
राजेश ज्वेल-
एक जमाना वो था जब नईदुनिया के साथ उसमें छपने वाले पत्र सम्पादक के नाम कॉलम का अपना जलवा था… हम जैसे नौसीखिए 82-83 में जब लिखना शुरू किए तब थोक में पोस्टकार्ड खरीद नईदुनिया सहित देशभर के समाचार-पत्र, पत्रिकाओं में विभिन्न विषय पर पत्र लिख भिजवाते थे और फिर बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और लाइब्रेरी में जाकर उनमें से कितने पत्र छपे! उसे देख मुदित होते और नईदुनिया में कोई पत्र छप गया तो वह एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती और पूरी कालोनी में उसका ढोल पीटते…
लेखन-पत्रकारिता की पहली सीढ़ी पत्र लेखन के साथ ही चढ़ी और फिर कई विषयों पर लिखे लेखों के प्रकाशन का सिलसिला शुरू हुआ..उसके बाद 1986 में जब उज्जैन से इंदौर आकर दैनिक भास्कर की स्पोर्ट्स डेस्क पर काम शुरू किया तब कुछ स्पोर्ट्स रिपोर्टिंग से स्व. सुरेश गावड़े प्रभावित हुए और उन्होंने नईदुनिया दफ्तर मिलने बुलाया…
अभय जी से भी पहली मुलाकात उस वक्त हुई , उस दौरान नईदुनिया के साथ उसकी खेल पत्रिका खेल हलचल में भी लिखता था ..तब स्पोर्ट्स डेस्क के लिए ही नईदुनिया से जुडऩे का अवसर आया, मगर बात बन ना सकी और भास्कर में ही काम करता रहा… लेकिन कई मौकों पर बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग स्थित नईदुनिया दफ्तर जाना होता रहा… एक अजीब सी मोहक अखबारी खुशबू और अनुशासित वातावरण उस दफ्तर में जाने पर मिलता था…
बड़े अदब और संकोच के साथ दफ्तर में प्रवेश करने के बाद धीमी आवाज में बात करना पड़ती थी… अभय जी के अलावा गावड़े जी, यशवंत व्यास, श्रीराम ताम्रकर सहित अन्य वरिष्ठ साथियों से मुलाकात के बाद फिर जलधारी जी, विकास भाई या अन्य साथियों से प्रेस क्लब चुनाव या अन्य कार्यों के चलते मिलने नईदुनिया दफ्तर जाना होता रहा… कुछ दफा पिताजी के साथ भी गया जब वे इंदौर आने पर अभय जी से मिलने जाते..कल सहयोगी साथी विजय मनोहर तिवारी की एक पोस्ट पढ़ी, जिसमें उन्होंने नईदुनिया बिल्डिंग के ढह जाने के साथ इस समाचार-पत्र से उनके जुड़ाव के कुछ संस्मरण लिखे… इसी के साथ मेरी भी नईदुनिया से जुड़ी कुछ यादें ताजा हो गई…
नईदुनिया 13 साल पहले दैनिक जागरण समूह के हाथों बिक गया और उसके बाद उसकी जो बिल्डिंग थी ,वह भी अब ढहा दी गई… यानी बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग की जो प्रमुख पहचान सालों तक रही वह अब मिट्टी में मिल गई… इंदौर ही नहीं, देश की हिन्दी पत्रकारिता में नईदुनिया ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की तरह वर्षों तक प्रतिष्ठित रहा, जहां से राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी जैसे दिग्गज और भूतो न भविष्यते सम्पादक निकले… लेखकों-पत्रकारों-स्तंभकारों की भी एक शानदार गैलेक्सी रही… नईदुनिया के इंदौरी साम्राज्य को हालांकि भास्कर ने सालों पहले ध्वस्त कर दिया था और उसके साथ हिन्दी पत्रकारिता की एक विरासत समाप्त हो गई थीं और अब बिल्डिंग भी जमींदोज!
प्रकाश हिंदुस्तानी-
नईदुनिया की पुरानी दुनिया ! काहे का स्यापा? इन्दौर में 60/1 केसरबाग रोड पर बनी इमारतों में से एक इमारत, मालिक ने ढहवा दी। वहां नई भव्य बिल्डिंग बनेगी। 100 करोड़ की। फाइव स्टार स्कूल खोला जाएगा। धनिकों के बच्चे पढ़ेंगे।अफसर-बैपारी-दलाल आदि बनेंगे। शिक्षा को धंधा बना लो तो माल ही माल मिलता रहता है। इनके रिटर्न रेकरिंग होते हैं। बढ़िया है! सभी बड़े-बड़े लोग इस धंधे में हैं। पूरा कानूनी काम है। एक लंबर!
इस नये ‘प्रोजेक्ट’ पर इन्दौर, भोपाल, दिल्ली, नागपुर आदि के कई जूने-पुराने पत्रकार स्यापा कर रहे हैं। स्यापा फिजूल है। वे कह रहे हैं कि इस परिसर की एक बिल्डिंग में कभी नईदुनिया का दफ्तर हुआ करता था। हमारी स्मृतियां जुड़ी है। यह बिल्डिंग धरोहर थी।
तो भाई, पत्रकार लोग ये बिल्डिंग क्या तुम्हारी थी? तुम्हारे बाप छोड़कर गये थे? तुम्हारी धरोहर कैसे हो गई? वह निजी, कमर्शियल इमारत थी, कोई लाल किला थोड़े ही था! जब नगर निगम, टाउन कंट्री प्लानिंग, विकास प्राधिकरण, ग्रीन ट्रिब्यूनल आदि को आपत्ति नहीं तो आप कौन? मालिक का मालिक बनने की कोशिश मत करो। तुम काहे को नईदुनिया के नाम पर इमोशनल अत्याचार करने पर तुले हो?
रही बात नईदुनिया अखबार की, तो वह 13 साल पहले ही बिक चुका। वह तो अब किसी और प्रकाशन का हिस्सा है। मैंने भी नईदुनिया और वेबदुनिया में काम किया है। सेठ ने यही सिखाया कि खूब काम करो, अपनी तनख्वाह लो और बढ़ लो! फिर तुम कौन?
इस नये दौर में मुझे VC ने इमोशनल कर दिया। इस जगह के वर्तमान मालिक हैं। विदेश चले गये हैं। कारण यह बताया गया कि लोग उनसे तरह तरह के सवाल पूछते। किस किस को जवाब देते फिरते? सही है, बैपार में इमोशनल नईं होने का। इमोशनल हो तो बैपार नहीं करने का। अल कबीर और अल नूर सबके बड़े एक्सपोर्टर्स हैं, लेकिन वे माल थोड़े तैयार करते हैं। वे तो केवल रोकड़े का हिसाब देखते हैं।
थू है उन ‘विध्न संतोषियों’ पर!


