आशीष मिश्रा-

अगर आप बलात्कारी बाबा होते तो पूज्य होते और सरकार हाथ डालने में सौ बार सोचती।
आप किसी जाति और धर्म के नरसंहार के लिए उकसाने वाले नेता होते, तो आप अगले चुनाव के लिए तमाम पार्टियों के लिए उपयोगी व्यक्ति होते।
आप सोशल मीडिया पर सिर्फ़ बदलाव की लफ़्फ़ाज़ी करते रहते, तो भी आपके लिए हज़ारों लोग बोलते।
लेकिन साथी, आपने लाखों-लाख मज़दूरों का भाग्य बदल देने का जो दुर्गम रास्ता चुना है, उसमें आपको घृणाजीवियों की घृणा ही मिलेगी।
इस एनबीटी उर्फ नवभारत टाइम्स ने आपके लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, इसे अपना सम्मान समझिए। सरकार, पूँजी और मीडिया का यह गठबंधन कोई छिपी हुई चीज़ नहीं है। इनसे यही अपेक्षा थी, ये सही साबित हुए।
लेकिन हम आपकी भूमिका समझते हैं। आप हमारे वैचारिक साथी और हमारे नायक हैं।
जो मिल जाए उसी को मास्टर माइंड घोषित कर दो..!
हरामखोर..! मेहनत कर! फिर मालूम चल जाएगा कि यह सॉफ़्टवेयर इंजीनियर है l मैं व्यक्तिगत रूप से परिचित हूं। तुम जिसे मास्टर माइंड घोषित कर रहे हो वो एक पढ़ा लिखा स्वप्नदृष्टा है। क्रांतिकारी हैं। सामाजिक बदलाव के क्रांतिकारी। आज अगर हमारे शहीद आज़म रहते तो उन्हें भी संघी सरकार मास्टर माइंड घोषित कर देती। -राजन आनंद
हुज़ूरे आला, अगर मज़दूरों ने कोई गुनाह किया है तो उसमें मुझे भी शामिल समझा जाए। मैं अनेक बार मज़दूर आंदोलनों में शामिल रहा हूँ। अनगिनत बार आपके ख़िलाफ़ उनके विद्रोह भड़काने वाली कविताएँ साझा की हैं। मेरे पास ‘मज़दूर बिगुल’ का सब्सक्रिप्शन है। मैं ज़्यादातर उसे पढ़ नहीं पाता, लेकिन पैसा इसलिए देता हूँ कि मज़दूरों में आपके ख़िलाफ़ खड़े रहने का हौसला बना रहे।
आप मज़दूर नेताओं को पकड़ सकते हैं, हमारा क्या करेंगे! हमारे जैसे लाखों हैं, उनकी लड़ाई को अपनी लड़ाई समझने वाले हैं, उनका क्या बिगाड़ लेंगे! आपको अपनी सत्ता पर भरोसा है, हमें अपने संघर्ष के इतिहास और साहस पर विश्वास है।
आप कुछ भी कर लें, हम जिसे न्याय समझते हैं, उसके लिए आख़िरी साँस तक लड़ते रहेंगे।

इंजीनियर से जनसंघर्ष तक: आदित्य आनंद की कहानी

एक नौजवान की यात्रा—पढ़ाई, प्रगतिशील विचार, मज़दूरों के हक़ की लड़ाई और गिरफ्तारी के पीछे का पूरा संदर्भ
आज जब आदित्य आनंद को “मास्टरमाइंड” बताकर गिरफ्तार किया गया है, तो ज़रूरी है कि इस पूरे मामले को केवल पुलिस के दावों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में समझा जाए।
आइए प्रकाश डालते हैं आदित्य आनंद के जीवन के कुछ खास तथ्यों पर :
आदित्य आनंद बिहार के हाजीपुर का रहने वाला एक पढ़ा-लिखा नौजवान है, जिसने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT), जमशेदपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और बाद में नोएडा व गुरुग्राम में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया। वह उन युवाओं में से है जो केवल करियर तक सीमित नहीं रहते, बल्कि समाज के सवालों से जुड़ते हैं।
नोएडा पुलिस के अनुसार, आदित्य आनंद को नोएडा में हुई हिंसात्मक कार्रवाई में “मास्टरमाइंड” बताया जा रहा है। लेकिन इन आरोपों की सत्यता अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।
दूसरी ओर, उसके भाई केशव आनंद का कहना है कि आदित्य को हिरासत में लेकर एक कमरे में बंद कर कई लोगों द्वारा पीटा गया। परिवार का यह भी कहना है कि अब तक उन्हें केवल एफआईआर की एक प्रति दी गई है और पूरी जानकारी साझा नहीं की गई। साथ ही, उसे “पाकिस्तान कनेक्शन” और “अर्बन नक्सल” जैसे शब्दों से जोड़कर पेश करने की कोशिश की जा रही है।
इन सबके बीच सबसे अहम बात आदित्य आनंद की अपनी भूमिका है। उपलब्ध तस्वीरों और बयानों से यह स्पष्ट होता है कि उसने मज़दूरों के बीच हमेशा शांतिपूर्ण संघर्ष की ही बात की है।
हड़ताल के बारे में आदित्य आनंद ने कहा और मजदूरों को शपथ दिलाई कि— “हम अपनी यह हड़ताल बिल्कुल ही शांतिपूर्ण तरीके से चलाएंगे, हम किसी भी तरीके का हिंसा नहीं करेंगे। हम चाहते हैं कि पुलिस प्रशासन हमारा साथ दे और हमारी जायज़ मांगों को पूरा करने में मदद करे।”
आज गुरुग्राम-मानेसर से लेकर नोएडा तक मज़दूर अपनी जायज़ माँगों—न्यूनतम वेतन 30,000 रुपये, 8 घंटे का कार्यदिवस, ओवरटाइम का डबल भुगतान, सस्ती कैंटीन सुविधा और ठेका प्रथा के अंत—को लेकर सड़कों पर हैं।
आदित्य आनंद को जानने वाले बताते हैं कि वह एक प्रगतिशील और जनपक्षीय सोच रखने वाला व्यक्ति है। वह मजदूरों और आम जनता के अधिकारों की बात करता है, पूँजीवादी शोषण और असमानता का विरोध करता है और ठेका प्रथा के खिलाफ खड़ा होता है। वह बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने और युवाओं के बीच जागरूकता फैलाने जैसे कामों से भी जुड़ा रहा है। नौजवानों के बीच उसकी भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह केवल रोजगार नहीं, बल्कि सोचने और सवाल करने की दिशा देने की कोशिश करता है। आदित्य आनंद के प्रेरणा स्त्रोत भगत सिंह जैसे वैचारिक क्रांतिकारी रहे हैं और वो अपने आपको भगतसिंह की विरासत के लोग बताते हैं । ऐसी परम्परा के वारिस जहाँ अन्याय के खिलाफ खड़ा होना एक जिम्मेदारी माना जाता है। आदित्य आनंद जैसे लोग, जो स्थानीय स्तर पर मजदूरों के हक़ की बात करते हैं और व्यापक स्तर पर अन्याय और युद्ध के खिलाफ खड़े होते हैं, एक ऐसे दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हैं जो समाज को समग्र रूप में देखता है। उनका विरोध किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से है जो असमानता और शोषण को जन्म देती है।
आज अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव और ग़ज़ा में जारी हिंसा पूरी दुनिया के सामने गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। आदित्य का मानना है कि ऐसे समय में युद्ध और निर्दोष लोगों पर हो रही हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाना एक मानवीय जिम्मेदारी है और आदित्य इस जिम्मेदारी को निभाते नजर आए हैं।
आज यह मामला सिर्फ़ एक गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि इस सवाल का है कि समाज में असहमति और प्रतिरोध की क्या जगह है।
अंततः सच्चाई अदालत तय करेगी, लेकिन यह समाज तय करेगा कि वह किन मूल्यों के साथ खड़ा होना है—शोषण और चुप्पी के साथ या न्याय, सवाल और बराबरी के साथ। अफवाहों से बचें और तथ्यों को अपने स्तर पर ढूंढने की कोशिश करें।


