
संजय कुमार सिंह
हेडलाइन मैनेजमेंट के इस दौर में रुह आफ्जा को धर्म के नाम पर अलग करने की पतंजलि वाले बाबा राम देव की शैतानी इन दिनों खबर नहीं है भले सोशल मीडिया पर मामला छाया हुआ है। आज पतंजलि का एक विज्ञापन दि एशियन एज में पहले पन्ने पर है और पूरी बेशर्मी से सांप्रदायिकता के आधार पर उत्पाद बेचने के लिए इसमें कही गई बातों का शीर्षक है, स्वधर्म व राष्ट्रधर्म सर्वोपरि। इस आधार पर बिक्री के लिए उत्पाद के प्रचार का यह पहला मामला हो सकता है और अगर कार्रवाई नहीं होगी तो ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ’ की तर्ज पर पतंजलि को फायदा ही है और वह ऐसे विज्ञापन तथा दावे करता रहे तो मजबूरी में की जाने वाली चर्चा से भी उसे लाभ हो रहा है और नाम तो हो ही रहा है। विज्ञापन का मूल पाठ अंग्रेजी में लिखा गया है और मुझे लगता है कि इस विज्ञापन की अपील आपत्तिजनक और संविधान विरोधी है। भारत में विज्ञापनों का मामला संपादकों के नियंत्रण का नहीं है। इसके लिए अलग भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) है और सरकार समर्थक योग बाबा को छूट हो तो अलग बात है। उनके एक वीडियो की सोशल मीडिया पर थू-थू हो रही है और कार्रवाई की कोई खबर नहीं है। इस बीच आज के विज्ञापन में एक क्यूआर कोड है। इसके साथ जो लिखा हुआ है उसका हिन्दी इस प्रकार होगा, योग गुरु स्वामी रामदेव जी का विशेष संदेश सुनने के लिए इसे स्कैन कीजिये। संभव है, वही बातें सुनने को मिले जिसकी आलोचना हो रही है। ना खाउंगा ना खाने दूंगा की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री के राज में उनके घोषित समर्थक अनुचित विज्ञापनों के लिए सुप्रीम कोर्ट का सामना कर चुके हैं लेकिन भूख है कि मिटती नहीं, आदत है कि जाती नहीं। वे शर्बत को धर्म के नाम पर बेचने में लगे हैं।
अखबारों के इस कॉलम में अभी तक खबरों की बात होती थी लेकिन आज विज्ञापन की बात करनी पड़ी तो आप समझ सकते हैं कि अखबारों (और विज्ञापनों का भी) का क्या हाल हो चला है। सरकार का प्रचार और प्रशंसा में लगे अखबारों में प्रमुखता प्रचार और प्रशंसा को ही दी जाती है खबरें रह जाती हैं। कल मैंने लिखा था कि असली खबर तो अमर उजाला में लीड है। आज असली खबर इंडियन एक्सप्रेस में लीड है और यही खबर द टेलीग्राफ में कुछ अलग शीर्षक से है। आप जानते हैं कि यह सरकार बहुमत की व्याख्या अपने अंदाज में करती रही है और इसके ढेरों उदाहरण हैं। राज्य सरकारों को राज्यपालों के जरिये नियंत्रित और परेशान करने का एक मामला इन दिनों सुर्खियों में है और कल मैंने जिसे खबर कहा था वह भी इसी से संबंधित था। आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर सुप्रीम कोर्ट के हवाले से है। इसके अनुसार, अगर कोई राज्यपाल किसी विधेयक को असंवैधानिक कहकर रोक लें और राष्ट्रपति की सहमति चाहें तो राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट की राय लेनी चाहिये। दूसरे शब्दों में जैसा द टेलीग्राफ ने शीर्षक लगाया है, “राज्यों के विधेयकों के मामले में राष्ट्रपति, राज्यपाल के पास वीटो नहीं है: सुप्रीमकोर्ट”। सुप्रीम कोर्ट ने यह तब कहा है जब न्यायिक अतिरेक की बात हो चुकी है।

जाहिर है, सरकार जब यह कह रही है और चाहती है कि बहुमत की आड़ में वह कुछ भी कर सकती है और लोकसभा चुनाव से पहले चार सौ पार का मकसद संविधान बदलना था तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधानसभा में पास किसी विधेयक पर राज्यपाल को असंवैधानिक होने का शक हो तो राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी जानी चाहिये। संविधान के पालन के लिहाज से मुझे यह सही लगता है और अगर ऐसा होने लगे तो इलेक्टोरल बांड जैसे कानून पास ही नहीं होंगे और पास होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में देश का समय खराब नहीं होगा। हाल के मामले में देखें तो संसद में बहस के बाद अगर वक्फ संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिली होती तो मामला सुप्रीम कोर्ट में नहीं जाता और देश के समय वह धन की बर्बादी नहीं होती। लेकिन सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फैसला देने से पहले उसका पक्ष सुने। मोटे तौर पर मतलब हुआ कि राष्ट्रपति दस्तखत कर दें, सुप्रीम कोर्ट से चर्चा भी नहीं करें (जो नियम और व्यवस्था है वह अपनी जगह)। यानी राज्यपाल रोक सकते हैं, राष्ट्रपति नहीं पर यह सब मेरी चिन्ता का विषय नहीं है। जिनकी चिन्ता का होना चाहिये वे इसपर बात कर रहे हैं? कानून के प्रावधानों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है लेकिन ऐसा हो जाये तो सुविधा होगी यह समझ में आ रहा है। संभव है, असुविधा भी हो लेकिन स्पष्टता के लिए जरूरी है कि इस पर चर्चा हो। लेकिन अखबार इसे पहले पन्ने की खबर ही नहीं मानेंगे तो चर्चा कौन करेगा और कैसे होगी? इंडियन एक्सप्रेस का उपशीर्षक है, “पीठ (ने कहा) : असंवैधानिक विधेयकों को रोकने से संसाधनों की बचत होती है। जाहिर है, यह मामला संसग में पास अंसंवैधानिक विधेयकों तथा राष्ट्रपति के लिए भी है। बेशक यह बड़ा मामला है और पहला भी। इसलिये बड़ी खबर भी है लेकिन इसे उन अखबारों ने प्रमुखता नहीं दी है जो सरकार का प्रचार करते हैं।
इस लिहाज से अमर उजाला की कल की लीड खास थी और आज यह खबर उसमें नहीं है तो इसे क्या समझा जाये – कहना मुश्किल है पर नहीं है तो रेखांकित करना जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस के बारे में अगर यह माना जाये कि कल वह चूक गया था तो आज कहा जा सकता है कि उसने कल की भरपाई कर ली। इस तरह, इमरजेंसी का एक्सप्रेस अघोषित इमरजेंसी का भी एक्सप्रेस है लेकिन बाकी अखबार खबरें देने में एक्सप्रेस जैसा नहीं हो पा रहे हैं। संभव है इसमें विज्ञापनों के साथ ईडी का डर भी हो। इमरजेंसी के बाद के तो हैं ही। अमर उजाला की आज की लीड तो कुछ और अखबारों की लीड है लेकिन सेकेंड लीड सरकार का प्रचार करने वाली है। नेशनल हेराल्ड की संपत्तियां जब्त करने की कार्रवाई शुरू भले बड़ी खबर हो लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट की खबर है और सरकार जब छोटे-छोटे चैनलों, प्रकाशनों के साथ यूट्यूबरों को नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रही है तो नेशनल हेराल्ड के मामले में यह कार्रवाई कोई अप्रत्याशित नहीं है भले ही इसीकारण बड़ी खबर हो। इस तरह, आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, इतिहास में पहली बार…. तमिलनाडु में राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना लागू किये दस कानून। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति से कहा है कि उसकी सलाह ली जानी चाहिये।
आमतौर पर यह इतना बड़ा मामला नहीं होता लेकिन वक्फ संशोधन विधेयक जिस ढंग से और जिस समय पास करके लागू किया गया है उस समय ऐसा कहा जाना महत्वपूर्ण है। पहले मैं लिख चुका हूं कि खबर के लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की किसी भी खबर को लीड बनाया जा सकता है पर किसी खबर को लीड नहीं बनाया जाया तो वह हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग हो सकता है और इस खबर के बारे में ऐसा कहा जा सकता है। जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्यपाल की मंजूरी के बिना एक दो नहीं, 10 कानून लागू होने के मायने हैं और यह भाजपा की राजनीति का नतीजा है। मीडिया के लिए चर्चा का गंभीर मु्द्दा है और मुख्यधारा का मीडिया इसपर चर्चा नहीं करेगा और वह मुद्दा नहीं बनेगा। निष्पक्ष दिखने की कोशिश करने वाले कुछ लोग यह जरूर कहेंगे कि किसी यू ट्यूबर या पॉडकास्ट वाले ने नहीं की या क्यों नहीं करते। पर चैनल, मीडिया संस्थान और यू ट्यूबर में अंतर है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब केंद्र सरकार की कार्यशैली के कारण है और इससे संबंधित एक खबर आज द टेलीग्राफ में है। इसके अनुसार एनसीईआरटी ने अंग्रेजी माध्यम की कई किताबों के नाम हिन्दी में रख दिये हैं। कोई भी इसे हिन्दी थोपना या हिन्दी को बढ़ावा देना कहेगा पर मुझे लगता है कि इसकी जरूरत नहीं है। इस संबंध में द टेलीग्राफ की यह खबर पढ़ने लायक है।

आज हिन्दुस्तान टाइम्स और द हिन्दू की लीड का शीर्षक लगभग वही है जो अमर उजाला का है, टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक थोड़ा अलग और सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्यपाल के प्रति थोड़ा सख्त है। राज्यपाल की मंजूरी के बिना 10 कानून लागू के मुकाबले यह स्थिति ज्यादा गंभीर है और राज्यपाल से जो करवाया गया और उन्हें जिस तरह राजनीति में घसीटा गया उसपर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न सिर्फ आम लोगों के जानने लायक है बल्कि उन्हें भी जानना चाहिये जो राज्यपाल हैं, बनाते हैं, बन सकते हैं और किसी को बनाना चाहते हैं। हम जानते हैं कि तमिलनाडु के राज्यपाल ने अगर विधानसभा द्वारा पास विधेयकों को सहमति देने में देरी की तो सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सहमति दिया घोषित कर दिया है और आज की बड़ी खबरों में एक खबर यह भी है कि पहली बार राज्यपाल या राष्ट्रपति की सहमति के बिना कोई कानून लागू हुआ है। इसके साथ आज यह भी तथ्य है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राज्यपाल को लगे कि कोई विधेयक असंवैधानिक है तो राष्ट्रपति को उसपर सहमति देने से पहले सुप्रीम कोर्ट की राय लेनी चाहिये। तकनीकी मामला ये हो सकता है कि नहीं देना हो तो क्या हो और देने से पहले सुप्रीम कोर्ट की राय ली जानी चाहिये। पर मेरा मुद्दा वह नहीं है। मैं यह याद दिलाना चाहता हूं कि संसद से हाल में पास वक्फ संशोधन विधेयक को राष्ट्रपति ने तुरंत सहमति दे दी और खबर छप गई कि यह कानून बन गया। दूसरी ओर, इसके खिलाफ कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दखिल की गई हैं और सुनवाई निर्धारित है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से सलाह की होती तो क्या होता। पर वह खबर नहीं है। खबर तो यह है कि वक्फ संशोधन विधेयक के कानून बन जाने का विरोध हो रहा है और बंगाल सरकार के लिए यह प्रशासनिक परेशानी का कारण है। सामान्य समझ है कि कानून जल्दबाजी में नहीं बना होता, विरोध पर चर्चा हुई होती और सरकार आम लोगों (प्रभावित पढ़ा जाना चाहिये) को साथ लेकर चल रही होती तो आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ती। अगर सरकार की छवि यह बनी होती कि एक बार बन गया कानून किसी भी हालत में यह सरकार वापस नहीं लेगी तो भी विरोध नहीं होता। लेकिन किसान कानून को वापस लेकर सरकार ने बता दिया है कि कानून वापस करवाने का तरीका क्या है ऊपर से प्रधानमंत्री इसे अपनी तपस्या में कमी मान चुके हैं और सुधार अभी तक नहीं हुआ है। इसलिये कहा जा सकता है कि स्थिति खराब है सरकार जो करती है उससे समस्या खड़ी होती है और जो देख (या रोक) सकता है उसे अपना काम करने के बारे में सोचना चाहिये। आज की खबरों का संदेश यही है भले अखबारों ने इसे साफ तौर पर नहीं कहा हो।
जनहित के खिलाफ और जनविरोधी कानून बनाकर भी सरकार अगर ईवीएम और मतदाता सूची जसी चुनावी कोशिशों से जीतकर समझ रही है कि ऐसे कानूनों से उसकी लोकप्रियता पर असर नहीं पड़ रहा है और इसलिये अगर प्रधानमंत्री यह कह सकते हैं कि सत्ता के लिए लालायित लोग केवल परिवार के हितों को आगे बढ़ाते हैं तो यह देखा जाना चाहिये कि जनता की सेवा या देश की चौकीदारी करने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री, उनकी सरकार और उनके सहयोगी संगठन क्या कर रहे हैं या क्या किया है। इस लिहाज से आज एनसीईआरटी वाली द टेलीग्राफ की खबर के अलावा आज नवोदय टाइम्स की लीड उल्लेखनीय है, आंधी में उड़ गये आईजीआई के इंतजाम। इस खबर की खास बातें जो हाइलाइट की हुई है, इस प्रकार है। 450 से अधिक उड़ानों में देरी, 27 डायवर्ट और 07 रद्द। मुझे लगता है कि आज के अखबारों के लिए यह भी बड़ी खबर है। संभव है कि हेडलाइन मैनेजमेंट के कारण खबर पहले पन्ने पर नहीं हो और नेशनल हेराल्ड के खिलाफ ईडी की कार्रवाई को जगह मिल गई जैसे बहुत बड़ा घोटाला था। सच्चाई यह है कि सरकार विपक्ष के प्रमुख मीडिया संस्थान को स्वतंत्र रूप से काम नहीं करने देना चाहती है। इस मामले में तथ्य जो भी हों, सरकार जब यू ट्यूब चैनल से परेशान है तो नेशनल हेराल्ड से क्यों नहीं होगी। जहां हवाई यातायात की व्यवस्था आंधी में उड़ जाने का मामला है मित्र अनिल पोद्दार उसी दिन भुवनेश्वर से दिल्ली पहुंचे। उन्होंने बताया, हम 13 व्यक्तियों के समूह में 11 अप्रैल को एयर इंडिया की उड़ान संख्या 2490 से भुवनेश्वर से नई दिल्ली आ रहे थे। उड़ान दो घंटे लेट थी और 12 अप्रैल को रात 12.36 बजे दिल्ली उतर सकी। इसके बाद टी3 की जगह टी1 पर पहुंचने में 15-20 मिनट लगे। लगभग 12.55 बजे विमान के पार्किंग के बाद 80-90 मिनट (जी हां, करीब डेढ़ घंटे) हम विमान में बैठे रहे क्योंकि यात्रियों को विमान से टर्मिनल बिल्डिंग तक लाने के लिए बस नहीं थी। इसके बाद सामान पहुंचने में भी इतना ही समय लगा। सामान लगभग 3.35 बजे पहुंचा। बेल्ट के आस-पास यात्रियों की मदद के लिए कोई नहीं था। एक व्यक्ति जो वहां मौजूद था, वह कुछ बताने की स्थिति में नहीं था। पूरी अराजकता थी और यात्रियों को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस मामले की जांच होनी चाहिए और एयर इंडिया की ओर से की गई इस घोर लापरवाही के लिए यात्रियों को हर्जाना दिया जाना चाहिये।

इससे आप समझ सकते हैं कि आम आदमी के लिए सरकारी सुविधाओं का व्यवस्थाओं की तो छोड़िये, कोई देखने-सुनने वाला नहीं है। अखबारों में खबर छपने पर कार्रवाई होती हो या नहीं, महसूस होता था कि शिकायत सार्वजनिक है अब सभी जिम्मेदार लोगों को मालूम हो जायेगी। पर अब ऐसा भी नहीं होता है। मालूम होना और कार्रवाई तो बहुत दूर। पता नहीं एयर इंडिया (विमानन मंत्रालय) ने यात्रियों को हुई असुविधा के लिए एक्स पर भी खेद जताने की जरूरत समझी या नहीं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार की कार्रवाई के कारण अगर पश्चिम बंगाल परेशान है तो उसकी भी खबर छपी है। आज हिन्दुस्तान टाइम्स ने इसे टॉप पर चार कॉलम में छापा है। तीन लोगों की मौत की खबर है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार हाईकोर्ट ने केंद्रीय बल तैनात करने के आदेश दिये हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, नजरअंदाज नहीं कर सकते… गंभीर, चंचल स्थिति। मुझे नहीं पता यह आदेश किसकी अपील पर है और क्यों है तथा मणिपुर के मामले में किसी कोर्ट का ऐसा कोई आदेश है या नहीं। बंगाल के मामले में हाईकोर्ट के जज को भाजपा का टिकट मिलना और उनका सासंद होना तो सर्वविदित है सुप्रीम कोर्ट ने भी डॉक्टर की हत्या और उसके बाद के आंदोलन के मामले में वर्षों बाद स्वतः संज्ञान लिया था। इसलिए यह खबर बड़ी है पर मणिपुर की खबर की ही तरह डबल इंजन पर सवाल होकर गायब हो गई है। दि एशियन एज की खबर के अनुसार तीन मौतों के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्य मंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि बंगाल में यह अधिनियम लागू नहीं किया जायेगा। इसके साथ भाजपा का भी पक्ष छपा है। यह मुख्य खबर के साथ सिंगल कॉलम की खबर के रूप में है। इसके अनुसार भाजपा ने कहा है कि मुख्यमंत्री (दीदी) विरोध के नाम पर हिन्दू विरोधी हिंसा को उकसा रही है। मुझे नहीं लगता कि इसमें कौन क्या कर रहा है और क्या चाहता है यह समझना मुश्किल है और किसी को समझने में कोई असुविधा होगी या एंटायर पॉलिटिकल साइंस की डिग्री जरूरी है। भाजपाई प्रधानमंत्री जब सीधे हिन्दू-मुसलमान और तुष्टीकरण संतुष्टीकरण करते रहे हैं तो जल्दबाजी में विधेयक लाने और उसे पास कराने का मकसद समझना मुश्किल नहीं है। इस बारे में ऊपर लिख भी चुका हूं। खबरों से यह स्पष्ट हो चला है कि बिहार बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव जीतने की कोशिश में भाजपा अपने स्तर पर अपनी शैली में तैयारी कर रही है और अखबारों की खबरों से पता चल रहा है कि कौन खबरें दे रहा है और कौन प्रचार कर रहा है। बिहार के लिए चल रही तैयारियों की खबरें छपती रहती हैं आज दि एशियन एज ने पूछा है, बिहार में दलित वोट के लिए आंबेडकर से संबंधित आयोजन हो रहे हैं? ऐसे राहुल गांधी ने अगर कहा है कि उन्हें सत्ता की ताकत से लड़ना पड़ रहा है तो गलत नहीं है। आजतक डॉट इन के अनुसार, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा है कि कांग्रेस का इतिहास उन सभी ताकतों को प्रोत्साहित करने का रहा है जो कमजोर भारत चाहते हैं। सत्ता के लिए उनके लालच का मतलब देश की अखंडता से समझौता करना और लोगों के विश्वास को धोखा देना था। बेशक यह भाजपा या भाजपा अध्यक्ष की राय हो सकती है पर सत्ता के लिए राहुल गांधी और कांग्रेस को क्या करना चाहिये यह बताने वाले तमाम लोग हैं और तमाम सुझाव रोज इधर उधर दिखते हैं। वैसे भी जिस पार्टी ने अपना नेतृत्व ही भाजपा के हिसाब से पप्पू को सौंप रखा है उसके बयान या चाल से भाजपा को परेशान होने का कोई मतलब नहीं है और परेशानी ही साबित करती है कि राहुल गांधी के कहे में ताकत है। हालांकि यह अलग मुद्दा है।


