समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो चुकी है… देखें इंटरव्यू भाग-दो

चर्चित आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव को एनडीटीवी के आर्थिक घपलों को पकड़ने के कारण बहुत प्रताड़ित किया गया. इस अफसर के पास एनडीटीवी की पूरी कुंडली है. भड़ास से बातचीत में एसके श्रीवास्तव ने खुलासा किया था कि मनमोहन राज में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने NDTV पर छापा डालने जा रहे इनकम टैक्स अफसरों को रोक दिया था.

IRS अफसर एसके श्रीवास्तव से भड़ास संपादक यशवंत सिंह की बातचीत का दूसरा पार्ट हाजिर है…. इस वीडियो के जरिए जानिए… आखिर प्रणय राय और पी. चिदंबरम में इतनी तगड़ी यारी के पीछे का कारण क्या है… -एनडीटीवी प्रबंधन में दम है तो वह कंपनी के संकट और कालेधन से रिश्ते को लेकर पब्लिक डिबेट करा ले…. -प्रणय राय कंपनी को लूट खा गए, अब एनडीटीवी को इसके मीडियाकर्मियों के हवाले कर देना चाहिए….-समय बीतने के साथ एनडीटीवी की मानहानि की कीमत कम होती गई और अब शून्य हो गई है… वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

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प्रणय राय की काली कमाई की पोल खोल दी इस IRS अधिकारी ने, देखें वीडियो

प्रणय राय अपना अफ्रीका वाला फार्म हाउस गिरवी रख देते तो सैकड़ों कर्मचारियों की नौकरी बच जाती… 

Yashwant Singh :  आपको मालूम है, प्रणय राय ने काली कमाई से अफ्रीका में सैकड़ों एकड़ का फार्म हाउस खरीद रखा है जिसमें ऐय्याशी के सारे साजो-सामान उपलब्ध है. प्रणय राय ने गोवा में समुद्र किनारे बंगला खरीद रखा है. दिल्ली और देहरादून में बंगले खरीद रखे हैं. एक हेलीकाप्टर भी खरीदा हुआ है. अगर वो सिर्फ अफ्रीका का अपना सैकड़ों एकड़ वाला रैंच या गोवा का सी-बीच वाला बंगला गिरवी रख दें तो सैकड़ों करोड़ रुपया मिल जाएगा. इस पैसे से वह एनडीटीवी की माली हालत ठीक कर सकते थे. सैकड़ों कर्मियों का ‘कत्ल’ करने से बच सकते थे.

लेकिन जिस शख्स का इरादा सिर्फ अपना फायदा देखना हो, वह अपने कर्मियों का हित क्यों देखेगा. सरोकारी पत्रकारिता का दावा करने वालों की कलई एक आईआरएस अधिकारी ने खोली. ये वही अधिकारी हैं जिन्हें मीडियाा हाउस और सत्ता ने मिलकर पागलखाने भिजवा दिया था, क्योंकि इनने एनडीटीवी के घपले-घोटाले-काली कमाई के सारे दस्तावेज एकत्र कर लिए थे. कल उनसे मैंने विस्तार से बातचीत की. इंटरव्यू का पहला पार्ट आज रिलीज कर रहा हूं. दूसरे और तीसरे पार्ट को क्रमश: कल परसों अपलोड किया जाएगा. आप ध्यान से पूरे वीडियो को देखें-सुनें. वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी के बुरे दिन : इनकम टैक्स विभाग ने चैनल के शेयर जब्त कर लिए

कभी कांग्रेस के यार रहे एनडीटीवी और प्रणय राय के दिन इन दिनों भाजपा राज में बुरे चल रहे हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन केंद्र सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे पी. चिदंबरम व एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय की मिलीभगत से ईमानदार इनकम टैक्स अधिकारी संजय कुमार श्रीवास्तव को प्रताड़ित करते हुए पागलखाने तक भिजवा देने का पाप अब असर दिखाने लगा है. इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के शेयर जब्त कर लिए हैं.

दरअसल इनकम टैक्स विभाग के अफसर संजय कुमार श्रीवास्तव ने अपने कार्यकाल में प्रणव राय और पी चिदंबरम की मिलीभगत से 2जी स्कैम के पैसे को हवाला के जरिए ब्लैक से ह्वाइट करने समेत कई किस्म के गड़बड़ घोटाले पकड़े थे जिसके कारण संजय को बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया. इन्हें पागलखाने तक भिजवा दिया गया. इनके उपर कई फर्जी केस लगवा दिए गए. अब एनडीटीवी और प्रणय राय को उन्हीं पापों की सजा भुगतनी पड़ रही है. पी चिदंबरम भी अपने पुत्र के लगातार केंद्रीय एजेंसियों के जाल में फंसते जाने को लेकर एक तरह से उसी पाप की सजा भुगत रहे हैं.

एनडीटीवी के साथ ताजा प्रकरण ये हुआ है कि इनकम टैक्स विभाग ने एनडीटीवी के स्वामित्व वाली कंपनी आरआरपीआर होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड के सभी शेयर अस्थायी तौर पर जब्त कर लिए हैं. मीडिया कंपनी ने शेयर बाजारों को भेजी सूचना में यह जानकारी दी है. कंपनी के पास कुल 1 करोड़ 88 लाख 13 हजार 928 शेयर हैं जो कुल शेयर का 29.12 प्रतिशत हिस्सा है. आरआरपीआर न्यू दिल्ली टेलिविजन लि. में सबसे बड़ी प्रवर्तक समूह की कंपनी है. यह कंपनी एनडीटीवी 24X7, एनडीटीवी इंडिया और एनडीटीवी प्रॉफिट न्यूज चैनलों का संचालन करती है.

कंपनी की तरफ से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज को बताया गया है कि उसे इनकम टैक्स के डिप्टी कमिश्नर की ओर से 25 अक्टूबर को एक पत्र प्राप्त हुआ है, जिसमें कहा गया है कि आयकर कानून, 1961 की धारा 281बी के तहत अस्थायी तौर पर आरआरपीआर की कंपनी में पूरी हिस्सेदारी कुर्क की जा रही है. यह हिस्सेदारी 1.88 करोड़ इक्विटी शेयरों की बैठती है.

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क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए कॉरपोरेट तख्तापलट की कोशिश की जा रही है?

Sanjaya Kumar Singh : क्या एनडीटीवी पर नियंत्रण के लिए क्या कॉरपोरेट तख्ता पलट की कोशिश की जा रही है? शुक्रवार की सुबह एनडीटीवी के बिक जाने की खबर पढ़कर मुझे याद आया कि प्रणय राय को अगर कंपनी बेचनी ही होती तो वे आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपए के लिए पड़े सीबीआई के छापे के बाद प्रेस कांफ्रेंस क्यों करते। क्यों कहते कि झुकेंगे नहीं। मुझे इंडियन एक्सप्रेस की खबर पर यकीन नहीं हुआ।

मैंने पूरी खबर पढ़ी और अंदर मिल गया कि इसकी पुष्टि नहीं हुई है और स्पाइस जेट के अधिकारी ने तो खबर को पूरी तरह गलत और निराधार कहा था। इसके बावजूद इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर छापी थी तो कारण सूत्र पर भरोसा होगा और इसके पक्ष में तर्क यह था कि एनडीटीवी ने इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मेरे हिसाब से ऐसी खबरों के सही होने की संभावना आधी-आधी ही रहती है। इसलिए मैं अगर ब्रेकिंग चलाने की जल्दी ना हो तो इंतजार करना पसंद करता हूं। दोपहर तक स्पष्ट हो गया कि इंडियन एक्सप्रेस चूक गया था। मेरा मानना है कि इस तरह गलत खबर प्लांट करने या कराने की कोशिश करने वालों को सबक सीखाना चाहिए पर अब नहीं लगता कि वैसे दिन कभी आएंगे। हालांकि वह अलग मुद्दा है।

शाम तक मुझे समझ में आ गया कि हो ना हो यह एनडीटीवी में तख्ता पलट की कोशिश चल रही होगी। देश में कॉरपोरेट तख्ता पलट का पहला और संभवतः सबसे चर्चित मामला अनिवासी भारतीय स्वराज पॉल और देसी उद्योग समूह डीसीएम तथा एस्कॉर्ट्स से जुड़ा था। डीसीएम यानी दिल्ली क्लॉथ मिल को तब खादी के बाद देसी कपड़ों यानी भारतीयता का प्रतीक माना जाता था। एस्कॉर्ट्स को उस समय उसके मालिक नंदा परिवार के लिए जाना जाता था। राजन नंदा दूसरी पीढ़ी के मालिक थे उनके पिता हर प्रसाद आजादी के समय पाकिस्तान से आए थे। राजन नंदा की पत्नी राजकपूर की बेटी ऋृतु हैं और उनके बेटे निखिल की शादी अमिताभ बच्चन की बेटी श्वेता से हुई है। यह विवरण ये बताने के लिए स्वराज पॉल ने किससे किसलिए पंगा लिया होगा और क्यों नाकाम रहे। एस्कॉर्ट्स समूह पर नंदा परिवार का नियंत्रण पांच से 10 प्रतिशत के बीच की हिस्सेदारी से था और नियंत्रण की इस कोशिश के बाद कई महीनों तक भारतीय उद्योग जगह में उत्सुकता औऱ चिन्ता छाई रही। आखिरकार स्वराज पॉल ने हथियार डाल दिए।

अब स्थिति थोड़ी अलग है। तख्ता पलट का उद्देश्य भी। एक मीडिया संस्थान जो सरकार के खिलाफ है उसे सरकार समर्थक ताकतें नियंत्रण में लेना चाहती हैं। तरीके वही आजमाए जा सकते हैं औऱ कल जो सब हुआ वह ऐसी ही कोशिश का हिस्सा लगता है। इसमें करना सिर्फ यह होता है कि बाजार से किसी कंपनी के इतने शेयर खरीद लिए जाएं कि जिसका नियंत्रण है उससे ज्यादा हो जाए या निदेशक मंडल में बहुमत हो जाए। यह आसान नहीं है पर तकनीकी रूप से संभव है। इसे कंपनी का बिकना नहीं कहा जाएगा पर स्थिति वैसी ही होगी। सैंया भये कोतवाल से यह संभव है। वैसे ही जैसे थानेदार अपना हो तो कितने भी पुराने किराएदार को भगा ही देगा। इसलिए मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। पिक्चर अभी बाकी है दोस्तों।

जनसत्ता समेत कई अखबारों में काम कर चुके और इन दिनों सोशल मीडिया पर बेबाक लेखन के लिए चर्चित पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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नए एनडीटीवी में भी यही होगा, बस तरीक़ा बदल जाएगा!

Harsh Vardhan Tripathi : लिखा जा रहा है कि मोदी-शाह के क़रीबी अजय सिंह ने NDTV ख़रीद लिया। तो पूरा लिखिए कि सीपीएम नेता प्रकाश करात के रिश्तेदार प्रणय-राधिका रॉय को 100 करोड़ रुपए इस बिक्री से मिलेंगे। 400 करोड़ रुपये का क़र्ज़ भी अजय सिंह चुकाएँगे। मेरा मानना है कि कारोबारी बेवक़ूफ़ नहीं होता कि सिर्फ ख़रीदकर बन्द करने के लिए चैनल ले रहा होगा। हाँ, यह जरूर है कि चैनल चलाना और हवाई जहाज़ चलाना एकदम अलग बात है।

टीवी चैनल के मालिक तो जहाज़ से भी ऊपर उड़ते रहे हैं। दोनों में घाटा ही घाटा होता है फिर भी मालिक की बल्ले-बल्ले होती है। देखिए ना, सैकड़ों कर्मचारियों को निकालने के बाद डॉ राय दम्पति को 100 करोड़ कैश मिल जाएगा। 20% हिस्सेदारी बनी ही रहेगी। लेकिन, अब पूरी खबर लिखने की आदत किसी को कहाँ रही है। अपने मतलब भर का वीओ और उसी को साबित करने वाली बाइट। ज़्यादा साबित करने के लिए अपने पसन्दीदा मेहमान के साथ प्राइम टाइम। नए एनडीटीवी में भी यही होगा, बस तरीक़ा बदल जाएगा। मुझे इस बिकने में अच्छा यह दिख रहा है कि कुछ नएके पत्रकारों को नौकरी मिल जाएगी।

Alok Kumar : NDTV बिक गया। एतराज का एक और सुर बंद हो जाएगा। बाजार की ताकत बेमिसाल है। एतबार के बीच कबीरा को बाजार में आना पडा। NDTV के editorial content के नए मालिक बीजेपी के करीबी एक उद्योगपति होंगे। कभी प्रमोद महाजन के ओएसडी रहे अजय सिंह ने रॉय दंपति को मुंह मांगा कीमत देकर NDTV का 40 फीसदी शेयर खरीद लिया। प्रणय रॉय और राधिका के पास अब बस बीस फीसदी शेयर रह गए।

Vishnu Nagar : तो क्या एनडीटीवी भी बिक गया भाजपा के हाथों? लगता यही है क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस ने यह ख़बर मुखपृष्ठ पर छापी है तो यह अखबार ऐसा नहीं है कि अफ़वाह को ख़बर बना दे! वैसे यह ख़बर अफ़वाह साबित हो जाए तो क्या बात है! तो भाजपा ने अपने खासमखास अजय सिंह -जो कि स्पाइसजेट के मालिक हैं -के ज़रिये खेल खेल दिया है ताकि मीडियावाले हल्ला करने की स्थिति में न रहें! भाजपा की दृष्टि से यह स्मार्ट मूव है चतुराईभरा खेल है। मगर क्या सारे चैनलों पर क़ब्ज़ा करना सचमुच स्मार्टनेस है? दूरगामी दृष्टि से सोचें-जिससे राजनीतिक दल सोच नहीं सकते-यह भाजपा के लिए घातक है। अगर हरेक का गला दबा दोगे, विरोध की सभी आवाज़ों को हर जगह से दबा दोगे तो अस्थायी जीत तो मिल जाएगी मगर पतन का रास्ता भी बहुत जल्दी खुल जाएगा। लेकिन हम-आप क्या कर सकते हैं? पूँजी और सत्ता के सामने हमारी एक कमज़ोर और बहुधा अकेली सी आवाज़ है, वह भी कब तक उठा सकेंगे, मालूम नहीं। लेकिन लोगों मानो या न मानो-चाहे मोदीभक्ति में आँखें मूँदे रहो- बहुत बुरे दिन आ चुके हैं सभी के लिए। उसके बाद जब सचमुच के (मोदीछाप नहीं) अच्छे दिन आएँगे तब तक काफ़ी बर्बादी हो चुकेगी। तो क्या एनडीटीवी के बढ़िया पेशेवर पत्रकारों से अलविदा कहने के दिन आ गये? हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों चैनलों के सारे बेहतरीन एंकर और संवाददाता क्या अब विदा! रवीश कुमार क्या विदा, सचमुच विदा?

Dilip Khan : NDTV ख़रीदने की ख़बरों के बीच देखिए कि SpiceJet वाले अजय सिंह को टाइमिंग की कितनी ज़्यादा समझदारी है। 1. पहली NDA सरकार में वो प्रमोद महाजन के साथ जुड़े। उस वक़्त प्रमोद महाजन का क्या रुतबा था, सब जानते हैं। राजनीतिक गलियारों में पैठ बनाई। परिवहन पर काम किया। मार्केट समझ लिया। 2. 2004 में SK मोदी के ModiLuft को ख़रीदा। नया नाम दिया- स्पाइसजेट। यूपीए-1 तक पूरा चलाया। घाटा हुआ। 3. फिर अगली बार 2009 में भी UPA की सरकार आ गई। 2010 में कलानिधि मारन (मुरासोली मारन का बेटा, दयानिधि मारन का भाई और करुणानिधि की बहन का पोता) के हाथों SpiceJet को बेच दिया। 4. कलानिधि मारन ने स्पाइसजेट को खूब विस्तार दिया। 2011-12 में जब घाटा हुआ तो मारन ने इसमें और पैसे झोंक दिए। स्पाइसजेट चल निकला। DMK सरकार में हिस्सेदार थी। परिवार के लोगों का रसूख था। स्पाइसजेट का विस्तार तो खूब हुआ, लेकिन 2013 के बाद मुनाफ़ा गिरने लगा। 5. इस बीच हवा भांपकर अजय सिंह फिर से बीजेपी के साथ हो चले। नरेन्द्र मोदी के चुनावी अभियान से जुड़ गए। मेहनत की। स्लोगन डिपार्टमेंट का सारा पैसा अजय सिंह ने पे किया। रिजल्ट आया। बीजेपी जीत गई। मोदी प्रधानमंत्री बन गए। 6. दिसंबर 2014 में जब लगातार पांच तिमाही SpiceJet को घाटा हुआ तो कलानिधि मारन और अजय सिंह के बीच फिर डील हुई। अब मोदी जी की सरकार थी। कमान अजय सिंह ही बढ़िया संभाल सकते थे। 7. जनवरी 2015 में अजय सिंह ने कलानिधि मारन से सारा शेयर ख़रीद लिया। SpiceJet तब से बम-बम कर रहा है। 8. अभी मोदी जी जब अमेरिका गए थे, तो अजय सिंह की कंपनी SpiceJet के लिए 100+ बोइंग विमान ख़रीदने का डोनल्ड ट्रंप से करार किया। एस के मोदी से अगर ModiLuft अजय सिंह नहीं ख़रीदे होते तो नरेन्द्र मोदी कैसे अमेरिका से SpiceJet की डील कर पाते!

Rakesh Kayasth : पूरी ख़बर आने पर ही असली बात ठीक से समझ में आएगी। लेकिन फिलहाल यही लग रहा है एनडीटीवी के मालिक डॉक्टर प्रणय रॉय अब उसी तरह पवित्र हो गये हैं जैसे नीतीश कुमार। पवित्र होने के लिए गंगा नहाना ज़रूरी नहीं है, वैसे भी क्योटो बहुत दूर है। अंबानी, अडानी या अजय सिंह जैसा कोई व्यक्ति अपना थोड़ा सा `पुण्य’ छिड़क दे, यही काफी है। सौ करोड़ रुपये लेकर डॉक्टर राय पूरी दुनिया में जहां चाहे वहां सेटेल हो सकते हैं। अपना पसंदीदा संगीत सुन सकते हैं, दुनिया के मशहूर विश्वविद्यालयों में लेक्चर दे सकते हैं या तीसरी दुनिया में मीडिया की स्थिति पर कोई चर्चित किताब लिख सकते हैं। वैसे 100 करोड़ में कोई छोटा जनपक्षधर मीडिया हाउस भी खड़ा हो सकता है। लेकिन बहुत झंझट का काम है। इतना सब देखने के बाद यकीनन डॉक्टर रॉय का मोहभंग हो गया होगा। क्या रखा है, इन पचड़ों में। यहां-वहां तैर रही आधी ख़बरें आजकल गलत भी साबित होती हैं। देखते हैं आगे क्या होता है।

Rajendra Tiwari : एनडीटीवी को लेकर एक बिजनेस डील हुई है। इसको लेकर हाय-तौबा क्यों? क्या इस डील में कुछ ऐसा दिखाई दे रहा है जो कानूनन वैध नहीं है। अपने यहां ऐसा कानून तो है नहीं कि दूसरे क्षेत्रों में बिजनेस इंटरेस्ट वाले मीडिया में न आ सकें। भाई, अगर ऐसा लग रहा है कि भाजपा समर्थक मीडिया पर काबिज हो रहे हैं तो भाजपा विरोधियों को किसी ने रोका है क्या? उनने रिपब्लिक शुरू किया तो आप डेमोक्रैटिक चैनल शुरू करो। वो एनडीटीवी पर काबिज हो रहे तो तुम किसी और के शेयर खरीदो….किसने रोका

Nadim S. Akhter : प्रणव रॉय, रजत शर्मा, राजीव शुक्ला और सुभाष चंद्रा ने शून्य से शिखर तक जाकर जिस तरह मीडिया अंपायर बनाया और उसे चला रहे हैं, उससे आप प्रेरणा ले सकते हैं। बाकी प्रणब रॉय को SPICE JET से डील में आम के आम और गुठली के भी दाम मिल गए हैं। नाम बना रहेगा और आर्थिक ज़िम्मेदारियों से भी छुटकारा मिला। कम से कम CNN IBN वाले राघव बहल और राजदीप सरदेसाई सा हाल तो नहीं होगा! और क्या चाहिए? बच्चे की जान लेंगे क्या? एक पुराने वरिष्ठ ने बताया था कि अगर दूरदर्शन ना होता तो ना तो NDTV होता और ना ही INDIA TV। ‘आज तक’ चैनल को भी उसमें कुछ हद तक जोड़ सकते हैं। सो नैतिकता का ज्ञान कृपया ना बघारें। बाजार में उतरेंगे तो इसी के नियम से चलना पड़ेगा। अब SNAPDEAL को अमेज़न खरीदे या फ्लिपकार्ट, क्या फ़र्क़ पड़ता है? हम दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है, जिधर चल देंगे रास्ता बन जायेगा। पत्रकार भी ऐसा ही होता है। मर्यादा में रहे तो सींचकर बस्तियां बसा दे और किनारा तोड़े तो तबाही ला दे।

सौजन्य : फेसबुक

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एनडीटीवी ने मुंह खोला- ‘नहीं बिके हैं हम!’

सुबह इंडियन एक्सप्रेस ने एनडीटीवी के बिकने की खबर छापकर तहलका मचाया तो दोपहर आते आते द हिंदू की वेबसाइट पर खबर आ गई कि एनडीटीवी ने बिकने से इनकार कर दिया है. दो बड़े अखबारों की इन दो अलग अलग विरोधाभासी खबरों से पूरे देश का मीडिया जगत हलकान रहा. फिलहाल द हिंदू की वेबसाइट पर प्रकाशित खबर पढ़ें और इसके ठीक बाद इस खबर को लेकर आईं नई प्रतिक्रियाओं को देखें…

NDTV denies reports of takeover by SpiceJet owner

“Not even a single sentence of these reports is true”, says a senior NDTV official

Special Correspondent

New Delhi , September 22, 2017

Sources in NDTV have denied reports of SpiceJet’s Ajay Singh taking over majority holding in the news channel. A formal statement on the issue is expected by Friday evening. It was reported that New Delhi Television Limited, one of the oldest news channels that was founded by Prannoy Roy and Radhika Roy in 1988, will change hands soon. The reports mentioned that the founders will be reduced as minority shareholders with merely 20 per cent shares, while Mr. Singh will have 40 per cent shares.

“Not even a single sentence of these reports is true,” a senior NDTV official told The Hindu.

The last few months have been eventful for NDTV. On June 5, the CBI raided the residences of the Roys. Calling them a “blatant attack on the freedom of the press,” NDTV, in a statement, said the CBI filed its FIR based on a “shoddy complaint” by a “disgruntled” former NDTV consultant, who has not obtained a “single order from the courts.”

In November last, former Information and Broadcasting Minister Venkaiah Naidu imposed a one-day ban on NDTV for its coverage of the Pathankot air base attack. The government claimed that NDTV imperiled national security by broadcasting the sensitive details about the air base. The ban was, however, put on hold after strong protests from the journalists’ union and the Supreme Court’s decision to hear NDTV’s plea.


सोशल मीडिया पर इस खबर पर आईं कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं यूं हैं…

Om Thanvi : पता चला है प्रणव रॉय ने एनडीटीवी के सहयोगियों से चैनल स्पाइस जेट को जाने की पुष्टि नहीं की है। चैनल की तरफ़ से अख़बारों को यह भी कहा जा रहा है कि बिक्री की ख़बर सही नहीं है। अगर ऐसा है तो मीडिया की आज़ादी के लिए चिंतित लोगों के लिए यह बड़ी राहत की बात होगी। फ़िलहाल इसमें रहस्य है कि एनडीटीवी के शेयर चंद रोज़ पहले अचानक कैसे उछले या क्या स्पाइस जेट ने चैनल के शेयर नहीं ख़रीदे हैं। बहरहाल, ख़बर ग़लत निकले तो निश्चय ही बहुत ख़ुशी की बात होगी।

Sanjaya Kumar Singh : मीडिया के लिए, मीडिया के बारे में, मीडिया के लोग… एनडीटीवी के बिकने और स्पाइस जेट के अजय सिंह द्वारा खरीदे जाने की खबर को हिन्दू ने गलत बताया है। एनडीटीवी के अधिकारियों के अनुसार इस संबंध में खबर की एक भी लाइन सही नहीं है। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस ने भी अपनी मूल खबर में लिखा है, When asked about the NDTV deal, a SpiceJet official said “it’s absolutely false and baseless.” Messages and emails sent to NDTV officials did not elicit any response. हालांकि एनडीटीवी या उसकी ओर से किसी ने कोई ट्वीट नहीं किया है। इसलिए मामला सीधा नहीं है। इसके बावजूद इकनोमिक टाइम्स ने लिखा है इस खबर से एनडीटीवी के शेयरों के भाव बढ़ गए हैं। और मनीकंट्रोल ने लिखा है, समाचार चैनल के शेयर मूल्य पांच प्रतिशत बढ़ जाने पर बांबे स्टॉक एक्सचेंज ने पूछा है कि इस संबंध में स्पष्टीकरण दे। चैनल क्यों दे? यह समझ में नहीं आया। एक्सप्रेस की मूल खबर में ही लिखा है कि खबर पक्की नहीं है। फिर भी भाई लोगों ने इसकी पुष्टि की और फैलाते रहे। नजीतन शेयर बाजार से कमाने वालों ने शेयर खरीदने के लिए लाइन लगा दी और कीमत बढ़ गई तो चैनल से ही पूछा जा रहा है कि सच क्या है। स्क्रॉल डॉट इन हिन्दू के हवाले से एनडीटीवी ने अधिग्रहण की खबरों से इनकार किया है। कुल मिलाकर, अभी तक मामला यह है कि बिकने पर एनडीटीवी की चुप्पी से उसके शेयरों के भाव बढ़ रहे हैं और उससे कहा जा रहा है बोलो, बोलते क्यों नहीं कि बिक गए। इस बीच एक खबर यह भी है कि अजय सिंह एनडीटीवी को नियंत्रण में लेने के लिए तैयार हैं। तैयार तो बहुत लोग बहुत समय से हैं। पर….

Pankaj Chaturvedi : एनडीटीवी मना कर रहा है कि उसे किसी ज़हाज वाले ने ख़रीदा है, लेकिन चम्पू स्यापा कर रहे है… कब तक दूसरों का बेनर उठा कर क्रांति करोगे, दम हो तो सारे गोदी चेनल देखना बंद करो दो… शहर शहर उनको ना देखने का आन्दोलन चलाओ.. लेकिन जब घर बैठ कर माउस के कीबोर्ड से बकलोल क्रांति हो सकती है तो कौन कुछ सार्थक सडक पर करे? इसी निकम्मेपन और सरकारी पैसे पर आरामतलबी का खामियाजा देश आज भयंकर साम्प्रदायिकता और निरंकुशता के रूप में भुगत रहा है… वक़्त कागज काले करने या क्लब में गला साफ़ करने का नहीं– अरे वहाँ तो आप उन्हें ज्ञान देते हो जो पहले से यह जानते हैं– तनिक बस्ती, पटरी, पगडण्डी का रुख करों– वरना आप केवल बकलोल हो..

Anil Bhaskar : बिक गया NDTV..  यह शोर सोशल के साथ वेब मीडिया पर भी खूब मचा है। उधर प्रणय रॉय बेचने की पुष्टि नहीं कर रहे तो कथित ख़रीदार अजय सिंह साफ़ कह रहे- हमने तो नहीं ख़रीदा। इसे कहते हैं, बेगानों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना। लगे रहो मुन्ना भाई…..

Aditya Pandey : प्रणय रॉय कह रहे हैं कि एनडीटीवी ‘अजय सिंह के हाथों’ नहीं बिका है, हमें एक घंटे का भी चैनल चलाना पड़ा तो चलाएंगे… सर, वैसे अब आपको ‘द वर्ल्ड दिस वीक’ के लिए रामायण और महाभारत के स्लॉट से ज्यादा पैसे चुकाने वाले घोष अंकल दूरदर्शन में नहीं हैं… फिर भी 600 करोड़ की डील और सौ करोड़ ‘रनिंग’ की खबर गलत है तो तत्काल इंडियन एक्सप्रेस पर केस करें और यह भी बताएं कि आखिर क्यों और कैसे एनडीटीवी का शेयर पिछले 15 दिनों में दोगुना तक बढ़ गया?

Nadim S. Akhter : NDTV के बिकने वाली खबर अगर इंडियन एक्सप्रेस के रिपोर्टर ने गलत दी है, तो मुझे एक्सप्रेस के संपादक से सहानुभति नहीं, उनकी समझ पे अफसोस होगा। कई दफा रिपोर्टर सूत्र के हवाले से पक्की खबर देता है लेकिन खबर कितनी पकी-पकाई है, ये रिपोर्टर और संपादक के बीच छुपा होता है। कई दफा सूत्र धोखा दे देते हैं या जानबूझकर गलत जानकारी दे देते हैं। ऐसे हालात में रिपोर्टर और संपादक को अपने विवेक से काम लेना होता है कि जो बताया जा रहा है, वो सोलह आने सही है या आठ आने या फिर इस सूचना की औकात दो कौड़ी की भी नहीं है!! और ये सब समझ संपादक को अनुभव से आती है। सो अगर खबर बड़ी है और संपादक को उसे लेकर संशय है, तो हर हाल में वो खबर रोक लेनी चाहिए। विश्वनीयता से कोई समझौता नहीं। उम्मीद करता हूँ कि इंडियन एक्सप्रेस के अनुभवी संपादक से इतनी बड़ी चूक नहीं हुई होगी।

अगर कोई दानी पैसे लगाकर NDTV के कर्जे उतार दे, तो ये चैनल नहीं बिकेगा। कोई है? या फिर मुफ्त का ‘निष्पक्ष मीडिया’ चाहिए। चैनल चलाने में खर्चा आता है। आप तो 10 रुपये के आलू पे मोलभाव कर लेते हो, बेचारा चैनल का मालिक कहाँ जाए? या फिर सारा ज्ञान पत्रकारों के लिए है। पेट पे पत्थर बांध के कब तक चौथे खंभे का बोझ उठा लेगा??!! आपका तो एक महीने का TA-DA नहीं मिलता तो आसमान सिर पे उठा लेते हैं। उस बेचारे को तो मालिक भी मारता है, नेता भी कूचते हैं और पब्लिक भी दौड़ा लेती है। इसलिए NDTV को अगर बिकने से बचाना है तो अपनी बचत राशि का 5 फीसद बैंक एकाउंट में जमा कराएं। प्रणब रॉय से पूछकर एकाउंट नम्बर मैं दे दूंगा। देखते हैं कितने लोग आगे आते हैं! और, अगर ये नहीं कर सकते तो निष्पक्ष मीडिया के लिए छाती मत पीटिये। हार्ट अटैक आ जाएगा, दिल बहुत नाजुक होता है। मसला ये नहीं है कि पत्रकार बाजार के नियमों के मुताबिक चल रहा है। मसला ये है कि वो बाजार में उतरने के बाद भी इज़्ज़त बचाये हुए है या नहीं! बहुत महीन फ़र्क़ है लेकिन ये बहुत बड़ा फ़र्क़ है।

Avinish Mishra : इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा से ये उम्मीद नहीं थी.. मुझे जब भी लगता है पत्रकारिता में जो हम कर रहे हैं.. वो गलत है.. तब राजकमल झा का गोयनका अवार्ड के दौरान दिया गया भाषण सुनने लगता हूँ.. डिमोर्लाइज्ड हुआ हौसला फिर से वापस आने लगता है.. और फिर से पत्रकारिता के मूल रूप पर वापस आ जाता हूँ.. आज सुबह एक रिपोर्ट देखा जिसमें सत्यता के नाम पर कोरी अफवाह था.. जिस सूत्र के हवाले से ये ख़बर लिखी गयी थी.. शायद उस सूत्र को ये नहीं पता था.. की “अबकी बार मोदी सरकार” का नारा पीयूष पांडे ने लिखा था.. और जो सबसे अहम बात है की गोयनका जी के सिद्धांत की बात करने वाले इंडियन एक्सप्रेस शायद यह भूल गये की बिना पुष्टि किये ख़बर नहीं चलाया जाना चाहिए पत्रकारिता का सबसे मूल सिद्धांत है… मुझे उम्मीद है की अगर इस ख़बर का प्रमाणित तथ्य इंडियन एक्सप्रेस के पास नहीं है (जैसा की प्रणब राय ने पुष्टि किया है कि एनडीटीवी का शेयर अभी नहीं बेचा जा रहा है) तो राजकमल झा को सरेआम इंडियन एक्सप्रेस से माफी मंगवाना चाहिए.. और पत्रकारिता मूल्यों को फिर से बरकरार रखते हुए जनपक्षधर का विश्वास हासिल करना चाहिए… धन्यवाद !!

Ak Lari : नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ने इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के बारे में एनडीटीवी से स्पष्टीकरण मांगा है। Ndtv को बेचे जाने की खबर अफवाह है। न कोई एनडीटीवी को खरीद रहा है न ही बिक रहा है। प्रणव राय ने कहा है कि अगर हमें एक घण्टे का भी चैनल चलाना पड़ा तो हम चलाएंगे।

मूल खबरें ये हैं…

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बिकने के बाद भी एनडीटीवी में काम करेंगे रवीश कुमार?

Ashwini Kumar Srivastava :  ”अब तेरा क्या होगा रवीश कुमार…” एनडीटीवी पर भी कब्जा कर चुके मोदी-अमित शाह और उनके समर्थक शायद ऐसा ही कुछ डॉयलाग बोलने की तैयारी में होंगे। जाहिर है, रवीश हों या एनडी टीवी के वे सभी पत्रकार, उनके लिए यह ऐसा मंच था, जहां वे बिना किसी भय के सरकार की आलोचना या खामियों की डुगडुगी पीट लेते थे। उनकी इसी डुगडुगी को अपने लिये खतरा मानकर संघ और भाजपा के समर्थकों की नजर में ये पत्रकार और एनडीटीवी सबसे बड़े शत्रु बने हुए थे।

कौन नहीं जानता कि लोकतंत्र में पक्ष से कहीं ज्यादा जरूरी विपक्ष होता है और मीडिया के जरिये पत्रकार भी विपक्ष की ही भूमिका निभाते हैं। हालांकि यह मामूली सी समझ भी केवल उनको ही हो सकती है, जिन्हें वास्तव में देश और लोकतंत्र से प्यार होगा। सरकार के खिलाफ भी बेबाकी से बोलने एनडी टीवी जैसे मीडिया का भी यदि देश में अभाव होगा, तो वह दिन दूर नहीं जब इस देश में लोकतंत्र सिर्फ यादों में जीवित रह जायेगा। लोकतंत्र की क्या अहमियत है, यह मोदी-अमित शाह के समर्थकों को शायद तभी पता चल पाएगा, जिस दिन उनके नेता लोकतंत्र की समस्त संस्थाओं को एनडीटीवी की ही तरह खुद या अपने कारिंदों द्वारा एक एक करके निगल जाएंगे। तब तक यूं ही अच्छे दिनों के आने का जश्न मनाते रहिये… (लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.)

Uday Prakash : तो अब एनडीटीवी भी बिक गया? ख़बर प्रामाणिक है। स्पाइस जेट मालिक अजय सिंह, जो २०१४ के चुनाव अभियान में भाजपा के सहयोगी रहे हैं, वही अब सारे सम्पादकीय अधिकारों के साथ एनडीटीवी के मालिक होंगे। (जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.)

Nitin Thakur : कितना सच और कितना झूठ ये नहीं मालूम लेकिन बीजेपी के समर्थक और मोदी की कैंपेनिंग में जुटी कोर टीम के मेंबर, प्रमोद महाजन के पूर्व सचिव और स्पाइसजेट नाम की सस्ती और सर्विस में बकवास (मेरी निजी राय) एयरलाइंस चलानेवाले अजय सिंह ने एनडीटीवी खरीद लिया है. अब उनके एनडीटीवी में सबसे ज़्यादा शेयर हैं. उनके पास चैनल के संपादकीय अधिकार सुरक्षित होंगे और वही तय करेंगे कि एनडीटीवी कौन सी खबर किस एंगल से चलाए. अगर वो कायदे के इंसान हुए तो एकाध परसेंट चांस ही हो सकता है कि दखलअंदाज़ी से बचें. (सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से)

Om Thanvi : एनडीटीवी को ख़रीदने वाले अजय सिंह कौन हैं? वही जिन्होंने नारा गढ़ा था- अबकी बार मोदी सरकार। जी हाँ, अजय सिंह 2014 के चुनाव में भाजपा अभियान समिति के सदस्य थे। नारा सुझाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। अटलबिहारी वाजपेयी के ज़माने में अजय भाजपा के सामान्य सेवक थे, प्रमोद महाजन के क़रीबी। महाजन ने उन्हें अपना ओएसडी बनाया, नई संचार नीति बनाने का ज़िम्मा सौंपा। मोदी के पदार्पण पर वे उनके साथ हुए। सौदेबाज़ी और तकनीकी ‘बुद्धि’ की जितनी पहचान महाजन को थी, मोदी को उनसे कम नहीं। अजय सिंह को साथ लेकर और अब चैनल ख़रीद में आगे खड़ा उन्होंने यही साबित किया है। (वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.)

Priyabhanshu Ranjan : NDTV का भावी मालिक – अजय सिंह (भाजपाई)। News18 के अंग्रेजी और हिंदी न्यूज चैनल के अलावा पूरा ETV नेटवर्क- मुकेश अंबानी (मोदी जी का जिगरी यार)।  आजतक, India Today और ABP News —- महीने में 28 दिन ‘मोदी-मोदी’ जपेंगे और दो-तीन दिन इधर-उधर के भाजपाइयों के खिलाफ खबरें दिखाएंगे, ताकि ‘बैलेंस’ बना रहे और लोगों की नजरों में ये ‘निष्पक्ष’ बने रहने का ढोंग कर सकें। Doordarshan की तो खैर, क्या ही बताऊं। लोकसभा टीवी और राज्यसभा टीवी में भी मोदी जी और RSS के ‘चेले’ सेट कर दिए गए हैं। Times Now, Republic, Zee News और सुदर्शन न्यूज़ के आगे तो दूरदर्शन और अंबानी के चैनल भी शर्मा जाएं। अब आप खुद तय कर लें कि असल खबरें देखने के लिए आपको कौन सा चैनल देखना है! (पीटीआई के तेजतर्रार पत्रकार प्रियभांशु रंजन की एफबी वॉल से.)

Dilip Khan : पूरा मीडिया ग़लत लिख-बोल रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिख दिया तो देखा-देखी सारे अख़बार, सारी वेबसाइट्स ने छाप दिया कि “अब की बार मोदी सरकार” का नारा स्पाइसजेट वाले अजय सिंह ने लिखा था। सच ये है कि ये नारा पीयूष पांडेय का लिखा हुआ है। “अच्छे दिन आने वाले हैं” का नारा अनुराग खंडेलवाल ने दिया था। “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं झुकने दूंगा” प्रसून जोशी ने लिखा था। अजय सिंह कैंपेन में शामिल था, लेकिन लिखा क्या, ये मैं भी जानना चाहता हूं। अब शायद NDTV के लिए ही कुछ लिखे। एक नारा छूट रहा है। अजय सिंह चाहे तो उसपर क्लेम कर सकते हैं। शंकराचार्य वगैरह के नाक-भौं सिकोड़ने के बाद बनारस में नारे को डाइल्यूट कर दिया गया था। नारा था- हर-हर मोदी, घर-घर मोदी। इसके लेखक को मैं नहीं जानता। वेबसाइट्स वाले भेड़चाल चलने लगे हैं। देखा-देखी छापते हैं। फैक्ट्स चेक नहीं करते। (टीवी जर्नलिस्ट और सोशल मीडिया के चर्चित लेखक दिलीप खान की एफबी वॉल से.)

Yashwant Singh : एनडीटीवी का बिकना दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसे दौर में जब सत्ता की पोलखोल वाली खबरों की सर्वाधिक जरूरत है, एनडीटीवी पर छापे मार मार कर उसे घुटनो के बल बैठने के लिए मजबूर करना और बिक्री के रास्ते पर ले जाना यह बताता है कि सत्ता से ताकतवर कोई चीज नहीं होती. लोकतंत्र में इस किस्म का रवैया बेहद निराशाजनक है. एनडीटीवी और प्रणय राय से मेरे लाख मतभेद रहे हों, पर एनडीटीवी का मुंह बंद करने के लिए उसे पहले डराना धमकाना फिर बिक्री के लिए दबाव डालना चौथे स्तंभ के लिए खतरनाक है. ये नए किस्म का आपातकाल ही है. ये नए किस्म का फासिज्म ही है. (भड़ास संपादक यशवंत की एफबी वॉल से.)

मूल खबर….

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एनडीटीवी बिक गया, स्पाइस-जेट वाले अजय सिंह ने खरीदा

Om Thanvi : आख़िर NDTV भी क़ब्ज़े कर लिया गया। मसालों के नाम पर स्पाइस-जेट हवाई कम्पनी चलाने वाले अजय सिंह अब यह तय करेंगे कि एनडीटीवी के चैनलों पर क्या दिखाया जाए, क्या नहीं। इसका मुँह-चाहा फ़ायदा उन्हें सरकार से मिलेगा। इस हाथ दे, उस हाथ ले। एक मसाला-छाप व्यापारी को और क्या चाहिए? इस ख़रीदफ़रोख़्त के बीच कुछ पत्रकार तो पहले ही एनडीटीवी छोड़कर जा चुके हैं। कुछ चले जाएँगे। कुछ को चलता कर दिया जाएगा। फिर एक संजीदा सच दिखाने वाले चैनल में बचा क्या रह जाएगा? हींग-जीरा, लौंग-इलायची?

मैंने कुछ ही रोज़ पहले एक विश्वविद्यालय में बोलते हुए कहा था कि यह दौर मीडिया को मैनेज करने का उतना नहीं, जितना उसे ख़रीद लेने का है। न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी। ससुरी बजेगी तो बेसुरी बजेगी। जब इस सरकार के लिए इतनी पहले से बज रही हैं – Zee News, CNN-IBN, ETV आदि – तो एक और सही। उन्हें भी ख़रीद कर पीछे से क़ब्ज़े किया गया था। एनडीटीवी भी उसी गति को प्राप्त हुआ। उम्मीद है अब उसे छापों आदि से शांति नसीब होगी। कह सकते हैं एनडीटीवी वालों पर छापे मार मार कर झुका दिया। नए ज़माने में चैन से ज़िंदा रहना ज़रूरी है, जूझते रहने से। इस बिक्री में अजय सिंह के पास प्रणय रॉय परिवार से दुगुने शेयर हो गए। एनडीटीवी के बिकने की कल ख़बर सुनी थी। आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर पढ़ भी लिया। नीचे दिया लिंक पढ़ सकते हैं तसल्ली के लिए.. goo.gl/XuY3h8

जनसत्ता अखबार के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.


एनडीटीवी के बिकने को लेकर इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी पूरी खबर इस प्रकार है…

SpiceJet’s Ajay Singh set to take control of NDTV

According to the source, Ajay Singh, chairman and managing director for SpiceJet, will have controlling stake in NDTV of around 40 per cent and the promoters Prannoy Roy and Radhika Roy will hold around 20 per cent in the company.

Written by Sandeep Singh | New Delhi |

With its founders Prannoy Roy, Radhika Roy and promoter firm RRPR Holding Pvt Ltd facing a CBI probe for allegedly concealing a share transaction, NDTV is set to change hands, it is learnt. Sources confirmed to The Indian Express that Ajay Singh, co-founder and owner of SpiceJet who was part of the BJP’s 2014 poll campaign, has picked up majority holding in the news channel. When asked if NDTV has been sold to SpiceJet’s Ajay Singh, the source said, “Yes, the deal has been finalised and Ajay Singh will take control of NDTV along with editorial rights.”

On June 5, the CBI conducted searches at the residences of the Roys. Calling the raids a “blatant attack on the freedom of the press,” NDTV, in a statement, said that the CBI had filed its FIR based on a “shoddy complaint” by a “disgruntled” former NDTV consultant who has not obtained a “single order from the courts.”

According to the source, Ajay Singh, chairman and managing director for SpiceJet, will have controlling stake in NDTV of around 40 per cent and the promoters Prannoy Roy and Radhika Roy will hold around 20 per cent in the company.

According to the data available with BSE, the promoter holding in NDTV as of June 2017 stood at 61.45 per cent. Public shareholding in the company stands at 38.55 per cent. The source said that Ajay Singh will also pick up NDTV’s debt of over Rs 400 crore and the total deal is valued at around Rs 600 crore.

A part of the cash (up to Rs 100 crore) will also go to the Roys.

When asked about the NDTV deal, a SpiceJet official said “it’s absolutely false and baseless.” Messages and emails sent to NDTV officials did not elicit any response.

A first-generation entrepreneur, Singh acquired SpiceJet in January 2015 and has turned it around. Having coined BJP’s 2014 campaign slogan “abki baar Modi Sarkar,” Singh served as OSD to Pramod Mahajan during the first NDA government. It was in this period that he played an active role in the launch of DD Sports and was also behind the planning of DD News. Singh played a role in 2014 Lok Sabha campaign of the BJP as part of the core advertising/campaigning team.

In 1996, he was asked to serve on the Board of Delhi Transport Corporation and prepare a plan to revamp DTC. He is known to have played a key role in its turnaround and in the two and a half years that he spent at DTC, its fleet rose from 300 to about 6000. He also turned around the grounded ModiLuft and renamed and launched it as SpiceJet. An alumnus of Delhi’s St. Columba’s school, Singh is a graduate of IIT Delhi, an MBA from Cornell University and a Bachelor’s degree in Law (LLB) from Law Faculty, University of Delhi.

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अपने उपर लगे आरोपों का कमाल खान ने दिया करारा जवाब

..मेरी पत्नी रुचि के पिता की पलामू में बॉक्साइट की दो बहुत बड़ी माइंस थी जिससे एल्युमीनियम बनता था और बिरला की एल्युमीनियम फैक्ट्री को सप्लाई होता था… जब उनके पिता बुजुर्ग हो गए तो उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपको अब इस उम्र में भागदौड़ नहीं करनी चाहिए इसलिए उन्होंने उनकी दोनों माइंस सरकार को सरेंडर करा दी.. अगर उनको यही चिरकुट टाइप बेईमानी करनी होती तो इसके बजाय वो अपने पिता की खानें चला कर उससे बहुत ज़्यादा पैसा कमा लेतीं… आपके तर्क के मुताबिक अगर पत्रकार को अच्छा वेतन पाना, खुशहाल होना या सम्पत्ति खरीदना अपराध है तो फिर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए… क्योंकि इतना पैसा तो सभी मीडिया हाउस देते हैं कि पत्रकार झोला लटका के साइकिल पर घूम सके…

(कमाल खान के जवाब का एक अंश)

लखनऊ से प्रकाशित ‘दृष्टांत’ मैग्जीन में वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान और उनकी पत्रकार पत्नी रुचि कुमार पर गंभीर आरोप लगाकर कवर स्टोरी का प्रकाशन किया गया… पर पूरी स्टोरी में कमाल और उनकी पत्नी रुचि का कोई पक्ष नहीं दिया गया… न ही उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई… भड़ास4मीडिया ने कमाल खान और उनकी पत्नी से पूरे प्रकरण पर अपना पक्ष रखने का अनुरोध किया तो उन्होंने एक-एक आरोप और उन पर अपने जवाब को सिलसिलेवार ढंग से तथ्यों के साथ लिखकर भड़ास के पास प्रकाशन के लिए भेजा. भड़ास पर वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान और रुचि कुमार के पक्ष को पूरे सम्मान के साथ प्रकाशित किया जा रहा है. साथ ही ‘दृष्टांत’ मैग्जीन के संचालकों से अपेक्षा है कि वो भी अगले अंक में कमाल और रुचि के पक्ष को जरूर प्रमुखता से प्रकाशित करेंगे ताकि दोनों पक्षों की बातों का प्रकाशन करने की परंपरा का पालन कर पत्रकारीय गरिमा का सम्मान किया जा सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया


‘दृष्टांत’ मैग्जीन बदनीयत, सारे आरोप गलत और बेबुनियाद : कमाल खान

दृष्टांत पत्रिका के अगस्त अंक में कवर पेज पर मेरी फ़ोटो छाप के मेरे बारे में लिखा गया है. इसमें मेरे ऊपर लगाए गए सभी आरोप मनगढ़ंत, तथ्यों से परे, मेरी प्रतिष्ठा को धूमिल करने और मानहानि करने वाले है. ये आपकी बदनीयती भी जारी करते हैं क्योंकि आपने मेरे ऊपर सार्वजनिक रूप से आरोप लगाने से पहले मेरा पक्ष जानने का कोई प्रयास नहीं किया. हमारे पास ना तो आपके बताये गोमती नगर के दो प्लाट हैं, ना पुरसैनी गांव में कोई ज़मीन है और ना ही हम किसी भी कम्पनी के डायरेक्टर या शेयर होल्डर हैं. मैं पिछले करीब तीन दशकों से पत्रकारिता कर रहा हूं. पिछले 22 साल से एनडीटीवी में हूं और मेरी पत्नी रुचि पिछले 24 साल से ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं और एक प्रतिष्ठित परिवार से सम्बन्ध रखती हैं.

हमारे मीडिया संस्थान हमें इतनी सैलरी देते हैं कि हम दोनों ने मिलके पिछले फायनेंशल ईयर में करीब नब्बे हज़ार रुपये महीना इनकम टैक्स दिया है जो टीडीएस की शक्ल में कम्पनी ने काट के भेजा है. अगर हम नब्बे हज़ार रुपये महीना टैक्स देते हैं तो आप समझ सकते हैं कि हम अपने लिए इससे भी ज़्यादा खरीदने की हैसियत रखते हैं. हमारे ऊपर दृष्टान्त पत्रिका में चार बड़े आरोप लगाए गए है, जिनके बारे में हमारा पक्ष यूं है…

(1) आरोप : कि हमारे पास गोमती नगर के विराज खण्ड में प्लाट नम्बर 1/97 और विकल्प खण्ड में प्लाट नम्बर 1/315 है..

मेरा जवाब : ये दोनों प्लाट कभी हमारे पास नहीं थे… अगर ये हमारे प्लाट हैं तो हमारे नाम इनकी रजिस्ट्री निकलवा के हमें कब्ज़ा दिलवा दीजिये। एलडीए से मैंने इन दोनों प्लाट्स के डाक्यूमेंट्स  निकलवाये तो पता चला विराज खण्ड का प्लाट नम्बर 1/97 कमाल खान नहीं बल्कि किन्हीं कलाम खान और असमा कलाम को 30 मार्च 1996 से एलाट है… जबकि 1/315 विकल्प खण्ड किन्हीं मयूरी शर्मा को 2001 से एलाट है…

(2) आरोप : कि हमारे पास मोहनलाल गंज के पुरसैनी गांव में काफी ज़मीन है…

हमारा जवाब : इस गाँव मे हम चार दोस्तों ने मिलके चार बीघा खेत खरीदे थे जिसमें मेरे नाम से एक बीघा और रुचि के नाम से एक बीघा खेत थे.. इन्हें करीब 4 साल पहले बेच कर हमने लखनऊ से 36 किलोमीटर दूर मोहनलालगंज के गौरा गांव में खेती की दूसरी ज़मीन खरीदी थी.. अब मेरे या रुचि के नाम से पुरसैनी में कोई ज़मीन नहीं है…पुरसैनी की खतौनी के पेज नम्बर तीन अगर आपने देखा होता तो पता चल जाता कि चार साल पहले ये ज़मीन बेची जा चुकी है..

(3) आरोप : कि हम लोग किसी केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी में डायरेक्टर हैं और इसमें हमारा शेयर है…

जवाब : हमे केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी में डायरेक्टरशिप और शेयर होल्डिंग से सम्बंधित कम्पनी के दस्तावेज़ दिला देंगे तो हम इस कम्पनी से डायरेक्टर की हैसियत से अपना पैसा मांग सकेंगे क्योकि इस कम्पनी का नाम हमने आज पहली बार सुना है। हमें पता ही नहीं था कि हम इसमें डायरेक्टर और शेयर होल्डर हैं। आपने अपनी मैग्ज़ीन में पुरसैनी गाँव की ज़मीन की खतौनी छापी है, जिसमें आपने साबित करने की कोशिश की है कि खसरा नम्बर 988 में मैं और रुचि केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी के डायरेक्टर अम्बरीष अग्रवाल के साथ पार्टनर हैं और कम्पनी के डायरेक्टर हैं.. आपने लिखा है कि हमने ये ज़मीन कंपनी के डायरेक्टर अम्बरीष अग्रवाल को दे रखी है.. रेवन्यू रिकॉर्ड में खसरा होता है… खसरा ज़मीन का बहुत बड़ा हिस्सा होता है.. एक ही खसरा नम्बर में कई लोगों की ज़मीन होती है… एक खसरे में अगर बहुत सारे नाम लिखे हैं इसका ये मतलब नहीं कि वो सब पार्टनर हैं… आपने जो खतौनी छापी है वो सिर्फ ये बताती है कि 988 नम्बर के खसरे में कई अलग-अलग लोग ज़मीनों के मालिक हैं.. और, आप बदनीयत नहीं होते तो इसी खतौनी के पेज नम्बर तीन को भी दिखाते जिसमें साफ साफ लिखा है कि ये ज़मीन हमने चार साल पहले किन्हीं और लोगों को बेच दी थी और खरीदने वाले अम्बरीष अग्रवाल या केएपीएस ट्रेडिंग कम्पनी नहीं है.. उस इलाके में अम्बरीष अग्रवाल की ज़मीन होने से आपने हमे उनकी कम्पनी का डायरेक्टर बताया है… कम्पनी के दस्तावेज निकाल के साबित कीजिये कि हम उस कम्पनी के डायरेक्टर हैं और हमारा कम्पनी में शेयर हैं…

(4) आरोप: कि हमारे पास मोहनलालगंज में विशाल फार्म हाउस है जिसकी कीमत करीब 12 करोड़ है..

मेरा जवाब : मैं अपना ये खेत आपकी बताई गई कीमत के एक चौथाई दाम तीन करोड़ में बेचने को तैयार हूं… आप तुरंत बिकवा दें… खरीदने वाले को नौ करोड़ का फायदा हो जाएगा…

पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे किये गए कार्यों के लिये मुझे पांच नेशनल और एक इंटनेशनल अवार्ड मिला है… मुझे दो बार भारत के राष्ट्रपति ने नेशनल अवार्ड दिए हैं… ऐसे में ये साफ है कि आप अपनी बदनीयती से  मेरी निजी और पेशेगत प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाना चाहते हैं.. मेरी पत्नी रुचि इंडिया टीवी में एसोशिएट एडिटर हैं और 24 साल से ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट हैं… उन्होंने देश के सबसे बड़े मीडिया हाउसेस में काम किया है… वो एक सम्मानित प्रतिष्ठित पत्रकार हैं और एक प्रतिष्ठित परिवार से हैं.. आपकी जानकारी के लिए मेरी पत्नी रुचि के पिता की पलामू में बॉक्साइट की दो बहुत बड़ी माइंस थी जिससे एल्युमीनियम बनता था और बिरला की एल्युमीनियम फैक्ट्री को सप्लाई होता था… जब उनके पिता बुजुर्ग हो गए तो उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपको अब इस उम्र में भागदौड़ नही करनी चाहिए इसलिए उन्होंने उनकी दोनों माइंस सरकार को सरेंडर करा दी.. अगर उनको यही चिरकुट टाइप बेईमानी करनी होती तो इसके बजाय वो अपने पिता की खाने चला कर उससे बहुत ज़्यादा पैसा कमा लेतीं… आपके तर्क के मुताबिक अगर पत्रकार को अच्छा वेतन पाना, खुशहाल होना या सम्पत्ति खरीदना अपराध है तो फिर पत्रकारों को मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने के लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए… क्योकि इतना पैसा तो सभी मीडिया हाउस देते हैं कि पत्रकार झोला लटका के साइकिल पर घूम सके…

कमाल खान
Resident Editor, NDTV
kamalkhanlko@gmail.com

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एनडीटीवी : जंग हारने पर यहां हर बार सिपाही हलाल होते हैं, सिपहसालार और राजा कतई ज़िम्मेदार नहीं!

एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए… फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है वहीं दूसरी तरफ अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अनुराग द्वारी ने भी एनडीटीवी छोड़ दिया… दो दशकों का साथी, साथ काम करने का तजुर्बा … बेहतरीन प्रोफेशनल, ज़िंदादिल इंसान … एक दशक से ज्यादा वक्त बिताने के बाद उसने भी एनडीटीवी छोड़ दिया। डेस्क, खेल, राजनीति, क्राइम, शहर, गांव, संगीत हर विषय पर उसकी पकड़ थी … जिस भेंडी बाज़ार को मुंबई में हमने सिर्फ अंडरवर्ल्ड की नज़र से देखा वहां भी वो संगीत का घराना ढूंढ लाया … जुनूनी ऐसा कि किसी ख़बर पर बॉस से भी भिड़ना पड़े तो भिड़ जाए … जिस दौर में स्ट्रिंगरों की खबर पर दिल्ली-मुंबई में बैठे पत्रकार बाईलाइन लूटते हैं उसने अपनी ज़िद से उनकी पीटीसी तक लगवा दी … उनके एक एक बिल के लिये लड़ने वाला … साफ कहता था हमारी तनख्वाह बढ़ती तो उनके लिये क्या महंगाई घटती है।

बहरहाल, एनडीटीवी ने उसकी क्षमताओं का पूरा दोहन किया … डेस्क से लेकर रिपोर्टिंग तक … हिन्दी से लेकर अंग्रेज़ी तक … खेल में कई ख़बरें उसने ब्रेक की होंगी लेकिन हर मौके पर चैनल अपनी कुलीन मानसिकता दिखाता रहा … देश में वो भागे, विदेश जाने का मौका आए तो ऐसे लोग भेजे जाते रहे जिन्होंने ताउम्र सिर्फ चिरौरी की, अपनी अंग्रेज़ियत का हवाला देते रहे … उसका दोस्त होने के नाते हम कई बातों के सामने गवाह रहे, कई बातें वो कहता भी था .. लेकिन एक संतोष के साथ चलो यार अपना नंबर भी आएगा … उसके चेहरे का असंतोष पढ़ पाओ तो पढ़ लो … नहीं तो पंडितजी गरिया देते थे …

चैनल के आख़िरी दिनों में पारिवारिक वजहों से उसने मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख की ज़िम्मेदारी संभाली तो साबित कर दिया कि रिपोर्टिंग के मायने क्या होते हैं, जिन चैनलों को लगता है खबर दिल्ली-मुंबई है वहां उसने हक़ से चैनल का एयर टाइम छीन लिया। उसे लगातार हम टीवी पर देखते रहे और उसकी एनर्जी को सराहते रहे।

बहुत दिनों से लिखना चाह रहा था लेकिन लगता था उसकी नौकरी पर दिक्कत ना आए, वैसे वो इतना डरपोक नहीं चाहे स्टार में रहा चाहे एनडीटीवी में जब जो ग़लत लगा न्यूज़ रूम हो या उसका अपना स्पेस वो खुलकर बोल देता था … उसका साफ मानना है कि ना लेफ्ट ग़लत हैं ना राइट, और ना दोनों ही एब्सोल्यूट में सही हैं … हमारा काम विचारधारा नहीं बल्कि नीतियों का मूल्यांकन है। क्रांति होगी तो लाला के पैसों से नहीं ख़ुद के दम पर …

जब उसने ख़ुद फेसबुक पर अपनी जाने की ख़बर पोस्ट की, तो लगा कमाल है … हर एक शख्स उसे याद है चाहे वो दस साल पहले ही क्यों ना गया हो या उसे निकाला गया हो … नाम-काम के साथ… बहरहाल उसकी नई पारी के लिये शुभकामना…

लेकिन सवाल जो एनडीटीवी प्रेमी हैं उनसे भी पूछना चाहता हूं कि क्या यहां मामला निवेशकों के साथ धोखे का नहीं .. ये ठीक है कि सरकार चैनल के पीछे है … वो कोर्ट तय कर देगा कौन सच है कौन झूठ … लेकिन जिस बरखा दत्त ने अपनी सफाई के लिये, खुद को बड़ा बनाने चैनल में कोर्ट चला दिया आज वही चैनल पर भ्रष्टाचार की बातों को रिट्वीट करती हैं, जो आज भी चैनल के दिये करोड़ों के बंगले में रहती हैं।

आज भी एनडीटीवी चैनल में कम से कम 40 लोग होंगे जो दस लाख से ज्यादा महीना कमाते हैं, और ये वो लोग हैं जो नंबर वन चैनल को आख़िरी पायदान पर ले आए … फिर भी हर दिन अच्छे पत्रकार, कैमरामैन, एडिटर चैनल छोड़ रहे हैं या उन्हें छोड़ने पर मजबूर किया जा रहा है।

अभिजात्य होने का नमूना देखिये… एक तरफ जहां नौकरी जा रही है यहां वहीं अभिजात्य 40-50 लोगों के लिये ऑडी गाड़ियां आती है, कमरों में एयर प्यूरीफायर लगता है, हर रोज़ हज़ारों के फूल सजाए जाते हैं … ये चैनल को भारी नहीं लगता… अरे, जंग हारने पर हर बार सिपाही हलाल होगा, सिपहसालार और राजा की कोई ज़िम्मेदारी नहीं… दो कौड़ी का आइडिया देकर मोबाइल से टीवी चैनल चलवा रहे हैं… कॉस्ट कटिंग जरूरी है तो अपनी लाखों की तनख्वाह छोड़ें… शेयरधारकों का पैसा डुबोने का हक़ इन्हें किसने दिया…

अभी भी चैनल में काम कर रहे कई साथियों से बात होती है सब हताश हैं, निराश हैं लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं … उनसे बात करेंगे तो पता लगेगा कि सच्चाई क्या है। उनकी ग़लती भी क्या है, जिसने जैसा आदेश दिया, उन्होंने वैसा काम किया… वो आज भी बेहतरीन प्रोफेशनल हैं लेकिन विचारधारा के दबाव में दबाए जा रहे हैं… फील्ड में गालियां उन्हें मिलती हैं और आपके स्टार पत्रकार कॉन्फ्रेंस में जाकर तालियां बजवाते हैं…

लेखक अजय कुमार इन दिनों मुंबई में पदस्थ हैं और अनुराग द्वारी के साथ भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकरिता विश्वविद्यालय में साथ पढ़ाई कर चुके हैं. अजय और अनुराग कई मीडिया संस्थानों जैसे स्टार न्यूज़ और एनडीटीवी में साथ काम कर चुके हैं. अजय ने कुछ साल पहले खबर की दुनिया से रुखसत ले लिया और अब वो डिजिटल स्पेस में सक्रिय हैं.

पूरे प्रकरण को समझने के लिए इसे भी पढ़ें….

 

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अनराग द्वारी ने बीबीसी ज्वाइन करने से ठीक पहले एनडीटीवी के साथियों के नाम ये अदभुत पत्र लिखा

Anurag Dwary : नवसंवत्सर — एनडीटीवी परिवार ने 10 साल मुझे मेरे गुण-दोष के साथ पाला-पोसा, अब नये सफर की शुरुआत होगी बीबीसी के साथ … साथियों के लिये मेरे आख़िरी मेल का हिस्सा जो संस्थान में शायद इसे ना पढ़ पाएं हों … जो दोस्त फेसबुक से साथ जुड़े हैं उनकी शुभकामनाओं के लिये भी …

1 अगस्त मेरे लिये सिर्फ एक तारीख़ नहीं … मेरे सफर के एक सफहे का बंद होकर, दूसरे सफहे की शुरूआत है … हम सब जानते हैं, इस वक्त इसकी ज़रूरत है हम जैसे लोगों को जिनके लिये कलम एक ज़रिया है … जिसे हमने चुना लेकिन कई बार किस्सागोई के बीच कुछ ऐसे किऱदार होते हैं जिनके चेहरे देखकर आप फैसला लेते हैं कि थोड़ा रूकना होगा, मुड़ना होगा … ताकी चूल्हे की आंच ठंडी ना हो … बहरहाल … पाकिस्तान के हबीब जालिब मेरे सबसे पसंदीदा शायर हैं ( वैसे उन्हें पाकिस्तानी ना कहूं तो भी चलेगा, क्योंकि वो हम जैसे कइयों के दिल में धड़कते हैं) … बस यूं ही उनका ज़िक्र याद आ गया… मुशीर में वो लिखते हैं …

………………………………….

मैंने उससे ये कहा

ये जो दस करोड़ हैं, जेहल का निचोड़ हैं, इनकी फ़िक्र सो गई हर उम्मीद की किस, ज़ुल्मतों में खो गई
ये खबर दुरुस्त है, इनकी मौत हो गई, बे शऊर लोग हैं, ज़िन्दगी का रोग हैं और तेरे पास है, इनके दर्द की दवा ….

जिनको था ज़बां पे नाज़, चुप हैं वो ज़बां दराज़, चैन है समाज में
वे मिसाल फ़र्क है, कल में और आज में,अपने खर्च पर हैं क़ैद, लोग तेरे राज में

मैंने उससे ये कहा

हर वज़ीर हर सफ़ीर, बेनज़ीर है मुशीर, वाह क्या जवाब है, तेरे जेहन की क़सम
खूब इंतेख़ाब है,जागती है अफसरी, क़ौम महवे खाब है, ये तेरा वज़ीर खाँ दे रहा है जो बयाँ … पढ़ के इनको हर कोई, कह रहा है मरहबा

मैंने उससे ये कहा….
…………………………………

हमारी ताक़त उन्हीं वज़ीरों की मुखालिफत है, लोग शायद इसे विचारधारा से जोड़ें लेकिन मैं जानता हूं ये सच नहीं … ये इसलिये लिखा क्योंकि अपने चैनल की यही खूबी मुझे इस परिवार में खींच लाई … कई बार कुछ वजहों से जाने की सोची लेकिन जेब पर सोच भारी पड़ी … लेकिन जैसा पहले लिखा … चूल्हे की आंच थोड़ा रूकने को मजबूर कर देती है… बहरहाल मुमकिन नहीं था कहीं और सोचता कि वंदेमातरम के संगीतमय सफर पर आधे घंटे का कार्यक्रम कर लूं, गंजेपन पर कुछ सोच लूं ( यक़ीन मानिये जब 2007 में आया था तो मैं गंजा नहीं था, भेंडी बाज़ार घराने पर कुछ करने की इजाज़त मिल जाए।

मनीष सर ने डेस्क से धक्का मारना शुरू कर दिया … बोला था डेस्क पर लेकर आया हूं … लेकिन वो टून इन वन बनाने लगे … जिस आदमी की ख़बरों को लेकर ऊर्जा सुबह 4 से रात 4 तक रहे उनसे क्या मज़ाल की मैं उलझ जाऊं … लिहाज़ा करना पड़ा … कुछ परिस्थिति कुछ हौसला-अफज़ाई एक बार पूरी तरह से रिपोर्टिंग में ले आई … संजय सर से डर लगता था लेकिन मनीष जी के साथ अपना स्पेस था… रिपोर्टर की नब्ज़ समझने में वो बेमिसाल हैं …

कमाल के कैमरा साथी मिले — मुंबई में सुहास, आनंद सर,प्रवीण,राजेन्द्र,,दिल्ली में प्रेम सिंह, भोपाल में रिज़वान भाई ने सिखाया कैसे मोबाइल से अच्छे शॉट्स बना सकते हैं … 3 महीने में रिज़वान से रिश्ते पारिवारिक हो गये … सर, यक़ीन मानें हमारे कैमरा साथियों से अच्छे शायद ही कहीं मिलें …टीवी रिपोर्टर अपने कैमरा सहयोगी के बग़ैर कुछ नहीं … कैमरा टीम ने शब्दश: एक नयी नज़र दी…

एडिटर्स में चाहे फैय्याज़ सर हों, अचिंत्य, राव सर, राजेन्द्र, कमाल था … हमारे प्रोड्यूसर मल्लिका, आशीष, गणेश, स्वरोलीपी, संकल्प, विपुल, आलाप, श्वेता, सम्मी, योगेश, कामाक्षी सबने मुझे बहुत सहा … ख़ासकर गणेशभाई … जो कभी नाराज़ नहीं होता …संयम के साथ सहूलियत दी काम करने की … हमारे प्रोड्यूसर और एडिटर्स ने बेहतरीन एडिट से हर कहानी को कहा …

मुंबई के सारे साथी … अभिषेक सर जो मेरे मुकाम के गवाह-सहयोगी रहे … कई बार गुस्से-झगड़े-प्यार के अपने हिस्सों के साथ, अजेय (गज़ब की ऊर्जा और कॉर्डिनेशन मित्र … तुम अद्भुत हो), उल्लास सर (सर आप हमेशा बड़े भाई सरीखे रहे … ख़बर को लेकर आपकी आंखों की चमक गज़ब थी), सुनील जी (इनकी ऊर्जा और जज़्बा उफ … सबको प्रेरणा देती है), काथे जी (ऊफ आपकी दलीलें और ज्ञान … बहुत बढ़िया), विजय जी, सांतिया, पूजा, दीप्ति जी, धरम, शैलू, केतन, योगेश, तेजस, सौरभ (दादा तुम थोड़ा नॉनवेज कम खाया करो … और थोड़ा आराम भी करो) , प्रसाद राममूर्ति, योगेश पवार, संचिका, महक, विवेक, आनंदी, मयूरी, अनंत, संजय, रवि तिवारी (आपका वॉयस ओवर, बेमिसाल और हर दिन झोले में एक ख़बर … वाह), अवधेश, अतुल, जाधव, शिंदे सर, भरत, विनायक भाई, विशाल भोसले (भाई अपन तीनों की शाम की चर्चा मिस करता हूं, और सरजी के कमेंट्स … क्या कहने) ….मुंबई ब्यूरो का हर एक एक सहकर्मी दही-हांडी जैसा एक दूसरे से जुड़ा रहा … हमेशा!

दिल्ली इनपुट पर … मनहर जी (अब हमसे न्यूज़ लिस्ट नहीं मांग पाएंगे आप) , रजनीश सर (बहुत पुराना साथ है आपके सवाल नई जिज्ञासा पैदा करते हैं, स्टोरी निखारते हैं) , नदीम जी (ओफफ अब आप शनिवार को किसके साथ गप्पा मारेंगे) , जसबीर (आप कभी कभार गुस्सा हो जाया करो), शैलेन्द्र भाई (आप बहुत सहज हैं, कितनी बातें साझा की हम दोनों ने … दिल्ली में बग़ैर फोन बातें करेंगे), आकाश, अदिति जी (धर्म से लेकर सियासत, कितनी चर्चा हुई आपसे), पिनाकी (भाई थोड़ा हंस के स्टोरी मांग लो … डर लग जाता है)) , सृजन, गौरी (भोपाल में हर सुबह पहला फोन आपका)…

रिपोर्टर और डेस्क में एक अघोषित द्वंद हमेशा रहता है … लेकिन यक़ीन मानें इतने सीमित संसाधनों में हमारी डेस्क कमाल की है, बेहद कमाल … मैं दोनों तरफ रहा इसलिये कह सकता हूं … अजय सर, प्रियदर्शन जी, दीपक जी, सुशील सर, भारत, मिहिर, बसंत, प्रीतीश, जया, अमित ( जिसने मुझे हर सप्ताहांत बहुत बर्दाश्त किया अपनी मुस्कान के साथ), अदिति, पार्थ सर, सीपी सर, विभा, आनंद पटेल, सत्येंद्र सर … बहुत कुछ सीखा इनसे … खट्टे-मीठे अनुभव रहे … जब झुंझलाया, नाराज़ हुआ अपने परिवार से साझा कर लिया … अजय सर को फोन कर लिया , प्रियदर्शन सर से भाषा सीख ली.. सुशील सर से सहजता साझा कर ली ….

दिल्ली से लेकर पूरे देश में हमारे साथी रिपोर्टर — हृदयेश भाई, किशलय सर, नेहाल भाई, राजीव सेना वाले, अहमदाबाद वाले भी , अखिलेश सर, हिमांशु, मुकेश, उमा, शारिक़,शरद, परिमल, रवीश – दिल्ली वाले, सौरभ, आशीष भार्गव ( भाई कमाल की रफ्तार से वेब कॉपी फाइल करता है, इस कला के हम सब कायल हैं), अजय सिंह, हरिवंश भाई, कमाल सर, शारिक़ भाई, नीता … सबका सहयोग मिला … सबका शुक्रगुज़ार हूं …

खेल डेस्क पर संजय सर, विमल भाई, प्रदीप, महावीर, अफशां, कुणाल,सौमित, निखिल, रीका, गौरिका, यश जैसे पुराने सहयोगियों का साथ बने रहा… ओलंपिक स्पोर्ट्स में विमल भाई का शायद ही कोई सानी हो … प्रशांत सिसौदिया सर इतनी पुरानी और नई जानकारी फिल्मों पर किताब लिख दो सर, पूजा, सूर्या, सुमित, मेरा साथी इक़बाल ( भाई सेवई लेकर आना, विजय सर — मुझे लगता है जिस अथॉरिटी के साथ विजय सर फिल्मों की समीक्षा करते थे वो मिलना मुश्किल है …

बाबा, विनोद दुआ सर सबने परखा … मौक़े दिये … देर रात तक बाबा खेल चैनल देखते हैं, अपनी फुटबॉल की जानकारी गोल है इसलिये हमने खेल से भागने में भलाई समझी … सुनील सर, लगभग 15 सालों से आपके साथ हूं … एक अपनापन है जिससे रात-सवेरे … दुख-सुख में कभी भी आपको फोन लगा लेता हूं … करता रहूंगा … जो दो नज़रिया आप देते हैं उससे नज़रिया खुल जाता है … वैसे हर क्षेत्र में आपके ज्ञान से थोड़ा डर भी लगता है … इसलिये सारी गिरह खोलकर आपसे जिरह की हिम्मत मिलती है …

रवीश सर आपने जैसे फेयरवेल दिया … वैसा कम ही लोगों को मिल पाता है…

शोर-शराबे के इस दौर में सुकून की अपनी कीमत है … लेकिन ऐसा सुकून जिसमें फिक्र है … सोच है … शुक्रिया उस सोच में मुझे स्पेस देने … एक राज़ की बात है मंदसौर में आपके नाम ने उन्मादी भीड़ से पिटने से बचा लिया..

ऑनिन सर, बहस के लिये-ज़रूरत के लिये-समझने के लिये-सीखने के लिये आपसे कई बार वक्त लिया …हर बात का अपना विस्तार … वैचारिकता को लेकर भी .. शायद ही अपने संपादक से ऐसे बहस की गुंजाइश वो भी टेलिफोन पर मिल पाए, आपके साथ ही मुमकिन था …. सबसे अहम देश भर में हमारी स्थानीय साथी, ख़ासकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ … कमाल है इनमें भी … सालों से हमारे साथ जुड़े हैं … सिर्फ प्रेम की वजह से … इनकी ईमानदारी और सहजता अद्भुत है … ये इस परिवार की सबसे अहम कड़ी हैं….

हमारे वेब डेस्क के साथी आपने ख़बरों को नई उम्र दी … सालों बाद बाईलाइन मिलने लगी … मज़ा आया… कई पुराने साथी इस फेहरिस्त में शामिल है, लेकिन चैनल का हिस्सा नहीं .. दुख हुआ, गुस्सा आया … लगा-लगता है उन्हें कुछ और ज़रियों से रोका-बचाया जा सकता था … लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था के अपने दायरे होते हैं और ये सोचना खुशफ़हमी होगी कि हम उसका हिस्सा नहीं हैं… बहरहाल … इसपर बहस फिर कभी लेकिन इसको अछूता छोड़ना मेरी फितरत के ख़िलाफ रहता..

हम कम हैं, लेकिन सच मानें हममें दम है …. पूरा देश घूमते फर्ज़ी आंकड़ों के बावजूद … पाश की तरह … हम सबके लिये …

मैं घास हूँ
मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊँगा …
बम फेंक दो चाहे विश्‍वविद्यालय पर
बना दो होस्‍टल को मलबे का ढेर
सुहागा फिरा दो भले ही हमारी झोपड़ियों पर

मेरा क्‍या करोगे
मैं तो घास हूँ हर चीज़ पर उग आऊँगा ….

इस मेल में यक़ीनन … मेरे बेहद करीबियों के नाम छूटे होंगे …
कई बार ज़ेहन, आंखें, की-बोर्ड के साथ तालमेल नहीं रख पातीं …
माफ़ी, चेहरों का हुजूम आंखों के धुंधलके में सिनेमाई रील सा आकर गुज़र जाता है…

एनडीटीवी को अलविदा कह बीबीसी ज्वाइन करने के ठीक पहले पत्रकार अनराग द्वारी द्वारा लिखा गया उपरोक्त पत्र उनके एफबी वॉल से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

अब इसके आगे की कथा पढ़िए, अनुराग द्वारी के साथी अजय कुमार की कलम से…

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एनडीटीवी से हटाए जाने वाले मीडियाकर्मियों की संख्या 100 के पार हो गई

एक बड़े मीडिया संस्थान में मीडियाकर्मियों की छंटनी की जा रही है और पूरा मीडिया जगत चुप्पी साधे है. खासकर वो लोग भी जो दूसरों जगहों पर छंटनी या बंदी के सवालों पर मुखर होकर अपने यहां स्क्रीन काली कर प्राइम टाइम दिखाते थे. एनडीटीवी के लोग इस छंटनी के पक्ष में भांति भांति के तर्क दे रहे हैं लेकिन सवाल यही है कि क्या दूसरों को नसीहत देने वालों को अपना घर ठीक-दुरुस्त रखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

सवाल और भी हैं…

क्या छंटनी ही एकमात्र रास्ता था.

क्या सेलरी कटौती या फिर उन्हें नए कामों में लगाकर उनके परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा नहीं किया जा सकता था.

क्या यह कहीं नियम बना हुआ है कि अपने घर की गंदगी / उपद्रव / छल / छंटनी / फ्राड / चीटिंग आदि पर बिलकुल बात नहीं करनी है और दुनिया भर के मामलों में मुंह फाड़ कर चिल्लाना है.

एनडीटीवी के भीतरी सूत्र बताते हैं कि छंटनी से प्रभावित होने वालों की संख्या कुल सौ के पार जा चुकी है. ये छंटनी एनडीटीवी ग्रुप के अंग्रेजी और हिंदी समेत सभी न्यूज चैनलों से की गई है. दिल्ली और मुंबई आफिस को मिलाकर अब तक सौ लोग निकाले जा चुके हैं. एनडीटीवी के दिल्ली आफिस की बात करें तो यहां से कुल 35 इंजीनियर्स हटाए गए हैं. 25 कैमरापर्सन्स पर भी गाज गिरी है. 7 असिस्टेंट हटाए गए हैं. वीडियो एडिटर कुल छह हटाए गए हैं. एमसीआर से आठ लोगों की बलि ली गई है. दो ड्राइवरों को पैदल कर दिया गया है.

एनडीटीवी के मुंबई आफिस से खबर है कि 13 कैमरापर्सन्स प्रणय राय की छंटनी नीति की भेंट चढ़ाए गए हैं. यहां भी इंजीनियरों पर गाज गिरी है जिनकी संख्या तीन है. एक एंकर अनीश बेग को भी हटाए जाने की सूचना है. छंटनी और बर्खास्तगी के घटनाक्रम से ठीक एक रोज पहले हालात की नजाकत भांपकर 6 इंजीनियरों ने खुद ही जाब छोड़ दिया था. इस तरह सारे नंबर्स को जोड़ लें तो संख्या सौ के पार जा रही है.

देखना है कि रवीश कुमार एनडीटीवी के इस कोहराम पर कब प्राइम टाइम करते हैं और दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में छंटनी के ट्रेंड पर प्रकाश डालते हुए जनसंचार के अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विद्वानों को उद्धृत करते हुए कब विषय विशेषज्ञों से बहस कर जनता की चेतना को जाग्रत करने का काम करते हैं ताकि जनता भी मीडिया की अर्थनीति और कूटनीति से दो-चार होकर मीडिया के प्रति अपने नजरिए सरोकार को रीडिफाइन कर सके.

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एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है!

Nitin Thakur : सब जानते हैं कि एनडीटीवी की छंटनी किसी पूंजीपति के मुनाफा बढ़ाने का नतीजा नहीं है. वो किसी नेटवर्क18 या ज़ी ग्रुप की तरह मुनाफे में होने के बावजूद लोगों को नहीं निकाल रहा. एनडीटीवी एक संस्थान के बिखरने की कहानी है. यही वजह है कि उनका कोई कर्मचारी मालिक को लेकर आक्रोशित नहीं है. वो जानते हैं कि उनसे ज़्यादा ये मुसीबत संस्थान के प्रबंधन की है. बावजूद इसके किसी को तीन महीने तो किसी को छह महीने कंपन्सेशन देकर विदा किया जा रहा है.

एनडीटीवी को जाननेवालों को मालूम है कि यहां ऐसे बहुतेरे हैं जिन्होंने दशकों तक आराम से नौकरी की और कहीं जाने की ज़रूरत नहीं समझी. सैलरी फंसाना, जाते हुए कर्मचारी की सैलरी मार लेना, किश्तों में तन्ख्वाह देना या चार चार पैसे पर इंटर्न पाल कर उनका शोषण वहां उस तरह नहीं हुआ जिस तरह इंडस्ट्री के दर्जन भर कई चैनलों में होता है. सबसे ऊंची सैलरी पर करियर की शुरूआत इसी चैनल में होती रही है. ये जो छंटनी -छंटनी का राग अलाप कर एनडीटीवी को सूली पर चढ़ाने की भक्तिपूर्ण चालाकी भरी कोशिश है वो धूर्तता के सिवाय कुछ नहीं.

ये वही हैं जो एनडीटीवी को रोज़ बंद होने की बददुआ देते थे और आज जब सरकार के खिलाफ मोर्चा लेते हुए वो तिनका तिनका बिखर रहा है तो किसी की जाती हुई नौकरी पर तालियां बजाने की बेशर्मी भी खुलकर दिखा रहे हैं. बीच बीच में कुटिल मुस्कान के साथ “बड़ा बुरा हुआ” भी कह दे रहे हैं. इनकी चुनौती है कि एनडीटीवी वाले अपनी स्क्रीन पर अपने ही यहां हो रही छंटनी की खबर दिखाएं. भाई, आप यही साहस अपने चैनलों और अखबारों में क्यों नहीं दिखा लेते? मुझे तो नहीं याद कि उस चैनल ने कहीं और छंटनी की खबर भी दिखाई हो.. फिर आप ये मांग आखिर किस नीयत से कर रहे हैं?

आपने पी7, श्री न्यूज़, जिया न्यूज़, ज़ी, आईबीएन में रहते हुए खुद के निकाले जाने या सहयोगियों के निकाले जाने पर खबर बनाई या बनवाई थी?? दरअसल आपकी दिक्कत पत्रकार होने के बावजूद वही है जो किसी पार्टी के समर्पित कैडर की होती है. आप उस चैनल को गिरते देखने के इच्छुक हैं जो चीन विरोधी राष्ट्रवाद के शोर में भी CAG की रिपोर्ट पर विवेकवान चर्चा कराके लोगों का ध्यान सरकार की लापरवाही की तरफ खींच रहा है. आपकी आंतें तो डियर मोदी जी की आलोचना की वजह से सिकुड़ रही हैं, वरना किसी की नौकरी जाते देख खुश होना किसी नॉर्मल इंसान के वश से तो बाहर की बात है.

मैंने यहां पहले भी लिखा है कि मैं चैनल दिखने की एक्टिंग करते संघ के अघोषित इलेक्ट्रॉनिक मुखपत्र चैनलों के बंद होने के भी खिलाफ हूं. वो चाहे जो हों मगर आम लोगों की रोज़ी रोटी वहां से चल रही है. विरोधी विचार होना एकदम अलग बात है.. मगर सिर्फ इसीलिए किसी की मौत की दुआ करना अपनी गैरत के बूते से बाहर का सवाल है. एनडीटीवी का मालिक दूध का धुला ना हो तो भी सरकार को सबसे ज़्यादा दिक्कत उसी से है. ये तो उसी दिन पता चल गया था जब पठानकोट हमले की एक जैसी रिपोर्टिंग के बावजूद ऑफ एयर का नोटिस बस एनडीटीवी इंडिया को मिला था. चैनल को लेकर सरकारी खुन्नस छिपी हुई बात नहीं है. इसे रॉय का वित्तीय गड़बड़झाला घोषित करके मूर्ख मत दिखो.

रूस में एनटीवी हो या तुर्की में आधा दर्जन सरकार विरोधी मीडिया संस्थान.. सबको ऐसे ही मामले बनाकर घेरा और मारा गया है. आज सरकार की बगल में खड़े पत्रकारनुमा कार्यकर्ताओं के लिए जश्न का दिन है. उसे खुलकर सेलिब्रेट करो. किसी की मौत की बददुआ करके.. अब जब वो मर गया तो उस पर शोक का तमाशा ना करो. थोड़ी गैरत बची हो तो सिर्फ जश्न मनाओ. जिस चैनल पर एक दिन के बैन को भी सरकार को टालना पड़ा था अंतत: वो सरकार के हाथों पूरी तरह “बैन” होने जा रहा है. अब आप कहां खड़े हैं तय कीजिए, वैसे भी इतिहास कमज़ोर राणा के साथ खड़े भामाशाह को नायक मानता है, मज़बूत अकबर के साथ खड़े मान सिंह को नहीं।

सोशल मीडिया के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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एनडीटीवी ने 70 कर्मचारियों को निकाला, रवीश कुमार ने चुप्पी साधी

हर मसले पर मुखर राय रखने वाले पत्रकार रवीश कुमार अपने संस्थान एनडीटीवी के घपलों-घोटालों और छंटनी पर चुप्पी साध जाते हैं. ताजी सूचना के मुताबिक एनडीटीवी ने अपने यहां से छह दर्जन से ज्यादा मीडियाकर्मियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. इनमें से ज्यादातर तकनीकी कर्मी हैं. करीब 35 तो कैमरामैन ही हैं. बाकी टेक्निकल स्टाफ है. वे कैमरामैन में जो पहले एडिटोलियल टीम के सदस्य थे, अब एचआर ने उन्हें टेक्निकल स्टाफ में कर दिया है.

ये सभी ग्रुप के अंग्रेजी हिंदी व अन्य चैनलों में काम करते थे. संपादकीय विभाग के अन्य लोगों पर भी गाज गिर सकती है. सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं क्या रवीश कुमार भी इस छंटनी के मसले पर कुछ बोलेंगे… क्या वे इस मामले में मुंह खोलेंगे. उल्लेखनीय है कि सीबीआई रेड पड़ने पर एनडीटीवी के पक्ष में तमाम बुद्धिजीवी खड़े हो गए थे. अब एनडीटीवी से 70 लोग निकाले गए हैं तो इनके परिवारों के पक्ष में कोई दो लाइन लिखने के लिए आगे आने वाला नहीं है.

आउटलुक मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार एनडीटीवी प्रबंधन ने अपने यहां से 70 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ज्ञात हो कि पिछले कुछ दिनों से एनडीटीवी ने MoJo यानि मोबाइल जर्नलिज्म शुरू किया है. इसके बाद ही माना जा रहा था कि कैमरामैन निकाल दिए जाएंगे. मोजो जर्नलिज्म के प्रयोग के बाद अब रिपोर्टर के साथ कैमरामैन नहीं जाता है. रिपोर्टर खुद मोबाइल से वीडियो बनाता है. एनडीटीवी भी कहता है कि वह मोजो यानी मोबाइल बेस जर्नलिज्म की ओर बढ़ रहा है.

इस छंटनी को लेकर फेसबुक पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं :

राजीव राय : एनडीटीवी से तकरीबन 60 लोगों को बाहर निकाल दिया गया है. उम्मीद है Ravish Kumar जी! इसपर भी कोई ब्लॉग या पोस्ट लिखेंगे और अपने साथी पत्रकारों के लिए ठीक वैसे ही आवाज़ बुलंद करेंगे जैसे अपने मालिक प्रणाॅय राॅय के लिए किया था.
Mayank Saxena : 6 महीने पहले ही जब एनडीटीवी ने अपने रिपोर्टर्स को मोबाइल दे कर उससे स्टोरी और लाइव करने को कहा था…तभी मुझे लग गया था कि छंटनियां होने वाली हैं…कैमरापर्सन्स ही सबसे ज़्यादा होंगे, मेरे हिसाब से इन 70 लोगों में…
Rajat Amarnath : NDTV ने सफेद हाथियों की सैलरी कम करने की जगह अपने करीब100 लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने का फैसला किया है (ज्यादातर टैक्निकल स्टाफ है). इस मौके पर एक प्राइम टाईम तो बनता है- “जुबां पे सच,दिल में इंडिया… NDTV इंडिया”
Ajay Prakash : एनडीटीवी ने की 70 कर्मचारियों की छंटनी… देखना होगा कि कौन से नेता और बुद्धिजीवी बाहर किये जाने वाले लोगों के समर्थन में आकर जंतर—मंतर पर प्रदर्शन करते हैं.

इस बीच, एनडीटीवी समूह ने एक बयान जारी कर कहा है- ‘दुनियाभर के अन्य न्यूज ब्रॉडकास्टर की तरह एनडीटीवी भी मोबाइल जर्नलिज्म पर ध्यान केंद्रित करते हुए अपने न्यूज रूम और रिसोर्सेज का पुनर्गठन कर रही है। एनडीटीवी ने हमेशा प्रारंभिक स्तर पर ही नई टेक्नोलॉजी को ग्रहण किया है और हम (एनडीटीवी) देश का पहला नेटवर्क है, जिसने मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर खबरों को शूट करने के लिए अपने पत्रकारों को प्रशिक्षित किया है। यह सिर्फ कॉस्ट-कटिंग नहीं है, बल्कि यह निश्चित रूप से हमारे लिए किसी भी अन्य बिजनेस की तरह या यूं कहें कि ऑपरेशंस का महत्वपूर्ण फैक्टर है।”

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मोदी सरकार में हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते!

Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

कोई भी व्यावसायिक मीडिया बिना चोरी, छिछोरी, काला धन और कमीनेपन के नहीं चल सकता। एनडीटीवी भी नहीं। विरोध भी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई भी व्यावसायिक घराना निष्पक्ष अखबार या चैनल नहीं चला सकता। निष्पक्ष होने के लिए काले धन और व्यवसाय से विरक्त होना पड़ेगा। नेहरु ने इस खतरे को समझ लिया था और कहा था कि अखबार को कोआपरेटिव सोसाईटी या ट्रस्ट के तहत ही चलाया जाना चाहिए। नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, कौमी आवाज़ का प्रयोग भी उन्होंने किया था। जो मिस मैनेजमेंट और मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ गया। हिंदू और ट्रिब्यून जैसे अखबार आज भी ट्रस्ट के तहत प्रकाशित होते हैं तो वहां कुछ खबर के सरोकार शेष हैं, कर्मचारियों के शोषण में कुछ अतिरेक नहीं है। अकबर इलाहाबादी याद आते हैं:
तीर निकालो न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो
तो एनडीटीवी न तीर है, न तलवार, न तोप। किसी गैंग की तरह एकपक्षीय और लाऊड खबर की तलब में डूबा, सत्ता विरोध के खबर की आड़ में काले धन की खेती करता है एनडीटीवी भी। मनी लांड्रिंग और फेरा जैसे आरोपों में घिरा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाले में गले तक हिस्सेदार है। सिर्फ़ साफ सुथरी, हिप्पोक्रेसी भरी बातें करने से, सेक्यूलरिज्म का ताश फेंटने से, सत्ता विरोध की नकली हुंकार से ही कोई साफ सुथरा नहीं हो जाता। एनडीटीवी के सत्ता विरोध का एक हिस्सा और जान लीजिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी इस के सरपरस्तों में से एक हैं। वाम नेता वृंदा करात प्रणव रॉय की बीवी राधिका रॉय की बहन हैं। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि की दलाली की दुकान एनडीटीवी से ही तो संचालित होती थी कांग्रेस राज में। आप लोग इतनी जल्दी भूल गए? आदि-इत्यादि बहुत से किस्से हैं। फिर कभी।

अभी बस इतना ही जानिए कि सभी मीडिया घरानों की तरह एनडीटीवी भी पाप और भ्रष्टाचार का घड़ा है, काले धन के कारोबार पर टिका है। सो इस के पक्ष में अपनी भावना और ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट करने से बचें। जो हो रहा है, होने दें। इसलिए भी कि यह मोदी विरोध की कीमत नहीं है, काले करतूत की कीमत है। इसका ही तकाज़ा है। बस इतना समझ लीजिए कि मीडिया होने की ताकत में एनडीटीवी का बहुत कुछ सड़ा हुआ सामने आने से बचा हुआ है। मोदी सरकार में हिम्मत नहीं है। हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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प्रणय और राधिका राय द्वारा ICICI बैंक को 48 करोड़ का चूना लगाने के कारण पड़े छापे

एनडीटीवी के को-फाउंडर और एग्जिक्यूटिव चेयरपर्सन प्रणय रॉय के घर पर सीबीआई और आईटी रेड पड़ने के बाद पूरे देश में हड़कंप मचा हुआ है. सीबीआई की टीम प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय से बैंक फ्रॉड के मामले में भी पूछताछ कर रही है. इनके खिलाफ केस भी दर्ज हो गया है. सीबीआई की टीम ने दिल्ली और देहरादून के चार ठिकानों पर छापे मारे हैं.

केंद्रीय जांच ब्यूरो और इनकम टैक्स की टीमों ने प्रणय राय के दिल्ली, देहरादून समेत देश भर के कई ठिकानों पर जो छापेमारी की है, वह आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ रुपये चूना लगाने को लेकर है. ICICI बैंक को नुकसान पहुंचाने के मामले में एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय, राधिका राय और एक अन्य कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज कर दिल्ली और देहरादून समेत चार जगहों पर छापे डाले गए हैं.

सीबीआई सूत्रों का कहना है कि प्रणव, राधिका और एक निजी कंपनी पर आईसीआईसीआई बैंक को 48 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने के मामले में रिपोर्ट दर्ज कर यह छापेमारी की गई है. प्रणय रॉय के दिल्ली स्थित घर पर भी इनकम टैक्स विभाग ने रेड किया है. इस मामले में समाचार एजेंसी एएनआई का ताजा ट्वीट और भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का ताजा ट्वीट इस प्रकार है..

ANI @ANI_news CBI registered a case against Prannoy, Radhika Roy and others for causing an alleged loss to ICICI bank to the tune of 48 Crore: CBI Sources

BJP MP Subramanian Swamy on CBI raids at Prannoy Roy’s locations- ”Fear of law is necessary and it should be applied no matter who you are.” भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी- ”कानून का डर हर किसी के अंदर होना चाहिए… फिर वो चाहे कितनी बड़ी ही शख्सियत क्यों न हो”।

2जी स्कैम के पैसे को चिदंबरम के साथ मिलकर ब्लैक से ह्वाइट करने के मामले में प्रणय राय इनकम टैक्स की जांच में आरोपी हैं. इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय ने फेमा प्रावधानों का उल्लंघन करने को लेकर एनडीटीवी के खिलाफ 2,030 करोड़ रुपए का नोटिस जारी किया था. ईडी ने ये नोटिस प्रणय रॉय, राधिका रॉय और सीईओ केवीएल नारायण राव के खिलाफ जारी किया गया था.

मूल खबर…

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एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय के घर पर इनकम टैक्स छापा

एक बड़ी खबर एनडीटीवी ग्रुप से आ रही है. चैनल के मालिक प्रणय राय के ठिकानों पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा है. सीबीआई ने इस बात की पुष्टि की है. इस बाबत समाचार एजेंसी एएनआई ने जो ट्विटर पर न्यूज फ्लैश जारी किया है उसमें कहा गया है कि प्रणय राय के दिल्ली स्थित घर पर इनकम टैक्स विभाग ने रेड किया है और इसकी पुष्टि केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने की है.

ज्ञात हो कि मोदी सरकार के निशाने पर एनडीटीवी मीडिया समूह शुरू से है. 2जी स्कैम के पैसे को चिदंबरम के साथ मिलकर ब्लैक से ह्वाइट करने के मामले में प्रणय राय इनकम टैक्स की जांच में आरोपी हैं. मनमोहन सरकार के कार्यकाल में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस स्कैम और इसमें चिदंबरम और प्रणय राय की मिलीभगत को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया था जिसके बाद इस आईआरएस अधिकारी को तरह तरह से प्रताड़ित किया गया.


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मोदी सरकार बनने के बाद जांच आगे बढ़ी और कई नोटिस एनडीटीवी और अन्य को भेजे गए. अब इनकम टैक्स ने छापा डालकर इस मामले के कई पहलुओं की पड़ताल शुरू की है. यह भी कहा जाता है कि एनडीटीवी समूह मोदी सरकार को रास नहीं आता इस कारण भी इस ग्रुप के खिलाफ जांच को तेज किया गया है वहीं दूसरे मीडिया समूह जैसे जी ग्रुप और पंजाब केसरी आदि मोदी राज में सरकार की गुणगान में लगे हैं या फिर भाजपा से इनके मालिकान जुड़े हैं, इसलिए इन्हें हर तरह से खुली छूट दी गई है.

ताजा छापों के मामले में बताया जा रहा है कि यह प्रकरण बैंक लोन न चुकाने का है. आईसीआईसीआई बैंक का करोड़ों रुपये हड़पने के मामले को लेकर सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय, राधिका राय, एक प्राइवेट कंपनी और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है. दिल्ली, देहरादून समेत कई शहरों में एनडीटीवी और प्रणय राय के ठिकानों पर सीबीआई व इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी जारी है.

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‘एनडीटीवी 24×7’ की एंकर ने लाइव डिबेट में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा को शो से जाने के लिए कह दिया

Vineet Kumar : ये संबित पात्रा का अपमान नहीं, टीवी में भाषा की तमीज बचाने की कोशिश है… कल रात के शो में निधि राजदान (NDTV 24X7) ने बीजेपी प्रवक्ता और न्यूज चैनल पैनल के चर्चित चेहरे में से एक संबित पात्रा से सवाल किया. सवाल का जवाब देने के बजाय संबित ने कहा कि ये एनडीटीवी का एजेंडा है, चैनल एजेंडे पर काम करता है. निधि राजदान को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसके बाद आखिर-आखिर तक सिर्फ एक ही बात दोहराती रही- ”प्लीज, आप इस शो से जा सकते हैं. आप प्लीज ये शो छोड़कर चले जाएं. ये क्या बात हुई कि आपसे कोई सवाल करे तो आपको वो एजेंडा लगने लग जाए.”

संबित इसके बावजूद शो में बने रहे और कहा कि वो चैनल को एक्सपोज करेंगे, निधि ने आगे जोड़ा- ”आपको दूरदर्शन की तरह जो चैनल ग्लोरिफाय करके दिखाते हो, वहीं जाएं, एनडीटीवी पर मत ही आएं.”

इस पूरी घटना के कई पाठ हो सकते हैं. इसे संबित पात्रा सहित देश की सबसे बड़ी पार्टी का अपमान के साथ जोड़कर देखा जा सकता है. दूसरी तरफ निधि राजदान की बतौर एक एंकर ताकत का भी अंदाजा लगाया जा सकता है. उनकी हीरोईक प्रेजेंस को सिलेब्रेट किया जा सकता है और विरोधी पार्टी के लोग रात से ही शुरु हो गए हैं. ये भी कहा जा सकता है कि एक एंकर जब अपने काम को ठीक-ठीक समझ पाए तो वो बहस के नाम पर कुछ भी बोलने नहीं दे सकते. लेकिन इन बहुस्तरीय पाठ के बीच जो सबसे जरुरी चीज है कि निधि राजदान ने जिस अंदाज में संबित पात्रा को शो से जाने कहा और एजेंड़े शब्द पर आपत्ति दर्ज की, वो इस बात की मिसाल है कि टीवी में तेजी से खत्म होती भाषा के बीच उसे बचाने की जद्दोजहद और तमीज बनाए रखने की कोशिश है. तथ्य के बदले पर्सेप्शन या धारणा, सहमति-असहमति के बजाय खुली चुनौती और देख लेंगे के अंदाज में जो नुरा कुश्ती चलती रहती है, उससे अलग निधि का इस तरह टोका जाना इस बात का संकेत है कि आप कहने के नाम पर कुछ भी नहीं कह सकते.

व्यावसायिक स्तर पर एनडीटीवी ग्रुप के अपने कई पेंच हो सकते हैं और उन्हें वैधानिक स्तर पर चुनौती मिलती रही है लेकिन एक एंकर जब सतर्कता से अपने पैनलिस्ट को पर्सेप्शन बनाने से रोकते हैं तो इसका एक अर्थ ये भी है कि वो अपने चैनल ब्रांड को लेकर कॉन्शस है. उन्हें पता है कि जब एजेंडा शब्द को पचा लिया जाएगा तो इसकी ब्रांड वैल्यू पर बुरा असर पड़ेगा. इसे सुनकर रह जाना खुद की क्रेडिबिलिटी पर बड़ा सवाल है.

आज जबकि हर दूसरे-तीसरे चैनल के एंकर ब्रांडिंग और वीरगाथा काल में फर्क करना तेजी से भूलते जा रहे हों, निधि राजदान का ये हस्तक्षेप टीवी में भाषा की तेजी से खत्म होती तमीज की तरफ इशारा है. एक मीडिया छात्र के नाते हमें इस सिरे से भी सोचना होगा कि एक तरफ जब एंकर खुद बेलगाम होते जा रहे हों, वो खुद ऐसे शब्दों का प्रयोग करते आए हों जिन्हें सुनकर आपकी उम्मीदें घुट-घुटकर दम तोड़ दे रही हों, निधि राजदान का ये अंदाज न्यूज चैनल की एक दूसरी परंपरा जो तेजी से खत्म होती जा रही है, याद करने की बेचैनी है, उसे बचाए रखने की कोशिश है.

आनेवाले समय में बहुत संभव है संबित सहित पूरी तरह उनकी पार्टी भी इस चैनल का बायकॉट कर दे लेकिन इससे पहले इस वीडियो से गुजरा जाएं तो आप इस बात से असहमत नहीं हो सकेंगे कि भाषा की ध्वस्त परिस्थिति में एक एंकर ऐसा करके दरअसल खुद को, अपने पेशे की गरिमा बचाने की कोशिश कर रही हैं. अपने सालों की उस मेहनत को जो नौकरी से कहीं आगे की चीज हैं. एक मीडियाकर्मी यदि भाषा के स्तर पर समझौते कर लेता है तो इसका मतलब है कि बाकी का उसका पूरा काम व्याकरण ठीक करते रहने में निकल जाएगा. भाषा व्याकरण से कहीं आगे एक बेहतर समाज की परिकल्पना है.

वीडियो के लिए चटकाएं.

https://www.youtube.com/watch?v=mhSKGOEHM9A

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार की एफबी वॉल से.

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रिपोर्टरों की इनवेस्गेटिव स्टोरीज पर मीडिया मालिक कर लेते हैं डील… सुनिए एनडीटीवी की कथा

Abhishek Srivastava : एक और कहानी। एनडीटीवी में किसी ने पहाड़ पर लग रही एक परियोजना पर स्‍टोरी बड़ी मेहनत से की। स्‍टोरी लेकर वो आया। इनजेस्‍ट करवाया। जिस दिन उसे प्रसारित होना था, उस दिन उसके पास वरिष्‍ठ का फोन आया। कहा गया- तुम बोलो तो चला दें। अब ये भी कोई बात हुई भला? ख़बर की ही थी चलाने के लिए। न चलाने का विकल्‍प कहां है। रिपोर्टर ने भी स्‍वाभाविक जवाब दिया। ख़बर नहीं चली क्‍योंकि परियोजना और चैनल के बीच एक नाम कॉमन था- जिंदल। अब रिपोर्टर क्‍या करे? नौकरी छोड़ दे? आप उसका घर चलाएंगे? क्‍या वो किसी हथियार कारोबारी सांसद को खोजे अपनी स्‍टोरी पर पैसा लगाने के लिए? अगर उसकी नीयत और उसका विवेक सही है तो वह ऐसा कुछ नहीं करेगा, बल्कि बिना बिदके अगली बढि़या स्‍टोरी करेगा। क्‍यों? क्‍योंकि एक स्‍तर पर अपनी की हुई ख़बर से वह मुक्‍त हो चुका है और अपनी सीमाएं जानता है।

कहने का लब्‍बोलुआब ये है कि ख़बर करना एक बात है और ख़बर से मुक्‍त हो जाना दूसरी बात। हर रिपोर्टर जब तक ख़बर लिख नहीं लेता, उसके मन पर एक बोझ-सा बना रहता है। ख़बर फाइल कर देने के बाद वह बोझमुक्‍त हो जाता है। फिर वो छपे या न छपे, चले या न चले- अपनी बला से! पत्रकारिता में अगर कोई रचना-प्रक्रिया होती होगी, तो सहज यही है। जो पत्रकार ख़बर से मुक्‍त नहीं हो पाता यानी हर कीमत पर अपनी ख़बर को प्रसारित करवाने के लिए भिड़ा रहता है और जोड़तोड़ से ऐसा कर भी ले जाता है, मुझे उसकी मंशा पर शक़ होता है। ख़बर के आगे-पीछे लगा लाभ-लोभ का लासा ऐसे रिपोर्टर के भीतर बैठे ‘पत्रकार’ को अंतत: ले डूबता है। ऐसा सब नहीं कर पाते, लेकिन जो कर पाते हैं वे ही एक दिन संपादक, मालिक, सीईओ बनते हैं और फिर ताजि़ंदगी खबरों को दबाने का धंधा करते हैं।

एनडीटीवी जैसे हज़ारों केस होंगे। हैं भी। ऐसे तमाम रिपोर्टर अपनी खबर दबाए जाने पर दुखी होते हैं और रात में किसी तरह ग़म भुलाकर अगले दिन फिर नई स्‍टोरी पर लग जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो एकाध घटनाओं के बाद मान बैठते हैं कि एक उदार पूंजीपति ही पत्रकारिता की रक्षा कर सकता है। फिर उनका चौबीस घंटा इसी फॉर्मूले को पुष्‍ट करने में बीतता है और हर नए संभ्रांत की हैसियत नापने में उसकी आंख मोतियाबिंद का शिकार हो जाती है। निष्‍कर्ष यह निकलता है कि फि़लहाल पत्रकारिता में भरोसा रखने वाले केवल दो ही किस्‍म के प्राणी शेष हैं- एक जो चुपचाप स्‍टोरी किए जा रहे हैं और दूसरे, जो किसी दैवीय फंडर की आस में कलम खड़ी कर चुके हैं। बाकी यानी बहुतायत केवल ईएमआइ चुकाने के लिए दस घंटे की स्‍टेनोग्राफी कर रहे हैं क्‍योंकि वे पत्रकारिता को ‘क्रांति’ करना मानते हैं और यह उनके वश में नहीं।

कई अखबारों में वरिष्ठ पद पर रहे और इन दिनों सोशल मीडिया समेत कई मंचों पर सक्रिय पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी माफी मांग ले तो एक दिन का प्रतिबंध हम भी माफ कर देंगे : मोदी सरकार

एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. केंद्र की मोदी सरकार ने कहा है कि पठानकोट एयरबेस पर आतंकी मामले की गलत रिपोर्टिंग के लिए चैनल अगर माफी मांग ले तो वह एक दिन के प्रतिबंध को माफ कर सकती है. एनडीटीवी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि उन्हें हफ्ते भर का समय दिया जाए ताकि वह एनडीटीवी प्रबंधन से बात कर उसके रुख की जानकारी दे सकें. ऐसे में माना जा रहा है कि चैनल प्रबंधन विवाद को आगे न बढ़ाते हुए माफी मांगने को तैयार हो जाएगा और पूरे मामले का पटाक्षेप हो जाएगा.

न्यूज चैनल एनडीटीवी के प्रसारण पर एक दिन का प्रतिबंध लगाने के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी पक्ष पेश किया है जिसके मुताबिक एनडीटीवी 2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की रिपोर्टिंग के लिए माफी मांग ले तो वह एक दिन का बैन नहीं लगाएगी. एनडीटीवी के अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि चैनल को माफी मांगने की जानकारी देने के लिए उन्हें एक हफ्ते का समय चाहिए. कोर्ट ने हफ्ते भर का समय दे दिया है. मामले की अगली सुनवाई 31 मार्च को होगी.

केंद्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय का आरोप है कि एनडीटीवी इंडिया ने पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले की कवरेज में संवेदनशील जानकारी लीक की. इसके दंड में मंत्रालय ने  9 नवंबर की रात से 10 नवंबर 2016 की रात तक 24 घंटे तक प्रसारण बंद रखने का आदेश दिया था. इस पर खूब हंगामा हुआ. बाद में मंत्रालय ने चैनल पर एक दिन के प्रतिबंध को ठंडे बस्ते में डाल दिया. उधर, चैनल इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट चला गया.

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मोदी राज में कितना डरपोक हो गया है एनडीटीवी, इसे अब अपने एडिटर्स पर ही भरोसा नहीं!

एनडीटीवी कभी साहसी मीडिया हाउस हुआ करता था. लेकिन जबसे प्रणय राय कांग्रेसी मंत्रियों के साथ मिलकर काला धन को सफेद करने के धंधे में पड़ गए और उनकी सारी पोल एक आईआरएस अफसर संजय कुमार श्रीवास्तव ने खोल दी तो उन्हें अब फूंक फूंक कर कदम रखना पड़ रहा है. सूत्र बताते हैं कि एनडीटीवी के ढेर सारे काला कारनामों की फाइलें पीएम नरेंद्र मोदी की मेज पर महीनों से पड़ी हुई हैं. एनडीटीवी के बड़े-बड़े पत्रकार अरुण जेटली से लाबिंग करवा रहे हैं कि उन फाइलों को साइलेंट मोड में डाल दिया जाए, कोई एक्शन न रिकमेंड किया जाए.

मीडिया फ्रेंडली अरुण जेटली भी एनडीटीवी वालों की बात से सहमत होते हुए पीएम मोदी से घुमा फिराकर बातें कर रहे हैं. नतीजा क्या होगा, यह तो नहीं पता क्योंकि पीएम मोदी ने अभी हां या ना नहीं कहा है, बस फाइल रोके हुए हैं, ऐसा सूत्र बताते हैं. पर एनडीटीवी के मालिकों की इतने में ही सांस अंटकी हुई है. वे दुविधा और भयों में जीते हुए इतने डिप्रेस्ड हो गए हैं कि कुछ भी नया रिस्क, नया चैलेंज नहीं लेना चाहते. यहां तक कि अपने संपादकों के आर्टकिल्स के आखिर में डिस्क्लेमर डाल देते हैं कि इन विचारों से एनडीटीवी का कोई लेना देना नहीं है. ऐसे में पूछना पड़ेगा कि हे भाई एनडीटीवी, आपका किन विचारों से लेना देना है?

बिलकुल उपर सुधी रंजन सेन द्वारा लिखे गए आर्टकिल के शुरुआती हिस्से का स्क्रीनशाट है और बिलकुल नीचे डिस्क्लेमर का स्क्रीनशाट है जिसे आर्टकिल के अंत में लिखा गया है. सुधी रंजन सेन एनडीटीवी में सेक्युरिटी और स्ट्रेटजिक अफेयर्स के एडिटर हैं. उनके साथ कैमरामैन भी था. ये लोग कश्मीर गए थे. वहां जो आंखों देखा, उसे लिखा. लेकिन एनडीटीवी इतना सशंकित है कि कहीं इस आर्टकिल से मोदी जी नाराज न हो जाएं, इसलिए उसने लास्ट में डिस्क्लेमर डाल दिया कि इस आर्टकिल में कही गई बातों, तथ्यों का एनडीटीवी से कोई लेना देना नहीं है, यह लेखक के अपने निजी विचार हैं. धन्य हो एनडीटीवी, धन्य हैं आप मिस्टर प्रणय राय. लगता है बुढ़ौती में गड़बड़ा गए हैं.

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