प्रिया का आंख मारना मौलानाओं को नहीं पचा, हैदराबाद में एफआईआर

Dayanand Pandey : मलयाली अभिनेत्री प्रिया प्रकाश वारियर एक आंख मार कर देश भर के लिए क्रश बन कर मौलानाओं को खटक गई है। इसकी वीडियो अलग-अलग तरह से वायरल हो कर पहले वाट्स अप पर मिली थी। अब खबरों में मिल रही है, स्टोरी बन कर। कई हस्तियों के साथ भी इस वीडियो को जोड़ दिया गया है। 18 साल की यह लड़की इसे आई ब्रो डांस बता रही हैं। लेकिन मौलाना लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हो गई हैं। हैदराबाद में एफआईआर भी दर्ज हो गई है प्रिया के ख़िलाफ़।

मैं तो इस स्वीट प्रिया के साथ हूं। प्रिया का यह आई ब्रो डांस मुझे अच्छा लगा है। नैसर्गिक स्वाभाविकता लिए इस दृश्य में ताज़गी भी लबालब है। आई ब्रो डांस का ऐसा कमाल एक बाइक के विज्ञापन में भी एक माडल ने हलका सा किया है। बाइक के इस विज्ञापन का सारा कमाल ही उस लड़की की आंखें हैं, जिन्हें मटकाते हुए वह अपने साथी की कमीज की कालर उठा कर उसे सुपर बना देती है। लेकिन इस प्रिया की आंखों ने तो कमाल कर दिया है। फैज के लिखे, तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है की याद दिला दी है, प्रिया ने। एक बार इन आंखों की कशिश तो देखिए। खैर, मौलाना लोग चाहे जो ऐतराज और जहर उगलें , लेकिन प्रिया की तो चल पड़ी है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अकेले शराब पीने को हस्त मैथुन मानते थे रवींद्र कालिया

Dayanand Pandey : संस्मरणों में चांदनी खिलाने वाला रवींद्र कालिया नामक वह चांद… आज रवींद्र कालिया का जन्म-दिन है… ‘ग़ालिब छुटी शराब’ और इस के लेखक और नायक रवींद्र कालिया पर मैं बुरी तरह फ़िदा था एक समय। आज भी हूं, रहूंगा। संस्मरण मैं ने बहुत पढ़े हैं और लिखे हैं। लेकिन रवींद्र कालिया ने जैसे दुर्लभ संस्मरण लिखे हैं उन का कोई शानी नहीं। ग़ालिब छुटी शराब जब मैं ने पढ़ कर ख़त्म की तो रवींद्र कालिया को फ़ोन कर उन्हें सैल्यूट किया और उन से कहा कि आप से बहुत रश्क होता है और कहने को जी करता है कि हाय मैं क्यों न रवींद्र कालिया हुआ। काश कि मैं भी रवींद्र कालिया होता। सुन कर वह बहुत भावुक हो गए।

उन दिनों वह इलाहबाद में रहते थे। बाद के दिनों में भी मैं उन से यह बात लगातार कहता रहा हूं । मिलने पर भी , फ़ोन पर भी । हमारे बीच संवाद का यह एक स्थाई वाक्य था जैसे। इस लिए भी कि ग़ालिब छुटी शराब का करंट ही कुछ ऐसा है। उस करंट में अभी भी गिरफ़्तार हूं। इस के आगे उन की सारी रचनाएं मुझे फीकी लगती हैं। ठीक वैसे ही जैसे श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी के आगे उन की सारी रचनाएं फीकी हैं। ग़ालिब छुटी शराब के विवरणों में बेबाकी और ईमानदारी का जो संगम है वह संगम अभी तक मुझे सिर्फ़ एक और जगह ही मिला है। खुशवंत सिंह की आत्म कथा सच प्यार और थोड़ी सी शरारत में। रवींद्र कालिया खुशवंत सिंह की तरह बोल्ड और विराट तो नहीं हैं पर जितना भी वह कहते परोसते हैं उस में पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता झलकती है। जैसे बहते हुए साफ पानी में दिखती है। मयकश दोनों हैं और दीवाने भी। लेकिन खुशवंत सिंह को सिर्फ़ एक मयकशी के लिए दिन-दिन भर प्रूफ़ नहीं पढ़ने पड़ते। तमाम फ़ालतू समझौते नहीं करने पड़ते। इसी लिए रवींद्र कालिया की मयकशी बड़ी बन जाती है।

कितने मयकश होंगे जो अपने अध्यापक के साथ भी बतौर विद्यार्थी पीते होंगे। अपने अध्यापक मोहन राकेश के साथ रवींद्र कालिया तो बीयर पीते थे। बताईए कि पिता का निधन हो गया है। कालिया इलाहबाद से जहाज में बैठ कर दिल्ली पहुंचते हैं, दिल्ली से जालंधर। पिता की अंत्येष्टि के बाद शाम को उन्हें तलब लगती है। पूरा घर लोगों , रिश्तेदारों से भरा है। घर से बाहर पीना भी मुश्किल है कि लोग क्या कहेंगे। घर में रात का खाना नहीं बनना है। सो किचेन ही ख़ाली जगह मिलती है। वह शराब ख़रीद कर किचेन में अंदर से कुंडा लगा कर बैठ जाते हैं। अकेले। गो कि अकेले पीना हस्त मैथुन मानते हैं।

श्वसुर का निधन हो गया है। रात में मयकशी के समय फ़ोन पर सूचना मिलती है। पर सो जाते हैं। सुबह उठ कर याद करते हुए से ममता जी से बुदबुदाते हुए बताते हैं कि शायद ऐसा हो गया है। अब लेकिन यह ख़बर सीधे कैसे कनफ़र्म की जाए। तय होता है कि साढ़ू से फ़ोन कर कनफ़र्म किया जाए। साढ़ू इन से भी आगे की चीज़ हैं। कनफ़र्म तो करते हैं पर यह कहते हुए कि आज ही हमारी मैरिज एनिवर्सरी है। इन को भी अभी जाना था। सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया। शराब ही है जो आधी रात मुंबई में धर्मवीर भारती के घर पहुंचा देती है । उन की ऐसी-तैसी कर के लौटते हैं। सुबह धर्मयुग की नौकरी से इस्तीफ़ा भेजते हैं।

शराब ही है जो अपना प्रतिवाद दर्ज करने इलाहबाद में सोटा गुरु भैरव प्रसाद गुप्त के घर एक रात ज्ञानरंजन के साथ पहुंच कर गालियां का वाचन करवा देती है। रात भर। भैरव प्रसाद गुप्त के घर से कोई प्रतिवाद नहीं आता। सारी बत्तियां बुझ जाती हैं। कन्हैयालाल नंदन को जिस आत्मीयता से वह अपनी यादों में बारंबार परोसते हैं वह उन की कृतज्ञता का अविरल पाठ है। परिवार चलाने के लिए ममता कालिया की तपस्या, उनका त्याग रह-रह छलक पड़ता है ग़ालिब छुटी शराब में। हालांकि शराब पीने को वह अपने विद्रोह से जोड़ते हुए लिखते हैं, ‘मुझे क्या हो गया कि मसें भीगते ही मैं सिगरेट फूंकने लगा और बीयर से दोस्ती कर ली। यह शुद्धतावादी वातावरण के प्रति शुद्ध विद्रोह था या वक्ती या उम्र का तकाज़ा। माहौल में कोई न कोई जहर अवश्य घुल गया था कि सपने देखने वाली आंखें अंधी हो गई थीं। योग्यता पर सिफ़ारिश हावी हो चुकी थी।’

वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें : xxx   xxx 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

‘रविवार’ के संपादक एसपी सिंह और रिपोर्टर शैलेश यूं निकल पाए थे दबंग मंत्री के आपराधिक मानहानि के मुकदमे से!

Dayanand Pandey : अमित शाह के बेटे जय शाह पर आरोप सही है या गलत यह तो समय और अदालत को तय करना है। पर इन दिनों बरास्ता द वायर एंड सिद्धार्थ वरदराजन, रोहिणी सिंह सौ करोड़ के मानहानि के मुकदमे के बाबत हर कोई पान कूंच कर थूक रहा है, आग मूत रहा है। लेकिन आज आप को एक आपराधिक मानहानि के मुकदमे का दिलचस्प वाकया बताता हूं। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध की बात है। अमृत प्रभात, लखनऊ में एक रिपोर्टर थे शैलेश। कोलकाता से प्रकाशित रविवार में उत्तर प्रदेश के ताकतवर और दबंग वन मंत्री अजित प्रताप सिंह के ख़िलाफ़ एक रिपोर्ट लिखी शैलेश ने।

रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अजित सिंह ने लखनऊ की एक अदालत में आपराधिक मानहानि का मुकदमा कर दिया। रविवार के संपादक एसपी सिंह उर्फ सुरेंद्र प्रताप सिंह भी उस मुकदमें में नामजद हुए। अब वकील वगैरह लगे। खबर की पुष्टि में कुछ तथ्य गलत मिले। शैलेश के सूत्र ने उन्हें प्रमाण के तौर पर जो फोटोकापी सौंपी थी वह फर्जी निकली। सुरेंद्र प्रताप सिंह ने शैलेश से पूछा, अब? शैलेश से कुछ जवाब देते नहीं बना। अब हर पेशी पर कोलकाता से सुरेंद्र प्रताप सिंह को लखनऊ आना पड़ता था। शैलेश ने आजिज आ कर एक तरकीब निकाली। हर पेशी पर वह अदालत में रहते ही थे। सो हर पेशी की एक रिपोर्ट अमृत प्रभात में लिखने लगे। उस रिपोर्ट में शैलेश लिखते थे कि आज फला मामले की फिर तारीख़ थी। फिर उस रिपोर्ट में पूरी तफ़सील से बताते थे कि कोलकाता से प्रकाशित रविवार ने यह-यह आरोप लगाए हैं।

रविवार की वह रिपोर्ट जिस ने नहीं पढ़ी थी, वह भी महीने में दो बार अमृत प्रभात में हर तारीख़ के बहाने पढ़ लेता था। दैनिक अख़बार अमृत प्रभात की पहुंच भी बहुत ज़्यादा लोगों तक थी। रविवार की अपेक्षा बहुत ज़्यादा। ख़ास कर अजित प्रताप सिंह के प्रतापगढ़ के चुनाव क्षेत्र तक तो थी ही। मंत्री के ख़िलाफ़ ख़बर के नाते अमृत प्रभात की प्रसार संख्या भी वहां बढ़ गई। अब अजित सिंह तबाह हो गए। सारी दबंगई और सत्ता की ताकत बेअसर हो गई। बुलवाया शैलेश को और पूछा कि आख़िर आप चाहते क्या हैं? शैलेश ने दो टूक कहा कि, अपना मुकदमा उठा लीजिए, नहीं यह ख़बर तो छपती रहेगी! हार मान कर अजित सिंह ने रविवार के ख़िलाफ़ आपराधिक मुकदमा चुपचाप वापस ले लिया। बात खत्म हो गई। पर तब वह अमृत प्रभात जैसा अख़बार था, शैलेश जैसा रिपोर्टर था। और अब?

तब के अख़बार भी तोप मुक़ाबिल नहीं थे। लेकिन आज की तरह भाड़ और मिरासी भी नहीं थे। शैलेश बाद के दिनों में नवभारत टाइम्स, लखनऊ गए फिर रविवार के लखनऊ में ही प्रमुख संवाददाता हुए, फिर नवभारत टाइम्स, दिल्ली होते हुए आज तक, ज़ी न्यूज़ होते हुए न्यूज़ नेशन के कर्ताधर्ता बने थे।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यह संजय, शराब और शेरो शायरी का दौर था…. कह सकते हैं डिप्रेसन की इंतिहा थी…

स्वर्गीय संजय त्रिपाठी


होते हैं कुछ लोग जो सिर्फ़ संघर्ष के लिए ही पैदा होते हैं। हमारे छोटे भाई और फ़ोटोग्राफ़र मित्र संजय त्रिपाठी ऐसे ही लोगों में शुमार रहे हैं। आज जब संजय त्रिपाठी के विदा हो जाने की ख़बर सुनी तो दिल धक से रह गया। फ़रवरी, 1985 से हमारा उन का साथ था। 32 साल पुराना साथ आज सहसा टूट गया। लखनऊ में वह पहले मेरे ऐसे दोस्त बने जिन से आत्मीयता बनी। दुःख सुख का साथ बना। बिना किसी टकराव और अलगाव के कायम रहा। बिना कुछ कहे-सुने भी हम एक दूसरे को समझ लेते थे। साथ खबरें करते थे, घूमते थे, सिनेमा देखते थे। खुद्दारी रास आई सो दलाली, फोर्जरी, चापलूसी, चमचई न मुझे कभी भाई न संजय को जबकि पत्रकारिता में यह आम बात हो चली है। बिना इस के अब गुज़ारा नहीं है।

जो जितना बड़ा दलाल, उतना बड़ा पत्रकार। हम यह नहीं कर सके सो हम ने तो इस की भारी क़ीमत चुकाई है, चुका रहा हूं। कहां होना था और आज कहीं का नहीं रह गया हूं। एक से एक कौवे दलाली, चापलूसी कर के भाग्य विधाता बन गए और हम इन कौवों की बीट देखते-देखते खत्म हो गए। संजय त्रिपाठी भी इस मामले मेरे हमराही थे। वह इस बेरंग जिंदगी को विदा कह गए, मैं जाने क्यों शेष रह गया हूं। वह कोई तीन साल मुझ से छोटे थे। जब मेरे घर आते तो मेरे पैर छूते मेरे बड़े होने के नाते। बाद में मैं ने बहुत मना किया कि हम दोस्त हैं तो वह किसी तरह माने।

जनसत्ता, दिल्ली से स्वतंत्र भारत, लखनऊ में जब मैं रिपोर्टर हो कर आया था तब संजय वहां पहले ही से फ़ोटोग्राफ़र थे। हम भी तब मुटाए नहीं थे लेकिन संजय त्रिपाठी ख़ूब दुबले-पतले थे। सींक सलाई जैसे। उन के चेहरे पर मासूमियत कुलांचे मारती थी, उत्साह जैसे हिलोरें मारता था। संकोच की चादर जैसे उन के पूरी देह पर लिपटी रहती थी। खुद्दारी की खनक उन के हर भाव से मिलती रहती थी। वह साईकिल से चलते थे। गले में कैमरा लटकाए, कैमरा संभालते, साईकिल चलाते उन को देखना मुश्किल में डालता था। लेकिन वह मुश्किल में नहीं रहते थे। पान कूंचते हुए वह अपनी सारी मुश्किलें जैसे साईकिल के टायर से कुचलते चलते थे। स्वतंत्र भारत था तो उस समय लखनऊ का सब से बड़ा अखबार, सवा लाख रोज छपता था लेकिन संजय त्रिपाठी का शोषण तब यह अख़बार बहुत करता था। उस समय सब को पालेकर अवार्ड के हिसाब से तनख्वाह मिलती थी, ठीक ठाक मिलती थी लेकिन संजय त्रिपाठी को प्रति फ़ोटो पांच रुपए मिलते थे। वह भी प्रकाशित फ़ोटो पर।

वह फ़ोटो चाहे जितनी खींचें पर पैसे छपी फ़ोटो पर ही मिलती थी। और कई बार फ़ोटो सेलेक्ट हो कर भी नहीं छपती थी। कभी अचानक विज्ञापन आ जाने के कारण जगह की कमी के चलते। तो कभी किसी फ्रस्ट्रेटेड डेस्क के साथी की मनबढ़ई और सनक के चलते। खैर जैसे-तैसे संजय त्रिपाठी फोटोग्राफरी क्या चाकरी करते रहे थे। इस उम्मीद में कि कभी तो नौकरी पक्की होगी और कि उन्हें भी पालेकर अवार्ड वाली तनख्वाह मिलेगी। वह भी सम्मानजनक जीवन जिएंगे। लेकिन उन दिनों स्वतंत्र भारत में एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज। निहायत ही मूर्ख, दुष्ट और धूर्त प्रवृत्ति के थे लेकिन चूंकि दलाल टाईप के पत्रकार थे सो उन की अख़बार और अख़बार से बाहर भी ख़ूब चलती थी। संजय को वह भरपूर परेशान और अपमानित करते। नित नए ढंग से। उन को चढ़ाई करने के लिए अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिए रोज कोई शिकार चाहिए होता था। संजय त्रिपाठी से कमज़ोर शिकार कोई और नहीं मिलता था।

संजय त्रिपाठी और शिव सिंह सरोज जब कि एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे। बाराबंकी के हैदरगढ़ के। बल्कि संजय त्रिपाठी के पिता श्री रामकिशोर त्रिपाठी साठ के दशक में हैदरगढ़ से विधायक रहे थे। लेकिन वह गांधीवादी थे सो पैसा नहीं बनाया, बेईमानी नहीं की। वह  पराग दुग्ध संघ के अध्यक्ष थे। चाहते तो संजय को कहीं अच्छी नौकरी दे सकते थे, किसी जगह सिफ़ारिश कर सकते थे। संजय ने ऐसा कई बार चाहा भी लेकिन पिता ने सख्ती से हर बार इंकार किया। संजय मन मसोस कर रह जाते थे। संजय के पिता जी एक समय भूदान आंदोलन में सक्रिय रहे थे। उत्तर प्रदेश में तमाम भूमिहीनों को भूमि के पट्टे दिए। लेकिन अपने किसी परिजन को एक इंच भूमि नहीं दी। अपने बच्चों को तो खैर क्या देते। आवश्यक वस्तु निगम के भी एक समय प्रशासक रहे। लेकिन उस भ्रष्ट विभाग में भी एक पैसा भी संजय के पिता ने न तो छुआ, न किसी को छूने दिया।

ऐसे ईमानदार पिता के पुत्र संजय त्रिपाठी पांच रुपए प्रति फ़ोटो पर गुज़ारा कर रहे थे। रोज जीते थे, रोज मरते थे। किसी-किसी दिन एक भी फ़ोटो नहीं छपती। वह उदास हो जाते। शिव सिंह सरोज को बर्दाश्त करना उन के लिए दिन पर दिन भारी होता जा रहा था। नौकरों को भी कोई क्या डांटेगा जिस तरह शिव सिंह सरोज उन्हें डांटते, जलील करते। पर संजय करते भी तो क्या करते। उन के पास कोई विकल्प नहीं था। मैं देख रहा था, संजय दब्बू बनते जा रहे थे।  उन की मासूमियत उन से मिस हो रही थी। खैर थोड़े दिन में वह संपादक वीरेंद्र सिंह की कृपा से दैनिक वेतन भोगी फ़ोटोग्राफ़र बन गए। अब थोड़ा ही सही, कम से कम एक निश्चित पैसा प्रति माह उन्हें मिलने लगा था। दबे-दबे से रहने वाले संजय अब फिर से हंसने लगे थे। उभरने लगे। संजय त्रिपाठी की खिंची फ़ोटो में भी निखार आने लगा।

वह जो कहते हैं बाईलाईन, वह भी कभी-कभार संजय त्रिपाठी को फ़ोटो पर मिलने लगी। लेकिन कनवेंस अलाऊंस उन्हें नहीं मिलता था। जो उन दिनों डेढ़ सौ रुपए होता था। क्या तो उन के पास अपना कनवेंस नहीं था। हालां कि वह बहुत गुरुर के साथ कहते कि, ‘ है तो साईकिल मेरे पास! ‘ लोग हंस पड़ते। बहुत लड़े वह इस के लिए। कुछ संघर्ष के बाद उन्हें कनवेंस अलाऊंस भी मिलने लगा। और यह देखिए कि शिव सिंह सरोज के तमाम विरोध के बावजूद संपादक वीरेंद्र सिंह ने संजय त्रिपाठी को स्टाफ़ फ़ोटोग्राफ़र का नियुक्ति पत्र थमा दिया। अब संजय ने लोन ले कर एक मोपेड भी ख़रीद लिया। जिसे उन के साथी फ़ोटोग्राफ़र संजय की बकरी कहते। अभी तक शिव सिंह सरोज के अपमान सहते आ रहे संजय अब थोड़ा दब कर ही सही उन से प्रतिवाद करने लगे थे। लेकिन स्वतंत्र भारत में एक क्राईम रिपोर्टर थे आर डी शुक्ल जो वीरेंद्र सिंह के बड़े मुंहलगे थे, वह भी सताने लगे। लेकिन संजय मेरे साथ बहुत कंफर्ट फील करते।

बहुत से एसाइनमेंट हमारे साथ किए संजय ने। जब साईकिल से चलते थे तब वह हमारे साथ जब चलते तो अपनी साईकिल आफिस में छोड़ कर मेरी स्कूटर पर आ जाते। पीछे बैठे-बैठे ही वह फ़ोटो खींच लेते। ऐसी बहुत सी घटनाएं और यादें हैं। लेकिन कुछ दृश्य भुलाए नहीं भूलते। जैसे एक बार एक प्रदर्शन के समय विधान सभा के सामने लाठी चार्ज हो गया था। संजय बोले, थोड़ा रिश्क लीजिए तो हम बढ़िया फ़ोटो बना लें। हामी भरते ही वह रायल होटल की तरफ से हमारे स्कूटर पर पीछे की सीट पर पीछे मुंह कर के बैठे। बोले, बस खरामा-खरामा चलते चलिए। चौराहे पर आते ही पुलिस ने रोका लेकिन हम झांसा दे कर प्रेस-प्रेस कहते निकल लिए। बीच लाठी चार्ज में हमारी स्कूटर निकली। और संजय का कैमरा चमकने लगा। अचानक ठीक विधान सभा के सामने के आते ही पुलिस की चपेट में हम आ गए।

संजय घबराए और बोले, फुल स्पीड में भाग लीजिए, नहीं पिट जाएंगे। हम कितना भागते। पुलिस की एक लाठी संजय के कैमरे पर आती-आती कि संजय ने कैमरे पर झुक कर अपना सिर लगा दिया। कैमरा बच गया, संजय का सिर फूट गया। चोट गहरी नहीं थी पर थी।  स्कूटर सरपट भगा कर सिविल हास्पिटल आया। संजय को पट्टी वगैरह करवाई। लेकिन संजय को सिर पर चोट की परवाह नहीं थी। ख़ुश थे वह कि कैमरा बच गया और फ़ोटो अच्छी मिल गई थी। इस के पहले एक बार किसी प्रदर्शन में संजय का कैमरा टूट गया था। पांच हज़ार का उन का नुकसान हुआ था तब के दिनों। दफ़्तर से कोई सहयोग नहीं मिला था। वीरेंद्र सिंह ने बाद में मुझे डांटा। कहा कि, वह तो फ़ोटोग्राफ़र है, बैल है, बुद्धि नहीं है पर आप तो रिपोर्टर हैं, तिस पर लेखक भी, अकल से काम लेना था।  कहीं जान पर बन आती तो? एक लाठी चार्ज में एक नेता अक्षयवर मल की ऐसे ही किसी पुलिस लाठी चार्ज में सिर में चोट लगने से उन्हीं दिनों मौत हो चुकी थी। लेकिन दूसरे दिन संजय हीरो थे। अख़बार में आठ कालम की संजय की खींची फ़ोटो संजय की बाईलाईन के साथ छपी थी। ऐसी फ़ोटो किसी और अख़बार के पास नहीं थी। सभी अख़बार पिट गए थे।

एक बार लखनऊ महोत्सव के कवि सम्मेलन में शिव सिंह सरोज ने अपना सम्मान आयोजित करवाया। सम्मान समारोह की गरिमा बनाने के लिए अमृतलाल नागर सहित कुछ और लोगों को भी सम्मान सूची में रखवा लिया। तब के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सम्मानित करना था। ठाकुर प्रसाद सिंह कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे। वह सम्मान के समय शिव सिंह सरोज का नाम भूल गए और कवि सम्मेलन शुरू कर दिया। शिव सिंह सरोज संजय को ख़ास ताकीद कर के ले गए थे समारोह में कि मेरे सम्मान की बढ़िया फ़ोटो खींचना। पर जब सम्मान समारोह खत्म हो गया, शिव सिंह सरोज का नाम नहीं पुकारा गया तो कवि सम्मेलन शुरू होते ही संजय पेशाब करने पंडाल से बाहर चले गए। लेकिन एक कवि के कविता पाठ के बाद सरोज ने संचालक को याद दिलाया कि उन के सम्मान का क्या हुआ? तो उन्हों ने कवि सम्मेलन रोक कर शिव सिंह सरोज का सम्मान भी करवा दिया। फिर जल्दी ही शिव सिंह सरोज को कविता पाठ के लिए भी बुला लिया।

शिव सिंह सरोज का डबल अपमान हो गया। एक तो क्रम से सम्मान नहीं हुआ दूसरे उन की वरिष्ठता का ख्याल नहीं रखते हुए नए कवियों के साथ पहले ही कविता पाठ करने के लिए बुला लिए गए। गुस्से में आग बबूला वह कविता पाठ करने आए। आग्नेय नेत्रों से ठाकुर प्रसाद सिंह को देखते हुए उन्हों ने बेलीगारद शीर्षक लंबी कविता पढ़नी शुरु की और हूट होने लगे। इतना कि वीर रस की यह कविता करुण रस में तब्दील हो गई। लेकिन लाख हूटिंग के शिव सिंह सरोज ने पूरी कविता पढ़ी। सम्मान में मिली कंधे से गिर गई शाल पीछे मुड़ कर उठाई, कंधे पर रखी और अपनी जगह ऐसे आ कर बैठे सीना तान कर कि हल्दीघाटी जीत कर लौटे हों। लेकिन असली हल्दीघाटी तो दूसरे दिन की रिपोर्टिंग मीटिंग में शेष थी। उन्हों ने संजय से अपने सम्मान समारोह की फ़ोटो मांगी। तो संजय बिदक कर पूछ बैठे कि, ‘आप का सम्मान हुआ भी था?’ और उन्होंने जैसे जोड़ा, ‘हां आप के बेलीगारद कविता पाठ की फ़ोटो ज़रूर खींची है!’; कह कर उन के काव्य पाठ की फ़ोटो सामने रख दी।

शिव सिंह सरोज ऐसे फटे गोया आसमान फट गया हो। फ़ोटो फेकते हुए बोले, ‘बेलीगारद! भाग जाओ यहां से।’ मुख्य मंत्री ने हमको सम्मानित किया, पूरी दुनिया ने देखा और ई बेलीगारद देखि रहे थे!’ संजय उठ कर मीटिंग से बाहर चले गए। फिर घर चले गए। शिव सिंह सरोज ने संजय को बर्खास्त करने के लिए लिख दिया। वीरेंद्र सिंह ने टालते हुए कहा, यह बर्खास्तगी का विषय नहीं है। लेकिन संजय की तबीयत ख़राब हो गई। डिप्रेसन में चले गए। हफ़्ते भर बाद लौटे। संजय की जिंदगी फिर रफ़्तार पर आ गई। लेकिन अकसर बुदबुदाते हुए कहते यह बुड्ढा मेरी नौकरी खा जाएगा किसी दिन। शिव सिंह सरोज के इस बेलीगारद प्रसंग का सविस्तार वर्णन मैं ने अपने उपन्यास अपने-अपने युद्ध में किया है। हुआ यह भी कि मैं संजय को जब-तब बेलीगारद कह कर भी बुलाने लगा। वह कभी मुस्कुरा पड़ता तो कभी ताव खा जाता।

उन दिनों मैं दारुलशफा में रहता था तो मेरे घर अकसर आते संजय। दफ़्तर का दुखड़ा रोते। घर में भी कम दिक्कत नहीं थी। एक दिन वह बहुत ख़ुश होते हुए बोले, मालूम है पांडेय जी, इस दारुलशफा में मैं भी रहा हूं काफी समय। बचपन गुज़रा है मेरा यहां। पूछा कैसे? तो हलके से मुस्कुराते हुए बताया कि पिता जी एम एल थे न! फिर चुप हो गए।

पिता ईमानदारी का बरगद थे पर एक सौतेली माता भी थीं। उन का सौतेलापन भी कम नहीं था। संजय भीतर-बाहर दोनों तरफ टूट रहे थे। संयोग देखिए कि वीरेंद्र सिंह ने स्वतंत्र भारत से इस्तीफ़ा दे दिया तो शिव सिंह सरोज कार्यकारी संपादक बना दिए गए। कुछ दिनों के लिए ही सही। सरोज से मेरी भी नहीं निभती थी। संजय की तो खैर क्या कहूं। वह सरोज को का वा स बोलता। खैर सरोज के बाद पत्रकारिता में एक और दलाली के चैंपियन राजनाथ सिंह सूर्य संपादक की कुर्सी पर शोभायमान हो गए। मेरे लिए और मुश्किल हो गई। स्वतंत्र भारत से छुट्टी हुई और नवभारत टाइम्स आ गया। जल्दी ही राष्ट्रीय सहारा शुरू हुआ तो संजय त्रिपाठी भी स्वतंत्र भारत छोड़ राष्ट्रीय सहारा आ गए।

अब हम उन को संजय के बजाय मज़ा लेते हुए कहते, का हो , बेलीगारद!  राष्ट्रीय सहारा में आ कर संजय की जिंदगी जैसे पटरी पर आ गई। अब वह ख़ुश और मस्त दिखने लगे। लेकिन जल्दी ही वह फिर पटरी से उतर गए। रणविजय सिंह नाम का एक मूर्ख संपादक बन गया। जो पत्रकारिता का क ख ग भी नहीं जानता था। यह रणविजय सिंह शिव सिंह सरोज से भी ज़्यादा मूर्ख और धूर्त निकला। संजय से भी जूनियर था, मुझ से भी। वह संजय जैसे खुद्दार आदमी को निरंतर अपमानित करने लगा। संजय गालियां देते हुए कहता कि यार यह साला किस्मत का पट्टा लिखवा कर लाया है। अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। फिर जैसे टूटते हुए कहता हम जैसों की किस्मत भगवान ने गधे के लिंग से लिखी है। रणविजय को पेट भर गरियाता और कहता साले को कुछ आता-जाता नहीं लेकिन दिन-ब-दिन मज़बूत हुआ जाता है पैर छू-छू कर। तंत्र-मंत्र कर के। बाद के दिनों में हम भी राष्ट्रीय सहारा पहुंचे। संजय और हम फिर साथ हो गए।

रणविजय सिंह जैसे साक्षर, दलाल और धूर्त से मेरी भी कभी नहीं निभी। अजब अहमक था यह आदमी। बीच मैच में फ़ोटोग्राफ़र से मैन आफ़ द मैच की फ़ोटो मांगता। फ़ोटोग्राफ़र कहता कि अरे मैच खत्म होगा तब तो मैन आफ़ द मैच होगा। वह कहता टेक्निकल्टी मत समझाओ मुझे। मुझे तो बस फ़ोटो चाहिए। एक से एक मूर्खताएं करता रहता वह। समझ से पूरी तरह पैदल। निर्मल वर्मा का निधन हुआ तो तब के दिनों दिल्ली में फ़ीचर देख रहे मित्र से मैं ने फ़ोन कर कहा कि निर्मल जी पर एक विशेष पेज निकलना चाहिए। मेरे पास उन के एक इंटरव्यू सहित कुछ सामग्री है, कहिए तो भेज दूं। वह बोले, पहले संपादक से बात कर लूं फिर बताता हूं।थोड़ी देर में उन का फ़ोन आया। कहने लगे कुछ मत भेजिए। मैं ने कारण पूछा तो वह बताने लगे कि संपादक ने पूछा कि क्या बहुत बड़ा कलाकार था? मैं ने कहा, नहीं लेखक थे। तो मुंह बिचका कर कहने लगा फिर रहने दीजिए।

ऐसी मूर्खताओं के उस के अनेक किस्स्से हैं। लेकिन संजय सही कहता था, अल्ला मेहरबान तो गधा पहलवान। रणविजय तो समूह संपादक हो गया। और यह देखिए कि औरतबाजी, दलाली  करते-करते, ट्रांसफर, पोस्टिंग करते-करवाते सांसद निधि बरसने लगी उस पर, विधायक निधि बरसने लगी उस पर। लाखों, करोड़ों में। वह मैनेजमेंट कालेज खोल बैठा , इंजीनियरिंग कालेज भी। बारात घर भी। कई-कई घर और फार्म हाऊस। इधर संजय नींद की दवा खाने लगा। डिप्रेसन में जाने लगा। बच्चे बड़े हो रहे थे जिम्मेदारियां बढ़ रही थीं। तनाव उस से ज़्यादा। शराब तनाव से भी ज़्यादा। लाठियां खा कर भी फ़ोटो खींचने वाला संजय, कैमरे बचाने में सिर फोड़वा लेने वाला संजय अब एसाइनमेंट से भागने लगा। कभी मासूम सा दिखने वाला संजय अब अड़ने, लड़ने और झगड़ने वाला हो चला था। शिव सिंह सरोज से बड़ा सिरदर्द रणविजय सिंह हो गया संजय के लिए। लेकिन वह जैसे तैसे निभाता रहा। फ़ोटो खींचने में फ़ोटोग्राफ़र अकसर पिटते रहते हैं। कभी पुलिस पीटती है तो कभी गुंडे, कभी भ्रष्ट अफ़सर।

संजय राष्ट्रीय सहारा की नौकरी में भी कई बार पिटा। लेकिन वापस दफ़्तर आ कर भी जलील हुआ तो टूट-टूट गया। परिवार बिखरने लगा। अब यह देखिए कि एक दिन पता चला कि संजय ने आत्महत्या की कोशिश की। ढेर सारी नींद की दवा खा ली थी। परिवारीजनों ने अस्पताल ले जा कर किसी तरह बचा लिया। जल्दी ही संजय ने दूसरी बार आत्म हत्या की कोशिश की। फिर घर वालों ने बचा लिया। पहली बार मैं ने समझाया था, सांत्वना दी थी। दूसरी बार डांटा। कि यह बार-बार की क्या बेवकूफी है। वह लिपट कर रोने लगा। कहने लगा आप बड़े भाई हैं, आप को डांटने का हक़ है! पर मेरी लाचारी समझिए। बच्चों का वास्ता दिया, बेटी का वास्ता दिया। पर एक बहादुर आदमी हर बात पर रोता रहा। अंततः उस ने वायदा किया कि अब यह गलती नहीं करेगा। लेकिन उस की जिंदगी पटरी से उतर गई थी। डिप्रेशन उस का बड़ा भाई बन गया था। अब वह जिस तिस से लड़ पड़ता। इसी बीच वह मुनव्वर राना से उस की मुलाकात हो गई। अब वह उन की शायरी का मुरीद हो गया। बात-बात में वह मुनव्वर राना के शेर कोट करता रहता। अब वह गजलों का शौक़ीन हो चला था। अकसर रात को फ़ोन करता। कहता सो न रहे हों तो बड़े भाई कुछ शेर सुनाऊं। फिर एक से एक शेर सुनाता। कई बार वह यह काम सुबह-सुबह भी करता। फ़ोन करता और कहता, अरे, कब तक सोते रहेंगे, शेर सुनिए। अब वह जब घर आता तो ग़ज़लों की कोई सी डी लिए। कभी पेन ड्राइव लिए हुए।कहता इसे सुनिए।

अब यह संजय,  शराब और शेरो शायरी का दौर था। कह सकते हैं उस के डिप्रेसन की इंतिहा थी।

पिछले दिनों हम दोनों बेटी की शादी खोजने में लगे थे। संजय की बेटी की शादी तय हुई तो वह कार्ड ले कर आया। शादी के दिन ही दिल्ली में मेरा एक कार्यक्रम था। बताया तो कहने लगा कुछ नहीं आना है। अपनी बेटी की शादी में नहीं आएंगे तो कब आएंगे? मैं ने टिकट कैंसिल किया। गया भी शादी में। बेटी की शादी संजय ने ख़ूब धूमधाम से की। इस के पहले संजय के एक छोटे भाई की शादी में अंबेडकर नगर के एक गांव में बारात गई थी। तब संजय का और ही रुप देखने को मिला था। बहुत सी रिपोर्टिंग यात्राओं में भी संजय का साथ रहा है। पर उस के रंग में फर्क नहीं आता था। उस की शेरो शायरी का रंग और ज़िम्मेदारी का रंग कैसे तो सुर्खरू थे। बेटी की शादी कर के वह बहुत निश्चिंत हो गया था। बिलकुल मस्त और मगन। मुझे बेटी के विवाह के लिए परेशान देखता तो कहता कि बेटियां अपना भाग्य ले कर आती हैं सो घबराओ नहीं यार! हो जाएगी बिटिया की शादी भी! वह बेटी की एक से एक फ़ोटो सेशन करता और कहता यह फ़ोटो भेज कर देखिए। अब की तो बात बन जाएगी। जब मेरी बेटी की शादी हुई तो वह आया और ख़ूब ख़ुश। 

ऐसे ही एक दिन मिला तो कहने लगा मालिनी अवस्थी से कभी बात होती है। मैं ने कहा हां, होती है कभी-कभार। मैं ने पूछा कि क्यों क्या हुआ? कहने लगा कि यार अब हमें वह पहचानती ही नहीं। फिर याद दिलाते हुए कहा कि याद है मालिनी अवस्थी के बलरामपुर अस्पताल वाले घर में आप के साथ गया था। आप ने इंटरव्यू किया था, हम ने फ़ोटो खींची थी। वह घर में स्कर्ट पहने बैठी थीं, उन की स्कर्ट में फ़ोटो। स्वतंत्र भारत में छपी थी बड़ी सी। किसी अख़बार में मेरी खींची फ़ोटो ही पहली बार उन की छपी थी, उन्हें याद तो दिलाइए। कि उन को स्टार बनाने में मेरा भी हाथ है। पहचान लिया करें मुझे भी तो अच्छा लगेगा। हम ने कहा, ठीक है। लेकिन मालिनी अवस्थी से यह कभी कह नहीं पाया।

क्या कहता भला। यह भी कोई कहने की बात होती है। रिपोर्टिंग और फ़ोटोग्राफ़ी में ऐसे तमाम मुकाम आते-जाते रहते हैं। बहुत से लोग कंधे पर सिर रख कर निकल गए। जब ज़रुरत हुई सुबह-शाम सलाम किया। ज़रूरत खत्म, पहचान खत्म। कौन किस को याद करता है। लेकिन संजय अकसर याद दिलाता और कहता कि कहा नहीं मालिनी अवस्थी से क्या। मैं हर बार कहता हूं, कह कर टाल जाता। फिर बहुत दिन हो गए इस बात को उस ने यह कहना बंद कर दिया। पर एक दिन फ़ेसबुक पर संजय की वाल पर देखा कि वह मालिनी अवस्थी के साथ एक फ़ोटो में मुस्कुरता हुआ खड़ा था। लेकिन मैं ने उस से कुछ कहा नहीं। जाने कितनी सांस और फांस है संजय के साथ हमारी। जाने कितने लोगों के इंटरव्यू, सेमिनारों, नाटकों, राजनीतिक कार्यक्रमों, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन आदि-इत्यादि में उस के साथ की अनेक यादें जैसे दफ़न हैं हमारे सीने में।

कुछ समय पहले इस राष्ट्रीय सहारा की नौकरी से भी इस्तीफ़ा दे दिया था संजय ने। सो जिंदगी जो थोड़ी बहुत पटरी पर थी बिलकुल पटरी से उतर गई थी। आर्थिक समस्याएं जब नौकरी करते हुए नहीं खत्म हुईं तो बिना नौकरी के कैसे खत्म होतीं। उसे अपना फाइनल हिसाब मिलने का इंतज़ार था कि ख़ुद फाइनल हो गया। संजय का एक छोटा भाई विनोद त्रिपाठी भी टाइम्स आफ़ इंडिया में फ़ोटोग्राफ़र था। कुछ साल पहले विनोद भी विदा हो गया था। अब संजय अपने गांव की बात करता रहता था। लेकिन गांव में भी कौन सी जमींदारी थी भला। पुरखे देवरिया से आ कर हैदरगढ़ के पास के गांव पूरे झाम तिवारीपुरवा में बसे थे और पिता विरासत में ईमानदारी और संघर्ष दे गए थे। दुर्भाग्य से संजय भी अपने दोनों बेटों को यही विरासत सौंप गए हैं।

शुरु के दिनों में जब संजय स्वतंत्र भारत में अपने को फ़ोटोग्राफ़र साबित करने के संघर्ष में लगा था, उसे हर कोई फ़ोटोग्राफ़ी सिखाने में लगा था। जिसे कैमरा पकड़ने का शऊर नहीं होता वह भी, जिसे फ़ोटो की समझ नहीं होती वह भी। उन्हीं लोगों में से एक मैं भी था। मैं भी उसे कभी रघु रॉय के फ़ोटो दिखाता तो कभी सत्यजीत रॉय के फ़ोटो। और बताता कि देखो फ़ोटो यह होती है। वह फ़ोटो देखता, मेरी बात सुनता और टाल जाता। यह सब जब कई बार हो गया तो संजय कहने लगा यह दिल्ली नहीं है, बंबई और कलकत्ता नहीं है, लखनऊ है। यहां ऐसी फ़ोटो कौन खींचता है, कौन छापता है। तो मैं उसे अनिल रिसाल सिंह के फ़ोटो दिखाता। सत्यपाल प्रेमी के फ़ोटो दिखाता और कहता यह देखो, यह तो लखनऊ के फ़ोटोग्राफ़र  हैं। वह तड़पता हुआ कहता, इन के कैमरे देखे हैं, इन के लेंस देखे हैं? क्या है मेरा कैमरा? यह कोई कैमरा है?

वह कहने लगा दिला दीजिए ऐसा ही कैमरा, ऐसा ही लेंस और ऐसी ही सुविधा। और फिर धरना, प्रदर्शन, नाटक, नौटंकी की रूटीन फोटुओं से फुर्सत, डाल दीजिए मेरे पेट में भरपेट रोटी। ऐसी ही सुविधा और ऐसी ही निश्चिंतता। इन से अच्छी फ़ोटो खींच कर न दिखाऊं तो कहिएगा। वह कहता, यहां तो रोज जब फ़ोटो खींचता हूं तो शिव सिंह सरोज का अपमानित करने वाला सामंती रवैया दिमाग में सवार रहता है। फ़ोटो क्या खाक खींचूंगा? रोटी दाल चलाने दीजिए परिवार की। व्यवहार में यही है, बाकी सब सिद्धांत है। सच यही है कि अधिकांश रिपोर्टर, फ़ोटोग्राफ़र रोटी दाल में ही स्वाहा हो जाते हैं और अपना बेस्ट नहीं दे पाते हैं। शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे पत्रकारिता के दलाल गिद्ध जाने कितने संजय त्रिपाठी खा गए हैं, खाते रहेंगे। क्यों कि अब इन्हीं शिव सिंह सरोज और रणविजय सिंह जैसे दलालों और भडुओं का ज़माना है। अख़बारों में यह भडुए दलाल ही भाग्य विधाता हैं। पढ़े-लिखे लोगों की ज़रुरत अब किसी प्रबंधन को नहीं है।

अलविदा मेरे भाई, मेरे दोस्त, मेरे बेलीगारद! बहुत सारी बातें हैं, बहुत सारी यादें हैं। स्मृतियों में तुम सर्वदा उपस्थित रहोगे। अभी इतना ही। शेष फिर कभी। लेकिन तुम ने आज मुझे रुलाया बहुत है। अकसर तुम्हें चुप कराने वाला मैं आज कैसे चुप रह पाता भला। सो रो-रो कर हलका किया ख़ुद को। तुम धू-धू कर जलते रहे, मैं फूट-फूट रोता रहा। यही तो आज हुआ, मेरे बेलीगारद, डियर बेलीगारद! पर अब किसे इतने दुलार से कहूंगा डियर बेलीगारद! तुम तो चले गए!

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।


मूल खबर…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

44 के हुए यशवंत को वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय ने यूं दी बधाई

Dayanand Pandey : आज हमारे जानेमन यारों के यार यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है। व्यवस्था से किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत सिंह से सीखे। अपनों से भी किसी को टकराना सीखना हो तो वह यशवंत से सीखे। यहां तक कि अपने-आप से भी किसी को टकराना सीखना हो तो भी वह यशवंत से सीखे। अपने आप को गाली सुनाने और सुनने की क्षमता भी किसी को पानी हो तो यशवंत से पाए। पारदर्शिता की इंतिहा भी हैं यशवंत सिंह।

मैं उनको उनकी फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं। मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों को जिस तरह सुस्ताने के लिए, रोने के लिए, साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत वायस आफ स्पीचलेस बन जाते हैं, वह बहुत ही सैल्यूटिंग है।

आज वह 44 साल के हो गए हैं। अभी कुछ समय पहले वह जेल गए थे, मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ते हुए। कई सारे मीडिया हाऊस मिल कर उन के खिलाफ पिल पड़े थे। कि वह जेल से बाहर ही न आ पाएं। पर वह आए और एक दिलचस्प किताब ‘जानेमन जेल’ भी लिखी। लेकिन जब वह जेल में थे तभी मैंने उनकी बहादुरी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए एक लेख लिखा था। लेख का लिंक नीचे देते हुए, उनके इस जुझारू जज़्बे को सैल्यूट करते हुए उन्हें जन्म-दिन की बधाई दे रहा हूं।

बीती आधी रात भी मेसेंजर पर उन्हें बधाई दी थी। फ़ौरन उनका वीडियो काल आया। वह लहालोट थे, जश्न में थे, बहू के साथ नृत्यरत! बजते हुए गीत और नृत्य के बीच वह बार बताते रहे, आप की बहू है, बहू! और बहू नृत्य में उनके साथ होते हुए भी गंवई और पारिवारिक लाज, ओढ़े हुए थीं। मर्यादा और यशवंत के मान का निर्वाह करते हुए। ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसे ही सपरिवार स्वस्थ, मस्त और प्रसन्न रहें यशवंत सिंह। लव यू जानेमन यशवंत सिंह, लव यू!

यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खड़े होने का है
http://sarokarnama.blogspot.in/2012/07/blog-post.html 

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश कुमार ने बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली

Dayanand Pandey : रवीश कुमार सिर्फ़ लाऊड, जटिल और एकपक्षीय ही नहीं होते, कभी-कभी स्मूथ भी होते हैं और बड़ी सरलता से किसी घटना को तार-तार कर बेतार कर देते हैं। आज उन्होंने एक बार फिर यही किया। एनडीटीवी के प्राइम टाइम में हरियाणा के पंचकुला में बलात्कारी राम रहीम के कुकर्मों और उन पीड़ित दोनों साध्वी की बहादुरी का बखान करते हुए खट्टर सरकार की नपुंसकता की धज्जियां उड़ा कर रख दीं।

योगेंद्र यादव के साथ उनकी शालीन बातचीत ने सारी बात को प्याज की तरह बेतरह बेपर्दा कर दिया। बिना किसी चीख़ पुकार के पूरे घटनाक्रम को शीशे में उतार दिया। इस बाबत पत्रकार छत्रपति की हत्या और सीबीआई के डीएसपी की जांबाजी को भी रेखांकित किया। दोनों साध्वियों को सलाम भेजा और सारी राजनीतिक पार्टियों की सलीके से मज़म्मत की। पंचकुला हिंसा, बलात्कारी राम रहीम और निकम्मे मनोहर लाल खट्टर की डट कर ख़बर ली। योगेंद्र यादव और रवीश कुमार आज बहुत दिनों बाद पूरी निष्पक्षता से थे और फुल फार्म में।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की मीडिया रिपोर्ट.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

यूं महाभ्रष्ट बना दी गईं नीरा यादव!

Dayanand Pandey : कभी थीं नीरा यादव भी ईमानदार जब वह नीरा त्यागी हुआ करती थीं। उन की ईमानदारी के नाम पर चनाजोर गरम बिका करता था। उन दिनों जौनपुर में डी एम थीं। उन के पति त्यागी जी सेना में थे। 1971 के युद्ध में खबर आई कि वह वीरगति को प्राप्त हुए। नीरा यादव ने महेंद्र सिंह यादव से विवाह कर लिया। तब यादव जी डी आई जी थे। लेकिन बाद में त्यागी जी के वीरगति प्राप्त करने की खबर झूठी निकली। पता चला वह युद्ध बंदी थे। बाद के दिनों में वह शिमला समझौते के तहत छूट कर पाकिस्तान से भारत आ गए। नीरा यादव से मिलने गए तो वह उन से मिली ही नहीं। उन्हें पति मानने से भी इंकार कर दिया। त्यागी जी भी हार मानने वालों में से नहीं थे। डी एम आवास के सामने धरना दे दिया। कहां तो नीरा यादव के नाम से ईमानदारी का चनाजोर गरम बिकता था, अब उन के छिनरपन के किस्से आम हो गए। खबरें छपने लगीं। किसी तरह समझा बुझा कर त्यागी जी को धरने से उठाया गया। जाने अब वह त्यागी जी कहां हैं, कोई नहीं जानता।

पर महेंद्र सिंह यादव ने नीरा यादव को अपनी ही तरह भ्रष्ट अफसर बना दिया। बाद के दिनों में मुलायम सिंह यादव की भी वह ख़ास बन गईं। मुलायम ने उन के भ्रष्ट होने में पूरा निखार ला दिया। अब नीरा यादव को आई ए एस अफसर ही महाभ्रष्ट कहने लगे। दुनिया भर की जांच पड़ताल होने लगी। मेरी जानकारी में नीरा यादव अकेली ऐसी आईएएस अफसर हैं जिन के भ्र्रष्टाचार की जांच के लिए बाकायदा एक न्यायिक आयोग बना। जस्टिस मुर्तुजा हुसैन आयोग। मुर्तुजा साहब ने नीरा यादव को दोषी पाया। शासन को रिपोर्ट सौंप दी। लेकिन किसी भी सरकार ने उस जांच रिपोर्ट पर पड़ी धूल को झाड़ने की नहीं सोची। हर सरकार में नीरा यादव की सेटिंग थी। बाद के दिनों में तो मुलायम सिंह यादव ने उन्हें अपना मुख्य सचिव भी बना लिया था। अदालती हस्तक्षेप के बाद उन्हें हटाना पड़ा। अब वह बाकायदा सज़ायाफ्ता हैं। और सब कुछ सब के सामने है।

लेकिन दो बात लोग नहीं जानते। या बहुत कम लोग जानते हैं। एक यह कि नीरा यादव की दो बेटियां हैं। दोनों विदेश में हैं। नीरा यादव सारी काली कमाई बेटियों को भेज चुकी हैं । बेटियों की पढ़ाई लिखाई भी विदेश में हुई और दोनों बेटियां वहां की नागरिकता ले कर मौज से हैं। दूसरे , डासना जेल में वह वी आई पी ट्रीटमेंट के तहत हैं। बैरक में वह नहीं रहतीं, स्पेशल कमरा मिला हुआ है, उन्हें। तीसरे डासना जेल ट्रायल कैदियों के लिए है, सज़ायाफ्ता के लिए नहीं। बाकी सरकार जाने और नीरा यादव। वैसे नीरा यादव भजन सुनने की खासी शौक़ीन हैं, खास कर अनूप जलोटा की तो वह बहुत बड़ी फैन हैं। हां, व्यवहार में वह अतिशय विनम्र भी हैं। कम से कम मुझ से तो वह भाई साहब, प्रणाम कह कर ही बात करती रही हैं। मेरा स्पष्ट मानना है कि अगर नीरा यादव के जीवन में महेंद्र सिंह यादव और मुलायम सिंह यादव नहीं आए होते तो शायद हम नीरा यादव को एक ईमानदार आई ए एस अफसर के रूप में आज जान रहे होते। कह सकता हूं कि नीरा यादव अपने को चंदन बना कर नहीं रख पाईं, भुजंगों के प्रभाव में आ कर विषैली और भ्रष्ट बन कर रह गईं। अफ़सोस!

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी सरकार में हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते!

Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

कोई भी व्यावसायिक मीडिया बिना चोरी, छिछोरी, काला धन और कमीनेपन के नहीं चल सकता। एनडीटीवी भी नहीं। विरोध भी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई भी व्यावसायिक घराना निष्पक्ष अखबार या चैनल नहीं चला सकता। निष्पक्ष होने के लिए काले धन और व्यवसाय से विरक्त होना पड़ेगा। नेहरु ने इस खतरे को समझ लिया था और कहा था कि अखबार को कोआपरेटिव सोसाईटी या ट्रस्ट के तहत ही चलाया जाना चाहिए। नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, कौमी आवाज़ का प्रयोग भी उन्होंने किया था। जो मिस मैनेजमेंट और मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ गया। हिंदू और ट्रिब्यून जैसे अखबार आज भी ट्रस्ट के तहत प्रकाशित होते हैं तो वहां कुछ खबर के सरोकार शेष हैं, कर्मचारियों के शोषण में कुछ अतिरेक नहीं है। अकबर इलाहाबादी याद आते हैं:
तीर निकालो न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो
तो एनडीटीवी न तीर है, न तलवार, न तोप। किसी गैंग की तरह एकपक्षीय और लाऊड खबर की तलब में डूबा, सत्ता विरोध के खबर की आड़ में काले धन की खेती करता है एनडीटीवी भी। मनी लांड्रिंग और फेरा जैसे आरोपों में घिरा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाले में गले तक हिस्सेदार है। सिर्फ़ साफ सुथरी, हिप्पोक्रेसी भरी बातें करने से, सेक्यूलरिज्म का ताश फेंटने से, सत्ता विरोध की नकली हुंकार से ही कोई साफ सुथरा नहीं हो जाता। एनडीटीवी के सत्ता विरोध का एक हिस्सा और जान लीजिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी इस के सरपरस्तों में से एक हैं। वाम नेता वृंदा करात प्रणव रॉय की बीवी राधिका रॉय की बहन हैं। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि की दलाली की दुकान एनडीटीवी से ही तो संचालित होती थी कांग्रेस राज में। आप लोग इतनी जल्दी भूल गए? आदि-इत्यादि बहुत से किस्से हैं। फिर कभी।

अभी बस इतना ही जानिए कि सभी मीडिया घरानों की तरह एनडीटीवी भी पाप और भ्रष्टाचार का घड़ा है, काले धन के कारोबार पर टिका है। सो इस के पक्ष में अपनी भावना और ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट करने से बचें। जो हो रहा है, होने दें। इसलिए भी कि यह मोदी विरोध की कीमत नहीं है, काले करतूत की कीमत है। इसका ही तकाज़ा है। बस इतना समझ लीजिए कि मीडिया होने की ताकत में एनडीटीवी का बहुत कुछ सड़ा हुआ सामने आने से बचा हुआ है। मोदी सरकार में हिम्मत नहीं है। हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

xxx

xxx

xxx

 

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अखिलेश यादव ने भी पिता के नक्शे कदम पर पत्रकारों को ख़रीद कर कुत्ता बना लिया है!

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री अखिलेश यादव आज एक प्रेस कांफ्रेंस में जिस तरह से एक चैनल के एक रिपोर्टर से बदसुलूकी की, तू-तकार किया, तुम्हारा नाम क्या है जैसे बेहूदे सवाल पूछे और अंत में बोले कि तुम्हारा तो ड्रेस ही भगवा है। आदि-आदि। और सारे उपस्थित पत्रकार अपनी रवायत के मुताबिक ही ही करते रहे तो टीवी के परदे पर यह देखना मेरे लिए कोई नई बात नहीं थी। यह तो दलाल पत्रकारों की मामूली तफसील है। ऐसा पहले अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव भी करते रहे हैं।

अखिलेश की कोई प्रेस कांफ्रेंस या कवरेज करने का दुर्भाग्य तो मुझे नहीं मिला है लेकिन उन के पिता मुलायम सिंह यादव की तमाम प्रेस कांफ्रेंस, कवरेज और उन के साथ हवाई और सड़क यात्राएं तो की हैं। पहले तो नहीं पर बाद के दिनों में मुलायम के तेवर भी यही हो चले थे। अव्वल तो वह पत्रकारों को, मीडिया मालिकों को पूरी तरह ख़रीद लेते थे तो कोई अप्रिय सवाल उन से करता नहीं था। अगर गलती से कोई पत्रकार ताव में आ कर कोई अप्रिय सवाल कर भी देता था तो मुलायम भड़क कर पूछते थे, तुम हो कौन? किस अखबार से हो? किस चैनल से? और उस पत्रकार को पब्लिकली बुरी तरह बेज्जत कर उस की नौकरी भी खा जाते थे। उन का हल्ला बोल तो हाकरों की पिटाई तक में तब्दील हो गया था। मुलायम सिंह यादव तो प्रेस क्लब में बैठ कर पत्रकारों से पूरी हेकड़ी से पूछते थे, तुम्हारी हैसियत क्या है?

बाद के दिनों में मायावती ने भी यही सब किया। मायावती ने तो फिर सवाल सुनने ही बंद कर दिए। लिखित वक्तव्य पढ़ कर उठ जाती हैं। लेकिन अगर मायावती के मुख्य मंत्री रहते उन के खिलाफ कोई गलती से भी संकेतों में भी लिख दे तो वह फौरन उस की नौकरी खा जाती थीं। कई पत्रकारों की नौकरी खाई है मायावती और मुलायम ने। मायावती तो कहती थीं, मीडिया मालिक से कि या तो अखबार बंद करो या इसे निकाल बाहर करो। एक बार एक पत्रकार को मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस में ही घुसने से रोक दिया था तो सभी पत्रकार बायकाट कर गए थे। लेकिन तब वह मुख्य मंत्री नहीं थीं। लेकिन पत्रकार चूंकि कुत्ते होते हैं सो फिर जाने लगे। अखिलेश यादव ने भी पिता के नक्शे कदम पर पत्रकारों को ख़रीद कर कुत्ता बना लिया। अब वह भले सरकार में नहीं हैं लेकिन उन को लगता है कि यह कुत्ते तो उन के ही हैं। सो कुत्तों को लात मारने की उन की आदत अभी गई नहीं है। जाते-जाते जाएगी। पर जाएगी ज़रुर। बहुतों की जाते देखी है मैंने।

एक समय था कि ज़रा-ज़रा सी बात पर बड़े से बड़े नेताओं को हम पत्रकारों ने इसी लखनऊ में उन की अकड़ उतार कर उन के हाथ में थमा दी है। किस्से अनेक हैं। पर वह समय और था, दिन और था, हम लोग और थे। अब दौर और है, लोग और हैं और हम जैसे पत्रकार इसीलिए मुख्य धारा से दूर हैं। क्यों कि मीडिया मालिकों, पक्ष-प्रतिपक्ष के नेताओं, अधिकारियों और इस समाज को भी सिर्फ़ कुत्ते और दलाल पत्रकार ही रास आते हैं। लिखने पढ़ने वाले , खुद्दार और समझदार पत्रकार नहीं। इस सिस्टम पर अब बोझ हैं खुद्दार पत्रकार।

दयानंद पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार
लखनऊ

इसे भी पढ़ सकते हैं….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

कश्मीर और पाकिस्तान मुद्दे पर नरेंद्र मोदी पूरी तरह फेल हो चुके हैं

कश्मीर और पाकिस्तान मुद्दे पर नरेंद्र मोदी पूरी तरह फेल हो चुके हैं। उनकी नीतियां पानी मांग गई हैं। दरअसल कश्मीर और पाकिस्तान दोनों ही मसले कूटनीति की परिधि से बाहर निकल चुके हैं। इन दोनों का समाधान अब सर्जिकल स्ट्राइक और सैनिक कार्रवाई है, कुछ और नहीं। मोदी कहते रह गए कि पाकिस्तान को अकेला कर दिया, यह कर दिया, वह कर दिया। नतीज़ा यह है कि कुछ नहीं किया। पाकिस्तान आज भी वही कर रहा है जो पहले करता रहा था।

चीन उसका कुंडल और कवच बन कर पूरी ताकत से उपस्थित है। रूस भारत-पाकिस्तान मसले पर तटस्थ है, खामोश है। अमरीकी आर्थिक मदद बदस्तूर जारी है। उस ने सरबजीत को बेमौत मार दिया था, अब कुलभूषण को मारने की तैयारी में है। न दाऊद को पकड़ पाए, न मसूद अजहर आदि को। कश्मीर को और ज़्यादा बरबाद होते और जलते हुए हम देख रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के आने पर माना गया था कि अब कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी और कि पाकिस्तान सुधर जाएगा।

लेकिन मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की। डिप्लोमेसी की ऐसी तैसी कर रखी है सो अलग। ऐसे मसले संसद में एकजुट होने और बयान बहादुरी से तय नहीं होते। संसद के हमलावरों का भी क्या कर लिया संसद ने? संसद के शहीदों के परिजनों तक को न्याय नहीं दे सकी यह संसद। संसद में सुषमा स्वराज के पूरे देश का बेटा कह देने भर से बच जाएगा कुलभूषण? हरगिज नहीं। पूरी दुनिया ने कहा था पाकिस्तान से कि जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी मत दो। पाकिस्तान ने भुट्टो को फांसी दे दिया। बामियान में तालिबानों ने बुद्ध की सब से बड़ी मूर्ति दुनिया भर की अपील के बावजूद तोड़ दी। पाकिस्तान से अमरीका मांगता रहा ओसामा बिन लादेन को। पाकिस्तान ने दे दिया था क्या। अमरीका को घुस कर मारना पड़ा था।

पाकिस्तान और कश्मीर की केमेस्ट्री कूटनीति नहीं सैनिक कार्रवाई समझती है, इस बात को अच्छी तरह समझे बिना इन का कोई इलाज नहीं है। आप चिल्लाते रहिए, जिनेवा, शिमला, लाहौर। आदि-इत्यादि। तीन सौ सत्तर फत्तर। शांति वगैरह। इन मूर्खताओं का कोई हासिल नहीं। पाकिस्तान लोकतंत्र से नहीं, सेना और आईएसआई से चलता है। कश्मीर पत्थरबाजी और आतंकवाद से चलता है। सीधी बात है। फ़िलहाल भूल जाईए अब कुलभूषण जाधव को। वह भारत का बेटा है ज़रूर पर भारत उसे अब सलीब से उतार नहीं सकता, वर्तमान कूटनीति से।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मांस कारोबारियों के असली दुश्मन हैं आजम खान!

Dayanand Pandey : उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार के नगर विकास मंत्री रहे सर्वशक्तिमान आज़म खान ने उत्तर प्रदेश के मांस कारोबारियों और मांस प्रेमियों से जो दुश्मनी निभाई है उस की कोई दूसरी मिसाल नहीं है। बतौर नगर विकास मंत्री न उन्हों ने अवैध बूचड़खानों के बाबत सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की परवाह की, न ग्रीन ट्रिब्यूनल की। न नगर निगम के स्लाटर हाऊसों को आधुनिक बनवाया, न लाइसेंस बनवाए, न पुराने लाइसेंसों का नवीनीकरण करवाया। जब कि बतौर मंत्री यह उन की ज़िम्मेदारी थी। उलटे उन्हों ने सब कुछ यानी अवैध बूचड़खानों को चलने दिया, सारे क़ानून को ठेंगे पर रख कर। लात मारते हुए।

जैसा कि देखा और कहा जा रहा है कि इस अवैध बूचड़खाने की बंदी से ज़्यादातर मुस्लिम समाज के लोग प्रभावित हुए हैं, बेरोजगार हुए हैं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समाज से, क़ानून से ऐसी अप्रतिम दुश्मनी किसी और राजनीतिज्ञ ने निभाई हो, जैसे आज़म खान ने निभाई है मुझे नहीं मालूम। किसी को मालूम हो तो बताए भी। तब जब कि मुस्लिम वोट बैंक के एक बड़े ठेकेदार हैं आज़म खान। लेकिन दिलचस्प यह कि मुस्लिम समाज का एक भी व्यक्ति, मांस कारोबार से जुड़ा एक भी व्यक्ति आज़म खान से नाराजगी नहीं जाहिर करता। जानते हैं क्यों?

क्यों कि यह अवैध बूचड़खाने आज़म खान की कृपा से ही चल रहे थे। तो यह अवैध कारोबारी बोलें भी तो किस जुबान से भला। आज़म खान और इन अवैध बूचड़खाना चलाने वालों को लगता था कि आज़म खान और सपा सरकार अमरफल खा कर आए हैं, कभी विदा ही नहीं होंगे। आज़म खान और इन मुस्लिम समाज के लोगों को कोई व्यक्ति बांगला की वह कहावत नहीं सुना पाया कि किसी भूखे को मछली भीख में देने के बजाय उसे मछली मारना सिखाना चाहिए। लेकिन आज़म खान तो अवैध कारोबार की हरामखोरी सिखा रहे थे। नतीज़ा सामने है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के जरखरीद गुलाम बन गए हैं!

Dayanand Pandey : कि पेड न्यूज़ भी शरमा जाए…. आज का दिन न्यूज़ चैनलों के लिए जैसे काला दिन है, कलंक का दिन है। होली के बहाने जिस तरह हर चैनल पर मनोज तिवारी और रवि किशन की गायकी और अभिनय के बहाने मोदियाना माहौल बना रखा है, वह बहुत ही शर्मनाक है। राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल आदि की घटिया कामेडी, कुमार विश्वास की स्तरहीन कविताओं के मार्फ़त जिस तरह कांग्रेस आदि पार्टियों पर तंज इतना घटिया रहा कि अब क्या कहें।

रवि किशन जैसा गंभीर अभिनेता भाड़ बन कर उपस्थित हुआ इन प्रहसनों में कि मुश्किल हो गई। रवि किशन गायक नहीं हैं, पर आज वह गायक बन गए। चारण और भाट भी शरमा जाएं मनोज तिवारी और रवि किशन का यह रुप देख कर। लगता ही नहीं कि श्याम बेनेगल के साथ भी कभी रवि किशन ने शानदार काम किया है।

आज नहीं बल्कि कल शाम से ही यह सब सभी चैनलों पर चालू है अभी तक। रवि किशन, मनोज तिवारी लगातार हर जगह चीख चीख कर गा रहे हैं, बम-बम बोल रहा है काशी! लतीफेबाज घटिया कवियों वाले कवि सम्मेलन भी इन न्यूज़ चैनलों पर मोदी राग में ही न्यस्त रहे। सिर्फ़ मोदी का भाषण, मोदी की तारीफ़ के पुल में बंधी कमेंट्री, मोदी पर गाना। ठीक है मोदी ने अप्रत्याशित जीत हासिल की है लेकिन सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के स्पीकर बन जाएं, भाड़ बन जाएं, यह न्यूज़ चैनलों का काम नहीं है।

सब जानते हैं कि मनोज तिवारी भाजपा के सांसद हैं और कि दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष भी, रवि किशन भी भाजपा ज्वाईन कर चुके हैं। उनको तो यह करना ही था। पर न्यूज़ चैनलों को? क्या न्यूज़ चैनलों ने भी भाजपा ज्वाइन कर लिया है?

जनता पार्टी की सरकार की विदाई के बाद जब इंदिरा गांधी की वापसी हुई थी तो उन से बंद हो चुके अख़बार नेशनल हेराल्ड के बाबत पूछा गया कि कब खुलेगा? इंदिरा गांधी ने पूरी बेशर्मी से जवाब देते हुए तब कहा था, अब इसकी कोई जरुरत नहीं है क्यों कि जो काम हमारे लिए नेशनल हेराल्ड करता था, अब वह काम सारे अख़बार करने लगे हैं। लेकिन आज जो न्यूज़ चैनलों ने किया है वह नमक में दाल हो गया है। सारे न्यूज़ चैनल भाजपा के जरखरीद गुलाम बन गए। इस कदर कि पेड न्यूज़ भी शरमा जाए। साक्षर और दलाल पत्रकारिता की यह हाईट है।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं….

Ajay Kumar Agrawal मीडिया का ये रूप बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है जब कहीं भी सिर्फ गुणगान होने की उम्मीद हो तो क्या देखना मैंने कोई न्यूज़ नहीं देखी।

Praveen Kumar Mishra क्षमा प्रार्थना के साथ लेकिन मनोज तिवारी कभी गायक हो ही नहीं पाये, गा ज़रूर लेते हैं लेकिन बिना ग्रामर के। लोक गायक भी नहीं हैं क्योंकि तुकबंदी इनके पूरे व्यक्तित्व पर भारी है। अधिक से अधिक चारण परंपरा में रख सकते हैं।

Vijaya Bharti सही कहा है भाई साहब आपने क्योंकि ये सभी चारण हैं क्योंकि चारण गाकर ही ये उपलब्धियाँ पाकर नौटंकी पसारे हुए हैं।

DrParmod Pahwa पत्रकारिता के नाम पर मूर्खो की टोली एकत्रित हो गई है। न्यूज़24 पर प्रह्लाद होलिका की कथा बिहार से जोड़ दी,जबकि ऐतिहासिक साक्ष्य पाकिस्तान के मुल्तान में हजारों सालों से है।  अब तो विश्वास कर सकते है कि सिकन्दर पटना तक आया होगा ।

Shyam Dev Mishra न्यूज़ चैनलों को क्या आप आज भी न्यूज़ चैनल समझते हैं? ज्यादातर लोग तो बहुत पहले से उनकी असलियत समझते हैं, इसलिए न उनसे अपेक्षा है, न कोई शिकायत।

Rajeev Dwivedi प्रणाम, इनकी तो छोड़िये जो लोग पानी पी पी के गाली देते थे वो भी कसीदे पढ़ रहे है lll

Sudhanshu Tak सर आज होली के छुट्टी है । छुट्टी मतलब पूर्ण छुट्टी । सभी एंकर , पत्रकार अपने घर , परिवार , मित्रों के साथ होली मना रहे है । ये प्रि रकोर्डेड प्रोग्राम है जो केवल टाइम पास के लिए चलाये गए हैं । कल से सब ड्यूटी पर हैं । अब ये कोई नजर नही आएगा । आप मौज करो । कल से सब धंधे पानी में लग जाएंगे । अब मोदी जी का भक्त मीडिया क्या पूरे देश की जनता हो रही है । ऐसा पहले कभी नही हुआ इसलिए पचाना मुश्किल है । वैसे कल से आपजो तकलीफ नही होगी । सादर

Dayanand Pandey बिलकुल नहीं , सारे कार्यक्रम आज के हैं । कल ही रिजल्ट आया है और आज कार्यक्रम में उस का यशोगान ।

Sudhanshu Tak सर रिजल्ट परसों आ चुका था 11 तारीख को । वैसे पत्रकारों की छुट्टी थी । कलाकारों का तो आज कमाने का दिन था । होटल में मनाये जा रहे होली के कार्यक्रमों में भी यही कलाकार आज अपनी प्रस्तुति भी दे रहे थे । सादर

Dayanand Pandey नतीजे एक शाम पहले ही सही । पर यह सब आज ही कल में हुआ । सवाल फिर कार्यक्रम पर नहीं न्यूज़ चैनलों के एप्रोच और उन के बिकाऊपन पर है यहां।

Shubham Tiwari रवि किशन, मनोज तिवारी ही नहीं मालिनी अवस्थी भी

Munna Pathak बनले के सार सभे बनेला, बिगड़ले के बहनोई भी बनल केहू ना चाहेला। जब मोदिये राजा बाड़े, त सोनिया के अब के पूछी ? वइसे भी मीडिया पइसा खइला से चाहें हुँकइला से, दुइयेगो तरीका से वश में रहेले। ई त पुरान परिपाटी ह ।
जितेंद्र दीक्षित कल युगपुरुष प्रेस से बात करने वाले हैं।

Bodhi Sattva आज मोदी और भाजपा विरोध देशद्रोह हो गया है । कब तक चलेगा यह मोदी राग । देखते हैं ।

Wahid Ali Wahid हाँ भाई देखा.भाँड भी शरमायें ऐसे तथाकथित कलाकारों कवियो के कृत्य पर.

Om Nishchal सांसद नाचै ताल दै कहै काढि के खीस टीवी मोदीमय हुए, चैनल माउथपीस। जोगीरा सररर।

Rajeev Bhutani चैनल देखना है तो राज्यसभा चैनल एक बार देखो दुबारा कोई चैनल समझ नही आयेगा …. ये झोलाछाप NCR चैनल दरअसल भांड चैनल हैं इनकी कवरेज दिल्ली और 100 किमी के दायरे तक सिमित है ……फटाफट न्यूज —– कुत्ता पेड़ पर चढ़ गया…  भैस नाले में गिर गई …बस कंजरखाना

Rajneesh Kumar Chaturvedi बस जुलाई तक।।हामिद अंसारी की विदाई के साथ ही राज्यसभा चैनल का भी वही हाल होना है।

Sridhar Sharma ये बाजार है सर… यहां सब बिकते हैं। बहुत सटीक टिप्पणी की है सर आपने।

Shashi Bhooshan एक नाम अवस्थी मैडम का भी जोड़ लीजिये। लिखा तो आपने अपनी इधर की लिखत के बीच विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए ही है लेकिन मुझे अच्छा लगा। उम्मीद है लडडू बाँटने का वीडियो भी आप तक पहुँचता ही होगा।

Bharat Shrivastava सभी चैनल्स या तो मोदी विरोधी है या मोदी समर्थक। होली में भी राजनीति की भांग घोल दी इन चैनल्स ने। पहले भी राजनीति पर चुटकियां ली जाती थी होली के अवसर पर किन्तु इस बार तो मीडिया वालो ने चाटुकारिता और विरोध की हदें पार कर दी।

सतीश शर्मा आदर्शवादी निष्पक्ष सन्तुलित पत्रकारिता आजादी के साथ ही लुप्त हो गयी है अब तो यह केवल कमाऊ व्यवसाय है जिसमे हर बात जायज और जरूरी है जिससे पैसा और थोथी लोकप्रियता मिले।फिर 24 घण्टे बकबक करे भी तो क्या?

रजनीकांत याज्ञिक कल चैनल पर कुमार विश्वास भी कविता पाठ कर मोदी पर अपनी भड़ास निकाल रहे थे।उस तरफ आपका ध्यान नहीं गया।स्वाभाविक है आपने जो चश्मा लगाया उससे यह नहीं दिखा होगा।

Puneet Nigam बुरा न मानो होली है। इतना सीरियस होने की जरुरत नहीं है भाई साहब। मौका है मौसम भी है , थोड़ी चुटकी ले ली तो क्या बुराई है।आप भी थोड़ी देर के लिए होली के रंग में रंग जाइये न।

Gambhir Shrivastav इसमें न कोई आश्चर्य है, न अफ़सोस है, और न ही ये पतन की ‘हाइट’ है. देखते रहिये, बहुत कुछ देखना अभी बाकी है. यूँ आपका आक्रोश वाज़िब है.

Vijender Gsp इसमें इन चैनलों का कोई दोष नहीं है । असल में ये न्यूज चैनल है ही नहीं और न ही कभी बन सकते है । वाजपेयी सरकार ने जब न्यूज चैनल खोलने के लिए आवेदन मांगे तब अधिकाँश लोगों ने यह सोचकर आवेदन कर दिया कि अलॉट हो गया तो लाइसेंस बेचकर पैसे कमा लेंगे । लेकिन हुआ यह कि जिसने भी आवेदन किया था उन सबको लाइसेंस दे दिए गए । अब चेनल चलाना मजबूरी हो गया लेकिन न्यूज चैनल चलाना कोई खाला जी का बाड़ा नही है । एक चैनल को चलाने के लिए भी कम से कम दस हजार वर्करों की जरूरत पड़ती जो इनके बुते से बाहर थी लिहाजा इन्होंने वो दृश्य दिखाने शुरू किए जिनका निर्माण नेट की सहायता से स्टूडियो में बैठकर किया जा सके । राशिफल, टोने-टोटको के साथ 4C अर्थात क्राइम, सिनेमा, क्रिकेट और सेलिब्रिटी ही इनके समय बिताने के मुख्य साधन है । अब खबरें तो इनके पास है नही तो चुटकले सुनाकर ही टाइम पास करना पड़ेगा । 24 घंटे बिताना कोई सरल काम तो है नही ।

Raghwendra Pratap Singh पत्रकारिता अब मिशन के रूप में कम कमीशन के रूप में ज्यादे नजर आने लगी है । ये इस क्षेत्र के लिए घातक है।

Rakesh Pandey साहब न्यूज चैनल्स आर कम्पलिटली न्यूड इन द कान्टेक्ट आफ रियल न्यूज और न्यूज चैनल देखना तब हो जब नो यूज आफ न्यूज

Vir Vinod Chhabra आपसे कई बार राजनैतिक पोस्ट को लेकर मतभेद रहा है। कई बार पूर्ण सहमति भी। लेकिन आज कई दिन बात आपसे सौ प्रतिशत से अधिक (यदि ऐसा होता है तो) सहमति है। इस पोस्ट में व्यक्त विचार से सहमति तो है ही, आपने लिखा भी बहुत अच्छा है, वास्तव में।

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

रवीश के भाई बृजेश पांडेय पर सेक्स रैकेट चलाने का आरोप!

Dayanand Pandey : अब बताईए कि एनडीटीवी वाले अपने रवीश कुमार के भाई बृजेश पांडेय फ़रार हो गए हैं। सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में बिहार पुलिस उन्हें खोज रही है। बृजेश पांडेय बीते बिहार विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव भी लड़ कर हार चुके हैं।

यूपी के वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पांडेय के उपरोक्त एफबी स्टेटस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Ashutosh Mishra Panday ji, it’s not good to give your credit, for fake news, because, after few fake Story, your credibility will be zero, at your social life. Be careful about your credibility. I am not supposed to protect any one, only questions on your credibility

Dayanand Pandey इस ख़बर को फर्जी बताने का आप के पास आधार क्या है ? या सिर्फ़ सहानुभूति भरी लफ्फाजी झोंक रहे हैं ?

Sonu Singh ये सत्य और सत्यापित खबर है।

Rizwan Khan अब भाई भागे है रवीश तो नहीं… और, भाइयों को करनी उनके साथ?

जितेंद्र दीक्षित वैसे भाई के कारनामे पर रविश कुमार पर टिप्पणी करना उचित नहीं पर अफसोस यह है कि दीपक तले अंधेरा। गांव-गांव की खाक छान कर स्टोरी करने वाले रविश साहब को अपने भाई की करतूत का संज्ञान नहीं । कहा तो यह भी जा रहा कि बिहार चुनाव में भाई का टिकट रविश ने ही पक्का कराया था।

Praveen Mishra आरोप के चलते नहीं, सिर्फ इस सवाल से घबराकर भागे हैं कि रवीश यह न पूछ लें…. कौन जात हो भाई?

असहिष्णु अरुण कौन जात हैं वे?

Haresh Kumar कान्यकुब्ज ब्राह्मण है और पांडेय टाइटल है। यह मोतिहारी जिला से बिलॉन्ग करता है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर इसका भाई चुनाव लड़ चुका है। हम बगल के ही हैं।

Praveen Mishra जहां तक मुझे जानकारी है, भूमिहार हैं लेकिन पांडेय लिखते हैं।

Shailendra Srivastava आप लोग जातिगत मानसिकता से कब उबरेंगे।

Praveen Mishra आप Shailendra Srivastava जी, इस मानसिकता से ऊबर चुके है? सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि रवीश इस सवाल को पूछते हुए सारी हद तोड़ चुके हैं।

Kailash Bajpai पांडेय जी में Rizwan Khan भाईसाहब की बात से पूरी तरह सहमत हूँ, कि भाई के किये का पाप रवीश पर थोपने का कोई औचित्य नहीं… मगर भाई स्वघोषित निष्पछ रविश कुमार जी स्क्रीन ब्लैक करने के और ग्राउंड पर माइक ले जाकर रिपोर्टिंग के माहिर हैं, तो भाई उन्हें भी तथ्यों की पड़ताल ग्राउंड पर जाकर स्क्रीन ब्लैक करनी चाहिए.

आलोक सिंह Rizwan Khan सही कहते हैं कि भाई के किये का पाप रवीश पर थोपने का कोई औचित्य नहीं, क्यूँकि ये गलत है, लेकिन भारत मे होने वाली हर घटना के लिए जब रवीश और उनके अनुयायी मोदी को दोषी ठहरा देते हैं, वो बड़ा क्रान्तिकारी पत्रकारिता होती है।

Vivek Kumar Singh कांग्रेस के बिहार उपाध्यक्ष भी है ।

Kameshwr Pandey कालिख लगाने का मौका चूकना नहीं चाहिए।

Acharya Chandrashekhar Shaastri भूमिहार ब्राह्मण है

Amrendra Ajay भूमिहार नही हैं..

Tarun Kumar Tarun इस पर रवीश से एक खोजी रपट की उम्मीद तो की ही जा सकती है!

Radhey Shyam Maurya रबिश भाई अभी रिपोर्टिंग के लिए भाई को खोज रहे है

Adarsh Shukla बागों में बहार है

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

अखिलेश यादव संग साइकिल चलाते राहुल कंवल का चमचई भरा इंटरव्यू पेड न्यूज़ ही तो है!

अखिलेश यादव के साथ साईकिल चलाते हुए ‘आज तक’ के राहुल कंवल का आधा घंटे का चमचई भरा इंटरव्यू करना क्या पेड न्यूज़ में नहीं आता? साईकिल पर ही बैठे हुए डिंपल यादव का इंटरव्यू करना भी। गोमती रिवर फ्रंट का भी प्रचार। [वैसे गोमती रिवर फ्रंट बहुत सुंदर बना दिख रहा है।]

याद कीजिए बीते विधान सभा चुनाव में चुनाव आयोग के निर्देश पर मायावती की बसपा के चुनाव निशान हाथी को सभी पार्कों में ढंक दिया गया था, लखनऊ से लगायत नोयडा तक। अलग बात है मायावती की बसपा बहुमत से बहुत दूर रह गई। इस बार भी पेट्रोल पंप पर से मोदी की फ़ोटो चुनाव आयोग ने हटवा दीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि साईकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान है और कि आज तक की दिल्ली से आई टीम हफ़्ते भर से लखनऊ में डेरा डाले हुई है।

आज तक के मालिक अरुण पुरी और चैनल के पत्रकार राहुल कंवल, अंजना ओम कश्यप, जावेद अंसारी आदि समूची कैमरा टीम सहित सभी उपस्थित हैं। दिलचस्प यह कि अखिलेश यादव का इंटरव्यू खत्म होते ही उन के पिता मुलायम सिंह यादव का गुडी-गुडी वाला इंटरव्यू भी आधा घंटा का शुरू हो गया है जब कि मुलायम परिवार की एकता दौड़ का विश्लेषण अगला कार्यक्रम है। ऐसे ऐलान की एक पट्टी चल रही है। एक पुराना फ़िल्मी गाना है, क्या प्यार इसी को कहते हैं? की तर्ज़ पर पूछा जा सकता है क्या पेड न्यूज़ इसी को कहते हैं?

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: