Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का एक अनूठा केंद्र : (पार्ट-3)

अनिल शुक्ल-

यह पता चलने पर कि मुझे किडनी का रोग है और आगरा का ‘एसएन मेडिकल कॉलेज’ का नेफ्रॉलॉजी विभाग बिना किसी प्राध्यापक की नियुक्ति के सूना पड़ा है, मैंने नवेंदु (अपने बड़े बेटे) से ‘एम्स’ में दिखाने का इंतज़ाम करने को कहा। उसने उसी शाम मुझे बताया कि आने वाली बृहस्पतिवार को मेरा अपॉइन्टमेंट सुनिश्चित हो गया है। यह सन 2012 की मई की 18 तारीख़ थी जब अपना इलाज करने की नीयत से मैं ‘एम्स’ पहुँचा। मेरे ब्लड सैम्पल और अल्ट्रासाउंड की तमाम जांचों के बाद एम्स के नेफ्रोलॉजी’ विभाग के रीडर डॉ० संजय गुप्ता ने मुझसे कह दिया था कि मेरे दोनों किडनी का पचहत्तर फ़ीसदी भाग सिकुड़ कर नष्ट हो चुका है। यह पूछने पर कि इसका निदान क्या है, उनका जवाब था “मुझे यह कहते हुए अफ़सोस हो रहा है कि यह एक क्रॉनिक (असाध्य) रोग है और इसका कोई ट्रीटमेंट नहीं है।” यह जानने पर कि क्या बाक़ी बचे पच्चीस फ़ीसदी किडनी के क्षरण को रोका जा सकता है, उनका जवाब सकारात्मक नहीं था। उन्होंने कुछ दवाएं लिखीं। इनमें एक स्टेरॉयड थी, एक बीपी कंट्रोल करने वाली गोली और एक ख़ून में आयरन बढ़ाने वाली।

किडनी ट्रांस्पलांट तब भी इतना आसान नहीं था जितना आज मुश्किल बना हुआ है, डायलिसिस मुझ जैसे व्यक्ति के लिए बेहद ख़र्चीला तामझाम तब से लेकर आज तक तो है ही साथ ही यह एक अंधे कुंए की मानिंद भी है जिसमें एक बार दाख़िल होने का मतलब अनंत अंधकार में भटकते चले जाने के सिवाय और कुछ भी नहीं। यह वह क्षण था जिसने एक बारगी मुझे दहला दिया। लौटते समय मनीषा ने फफकते हुए मुझसे कहा “तुमसे यह उम्मीद नहीं थी अनिल!” मेरे कंधे पर अपना सिर टिका कर वह रो पड़ीं।

‘क्या एलोपैथी के सिवाय कोई और वैकल्पिक चिकित्सा भी है जहाँ मैं जीवन हासिल कर सकता हूँ?’ मैंने सोचा और खोजबीन शुरू कर दी। कुछ दिन होम्योपैथी, आयुर्वेद की दरिया में डूबता-उतराता रहा। निराशा ही हाथ लगी। ग्लोबल परिदृश्य खंगालने पर जो दो विधाएँ पता चलीं उनमें एक चाइनीज़ परम्परा थी जिसमें वे सैकड़ों सालों से सब्ज़ियां खिलाकर किडनी का इलाज करते हैं। दूसरी परंपरा अमेरिका और यूरोप में प्रचलित नेचरोपैथी की थी। ‘प्राकृतिक चिकित्सा तो हमारे देश में भी चल निकली है।’ मैंने सोचा। यह भी पता चला कि बेशक अलग-अलग शहरों में भले ही तमाम नेचरोपैथी सेंटर खुले हों लेकिन क्रॉनिक बीमारियों के केंद्र गिने चुने ही हैं। अंततः डॉ० जेता सिंह और भागलपुर (बिहार) स्थित उनके केंद्र की बाबत जानकारी मिली।

सन 2012 की जुलाई की 10 तारीख थी जब अपने दोनों बेटों को मुंह फुलाए छोड़कर हम मियां-बीबी दिल्ली के आनंदविहार रेलवे स्टेशन से राजधानी और भागलपुर के बीच चलने वाली ‘विक्रमशिला सुपरफ़ास्ट एक्सप्रेस’ से रवाना हुए। डॉ० जेता सिंह से दिल्ली में हुई मुलाक़ात से इतना मुत्मईन हो गया था कि अगर नष्टप्राय नेफ्रॉन्स पुनर्जीवित हो न हो, बचे हुए किडनी को हर हाल में रोका जा सकता है और जीवन पद्धति को सुनिश्चित रखा जाय तो उतने से काम चल सकता है। यह एक बड़ा विश्वास था जो अगले 8-9 सालों तक कारगर साबित हुआ। छोटा बेटा सुकांत स्टेशन छोड़ने आया था। अपनी मां को मुझसे कुछ दूर ले जाकर उनके कान में कुछ फुसफुसाया। बाद में मनीषा ने बताया कि कह रहा था कि इनके (यानि मेरे) चक्कर में मत फँसियेगा और अगर ज़रा सा भी कुछ गड़बड़ दिखे तो मुझे फ़ोन कर दीजियेगा, मैं फ़ौरन वापसी का रेल टिकिट भेज दूंगा। बेटों की निगाह में उनके पिता ज़िंदगी भर समाज में बदलाव के वैकल्पिक रास्तों की तलाश में ‘भटकते’ रहे हैं और ‘एम्स जैसे लब्धप्रतिष्ठ संस्थान’ को छोड़कर अब अपने किडनी की वैकल्पिक चिकित्सा की तलाश में 11 सौ किलोमीटर दूर भागलपुर ‘झक मारने’ जा रहे हैं। मैं जानता था कि हमारे बच्चे भी भारतीय समाज का वे हिस्सा हैं जो चिकित्सा पद्धति में एलोपैथी को ‘अंतिम सच’ मानकर चलता है। मां से कही बिट्टू की बात सुनकर इसलिए मैं मुस्करा दिया। बाद में भागलपुर के अपने 3 महीने के प्रवास के दौरान जब-जब मनीषा उन्हें मेरी पैथोलॉजी जाँच की रिपोर्ट का विवरण भेजतीं (जो ज़ाहिर है इम्प्रूवमेंट दर्शाने वाले होते थे) उन लोगों का एक ही जवाब होता- ”यहाँ दिल्ली लौटकर ‘लाल पैथोलॉजी लैब’ में टेस्ट करवाएंगे तब मानेगे।”

अठारवीं सदी के अंतिम दशक में भागलपुर में ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ की हुक़ूमत से लड़ने वाले क्रन्तिकारी आदिवासी नेता तिलका माझी की स्मृति में बने शहादत स्थल वाले ‘तिलकामांझी चौक’ से ही कुछ दूर पर ‘तपोवर्द्धन प्राकृतिक चिकित्सा केंद्र’ की बाउण्ड्री शुरू हो जाती है। सुदूर गंगा नदी के किनारे तक चली जा रही सड़क के समान्तर भागती ‘चिकित्सा केंद्र’ की बाउण्ड्री की लम्बाई हैरान करने वाली थी। मुख्य द्वार के भीतर घुसते ही ‘केंद्र’ का परिवास सचमुच आकर्षित करने वाला था। कुछेक कॉटेज और चारों तरफ बिखरे सैकड़ों हरे-भरे पेड़। ‘तपोवर्द्धन’ मुझे पहली नज़र में ही भा गया! अगली सुबह पिछवाड़े बहुत दूर तक खिंची दीवार की सरहद के भीतर फैला कई एकड़ का विराट जंगल देखा तो और भी हैरानी हुई। महीने भर बाद जब स्वास्थ्य सुधरने लगा तो डॉ० जेता सिंह के निर्देश पर हर सुबह जंगल में भ्रमण को जाता। अपने नर्स विजय की सलाह पर हाथ में छोटा सा डंडा रखता। घूमते-फिरते सांप, नेवले और कई छोटे-मोटे जानवरों के दीदार होते रहते। सुना है कि अब इस जंगल के एक हिस्से में 70 बिस्तरों वाला एक अस्पताल और रिसर्च सेंटर निर्माणाधीन है जो कुछ ही महीनों में शुरू हो जायेगा।

(क्रमशः जारी……………।)

आगरा के मूल निवासी अनिल शुक्ल हिंदी मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, हिंदी जगत के जाने माने रंगकर्मी और चर्चित सोशल एक्टिविस्ट हैं.

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन