाओं के चरणों में झोंक रही है! देखें वीडियो

मुकेश कुमार-

ऐसा लग रहा है कि देश एक भयानक संकट की ओर बढ़ रहा है। मोदी सरकार न केवल सेना का राजनीतिक इस्तेमाल बढ़ाती जा रही है, बल्कि वह सेना को हिंदुत्व के रंग में भी रंग रही है।

सर्जिकल-फर्जिकल स्ट्राइक से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक हमने देखा कि सरकार कैसे देश में राष्ट्रवाद का नरैटिव बनाने के लिए सेना का इस्तेमाल कर रही है।

प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी के चुनावी भाषणों को देखिए उनमें भी वही नीयत देखने को मिल सकती है। सरकार तरह-तरह से सेना को अपने एजेंडे के साथ जोड़ने और दिखाने की कोशिशें करती रही है।

सरकार सेना के गठन और नियुक्तियों में भी अपनी विचारधारा और एजेंडे को प्रमुखता देती साफ़ दिख रही है।

ख़तरनाक़ बात ये भी है कि सेना अपना सेकुलर कैरेक्टर को भुलाकर हिंदुत्व के रंग में रंगती दिख रही है। सेना के अफसर यूनिफ़ार्म में मंदिरों में जा रहे हैं, वे हिंदुत्ववादी संगठनों जैसे आरएसएस की प्रशंसा कर रहे हैं। सैनिक स्कूलों में संघ की पैठ बढ़ती जा रही है।

इसका ताज़ा संकेत सेना के अफसरों का यूनिफॉर्म में संघ परिवार के क़रीबी जग्गी वासुदेव के कार्यक्रम में शामिल होकर पुरस्कार लेना है। ईशा फाउंडेशन के महाशिवरात्रि कार्यक्रम में भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों (तीन-स्टार रैंक) ने यूनिफॉर्म में भाग लिया।

सद्गुरु जग्गी वासुदेव के आमंत्रण पर वे वहां पहुंचे, जहां रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें भव्य भारत भूषण जैसे धार्मिक मेडल और प्रमाणपत्र दिए। यह कार्यक्रम एक बड़े धार्मिक आयोजन का हिस्सा था, जिसमें हजारों लोग शामिल हुए थे।

सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि सेना की टॉप लीडरशिप ने भी या तो उसके सामने हथियार डाल दिए हैं या फिर उसने सरकार के एजेंडे के साथ चलने का फ़ैसला कर लिया है।

एक और ख़तरनाक़ संकेत ये है कि सेना अपना सेकुलर कैरेक्टर को भुलाकर हिंदुत्व के रंग में रंगती दिख रही है। सेना के अफसर यूनिफ़ार्म में मंदिरों में जा रहे हैं, वे हिंदुत्ववादी संगठनों जैसे आरएसएस की प्रशंसा कर रहे हैं।

इसका ताज़ा संकेत सेना के अफसरों का यूनिफॉर्म में सद्गुरु के कार्यक्रम में शामिल होकर पुरस्कार लेना है। क्या ये सेना के नियमों के ख़िलाफ़ नहीं है? क्या सेना का नेतृत्व राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने में जुट गया है?

सबसे बड़ी चिंता की बात तो ये है कि सेना की टॉप लीडरशिप ने भी या तो उसके सामने हथियार डाल दिए हैं या फिर उसने सरकार के एजेंडे के साथ चलने का फ़ैसला कर लिया है।

क्या ये सेना के नियमों के ख़िलाफ़ नहीं है? क्या सेना का नेतृत्व राजनीतिक एजेंडा को आगे बढ़ाने में जुट गया है? और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि सेना के इस राजनीतिकरण और हिंदुत्व के रंग में रंगने का लोकतंत्र और देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा….

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