जीएसटी के फायदे आज भी बताये जा रहे हैं जो बचत होगी वह ग्राहकों को और विज्ञापन का खर्च सरकार के लिए।
संजय कुमार सिंह
आज जब अखबारों में देश भर में एसआईआर की तैयारी, विधेयकों पर बैठे रहने के राज्यपालों के अधिकारों की वकालत से जुड़ी खबरें हैं तो देश के मुख्य न्यायाधीश का यह बयान भी महत्वपूर्ण है कि हमें अपने संविधान पर गर्व है पड़ोसी देशों में देखिए क्या हो रहा। यह टिप्पणी संविधान में राज्यपालों की शक्तियों का बचाव करते हुए दी गई सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों के जवाब में आईं। एसजी मेहता ने कहा कि उनके पास अनुभवजन्य आंकड़े हैं जो दर्शाते हैं कि राज्यपाल द्वारा विधेयकों को एक महीने से ज़्यादा समय तक सुरक्षित रखने के मामले कितने दुर्लभ है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम आंकड़े नहीं ले सकते। हमने उनके आंकड़े नहीं लिए, तो आपके कैसे ले सकते हैं? टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी संबंधित खबर के अनुसार केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि राज्यपाल अनिश्चित काल तक विधेयकों पर बैठे नहीं रह सकते हैं लेकिन राज्य सरकार की सलाह मानने के लिए बाध्य भी नहीं हैं। मैंने यही पढ़ा है और जानता हूं कि राज्यपाल (और कई मामलों में राष्ट्रपति भी) विधानसभा (या संसद) द्वारा पास विधेयक को वापस कर सकते हैं लेकिन दोबारा सहमति के लिए आये तो उनके पास विकल्प नहीं होता है और सहमति देनी ही होती है। मोटे तौर पर यह जन प्रतिनिधियों को किसी व्यक्ति से ऊपर रखने के लिए है और शक-शंका के निदान के बाद अगर राज्यपाल को लगे कि जनप्रतिनिधि यही चाहते हैं तो उन्हें मानना पड़ेगा। यह जमाने से चला आ रहा है। सॉलिसिटर जनरल ने इसे कहा भी है।
अब जब नाम बदले जा रहे हैं, पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं, कहानियां हटाई जा चुकी हैं और राज्यपाल से केंद्र सरकार अपने काम करवाता है तो सॉलिसिटर जनरल के जरिये राज्यपालों को यह अधिकार दिलाने की कोशिश के मायने हैं। उसपर मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी और महत्वपूर्ण है लेकिन यह खबरों में नहीं है। नेपाल के बावजूद नहीं है और यह कहे जाने के बाद भी नहीं है कि, पड़ोसी देशों में देखिए क्या हो रहा है। अखबारों के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं होता अगर वे बताते कि उनके इलाके से नेपाल गये या वहां रह रहे लोग किस हाल में हैं, क्या बता रहे हैं। पर ज्यादातर अखबारों ने यह भी नहीं बताया है। कोलकाता के द टेलीग्राफ की आज की लीड यह बताती है कि काठमांडो गई दो सहेलियां नेपाल के होटल में फंसी हुई हैं और बाहर गोलियां चल रही हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में ऐसा नहीं हो, इसे सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं है और पूरे भारत में न हो किसी खास इलाके में ही हो जाये तो हम क्या करेंगे या कर पायेंगे तय नहीं है और अनुभव यही बताते हैं कि जो होगा वह बहुत परिपक्व समझा जाने वाला नहीं होगा। हो सकता है अखबारों को इतनी समझ या गंभीरता न हो पर वह भी पाठकों को जानने-समझने वाली बात है।
इंडियन एक्सप्रेस में भी आज ऐसी एक खबर है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, “सीमा बंद, कई फंसें : सुबह ट्यूशन के लिए आया था, लौट नहीं सकता”। यह बिहार के रक्सौल को नेपाल के बीरगंज से जोड़ने वाले मैत्री पुल की खबर है। जाहिर है आज ऐसी खबरों की अपेक्षा रहेगी पर ज्यादातर अखबारों की लीड सरकार का प्रचार है। इंडियन एक्सप्रेस में सरकार के काम की खबर है और इसके अनुसार, काशी विश्वनाथ के पास एक और प्रोजेक्ट तथा टैक्स नोटिस (के आलोक में) विस्थापन का डर है। ऐसे समय में सही और जरूरत के अनुसार खबर को प्राथमिकता देने की बजाय आज अखबारों में सरकार का प्रचार भी है। न सिर्फ खबर के रूप में, बल्कि विज्ञापन के रूप में। निश्चित रूप से यह अभिव्यक्ति की आजादी का मामला है और जो चाहे जिसकी तारीफ करे जिसकी आलोचना न करे। पर तथ्य यही है कि जब आलोचना की जानी चाहिये थी तो नहीं की गई प्रशंसा की जा रही है। इसमें यह संभावना है और मैं उससे इनकार नहीं करता हूं कि आलोचना करना इतना आसान नहीं है। इस विज्ञापन से खर्च करने वाले को जो लाभ मिलेगा वह आलोचना से भी बराबर मिलता लेकिन आलोचन से परेशान किये जाने की आशंका कई गुना ज्यादा है जबकि प्रशंसा में लगभग शून्य है।
सरकार की प्रशंसा या प्रचार करने वाली आज की एक खबर (अमर उजाला) का शीर्षक है, “मोदी घनिष्ठ मित्र, व्यापार वार्ता जारी : ट्रम्प” और “अमेरिका-भारत स्वाभाविक साझेदार : मोदी”। दो लाइन का यह शीर्षक एक साथ है जबकि दो अलग बातें हैं और दो अलग लोगों के बयान हैं भले नरेन्द्र मोदी या बहुत सारे लोगों के लिए ट्रम्प का मतलब अमेरिका हो। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सेकेंड लीड है और हिन्दी में शीर्षक है, ट्रम्प ने व्यापार में नरमी के संकेत दिए (Trump signals thaw in trade chill), मोदी ने कहा भारत, अमेरिका करीबी मित्र हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, “ट्रम्प, मोदी ने व्यापार वार्ता शुरू होने के संकेत दिये”। मुझे लगता है कि अखबार के पहले पन्ने की एक और खबर ज्यादा महत्वपपूर्ण है, बाईलाइन वाली है और उसे ही लीड बनाया जाना चाहिये था। पर मैं लिख चुका हूं कि इसके पाठकों (प्रशंसकों) में एक बता देते हैं कि खबरों के अपने चयन के कारण अखबार यह ‘डॉन’ का इस्लामाबाद संस्करण लग रहा है। पूर्व में जब ऐसा हुआ था तो इसके मालिकानों में से एक ने इसके लिए अफसोस जताया था और निश्चित रूप से यह संपादकों के लिए अफसोसनाक रहा होगा। यह उसका असर हो सकता है। आज की खबर है, एजेंट की ठगी के शिकार 15 भारतीय यूक्रेन-रूस युद्ध क्षेत्र में फंसे हैं। ऐसा पहले भी हो चुका है और आज फिर खबर है तो जाहिर है कि ना खाउंगा, ना खाने दूंगा के बावजूद नौकरी के लिए पैसे लेकर लोगों को विदेश भेजने का अवैध धंधा जारी है। इसे रोकने की बजाय आरोप है कि पुलिस ने वसूली के लिए कुछ नामी लोगों को कबूतरबाजी में फंसा दिया था। फंसाये जा सकने वाले संभल गये होंगे या पैसे देते होंगे लेकिन इस तरह फंसने वालों की खबरों को प्रमुखता भी नहीं मिलती है यह आज स्पष्ट है।
भारत-अमेरिका की करीबी या घनिष्ठ मित्रता लिखने की बजाय टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, मोदी-ट्रम्प वार्ता के लिए तैयार हुए तो भारत अमेरिका की नजर व्यापार को रीसेट करने पर। आप समझ सकते हैं कि प्रचार वाला शीर्षक स्वाभाविक तौर पर लगा भी हो सकता है। यह भी संभव है कि प्रचार करने के लिए प्रयास करके लिखा गया हो – यह भी संभव है। अगर पहली स्थिति है तो पत्रकारिता के लिए ठीक नहीं है अगर दूसरी स्थिति है तो उसकी जरूरत नहीं होनी चाहिये। लेकिन नौकरी की मजबूरियां होती हैं और ऐसे शीर्षक को इन तथ्यों के आलोक में देखा जाना चाहिये। ऐसे में हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक और भी अलग है – व्यापार, टैरिफ से संबंधित विवाद निपटाने के लिए ट्रम् मोदी सहमत हुए। खबरों से ऐसा लग रहा है कि दो मित्र किसी बात पर कुछ दिनों के लिए कुट्टी हो गये थे और पाठकों के लिए ऐसी खबरों में यही सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए लीड तो है लेकिन बाकी विवरण की क्या जरूरत? कुल मिलाकर, जो चल रहा है वह पत्रकारिता के लिहाज से अजीब तो है ही, लापरवाह किस्म का भी है।
दि एशियन एज के पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है, खबरें ज्यादा होती हैं और मैं समझ सकता हूं कि ऐसे पन्ने को भरना कई बार संपादकीय प्रभारी के लिए कितना मुश्किल होता है। आज एक खबर हाईलाइट की हुई है। इसके अनुसार, सीईए (मुख्य आर्थिक सलाहकार) ने कहा है कि जीएसटी में किये गये सुधारों से अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव की भरपाई हो जायेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि स्लैब कम किये जाने से मजबूरी में दरें कम हुई हैं। इसका जबरदस्त प्रचार किया जा रहा है और मीडिया की मदद से (या मीडिया स्वयं भी) यह प्रचार कर रहा है कि जो बचत होगी वह कितना उपयोगी होगा। इसे आप चाहे जैसे देखिये, तथ्य यह है कि सरकार ने 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद से ही दर ज्यादा रखा था, कम करने की मांग पर ध्यान नहीं दिया, किसी ने विरोध तो नहीं ही किया तारीफ जरूर किये थे। अब 15 अगस्त को स्लैब कम किये जाने की घोषणा के बाद से ही इसके फायदे रोज बताये जाते हैं, जा रहे हैं। अमूमन होता यह है कि टैक्स कम होने से कीमत जितनी कम होती है निर्माता या विक्रेत अपना लाभ उतना बढ़ाकर अधिकत्तम खुदरा मूल्य वही रखते हैं। इस बार वित्त मंत्री ने कहा है कि 22 सिंतबर के बाद नई दरें लागू होने पर वे स्वयं सुनिश्चित करेंगी (और उन्हें खुद यह काम करना पड़ेगा) कि टैक्स कम होने का लाभ उपभोक्ता को मिले।
आज नेपाल की खबर तो कई अखबारों में लीड या सेकेंड लीड है ही लेकिन नवोदय टाइम्स का शीर्षक सबसे अलग है। उपशीर्षक है, पूरे नेपाल में सेना तैनात। मुख्य शीर्षक है, पूर्व सीजेआई कार्की को कमान। अमर उजाला का शीर्षक है, सड़कों पर सेना उतरने के बाद नेपाल में शांति। अंतरिम सरकार बनाने में जुटे आंदोलनकारी। इस शीर्षक से लगता है कि नेपाल में इस्तीफे हो गये तो अंतरिम सरकार बन जायेगी और स्थिति बदलेगी। लेकिन जहां इस्तीफे नहीं होते हैं वहां ऐसे प्रदर्शन से कुछ बदलेगा नहीं, नुकसान चाहे जितना हो जाये। क्योंकि सेना के सड़कों पर उतरने के बाद तो सब ठीक हो ही जाना है। अखबार में इस लीड के बगल के दो कॉलम की खबर का शीर्षक है, भारतीय संविधान पर गर्व देखिए पड़ोसी देशों में क्या हो रहा है : सुप्रीम कोर्ट। हाईलाइट किया हुआ अंश है, 2014 से पहले क्या हुआ या बाद में यह कोर्ट के लिए प्रासंगिक नहीं है। अखबार ने सॉलिसिटर जनरल का दिया वह आंकड़ा भी छापा है जो जिसकी चर्चा ऊपर है। सरकार का प्रचार और जीएसटी कम होने के लाभ बताने वाला एक विज्ञापन आज अमर उजाला में जैकेट है। हीरो के इस विज्ञापन में प्रधानमंत्री की फोटो है और भिन्न मॉडल की कीमत कितनी कम हुई यह बताया गया है। विज्ञापन में कंपनी, उसके लोगों या कर्ता-धर्ता का प्रचार-फोटो तो नहीं ही है जो लिखा है उसका खास अंश इस प्रकार है, “हम अपने माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार को देशवासियों के हित में किए गए जीएसटी बदलाव के लिए हार्दिक धन्यवाद देते हैं, जिन्होंने इस पल को एक राष्ट्रव्यापी उत्सव में बदल दिया! त्यौहार के इस समय में, अपने पसंदीदा हीरो टू-व्हीलर को घर ले क्योंकि 100% जीएसटी के लाभ सीधे आप तक पहुँचाए जा रहे हैं। डिलीवरी इस नवरात्रि से शुरू। कम कीमत, शानदार त्यौहार”।
जीएसटी के लिए सरकार का प्रचार करने वाला दूसरा विज्ञापन टाइम्स ऑफ इंडिया में खबरों के पहले पन्ने पर है और यह मारुति सुजुकी का है। इस विज्ञापन के जरिये माननीय प्रधानमंत्री को उनकी फोटो के साथ धन्यवाद कहा गया है। इसमें कहा गया है, ऐतिहासिक जीएसटी सुधार से सामर्थ्य बढ़ेगा (या पहुंच आसान हो जायेगी) और करोड़ों लोग अपने सपने पूरे करने के लिए सशक्त होंगे, जिससे विकासित भारत की दिशा में बढ़ना तेज होगा। छोटी कारों पर टैक्स कम किये जाने से भारत समाज के एक बड़े वर्ग को गतिशीलता का आनंद प्रदान करेगा। लोगों को मिलेगी – 1) अधिक क्रय शक्ति 2) विनिर्माण को बढ़ावा और 3) विकास का सद्चक्र। टैक्स में कमी सरकार की ओर से उपभोक्ताओं के लिए एक उपहार है। हमेशा की तरह, मारुति सुजुकी, वाहनों, पुर्जों, सहायक उपकरणों और सेवाओं पर लागू होने वाले सभी जीएसटी लाभ ग्राहकों को देगी। अखबारों में औद्योगिक घरानों का यह विज्ञापन स्वतःस्फूर्त है या ईडी-सीबीआई का डर अथवा सरकार का दबाव या वाशिंग मशीन पार्टी का कमाल कहना मुश्किल है। लेकिन सच यही है कि जो भी, असामान्य है और यह सब ऐसी मनमानी है जिसकी ना गिनती है ना बिसात।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



Shambhu Arya
September 12, 2025 at 12:14 pm
दलाल कभी देश भक्त नहीं हो सकता है, मुसलमान वामपंथी और कॉंग्रेस कभी भी देश का सगा नहीं हो सकता है, हमें मुसलमानों और मुसलमानों के दलाल कोंग्रसी और वामपंथी से सावधान रहना चाहिए।
Shambhu Arya
September 12, 2025 at 12:19 pm
रास्ट्रपति और राज्यपाल का पद क्यों नहीं समाप्त होना चाहिए? सारी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट के अधीन होना चाहिए? कड़ोंरों रुपए की बचत होगी उस पैसे को ” पीड़ित भूखा नंगा दंगाई बलात्कारी मक्कार ” तथाकतथित अल्पसंख्यक समुदाय ” पर खर्च करना चाहिए?