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मोदी सरकार में हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते!

Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

कोई भी व्यावसायिक मीडिया बिना चोरी, छिछोरी, काला धन और कमीनेपन के नहीं चल सकता। एनडीटीवी भी नहीं। विरोध भी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई भी व्यावसायिक घराना निष्पक्ष अखबार या चैनल नहीं चला सकता। निष्पक्ष होने के लिए काले धन और व्यवसाय से विरक्त होना पड़ेगा। नेहरु ने इस खतरे को समझ लिया था और कहा था कि अखबार को कोआपरेटिव सोसाईटी या ट्रस्ट के तहत ही चलाया जाना चाहिए। नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, कौमी आवाज़ का प्रयोग भी उन्होंने किया था। जो मिस मैनेजमेंट और मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ गया। हिंदू और ट्रिब्यून जैसे अखबार आज भी ट्रस्ट के तहत प्रकाशित होते हैं तो वहां कुछ खबर के सरोकार शेष हैं, कर्मचारियों के शोषण में कुछ अतिरेक नहीं है। अकबर इलाहाबादी याद आते हैं:
तीर निकालो न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो
तो एनडीटीवी न तीर है, न तलवार, न तोप। किसी गैंग की तरह एकपक्षीय और लाऊड खबर की तलब में डूबा, सत्ता विरोध के खबर की आड़ में काले धन की खेती करता है एनडीटीवी भी। मनी लांड्रिंग और फेरा जैसे आरोपों में घिरा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाले में गले तक हिस्सेदार है। सिर्फ़ साफ सुथरी, हिप्पोक्रेसी भरी बातें करने से, सेक्यूलरिज्म का ताश फेंटने से, सत्ता विरोध की नकली हुंकार से ही कोई साफ सुथरा नहीं हो जाता। एनडीटीवी के सत्ता विरोध का एक हिस्सा और जान लीजिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी इस के सरपरस्तों में से एक हैं। वाम नेता वृंदा करात प्रणव रॉय की बीवी राधिका रॉय की बहन हैं। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि की दलाली की दुकान एनडीटीवी से ही तो संचालित होती थी कांग्रेस राज में। आप लोग इतनी जल्दी भूल गए? आदि-इत्यादि बहुत से किस्से हैं। फिर कभी।

अभी बस इतना ही जानिए कि सभी मीडिया घरानों की तरह एनडीटीवी भी पाप और भ्रष्टाचार का घड़ा है, काले धन के कारोबार पर टिका है। सो इस के पक्ष में अपनी भावना और ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट करने से बचें। जो हो रहा है, होने दें। इसलिए भी कि यह मोदी विरोध की कीमत नहीं है, काले करतूत की कीमत है। इसका ही तकाज़ा है। बस इतना समझ लीजिए कि मीडिया होने की ताकत में एनडीटीवी का बहुत कुछ सड़ा हुआ सामने आने से बचा हुआ है। मोदी सरकार में हिम्मत नहीं है। हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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