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आयोजन

ये कौन लोग हैं जिन्हें श्रीनगर, गढ़वाल में किताबों और नेगी दा से परहेज है?

राहुल कोटियाल-

श्रीनगर में 15-16 फरवरी को ‘किताब कौथिक’ होना था. पहले तय हुआ कि यूनिवर्सिटी में आयोजित किया जाएगा और कुलपति ने इसकी अनुमति भी दी. लेकिन कुछ समय बाद आयोजकों से ‘ऑफ़ द रिकॉर्ड’ कहा गया कि ‘ऊपर से दबाव’ है इसलिए यह पुस्तक मेला कहीं और आयोजित कर लिया जाए.

आयोजकों ने फिर रामलीला मैदान में इसे आयोजित करने के लिए समिति से अनुमति ली. अनुमति मिल भी गई क्योंकि उस दिन रामलीला मैदान में कोई अन्य कार्यक्रम नियत नहीं था. लेकिन जैसे ही आयोजकों ने किताब कौथिक के पोस्टर शहर में लगाए, उन पोस्टरों के ऊपर ही एक अन्य पोस्टर चस्पा कर दिया गया जिसका आशय था कि ठीक किताब कौथिक वाली जगह पर, उसी दिन और उसी समय ‘विद्यार्थी एकत्रीकरण’ कार्यक्रम किया जाएगा.

सीधी-सी मंशा ये कि चाहे जो हो जाए, किताबों का मेला न लगे. इसकी अनुमति आधिकारिक तौर से निरस्त नहीं की जा सकती थी लेकिन लठैतों को भेज कर अनाधिकारिक तौर से व्यवधान तो पैदा किया ही जा सकता है. सुना है कि कथित लठैतों को नेगी जी के भी इस कार्यक्रम में शामिल होने से दिक्कत थी. उन्होंने आयोजकों से कहा कि आप नेगी जी को यहाँ मत बुलाइये.

अब ये कौन पहाड़-हितैषी हैं जिन्हें नरेंद्र सिंह नेगी से दिक्कत है? किताबों से दिक्कत और डर तो खैर एक बड़े वर्ग को सदियों से रहा ही है. लेकिन अब ये लोग पहाड़ों में इतने ताकतवर हो गए हैं कि अपनी दबंगई का डर दिखाकर कुछ भी कर जाएँ?

किताब कौथिक का आयोजन निरस्त होना, इसमें नेगी दा के शामिल होने का विरोध होना, गढ़वाल के लोगों की अस्मिता पर सीधा हमला है. जो भी लोग किताब कौथिक जैसे आयोजन को निरस्त करने में शामिल हैं, उनकी पहचान होनी चाहिए और उनका पुरज़ोर विरोध होना चाहिए.

आप सभी से अपील है कि अपने-अपने स्तर पर उन लोगों का पूरी ताक़त से विरोध कीजिए जो लठैत बन कर किताब कौथिक जैसे आयोजनों को रोक रहे हैं.

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