चैनल मालिक के खिलाफ जांच की कार्रवाई को मीडिया पर हमले का रंग देने का प्रयास क्यों?

प्रेस क्लब आफ इंडिया में बीते दिनों वरिष्ठ, कनिष्ठ, नामचीन, गुमनाम, बूढ़े, जवान
पत्रकारों का जमावड़ा लगा था। अवसर था एनडीटीवी के मालिक प्रणव राय के
यहां मारे गए सीबीआई छापे के विरोध का। मंच पर विराजमान थे एक से बढ़ कर
एक पत्रकारिता के अपने जमाने के दिग्गज अरुण शौरी, एच.के.दुआ, फली एस
नॉरीमन, कुलदीप नैय्यर, राज चेनप्पा, शेखर गुप्ता, ओम थानवी और प्रणव राय।
इन सभी ने एक स्वर में एक बैंक घोटाले की जांच के सिलसिले में एनडीटीवी
के मालिक प्रणव के यहां मारे गए छापे को प्रेस की आजादी पर हमला करार दे
दिया। इन्होंने साफ साफ कहा कि मोदी राज ने एक बार फिर आपातकाल की याद
दिला दी है और अब वक्त आ गया है कि मीडिया को एकजुट होकर विरोध करना
चाहिए सरकार की मीडिया विरोधी नीति का।

वक्ताओं की काबिलियत पर कोई सवाल नहीं, सभी अपने जमाने के घुरंघर
पत्रकार। लेकिन सभी रिटायर। एक सवाल तो पूछा जा सकता है कि सीबीआई का यह
छापा प्रणव राय की करतूतों के खिलाफ था या मीडिया के खिलाफ। इतने वरिष्ठ
लोग क्यों बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहे हैं। चैनल मालिक के
खिलाफ जांच की कार्रवाई को प्रेस पर हमले का रंग देने का प्रयास क्यों
किया जा रहा है? कुछ वक्ताओं ने उपदेश दिया कि एक पत्रकार को कैसे काम
करना चाहिए, सरकार के खिलाफ। इन सबसे एक सवाल मैं पूछता हूं कि किसी भी
चैनल या अखबार में पॉलिसी कौन लागू करता है….संपादक। संपादक जो
चाहेगा वही छपेगा और टीवी पर दिखेगा। आज कौन संपादक है जो नरेंद्र
मोदी के खिलाफ खबरें छापने का दम रखता हो। मोदी और योगी के साथ
संपादक मंडली कई बार टी पार्टी कर चुकी है।

आज जब अधिकांश संपादक खुद दलाल की भूमिका में हैं तो वे खबरों की कद्र
क्या और कैसे करेंगे। आज अधिकांश संपादक खुद ही मंत्रियों के साथ चाय
पीने और सेल्फी खिंचाने के लिए ललायित रहते हैं। आज संपादक सीधे
मंत्रियों से बात करते हैं। उनके साथ पांच सितारा होटलों में दावत
उड़ाते और जाम से जाम टकराते हैं। ऐसे में कौन सी पत्रकारिता और काहे
की पत्रकारिता। प्रेस क्लब में जितने पत्रकारों ने भाषण झाड़ा वे सभी
अपनी पारी खेल चुके हैं। आज उन सबके पास लंबी लंबी कारें हैं, शानदार घर
है और लैविस लाइफ स्टाइल है। उन्हें न तो नौकरी करनी है और न चाहिए।
ऐसे में भाषण देना आसान है। इनमें से किसी को आज संपादक बना दिया जाए
तब पता चले कि इनमें कितना दमखम है मोदी विरोध करने का।

मामला एनडीटीवी का था तो ढेर सारे नामचीन पत्रकार जुट गए। लेकिन जिस
पत्रकारिता की दुहाई देकर ये अपनी दुकानदारी चला रहे हैं इस पेशे से जब
पत्रकार निकाले जाते हैं तब यह मंडली कहां होती है। मोदी एंड कंपनी आज
यदि मीडिया पर हावी है तो उसका जिम्मेदार कौन है..संपादकों की फौज।
आज संपादकों की सैलरी लाखों में और इन्हें रिपोर्टर चाहिए 5 से 10
हजार रुपए प्रतिमाह में। अंग्रेजी अखबारों की हालत थोड़ी बहुत ठीक हो
सकती है लेकिन हिंदी व रीजनल भाषा के अखबारों व चैनलों की तो पूछिए
मत। एक तो सैलरी नहीं, और मिलती भी है तो दो चार महीने लेट। तब
संपादकों की फौज आवाज क्यों नहीं उठाती। आज पत्रकारिता जिस फटे हाल
में सरकार की गुलाम होकर काम कर रही है उसके लिए जिम्मेदार सिर्फ संपादक
हैं। संपादकों का एक बड़ा वर्ग मालिकान के तलवे चाटने लगा और मालिकान
सरकार के सामने अपने उल्टे सीघे स्वार्थ साधने के लिए पूंछ हिलाने लगे।

आज किस बड़े अखबार में संपादक हैं। अधिकांश में नहीं। मालिक ही संपादक है।
जब मालिक ही संपादक है तो निष्पक्ष पत्रकारिता कैसे होगी? सरकार इसका
फायदा उठाएगी और वही हो रहा है। साथ ही फायदा उठा रहे हैं मालिकान
पत्रकारों का। उल्टे सीधे काम करें मालिक और जब कोई सरकारी कार्रवाई
हो तो उसे पत्रकारिता पर हमला बता सरकार पर प्रेशर बनाना शुरू। इस काम
में उन्हें पत्रकारों की याद आ जाती है। बेचारे पत्रकार लोग भी करें तो क्या
करें, नौकरीपेशा हैं, मालिक जो कहेगा करना ही पड़ेगा। वही हो रहा है।
लेकिन यहां पत्रकारों को सोचने की जरुरत है कि उन्हें इस्तेमाल होना
चाहिए या नहीं।

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों-चैनलों में वरिष्ठ पद पर काम कर चुके हैं.

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मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में वो फैसला देगा?

मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक में वो फैसला देगा? मैं रवीश सर की इस बात से सहमत हूं कि प्रोपोगेंडा ही एजेंडा है और अरविन्द सर की इस बात से भी सहमत हूं कि सब मिले हुए है। आपको इन दोनों कथनों का अर्थ जानने के लिए पहले वकील फली एस नरीमन के बारे में जानने की जरुरत है। फली एस नरीमन देश के मशहूर कानूनविद और सुप्रीम कोर्ट के वकील है। वे एक बार पद्म भूषण और एक बार पद्म विभूषण से भी सम्मानित हो चुके है। यूं तो अलावा नरीमन साहब की कई उपलब्धियां हैं। पर आपको इतना जान लेने की जरुरत है कि वे राज्यसभा सांसद रह चुके हैं और भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड के पक्ष की वकालत कर चुके हैं।

खैर। इन दिनों देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे का शोर है और उसे बचाने की ndtv की पहल पर नरीमन साहब ने भी उस कार्यक्रम में अपना लेक्चर दिया है। अब आप सोच रहे होंगे कि नरीमन साहब ने अभिव्यक्ति की आजादी पर स्पीच दिया तो मेरे पेट में मरोड़ क्यों उठ रही है? तो आप इतना जान लीजिए कि मेरा कातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक़ में वो फैसला देगा? कहने का अर्थ है भोपाल गैस त्रासदी में यूनियन कार्बाइड का पक्ष लेने वाले नरीमन साहब मीडिया मालिकान से चल रही पत्रकारों की मजीठिया की लड़ाई में मीडिया मालिको की ओर से है।

और पत्रकारों के हक़ की हर उस आवाज को दबा देने के लिए प्रयासरत हैं जो न सिर्फ अभिव्यक्ति की आजादी हत्या करती है बल्कि पत्रकारों के अधिकारों का गला घोंट देती है। हां, बात अभिव्यक्ति की आजादी का है तो उन्हें बोलने से रोका तो नही जा सकता। पर अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई के नाम पर किये जा रहे प्रोपोगेंडा पर लहालोट हो रहे पत्रकारों द्वारा आर्थिक अपराधों के दोषी प्रणव रॉय को बचाने के षड़यंत्र को तो समझा ही जा सकता है। जो बंदा पत्रकारों का नहीं हो सका, वह कैसे किसी चैनल की आजादी का पक्षधर हो गया यह बड़ा सवाल है। रविश सर आजादी के पक्षधर हैं और नरीमन साहब मीडिया मालिको के सहचर। अब दोनों मिलकर मीडिया की आजादी की लड़ाई का कौन सा समीकरण बना रहे हैं। यह हम आपके ऊपर छोड़ देते हैं।

दीपक पाण्डेय
deepakshiats18@gmail.com

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बाबू मोशाय प्रणय रॉय, शीशे​ के घर में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकते

इंद्र वशिष्ठ


कृपया क्या कोई बता सकता है कि मीडिया मालिक/संपादक द्वारा शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, नौकरी से निकाले गए पत्रकारों को न्याय दिलाने, मजीठिया वेतन बोर्ड लागू कराने के लिए या बीमारी से जूझ रहे किसी पत्रकार के लिए प्रेस क्लब और एडिटर गिल्ड ने कभी कोई पहल की है। जैसे धोखाधड़ी और आपराधिक साज़िश के आरोपी प्रणय रॉय के लिए की जा रही है। क्या इंडिया टीवी पर प्रताड़ना का आरोप लगा कर जहर खाने वाली तनु शर्मा को इंसाफ दिलाने के लिए कुछ किया था।

100 करोड़ की वसूली के आरोपी जेल भोगी जी न्यूज के सुधीर चौधरी ने लाइव इंडिया में दिल्ली की टीचर उमा खुराना के बारे फर्जी स्टिंग दिखा कर छात्राओं से वेश्यावृत्ति कराने काआरोप लगा कर उसका जीवन बर्बाद कर दिया। सुधीर की इस हरकत से दरिया गंज जैसे संवेदनशील इलाके में दंगा होने की नौबत आ गई थी। पुलिस ने दंगा होने के डर से चैनल की खबर पर विश्वास करके बिना जांच के ही टीचर को जेल भेज दिया। बाद में जांच में चैनल की खबर फर्जी निकली तो पुलिस को अपनी गलती का अहसास हुआ। उस समय सुधीर किसी तरह बच गया उसके रिपोर्टर को गिरफ्तार किया गया।

कहावत है न कि चोर की मां कब तक खैर मनाएगी। सुधीर वसूली के आरोप में जेल पहुंच गया। सह आरोपी जी का मालिक हरियाणे का बानिया सुभाष चन्द्र जेल जाने से बच गया । लेकिन कब तक क्योंकि शिकायत कर्ता भी मामूली आदमी नहीं वो भी हरियाणे​ का ही तगड़ा बानिया नवीन जिंदल है। क्या इन संस्थाओं ने इन मठाधीशों के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत दिखाई है। आरोपी सुभाष चंद्र की किताब का विमोचन प्रधानमंत्री निवास पर करना और सुधीर को पुलिस सुरक्षा देना देख लगा कि मोदी और कांग्रेस में ज्यादा फ़र्क नहीं है।

अब बात बाबू मोशाय प्रणय रॉय की जिनकी आऊट आफ टर्न तरक्की की बुनियाद भी दूरदर्शन के बाबू मोशाय की गोद में रखी गई थी। किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ सीबीआई या पुलिस कार्रवाई करती है तो ये मठाधीश आरोपी को बिल्कुल झूठा साबित करने की होड़ करते हैं पुलिस और सीबीआई को सत्यवादी मान उसका स्तुति गान करते हैं।जैसा कि पत्रकार इफ्तिखार गिलानी के मामले में नीता शर्मा और दीपक चौरसिया ने भी किया था। अब यही बात बाबू मोशाय पर भी तो लागू होनी चाहिए। कहावत है कि अपने लगी तो हित में और दूसरे के लगे तो भित (दीवार ) में। मतलब अपने लगे तो दर्द होता​ हैं।

सीधी सी बात है सीबीआई ने धोखाधड़ी और आपराधिक साज़िश का मामला दर्ज किया है और अभी तो जांच चल ही रही। जांच के बाद मामला कोर्ट में जाएगा वहां साफ़ हो ही जाएगा कि सच क्या है। जांच में दखल तो​ कोर्ट भी नही देता। प्रणय से तो बढ़िया नेता हैं जो जेल जाने के बाद भी कह देते हैं कि न्यायालय पर उनको पूरा भरोसा है। शायद बाबू मोशाय को नहीं है या वह खुद अपनी असलियत तो जानते ही है । इसीलिए अपने निजी आपराधिक मामले को मीडिया पर हमला बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाबू मोशाय खुद सामने आने की बजाय अपने जैसों को आगे कर रहे हैं।

बाबू मोशाय कोई गिलानी जैसे कमजोर तो है नहीं कि हलवा समझ कर सरकार खा लेगी। यह तो बकायदा एक शक्तिशाली न्यूज​ मठ के मठाधीश है अरबपति हैं चिदंबरम जैसे नेता,नामी वकील दोस्त ​है। फिर भला पत्रकारों की संस्थाआें की मदद लेने की क्या जरूरत पड़ गई। इससे तो यही लगता है कि बाबू मोशाय को मालूम है इस केस में नहीं तो ईडी के केस में, या किसी अन्य में जेल यात्रा हो सकती हैं। इसलिए मीडिया बनाम सरकार बनाने के लिए एक ही थैली के चट्टे बट्टे मठाधीशों की गिरोह बंदी करने की कोशिश में है। हालांकि एकजुट होने की संभावना कम है क्योंकि सब मठ भले न्यूज सम्प्रदाय के हो लेकिन किसी की आस्था कांग्रेस महामंडलेश्वर में तो किसी की भाजपा भजन में है तो कोई जगत गुरु अंबानी अखाड़े का हैं। यही वजह है कि मठाधीशों का कुछ नहीं बिगड़ता। लेकिन​ कहते हैं कि देेर हैं अंधेेर नहीं। इसलिए जो ईमानदारी से पत्रकारिता कर रहे हैं वह सावधानी बरतें और अपने कंंधे का इस्तेमाल​ इन मठाधीशों को न करने दें। सिर्फ खाटू के श्याम बाबा की तरह साक्षी भाव से युद्ध देखें। ईमानदार पत्रकारों के संकट के समय में ये मठाधीश भी ऐसा ही करते रहे हैं। बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना न बने।

क्या मीडिया की इन संस्थाओं​ ने अपने बीच से इन गंदी मच्छलियों को बाहर करने के लिए कभी कुछ किया है।अगर किया होता तो आज पत्रकारिता का पूरा तालाब गंदा नहीं माना जाता। अब बात साहेब की उनकी साख से ज्यादा सीबीआई की साख दांव पर है।कोर्ट पिंजरे का तोता कह चुका है। मोदी अगर ईमानदार है तो उन सब मठाधीशों पर कार्रवाई करके दिखाए जिन पर CBI ED Policeमें केस दर्ज है। अगर कार्रवाई नहीं की गई तो यह साफ़ हो जाएगा कि कार्रवाई करने की धमकी भरी तलवार लटका कर मीडिया को भोंपू बनाने की नीयत हैं। ED ने 2030 करोड़ के फेमा मामले में प्रणय रॉय को दो साल पहले नोटिस दिया था उसमें आगे क्या कार्रवाई हुई इसका खुलासा करके सरकार सच सामने रखें।

1998 में सीबीआई ने दूरदर्शन को चूना लगाने का जो केस दर्ज किया था उसका भी खुलासा सरकार करें। वैसे तो यह साफ-साफ आपराधिक मामला है जिसे प्रणय मीडिया से जबरन जोड़ रहा है। सभी पत्रकारों को गोदी पत्रकार कहने वाले बाबू मोशाय तो अभी तक गोदी में ही है पता नहीं गोद से उतर कर चलना कब सीखेंगे। बाबू मोशाय की बात ही मान लें कि मोदी बदला ले रहा है तो स्वाभाविक है कि बदला वहीं लेगा जिसके साथ अन्याय हुआ हो। यह तो उस समय सोचना चाहिए था बाबू मोशाय जब मठ के चेले चेलियों राजदीप सरदेसाई,बरखा समेत गुजरात दंगों में पत्रकारिता के नाम पर तमाशा किया। इशरत जहां एनकाउंटर केस में इसी सीबीआई को सत्य वादी हरीश चंद्र मान कर मोदी को फांसी चढ़ाना चाहा। बाबू मोशाय बैंक से लेन देन तो तुमने किया, तुम पर बैंक को 48 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने का आरोप न होता तो भला मोदी कैसे बदला ले सकता था।

अपने अपराध के लिए दूसरे को दोषी मत ठहराओ। बाबू मोशाय तुमने जो बोया वही काटना है। तुम भूल गए जिनके घर शीशे के होते हैं उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। मनुष्य बलि ना होत है होत समय बलवान भीलन लूटी गोपियां वहीं अर्जुन वहीं बाण।। ईमानदार पत्रकारों उम्मीद है कि मठाधीशों के पाप के घड़े भरने शुरू हो गए।बस फूटने का इंतजार करे। उम्मीद है कि आने वाले समय में पत्रकारिता की पवित्रता और इज्जत दोबारा कायम होगी। अब तो सुब्रत रॉय सहारा ,तरूण तेजपाल, सुधीर, सुभाष चंद्र भी प्रेस क्लब और एडीटर गिल्ड से समर्थन मांगने के हकदार हो गए।वैसे सुब्रत रॉय सहारा को तो ऐसे मठाधीशों के कल्याण के लिए अपना ही क्लब और गिल्ड बना लेना चाहिए।

इंद्र वशिष्ठ
पूर्व क्राइम रिपोर्टर सांध्य टाइम्स (टाइम्स ग्रुप))
पूर्व विशेष संवाददाता दैनिक भास्कर।
9868270534
indervashisth@gmail.com

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प्रेस क्लब आफ इंडिया : पत्रकारों की नौकरी जाने पर चुप्पी, मालिकों के यहां छापे पड़ते ही विरोध प्रदर्शन

संदीप ठाकुर


प्रेस क्लब आफ इंडिया ने एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय और राधिका रॉय के
यहां पड़े सीबीआई छापे के विरोध में शुक्रवार यानी 9 जून यानि आज प्रोटेस्ट
मीटिंग बुलाई है। क्लब का मानना है कि सीबीआई की कार्रवाई देश के चौथे
स्तंभ यानी मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला है। क्या वाकई ऐसा है। सीबीआई
का छापा क्या किसी खबर को लेकर मारा गया था या फिर प्रणव राय की कई
कंपनियों में से एक कंपनी की करतूत की जांच के सिलसिले में मारा गया था।
आगे लिखने से पहले चंद उदाहरण…

1. बंगाल का Saradha Scam। सुदिप्तो सेन एक Ponzi Scheme चला लाखों गरीब
लोगों का 6000 करोड़ से ज़्यादा डकार गया। इस रकम से उसने Saradha Media
House की भी स्थापना की थी। उसका एक News Channel और एक अखबार भी निकलता
था । सुदिप्तो सेन आज जेल में है। ये कानूनी कार्यवाही प्रेस के खिलाफ
कार्यवाही मानी जायेगी क्या?

2. सहारा समूह के मालिक सुब्रत राय News Channel और अखबार चला रहे हैं और
20 हजार करोड़ के गबन में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जेल में हैं। सुब्रत
राय के खिलाफ कार्यवाही प्रेस के उपर हमला माना जाएगा क्या?

3. न्यूज एक्सप्रेस चैनल का मालिक बालाजी भापकर परिवार सहित जेल में है।
चिट फंड कंपनी का मालिक था। करोड़ों का घोटाला किया। क्या यह प्रेस पर
हमला है?

4. लाइव इंडिया चैनल का मालिक महेश मुत्तेवार जो चिटफंड कंपनी चलाता
था, इन दिनों जेल में है। क्या यह भी प्रेस पर हमला है?

5. तहलका मैग्जीन का समूह संपादक तरुण तेजपाल सेक्सुअल हैरासमेंट में जेल
गया, क्या यह भी प्रेस पर हमला था?

6. सुदर्शन news का मालिक सुरेश चह्वाणके पिछले दिनों बलात्कार के आरोप में
गिरफ्तार हुआ था, क्या इसे भी प्रेस पर हमला कहेंगे?

7. देशभक्ति पर भाषण देने वाला जी न्यूज का एंकर सुधीर चौधरी 100 करोड़ की
वसूली के चक्कर में गिरफ्तार हुआ था, क्या यह भी प्रेस पर हमला था?

8. Star News का सीईओ रहा पीटर मुखर्जी अपनी बेटी की हत्या के जुर्म में
पत्नी इंद्राणी मुखर्जी के साथ जेल में बंद है, क्या यह भी फ्री प्रेस पर
हमला है?

9. कुबेर टाइम्स, जेवीजी टाइम्स नामक अखबार लाने वाले मालिकों को भी
चिटिंग व फॉड के मामले में गिरफ्तार किया गया था, क्या यह भी प्रेस पर
हमला था?

10. चैनल पी7, शुक्रवार और बिंदिया पत्रिका का मालिक निर्मल सिंह भंगू
28 हजार करोड़ के घोटाले में जेल में है। क्या इसे मीडिया के खिलाफ
कार्रवाई कहेंगे?

फेहरिश्त काफी लंबी है वैसे लाोगों की जो मीडिया की आड़ में अपना उल्टा
सीधा धंधा चलाते हैं और जब इन पर कोई कानूनी कार्रवाई होती है तो उसे
मीडिया पर हमला बता शोर मचाने लगते हैं। प्रणव राय के मामले में भी यही
हो रहा है।

एडिटर्स गिल्ड से लेकर प्रेस क्लब आफ इंडिया तक प्रेस की
आजादी के नाम पर रॉय के साथ खड़ा नजर आ रहा है। वैसे वर्तमान सरकार में
मीडिया भोंपू का काम कर रहा है। मानता हूं। साथ ही यह भी मानता हूं कि
एनडीटीवी भोंपू चैनलों से थोड़ा अलग है। लेकिन वह भी कोई दूध का धुला
नहीं। प्रणव राय के खिलाफ 7 मामले दर्ज हैं। क्या इन मामलों में होने
वाली हर कार्रवाई के बाद प्रेस क्लब विरोध मीटिंग बुलाएगा? प्रेस क्लब
पत्रकारों का क्लब है, न कि मालिकों का। जब पत्रकारों की नौकरी जाती
है तब प्रेस क्लब क्यों नहीं आगे आता है। आज तक कितने पत्रकारों की
नाौकरी के लिए प्रेस क्लब लड़ा है? जरा सोचिए।

लेखक संदीप ठाकुर प्रेस क्लब आफ इंडिया के सदस्य हैं और दिल्ली के कई अखबारों चैनलों में वरिष्ठ पद पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क sandyy.thakur32@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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देश के सभी बड़े न्यूज चैनलों में अंबानी का पैसा लगा है!

Pushya Mitra : एनडीटीवी वाले मामले से और कुछ हुआ हो या न हो, मगर यह जरूर पता चल गया कि देश के टॉप टेन चैनलों में से शायद ही कोई बचा हो जिसमें अम्बानी का ठीक ठाक पैसा न लगा हो (NDTV में भी प्रणव-राधिका के तमाम शेयर अंबानी के पास गिरवी हैं)। इस हिसाब से राष्ट्रवादी हो, बहुराष्ट्रवादी हो या साम्यवादी हो। तकरीबन हर न्यूज़ चैनल अंततः अम्बानी न्यूज़ ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई चीख कर बातें करता है तो कोई मृदुल स्वर में। कोई राष्ट्रवादियों को शेयरिंग कंटेंट उपलब्ध कराता है तो कोई उदारवादियों को।

इस लिहाज से अखबार अभी बचे हुए हैं। दो चार बड़े अखबार ही होंगे जिनमें अम्बानी का पैसा लगा होगा। बाकी अंबानी के विज्ञापन के लिए ही मुंह जोहते रहते हैं। अखबार वाले विज्ञापन पर बिकते हैं, जबकि tv वाले परमानेंटली बिके हुए हैं, किसी रोज अंबानी इन पर कब्जा कर सकता है। अगर विज्ञापन न मिले तो अखबार वाले किसी भी रोज राजस्थान पत्रिका की तरह सीना तानकर खड़े हो सकते हैं। मगर tv वालों को छापे के दिन का इंतजार करना पड़ता है। और हां, ये सरकार के खिलाफ तो खड़े हो सकते हैं मगर अंबानी के खिलाफ खड़ा होना मुश्किल होता है। रस्मी खबरें चला देना अलग बात है।

हां, बीबीसी और स्क्रॉल डॉट इन की बात अलग है। इन दो मीडिया हाउस को आमदनी से कोई लेना देना नहीं है। इन्हें सिर्फ खर्च करना है। और खर्च करने के लिये इनके पास इफरात पैसा है। लिहाजा इनको न अम्बानी की गरज है और न ही davp-prda की। क्रांति करने के लिए ऐसी आदर्श स्थिति तो चाहिए ही होती है। बीबीसी का पैसा कहां से आता है, यह तो मालूम है। बस स्क्रॉल का सोर्स ऑफ इनकम नहीं मालूम। लगता है कोई जादुई चिराग है इनके पास।

प्रभात खबर अखबार में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पुष्य मित्र के उपरोक्त एफबी स्टटेस पर आए ढेरों कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Alok Kumar द वायर भी

Pushya Mitra वायर वाले तो कहते हैं, चार दोस्तों ने 1-1 लाख मिलाकर शुरू किया था।

Alok Kumar विप्रो का पैसा लगा है.. अजीम जी समेत कई घरानों ने मीडिया के लिए खास तौर पर फंड जेनरेट किए हैं.. स्टार्ट अप स्कीम के तहत भी कुछ घराने पैसा दे रहे हैं.. आइडिया दीजिए पैसा लीजिए.. खोलिए दुकान..

Pushya Mitra और स्क्रॉल में?

Arvind Das The wire को IPSMF ने फंड किया है औरों ने भी किया है…हेल्थ बीट वगैरह के लिए वे हेल्थ सेक्टर से जुड़े संस्थानों से भी सहयोग लेते हैं…यहाँ देखिएगा…http://ipsmf.org/ एनडीटीवी में अंबानी का पैसा लगा है, यह तो पुरानी ख़बर है. Caravan ने इस पर कवर स्टोरी की थी: http://www.caravanmagazine.in/reportage/the-tempest-prannoy-radhika-roy-ndtv

Pushya Mitra आपको सोर्स मालूम है क्या अरविंद जी? कैसे कोई पोर्टल लाखों की सैलरी बांटता है और विज्ञापन नहीं लेता है। Ipsfm की आमदनी का स्रोत क्या है?

Arvind Das जाहिर है, केवल विज्ञापन से तो अखबार भी नहीं चलता. छोटे-मोटे वेबसाइट के बारे में पता नहीं, हो सकता है राजनीतिक पार्टियों का सहयोग हो, चिट फंड कंपनियों का सहयोग हो, ब्लिडरों का सहयोग हो…लेकिन वायर या स्क्रॉल या क्विंट या कैच के बारे में जानकारी पाना मुश्किल नहीं…

Arvind Das IPSFM के वेबसाइट पर donor की पूरी लिस्ट लगी है: DONORS.. The Foundation has received donations from the following (names in alphabetical order): The Foundation has received donations and significant commitments of donations from over a dozen individuals and charitable organizations. Donors wish to have no say in funding decisions taken by the Foundation, and have entrusted the Trustees to run the IPS Media Foundation as an independent entity with the help of an operating team.
1. Mr. Aamir Khan
2. Azim Premji Philanthropic Initiatives Private Limited
3. Mr. Cyrus Guzder
4. Ms. Kiran Mazumdar-Shaw
5. Lal Family Foundation
6. Manipal Education and Medical Group India Pvt Ltd
7. Piramal Enterprises Limited
8. Pirojsha Godrej Foundation
9. Quality Investment Pvt. Ltd.
10. Ms. Rohini Nilekani
11. Rohinton and Anu Aga Family Discretionary No. 2 Trust
12. Sri Nataraja Trust
13. Tejaskiran Pharmachem Ind. P. Ltd.
14. Unimed Technologies Ltd.
15. Viditi Investment Pvt. Ltd.

Pushya Mitra स्क्रॉल के बारे में मैं सचमुच जानना चाहता हूँ।

Arvind Das मैंने भी कभी गौर नहीं किया, कोशिश करता हूँ या आलोक जी बताए मेहनत से बच जाऊँगा

Pushya Mitra यह फार्मूला अच्छा है। वैसे क्या ये लोग कंटेंट पर भी कंट्रोल करते हैं?

Arvind Das पता नहीं, पर कुछ ना कुछ तो इनका say रहता ही होगा…ज्यादा कंट्रोल नहीं करते होंगे, ऐसा मुझे लगता है…

Arvind Das In India, Omidyar has invested in Scroll.in and Newslaundry.com. Madhukar admits that he’s often asked why Omidyar invested in a left-of-centre media product, Scroll.in. “When we invested in Scroll, it was just an idea. All we were promised was a compelling editorial product. We have also invested in Newslaundry and don’t know where to place it really. The genesis of our investment is agnostic of ideology,” he says. ये देखिएगा… http://www.livemint.com/Opinion/CUrOd5ytWmYd3qREoDqgdK/The-ideology-behind-media-investments.html

Diwakar Ghosh Share Ambani k pass girbi hai ka kya saboot hai aap k pass ?koi documents ho to bataeye ,nahi to mana jayega ki aap bhi …,

Pushya Mitra अरे सर। इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी है, पढ़ लीजिये। बांकी मानने को तो जो मानना है मान सकते हैं। आप सर्च कीजिये। मिल जाएगा। नहीं तो मेरे पुराने पोस्ट पर लिंक है। सोर्स ऑफ इनफार्मेशन सीमित नहीं रखिये।

Vikas Kushwaha Kha se aata hai bbc ka paisa??

Pushya Mitra ब्रिटेन की सरकार से। यह तो वहां के विदेश मंत्रालय का उपक्रम है।

अभिषेक मिश्रा राजस्थान पत्रिका तो राजस्थान की मुख्यमंत्री की तस्वीर और नाम छापने से परहेज करता हैI

Pushya Mitra क्योंकि विज्ञापन बन्द हो गया था।

अभिषेक मिश्रा जी और सिलसिला आज भी जारी है, लेकिन जनता सब समझती है वहां की, लिहाजा संपादकीय नीति का विरोध भी कर रही हैI

नबीन चंद्रकला कुमार अम्बानी के पास गिरवी नही है कुछ शेअर अम्बानी के पास भी है । जिसने केस किया था उसके पास भी 1-2 % शेअर है । गिरवी आईसीआईसीआई के पास था

Pushya Mitra नवीन भाई। ठीक से पता कीजिये। अम्बानी ने 403 करोड़ का लोन इस शर्त पर दिया है कि 99.99 फीसदी शेयर गिरवी रहेंगे।

नबीन चंद्रकला कुमार अभी तक ऐसा कुछ फर्म नही आया है शगुफा चल रहा है । तरह तरह के न्युज आ रहे है ।

Pushya Mitra अगर आपका सोर्स सिर्फ Ndtv होगा तो सब शिगूफा लगेगा। कभी कभी इंडियन एक्सप्रेस भी पढ़ना चाहिये।

नबीन चंद्रकला कुमार ना भाई जी इंडियन एक्सप्रेस न्यु इंडियन एक्सप्रेस मय पढते है। एनडीटीवी की खबर हम इस मामले में खाली आईसीआईसीआई वाला लेटर पढे है और कुछ नहीं। चलिये इसपे भी क्लेरिफिकेसन जल्दिये आ जायेगा। सच बाहर होगा।

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सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर हैं, सबके घर छापा पड़ना चाहिए!

Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

Shrikant Asthana : तलवा चाटने और अपनी बात न कह सकने वाले दरअसल कभी पत्रकार थे ही नहीं- भले उन्होंने अखबारी नौकरी में ही पूरा जीवन बिताया हो। पिछले दो दशको में चारणों-भाटों, और अधीनस्थों के शोषण में सक्रिय सहयोग के लिए तैयार चरित्रों को ही छांट कर सम्पादक बनाया गया है। उत्पीड़न का असल औजार तो मालिक की हां में हां मिलाने वाले ये दलाल ही रहे हैं। पत्रकार है तो औकात है। वह बोलेगा मालिक के खिलाफ भी, भांड़ सम्पादक के खिलाफ भी या हर गलत शख्स या बात के खिलाफ। पर पत्रकार हैं कितने देश भर में? पहले पत्रकार तो सामने आयें…

Dayanand Pandey : लोगों को जान लेना चाहिए कि भारत में अब मीडिया नहीं है। मीडिया की दुकानें हैं, मीडिया के दलाल हैं। संविधान में भी तीन खंभों का ही ज़िक्र है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। बस। मीडिया के नाम पर चौथा खंभा जो है वह काल्पनिक है, संवैधानिक नहीं। फिर भी चौथा खंभा अगर है तो वह पूंजीपतियों का खंभा है, दलालों का खंभा है, गरीबों का खंभा नहीं है, गरीबों के लिए नहीं है। निर्बल और लाचार के लिए नहीं है। सर्वहारा के लिए नहीं है। कारपोरेट घरानों का है मीडिया, इसकी सारी सेवा कारपोरेट घरानों के लिए है। सिर्फ़ इनकी ही तिजोरी भरने के लिए है, इनकी लायजनिंग करने के लिए है, इनका ही स्वार्थ साधने के लिए है। बहुत सारे राजनीतिज्ञ भी इनके लिए सिर्फ़ कुत्ते हैं। दुम हिलाते हुए कुत्ते। इस मीडिया में काम करने वाले भी दलाल और चाकर हैं। गली वाले कुत्तों से भी बदतर। अरबों खरबों के साम्राज्य वाले इस मीडिया के ज्यादतर चाकर एक दिहाड़ी मज़दूर से भी कम वेतन पाते हैं। लोगों को यह बात भी जान लेनी चाहिए।

कई अखबारों में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार रमेश राय, श्रीकांत अस्थाना और दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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मैं रवीश कुमार, एनडीटीवी पर पेश है प्राइम टाइम, प्रायोजक हैं ‘पतंजलि’!

Samar Anarya : बस सनद रहे कि रवीश कुमार का आज का शानदार प्राइम टाइम भी पतंजलि प्रायोजित है! बोले तो लड़ाई बहुत मुश्किल है, बहुत बहुत मुश्किल। Gentle Reminder: Even today’s gallant Prime Time of Ravish Kumar is sponsored by Patanjali. The battle is going to be difficult, very very difficult.

Subhash Rai : रवीश कुमार कह रहे हैं कि कुछ को छोड़कर सभी पत्रकार डर गये हैं। मुझे लगता है, वे खुद डरे हुए हैं। अगर प्रणव राय ने कोई गलती नहीं की है तो सरकार या सीबीआई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। उन्हें अपनी जांच करने दें, आप जो काम कर रहे थे, वो करें। आप अगर यह समझते हैं कि सारी जनता अंधे कुएं में चली गयी है और वह सच और झूठ में फर्क करना भूल गयी है तो आप गलती कर रहे हैं। किसी सच को कई झूठ बोलकर कोई नहीं दबा सकता। न सरकार, न प्रेस, न वे, न आप।

पत्रकार द्वय समर अनार्या और सुभाष राय की एफबी वॉल से.

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एनडीटीवी पर छापे के पक्ष में पोस्ट और कमेंट लिखने वाले आदमी नहीं, पाजामा हैं!

Sheetal P Singh : वित्त मंत्रालय के अनुसार देश में करीब 5500 willful defaulters हैं जिन से बैंकों को करीब साठ हजार करोड़ रुपये वसूलने हैं। माल्या के अलावा। प्रणव राय के उपर यह राशि 43 करोड़ बताई गई है जिसे वे अदा कर चुके हैं सिर्फ़ ब्याज पर यह FIR दायर है। बाकी किसी पर होमगार्ड तक नहीं पहुंचा। क्या यह तथ्य जानने के बाद भी आप सीबीआई की रेड के लिए पक्ष में पोस्ट लिख सकते हैं, कमेन्ट कर सकते हैं? आप आदमी हैं कि पाजामा?

Prabhat Dabral : अब तो मानना ही पड़ेगा कि अकेला NDTV ही है जिसने कोई कानून तोडा, बाकी सारे चैनल और उनके मालिक दूध के धुले हैं- ज़ी न्यूज़ भी…कानून तोडा है तो छापा भी पड़ेगा मुक़द्दमा भी दर्ज़ होगा…कानून अपना काम करेगा, हमें उसपर कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए….आप जो ये कह रहे हैं न कि सी बी आई और इनकम टैक्स विभाग सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं, कोरी बकवास है…तब आप कहाँ थे जब इंदिरा गाँधी वाली इमरजेंसी में आर एस एस के अख़बार मदरलैंड को बंद किया गया था, बाकियों के गैरकानूनी निर्माण को नज़रअंदाज़ करते हुए सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस के गैरकानूनी निर्माण को सील किया गया था…सरकार का विरोध करोगे और चाहोगे कि सरकारी विभाग आँखे बंद करे रहें ये कैसे हो सकता है… वही तो हो रहा है जो इंदिरा गाँधी ने इमरजेंसी में किया था, इसलिए चिल्लाओ मत…..अभी तो विरोध करने वाले पत्रकारों की गिरफ्तारी भी नहीं हुई है, अभी से बोखला गए, ये ठीक नहीं है…

Shambhunath Shukla : सीबीआई का प्रणब रॉय के ग्रेटर कैलाश-वन स्थित आवास पर छापा हो सकता है कि रूटीन कार्रवाई के तहत हुआ हो पर यह समय गलत है। दो दिन पहले ही सत्तारूढ़ दल भाजपा के प्रवक्त संबित पात्रा को एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान ने अपने शो से चले जाने को कहा था तब यह शुबहा होना लाजिमी है कि सरकार ने बदले की कार्रवाई के तहत यह छापा पड़वाया। मालूम हो कि श्री प्रणब रॉय एनडीटीवी के मालिक हैं। अगर श्री प्रणब रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय पर आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए एक करार के तहत यह छापा डाला गया तो भी इसे फिलहाल टाला जा सकता था। सरकार और सरकारी एजेंसियों को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे पब्लिक में यह मेसेज जाए कि सरकार बदला ले रही है।

Jaishankar Gupta : एनडीटीवी के संस्थापक-संचालक प्रणय राय के यहां सीबीआई का छापा निंदनीय है। इसकी टाइमिंग के मद्देनजर यह बदले की कार्रवाई भी लग सकती है। कानून और जांच एजेंसियों को अपना काम स्वतंत्रता, निष्पक्षता और बिना किसी दबाव और भेदभाव के पूरा करना चाहिए। अगर एनडीटीवी और इसके मालिकान ने कुछ गलत किया है तो उसे सामने लाकर उन पर कार्रवाई की जा सकती है लेकिन हाल के घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि को सामने रखकर देखें तो कुछ और ही लगता है। हमारी जांच एजेंसियों को असहमति की आवाज दबाने में टूल कतई नहीं बनना चाहिए।

Ankur Tiwary : कुछ दिन पहले NDTV पर कुतर्क कर रहे बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा को निधि राजदान ने स्टूडियो से भगाया था और आज एनडीटीवी के मालिक पर सीबीआई की रेड पड़ गई है। उफ्फ, सीबीआई जैसी एजेंसियों का इतना दुरुपयोग तो शायद ही किसी केंद्र सरकार ने किया होगा, जितना इस समय सरकार कर रही है। 3 साल से अधिक हो जाने पर यह बात तो तय हो गई है कि यदि कोई भी मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने की हिमाकत करेगा तो उसे सीबीआई, आईटी जैसी एजेंसियों का डर दिखाकर मुंह पर लगाम लगाने की कोशिश की जाएगी। शर्मनाक।

Anil Singh : सत्य की परंपरा ही जीतेगी, झूठ हारेगा. रवीश ने ठीक कहा कि एनडीटीवी एक दिन में नहीं बना। जिस तरह वो सच दिखाने की राह पर चल रहा है, उसके पीछे सत्य के लिए लड़ने की हज़ारों सालों की भारतीय परंपरा है। वहीं, सत्ता झूठ का सहारा ले रही है, प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू कुछ न जानने का स्वांग रच रहे हैं, जो ऋण चुकाया जा चुका है, उसे बकाया बताकर सीबीआई से छापे मरवा रहे हैं। इसलिए तय मानिए कि अंततः झूठ की हार और सत्य की जीत निश्चित है। सत्यमेव जयते।

सौजन्य : फेसबुक

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मोदी सरकार में हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते!

Dayanand Pandey : एनडीटीवी पर आयकर और सीबीआई के संयुक्त छापे पर बहुत हाहाकार मचा हुआ है। यह व्यर्थ का हाहाकार है। जैसे सभी मीडिया घराने चोर और डाकू हैं, काले धन की गोद में बैठे हुए हैं, एनडीटीवी भी उनसे अलग नहीं है। एनडीटीवी भी चोर और डाकू है, अपने कर्मचारियों का शोषण करता है, क़ानून से खेलता है, काले धन की गोद में बैठा हुआ है। वह सारा कमीनापन करता है जो अन्य मीडिया घराने करते हैं। एनडीटीवी में चिदंबरम का ही काला धन नहीं बल्कि पोंटी चड्ढा जैसे तमाम लोगों का भी काला धन लगा है। सरकार से टकराना भी एनडीटीवी की गिरोहबंदी का हिस्सा है, सरोकार का नहीं। सरकार से टकराने के लिए रामनाथ गोयनका का डीएनए चाहिए जो आज की तारीख में किसी एक में नहीं है। अलग बात है कि आखिरी समय में व्यावसायिक मजबूरियों में घिर कर रामनाथ गोयनका भी घुटने टेक कर समझौता परस्त हो गए थे। इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की धार रामनाथ गोयनका के जीवित रहते ही कुंद हो गई थी। अब तो वह धार भी समाप्त है।

कोई भी व्यावसायिक मीडिया बिना चोरी, छिछोरी, काला धन और कमीनेपन के नहीं चल सकता। एनडीटीवी भी नहीं। विरोध भी व्यवसाय का हिस्सा है। कोई भी व्यावसायिक घराना निष्पक्ष अखबार या चैनल नहीं चला सकता। निष्पक्ष होने के लिए काले धन और व्यवसाय से विरक्त होना पड़ेगा। नेहरु ने इस खतरे को समझ लिया था और कहा था कि अखबार को कोआपरेटिव सोसाईटी या ट्रस्ट के तहत ही चलाया जाना चाहिए। नेशनल हेरल्ड, नवजीवन, कौमी आवाज़ का प्रयोग भी उन्होंने किया था। जो मिस मैनेजमेंट और मीडिया घरानों के आगे दम तोड़ गया। हिंदू और ट्रिब्यून जैसे अखबार आज भी ट्रस्ट के तहत प्रकाशित होते हैं तो वहां कुछ खबर के सरोकार शेष हैं, कर्मचारियों के शोषण में कुछ अतिरेक नहीं है। अकबर इलाहाबादी याद आते हैं:
तीर निकालो न तलवार निकालो,
जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो
तो एनडीटीवी न तीर है, न तलवार, न तोप। किसी गैंग की तरह एकपक्षीय और लाऊड खबर की तलब में डूबा, सत्ता विरोध के खबर की आड़ में काले धन की खेती करता है एनडीटीवी भी। मनी लांड्रिंग और फेरा जैसे आरोपों में घिरा है। टू जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाले में गले तक हिस्सेदार है। सिर्फ़ साफ सुथरी, हिप्पोक्रेसी भरी बातें करने से, सेक्यूलरिज्म का ताश फेंटने से, सत्ता विरोध की नकली हुंकार से ही कोई साफ सुथरा नहीं हो जाता। एनडीटीवी के सत्ता विरोध का एक हिस्सा और जान लीजिए कि वित्त मंत्री अरुण जेटली भी इस के सरपरस्तों में से एक हैं। वाम नेता वृंदा करात प्रणव रॉय की बीवी राधिका रॉय की बहन हैं। राजदीप सरदेसाई, बरखा दत्त आदि की दलाली की दुकान एनडीटीवी से ही तो संचालित होती थी कांग्रेस राज में। आप लोग इतनी जल्दी भूल गए? आदि-इत्यादि बहुत से किस्से हैं। फिर कभी।

अभी बस इतना ही जानिए कि सभी मीडिया घरानों की तरह एनडीटीवी भी पाप और भ्रष्टाचार का घड़ा है, काले धन के कारोबार पर टिका है। सो इस के पक्ष में अपनी भावना और ऊर्जा व्यर्थ में नष्ट करने से बचें। जो हो रहा है, होने दें। इसलिए भी कि यह मोदी विरोध की कीमत नहीं है, काले करतूत की कीमत है। इसका ही तकाज़ा है। बस इतना समझ लीजिए कि मीडिया होने की ताकत में एनडीटीवी का बहुत कुछ सड़ा हुआ सामने आने से बचा हुआ है। मोदी सरकार में हिम्मत नहीं है। हिम्मत होती तो प्रणव रॉय अपनी दाढ़ी के बाल नोचते हुए तिहाड़ की रोटी तोड़ रहे होते।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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रंगदार संपादक और राष्ट्रवादी शोर : टीवी जर्नलिज्म आजकल….

मोदी के राज में कानून का डंडा बहुत सेलेक्टिव होकर चलाया जा रहा है…

Nitin Thakur : एनडीटीवी प्रमोटर पर छापे के दौरान ‘ज़ी’ अजीब सी खुशी के साथ खबर चला रहा था. शायद उन्हें इस बात की शिकायत है कि जब उनकी इज्ज़त का जनाज़ा निकल रहा था तब उनका साथ किसी ने नहीं दिया. ज़ी का दर्द एक हद तक सही भी है. तब सभी ने चौधरी और अहलूवालिया का स्टिंग बिना ऐसे कुछ लिखे चलाया था कि “ये पत्रकारिता पर हमला है”. अब ज़ी हर बार जश्न मनाता है. जब एक दिन के एनडीटीवी बैन की खबर आई तो भी.. जब छापेमारी की खबर आई तो भी. उसे लगता होगा कि कुदरत ने आज उसे हंसने का मौका दिया है तो वो क्यों ना हंसे. बावजूद इसके सच बदल नहीं सकता कि उनका मामला खबर ना दिखाने के लिए संपादकों द्वारा रंगदारी की रकम तय करने का था और ये सब एक बिज़नेसमैन की वित्तीय अनियमितता का केस है जिसमें बैंक का कर्ज़ ना लौटाना प्रमुख है.

दोनों मामलों की गंभीरता की तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. ज़ी के मामले में पत्रकारिता पर हमला तब माना जाता जब कैमरे पर जिंदल का आदमी खबर रोकने के पैसे तय करता और ज़ी के संपादक खुले आम कहते कि हम बिकनेवाले नहीं. वहां ऐसा कुछ नहीं था. हां, जब जिंदल ने स्टिंग सार्वजनिक कर दिया तब ज़रूर ज़ी ने कहा कि हम तो खुद मीडिया को खरीदने की इस चाल का पर्दाफाश करनेवाले थे. हालांकि ये कभी नहीं पता चला कि कैसे? सीबीआई ने विदेश से लौटते ही घंटों तक वर्तमान सांसद चंद्रा जी से पूछताछ की और उन्होंने सीबीआई की पूछताछ के तुरंत बाद अपने संपादकों की क्लास लेने वाले ढंग में बाइट भी दी. वो फिर अलग कहानी है कि कैसे संपादकों से मिलने के बाद चंद्रा जी हल्के पड़ते चले गए. सवाल आज भी कायम है कि क्यों?

खैर आगे चलकर संपादकों का ना सिर्फ प्रमोशन हुआ बल्कि एक को तो जनता में अपनी छवि चमकाने के लिए फ्री हैंड दिया गया कि वो अपने शो को भयानक राष्ट्रवादी बनाकर हीरो बन जाए. इसके लिए अलग से लोगों की भर्ती हुई. आज कर्मचारियों की पूरी फौज सारा दिन सिर्फ एक शो में चांद तारे जड़ने के लिए लगी रहती है. वो जानती है कि ये शो सिर्फ टीआरपी के लिए नहीं बनता. ये टीम की अनवरत मेहनत का परिणाम है कि आज कोई भी उस “रंगदार संपादक” की बात नहीं करता. अब सबको राष्ट्रवादी शोर ने बहरा कर दिया है. स्वयं चंद्रा जी ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए टीवी पर अमीर बनने के टिप्स बेचने शुरू किए.

कई साल तक उस बोरियत से भरपूर शो को चलाकर वो भी अंतत: करियर गुरू जैसी इमेज बनाने में कामयाब रहे. दोनों ही लोगों ने विश्वसनीयता के संकट से जूझते हुए टीवी का उपयोग अपने निजी छवि निर्माण में जिस तरह योजनाबद्ध ढंग से किया उस पर मैं कभी पीएचडी का शोध करना चाहूंगा. आज दोनों के पास अपना बचाव करने के लिए फैन्स का साथ है. यकीन ना हो तो फैन पेज देख आइए. संपादक जी के नाम से लगे होर्डिंग तो मैंने दिल्ली के पॉश इलाकों तक में पाए हैं. ये अभूतपूर्व है जब एक संपादक को कुछ लोग नेता की तरह प्रमोट कर रहे हैं.

अब तो कोई उनका स्टिंग कर दे तो पहले की तरह परेशानी नहीं होगी. वो उसे अपने स्तर से पत्रकारिता पर हमला कह कर या सीधा सीधा राष्ट्रवादी पत्रकारों पर हमला कह कर बच निकलेंगे. निजी हितों की लड़ाई को कैसे अभिव्यक्ति या विचार की लड़ाई में बदला जाए ये उसकी तैयारी है. क्रिकेट मैच का बायकॉट दरअसल अपने उसी खास रुझानवाले फैन को ये भरोसा दिलाने के लिए है कि जब सारे मीडिया के लिए देश से ऊपर क्रिकेट हो गया था तब हम अकेले भारतीय सेना का पराक्रम दिखा रहे थे. उससे उलट एनडीटीवी ऐसी कोई कोशिश कभी करता नहीं दिखा. उन्होंने सरकारों से सवाल पूछे. भले चैनल का प्रमोटर कोई वित्तीय खेल करता ही रहा हो तो भी चैनल के तेवर ने पत्रकारिता के बेसिक्स के साथ खिलवाड़ नहीं किया.

खिलवाड़ तब होता जब चैनल धीरे धीरे अपनी टोन डाउन करता ताकि उसके प्रमोटर को सरकार के कोप से किसी हद तक बचाया जा सके. इससे उलट वो टीआरपी में जितना पिछड़ा उसका तेवर ज़्यादा ही तल्ख होता गया. बैन का नोटिस भेजकर सरकार ने सोचा होगा कि चेतावनी देकर चैनल के सुर साध लेगी मगर रवीेश कुमार की काली स्क्रीन का मैसेज साफ था. चैनल बैन तो सरकार ने वापस लिया ही.. प्रतिरोध की बहार देखकर समझ आ गया कि भले ही मालिक पर हमला कर दो लेकिन चैनल से बचकर रहो. चैनल की लड़ाई जो चेहरा लड़ रहा है उसे देश के करोड़ों लोगों का भरोसा हासिल है. बीच में उसकी क्रेडिबिलिटी भी खत्म करने की साज़िश हुई. भाई पर छिछला सा आरोप लगा और ट्रोल रवीश को किया जाने लगा. उसके बाद सोशल मीडिया पर किसी रवीश की छोटी बहन को भी ट्रोल किया गया. ट्रोल करनेवालों को इस तथ्य से बहुत लेनादेना नहीं था कि रवीश की कोई बहन ही नहीं है. खैर.. दो चैनलों के पाप की तुलना से मीडिया का कोई भला नहीं होनेवाला.

मैंने ये लड़ाई पहली बार पाकिस्तानी चैनल्स पर देखी थी जहां एंकर खुलेआम ऑन एयर अपने प्रतियोगियों की खिंचाई करते हैं. भारत के चैनल इस मामले में बेहद अनुशासित रहे मगर पहली बार इस नियम को ज़ी ने ही तोड़ा. उसने ही सबसे पहले सेकुलर मीडिया जैसी बात कहके देश को समझाने की कोशिश की.. कि वो खुद बाकी सबसे अलग हैं और सेकुलर तो कतई नहीं हैं. उसने ये हरकत इतनी बार दोहराई कि एक बार तो चैनल के मालिक को ऑन एयर सफाई देनी पड़ी कि हम किसी पार्टी के साथ नहीं हैं. ये ऐतिहासिक सफाई वो तब दे रहे थे जब कुछ महीने पहले अपने ही चैनल पर एक पार्टी के लिए प्रचार करते और वोट मांगते दिखे थे. ज़ाहिर है उनकी सफाई कपिल की कॉमेडी की तरह मज़ेदार थी.

वैसे उनके विरोधी नवीन जिंदल तो और भी माशाअल्लाह निकले. उन्होंने ज़ी को घेरने के लिए एक चैनल ही खरीद डाला. ज़ी फिर भी किसी ज़माने में कभी शानदार पेशेवर चैनल था जिसने राजनीतिक खबरों को बेहद अच्छे ढंग से रखने में साख बनाई थी मगर जिंदल इस पेशे में सिर्फ इसीलिए उतरे क्योंकि उन्हें ज़ी के हमलों का जवाब उसी की भाषा में देना था. इस सबमें किस को कितना फायदा हुआ ये तो नहीं मालूम लेकिन पत्रकारिता का नुकसान बहुत हुआ. विरोधी चैनल को अपने खिलाफ खबर चलाने का कानूनी नोटिस भिजवाने वाला खेल ये दोनों खूब खेलते रहे हैं. भारतीय पत्रकारिता ने दो बिज़नेसमैन की लड़ाई में अपना इतना खून कब बहाया था याद नहीं. इतने बड़े मामले की जांच कहां तक पहुंची आज ये कोई नहीं जानता. वैसे मोदी सरकार को इनकी लड़ाई में कोई खास दिलचस्पी नहीं है.

कोल ब्लॉक की जिस जंग में दोनों के हाथ काले हुए उस पर अब कोई बात नहीं करता. सरकार के पास वक्त और ऊर्जा लगाने के लिए आज खुद का एक शत्रु है और फिलहाल उसका फोकस पूरी तरह उसी पर है. फोकस ना होता तो वो इतने छिछले आरोप में सीबीआई को कभी नहीं उतारती. प्राइवेट बैंक का कर्ज़ ना लौटाने का केस और उसमें भी एक ऐसे आदमी की शिकायत जो कभी इसी ग्रुप का खास रहा है सब कुछ ज़ाहिर करने के लिए काफी है. आरोप तो इतना कमज़ोर है कि जिसकी हद नहीं. प्रणय रॉय के पास कर्ज़ चुकाने के कागज़ात मौजूद हैं. अलबत्ता कागजों के सही गलत का फैसला बाद की बात है. अब लगे हाथ बता दूं कि जिस फेमा के उल्लंघन में चैनल की अक्सर खिंचाई होती है ठीक वही मामला एक अन्य मीडिया संस्थान पर भी है लेकिन उसे सरकार के एक बेहद शक्तिशाली मंत्री के बहुत करीबी होने का ज़बरदस्त फायदा मिल रहा है.

मोदी के राज में कानून का डंडा इतना सेलेक्टिव होकर चलेगा ये अंदाज़ा लगाना तब बेहद आसान हो गया था जब गुजरात की एजेंसियों ने सरकार बनने के बाद उन तीस्ता सीतलवाड़ पर औने पौने आरोप लगाए जिसने गुजरात दंगों के मामले में मोदी को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाया. आज जो हो रहा है वो सीबीआई से पहले भी कराया गया है. इस काम में अब उसे महारत हासिल है. खुद मोदी का वो वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद है जिसमें वो सीबीआई को कांग्रेस की कठपुतली बता रहे हैं.

आज देश किस आधार पर मान ले कि वो प्रधानमंत्री का तोता नहीं है? मीडिया के उस खेमे से उनकी खुन्नस यूं भी पूरानी है जो अक्सर उनसे गुजरात दंगों पर सवाल करता रहा है. वो तो लाल किले तक से मीडिया को पाठ पढ़ा चुके हैं. उनके लिए मीडिया को उसकी हैसियत दिखाना कितना ज़रूरी है ये इसी बात से समझिए कि तीन साल गुज़र गए उन्होंने कभी खुलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की.. अलबत्ता संपादकों से अलग मिलकर निर्देश और सलाह देते रहते हैं. आज सत्ता उनके पास है और उसके साथ सीबीआई दहेज की तरह मिलती है. अब ये प्रधानमंत्री के विवेक पर है कि वो सीबीआई का इस्तेमाल व्यापमं जैसे बड़े घोटालों में कायदे से करते हैं या फिर अपने पूर्ववर्तियों की तरह विरोधियों को निपटाने और ब्लैकमेल करने में करते हैं. देश उन्हें देख रहा है.. वो कहां देख रहे हैं??

फेसबुक के चर्चित युवा लेखक नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

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भड़ास के यशवंत ने एनडीटीवी छापे पर क्या लिखा, ये पढ़ें

Yashwant Singh : हां ठीक है कि ये लोकतंत्र पर हमला है, अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार है, मीडिया का गला घोंटने की कोशिश है.. लेकिन पार्टनर ये भी तो बता दीजिए कि जो आरोप लगे हैं आईसीआईसीआई बैंक के 48 करोड़ रुपये के फ्राड करने का, उस पर आपका क्या मत है.

ये भी तो बता दीजिए कि आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने चिदंबरम और प्रणय राय द्वारा मिल जुल कर 2जी स्कैम के पैसे के गोलमाल का जो खुलासा किया, उस पर आपका स्टैंड क्या है.

मुझे भी आपसे प्यार था. मैं भी भाजपा विरोधी रहा हूं और हूं. लेकिन आप जो कामरेड होने के नाम पर पैसों का गबन कर रहे हैं, स्कैम में सहयोगी बन रहे हैं, उसका कैसे समर्थन कर सकता हूं.

हां ये सही है कि जी न्यूज वाले चोर हैं, रजत शर्मा भाजपाई है, ऐसे ही अन्य भी जो हैं, वो सब आपके विरोधी हैं, लेकिन आप अपने ब्रांड के नाम पर जो घपले-घोटाले किए हैं और किए जा रहे हैं, उस पर आपको खुल कर सफाई देनी चाहिए, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया, क्यों?

चिदंबरम और उनके बेटे के यहां जब इनकम टैक्स का छापा पड़ा था, तभी मुझे पता चल गया कि अब आपकी बारी है. पर आपने तब भी अपना स्टैंड क्लीयर नहीं किया, आपने आईसीआईसीआई बैंक के साथ किए गए फ्राड घोटाले के बारे में अपनी साइट या अपने चैनल पर कुछ नहीं लिखा दिखाया.

दुनिया को पारदर्शिता और लोकतंत्र सिखाने वाले प्रणय राय एंड कंपनी, आप लोग खुद को सरकार विरोधी होने का लाभ भले ले लो, जो कि लेना भी चाहिए, यही राजनीति है, यही तरीका है आजकल का, लेकिन सच यह है कि आपसे हम लोग यानि खासकर भड़ास वाले जमाने से पूछ रहे हैं कि जो काला धन सफेद किया है, तत्कालीन मनमोहन सरकार के मंत्री चिदंबरम के साथ मिलकर, जो आरोप आप पर आईआरएस अधिकरी संजय श्रीवास्तव ने लगाए, जो नोटिस तमाम सरकारी एजेंसीज ने समय समय पर आपको भेजी, उस पर आपकी सफाई क्या है?

एनडीटीवी और प्रणय राय के ऐसे तमाम फ्राड को लेकर आपने अपने यहां कुछ नहीं लिखा और न दिखाया, केवल गोलमोल सफाई देते रहे, जैसे आज दिया है. आपने इन मुद्दों पर अपने चैनल पर प्राइम टाइम डिबेट में न तो निधि राजदान को आगे किया और न रवीश कुमार को. ये लोग दुनिया भर के ढेर सारे मुद्दों पर बहस करते रहे, केवल एनडीटीवी-प्रणय राय के फ्राड को छोड़कर. आपको इन मुद्दों पर भी खुलकर लिखना दिखाना चाहिए था क्योंकि मीडिया तो सबकी और अपनी भी आलोचना करने के लिए जाना माना जाता है. पर आप ऐसा नहीं करेंगे न करने वाले हैं क्योंकि आप एड़ा बनकर पेड़ा खा रहे थे.

आप विचारधारा और पार्टीबाजी के आधार पर खुद को शहीद दिखाकर लाभ लेना चाह रहे थे और ले रहे हैं और लेंगे भी.

पर हम जैसे लोग जो मीडिया को बहुत नजदीक से देख रहे हैं, और जानते हैं कि यहां सिर्फ और सिर्फ लूट और कालाबाजारी है, सरोकार विचार संवेदना जैसी बातें सिर्फ दिखाने कहने वाली चीजें होती हैं, वो ये ठीक से समझते मानते हैं कि आप को ही नहीं, बल्कि इस समय के सारे कथित मुख्य धारा और संपूर्ण कारपोरेट मीडिया के मालिकों को सरेआम सूली पर चढ़ा देना चाहिए. वजह ये कि असल जीवन में आप सब लोग उतने ही बड़े चोट्टे हैं, जितने किसी दूसरे फील्ड के चोट्टे. आप थोड़े कम ज्यादा चोट्टे हो सकते हैं और लेकिन हैं चोट्टे ही.

आपको यह जानना चाहिए कि जिस लोकतंत्र की दुहाई देकर आप बार बार अपना बचाव कर रहे हैं, उसी लोकतंत्र ने जिन्हें चुनकर भेजा है, वो आपसे अपना हिसाब ले रहे हैं, लेकिन उन्हीं चीजों का, जो आपने गलत किया है और उनके हाथों में एक्शन लेने के लिए सौंप दिया है. ये घपले घोटाले आजकल के नहीं, बरसों पुराने है. आपने इन्हें साधने, पटाने की भी कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए. आपकी ढेर सारी फाइलें पीएमओ में पड़ी हैं जो आपकी काली कहानी बांय बांय करके बता रही हैं.

जो आपने काला किया है, जो आपने फ्राड किया है, वो आपका ही है. ऐसे लोग भुगतते तो जरूर हैं, कोई देर तो कोई सबेर. कोई इस सरकार के आने पर तो कोई उस सरकार के आने पर. अब तो घपले घोटाले भी पार्टियां के संरक्षण में होता है इसलिए पार्टियां बदलते ही घपले घोटालेबाजों के चेहरे भी बदलने लगते हैं.

मेरी संवेदना आपके साथ है क्योंकि आप फिलहाल पीड़ित हैं और हम लोग पीड़ितों के साथ रहते हैं, भले ही वो चोर हो. लेकिन आप पर अत्याचार के खिलाफ जो मोर्चा निकलेगा, उसमें मैं कतई शरीक नहीं हूंगा. मेरी सदिच्छा आपके साथ कतई नहीं है क्योंकि आपके फ्राड हैं. मीडिया के चोरों को मैं नजदीक से जानता हूं, इसलिए आपके साथ तो कतई नहीं खड़ा रहूंगा.

माफ करिएगा, बड़े लोग, खासकर मीडिया के, अपनी चोरी और फ्राड को बड़े आराम से वैचारिक ताने बाने के जरिए ढंक तोप लेते हैं. मैं ऐसे लोगों को अब कतई सपोर्ट नहीं करता. मुझे न तो आपका साथ चाहिए और न आपके लोगों का. हां, ये भी जानता हूं कि आप आत्ममुग्ध लोग पीड़ित पत्रकारों का न कभी साथ दिए न देंगे. खुद आपके यहां के दर्जनों लोग बिना वजह निकाले गए और प्रताड़ित जीवन जीने को मजबूर किए गए. आप अपनी समृ्द्धि, संबंध और साम्राज्य में मस्त रहे. इसलिए आपको एक्सपोज होते हुए देखकर, आप पर एक्शन होते हुए देखकर, मुझे दिल से आनंद आ रहा है.

ऐसे दौर में जब राजनीति पूरी तरह भ्रष्टतम हो गई है, ऐसे दौर में जब राजनीति सिर्फ अपनी जनता का खून पीने का माध्यम बन गई है, मैं किसी को नहीं कहूंगा कि वह राजनीति या मीडिया जनित उत्तेजना का हिस्सा बने, किसी मोर्चे या मार्च का हिस्सा बने. ये सब आपका टाइम और धन वेस्ट करने का तरीका है.

फिलहाल तो आज का दिन मेरे लिए चीयर्स वाला है… आपके यहां छापा पड़ा, चाहें जिस बहाने से भी, मुझे सुकून पहुंचा है. मुझे खुशी है कि आज आईआरएस अफसर एसके श्रीवास्तव भी खुश होंगे जिन्हें आप लोगों ने पागलखाने भिजवाकर अपने फ्राड चोट्टई को ढंकने की कोशिश की थी.

भड़ास के आठवें स्थापना दिवस पर जब आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने एनडीटीवी के प्रणय राय और तत्कालीन वित्त व गृह मंत्री चिदंबरम द्वारा अपने घोटाले चोरकटई को ढंकने के लिए उन्हें जेल भिजवाने की कथा सुनाई तो मेरी ही नहीं, वहां मौजूद सारे लोगों के रोएं खड़े हो गए और एक झुरझुरी तैर गई शरीर में.

ये दौर मान्य संस्थाओं को नष्ट किए जाने का है, तो आपको भी नष्ट होना है क्योंकि आप महा चोरकट लोग हो. हां, सुपर चोरकटों से कुछ कम, कुछ बाएं, कुछ नीचे. तो आप लोग अपनी लड़ाई लड़ें. आपका अंजाम देखना मुझे अच्छा लगेगा.

चीयर्स.
यशवंत

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संबित पात्रा को शो से बाहर निकालने का मजा एनडीटीवी को तो चखाना ही था!

Shrikant Asthana : सत्तारूढ़ दल के बड़बोले प्रवक्ता को कार्यक्रम से बाहर करने पर सरकारी तंत्र को एनडीटीवी को मजा तो चखाना ही था। प्रणव राॅय ने अगर कोई गड़बड़ न की हो तो भी परेशान तो किए ही जा सकते हैं। मीडिया हाउस चला रहे हैं तो इतने के लिए तैयार रहना भी चाहिए।

Priyabhanshu Ranjan : Zee News वाले सुधीर चौधरी और उसके मालिक सुभाष चंद्रा पर कोयला घोटाले की खबर दबाने की एवज में नवीन जिंदल से 100 करोड़ रुपए की रिश्वत मांगने के मामले में केस चल रहा है। चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। क्या मोदी राज में निष्पक्ष फैसला आने की उम्मीद है? इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा, उनकी पत्नी और चैनल की एक बड़ी अफसर पर एक महिला एंकर ने ‘शोषण’ का आरोप लगाया था। मोदी राज में मामला दब क्यों गया? दैनिक जागरण ने अपने पत्रकारों और गैर-पत्रकारों को वेज बोर्ड की सिफारिशों का लाभ न देकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाया है। मोदी सरकार ने अखबार पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? लेबल कमिश्नर ने छापेमारी क्यों नहीं की? सारे कानून NDTV के लिए हैं? क्योंकि वो बाकियों की तुलना में ठीक-ठाक पत्रकारिता करता है?

Dinesh Choudhary : अब और किसका इंतज़ार है? हर असहमति को सख्ती से कुचला जाएगा। लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले भारत के तमाम राजनीतिक दल, जन संगठन, मजदूर संगठन, बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार, पत्रकारों को एक साझा मोर्चा खोलना चाहिए। तेजी से फिसलते हुए समय में सम्भवतः यह आखिरी मौका हो!

Vikram Singh Chauhan : नरेंद्र मोदी देश के साथ बहुत गलत कर रहे हैं। देश की जनता ने उन्हें चुनावी जनमत लोगों से ,मीडिया से बदला लेने नहीं दिया था। सत्ता के अहंकार में मोदी देश के एकमात्र निष्पक्ष न्यूज़ चैनल एनडीटीवी को दबाने की कई बार कोशिश कर चुके है। ठीक उसी तरह से जैसे अरविंद केजरीवाल के खिलाफ हर तीसरे दिन सीबीआई को मैदान में लाया जाता है। कथित संवेदनशील कॉन्टेंट मामले में एक दिन के लिए एनडीटीवी को बैन करने का मामला हो ,प्रवर्तन निदेशालय द्वारा फेमा प्रावधानों का उल्लंघन करने को लेकर एनडीटीवी के खिलाफ 2,030 करोड़ रुपए का नोटिस जारी करने का मामला हो या वर्तमान में एक निजी बैंक आईसीआईसीआई को कथित तौर पर 48 करोड़ का नुकसान पहुँचाने का मामला हो इसमें से किसी आरोपों में दम नहीं है। निजी बैंक ने भी इस मामले में सरकार से कोई जाँच नहीं चाही थी। मोदी की सीबीआई स्वतः इस मामले को अपने हाथ में ले ली। जबकि देश के लाखों करोड़ों लेकर भागे लोग भारत -पाकिस्तान मैच का लुत्फ़ उठा रहे हैं। वे देशभक्त बन गए है। मोदी ने देश में ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जिसकी तुलना हम आपातकाल से कर सकते है। एक सड़क छाप प्रवक्ता के घमंड के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ढहाने की कोशिश करने वाला भी वह पहला प्रधानमंत्री है। चलो मान लेते है एनडीटीवी आपका गुणगान नहीं करती। लेकिन एनडीटीवी बेसिर पैर न्यूज़ भी तो नहीं देती। यह समाचार माध्यम उन न्यूज़ को दिखा रहा है ,उन मुद्दों को उठा रहा है जिसे वाकई उठाने की जरूरत है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को हमेशा सत्ता के विरोध में होना चाहिए। एनडीटीवी के पास ज़ी न्यूज़ और इंडिया टीवी की तरह मिसाइल नहीं है जो वे स्टुडिओ से रोज पाकिस्तान के ऊपर फेंक कर खुद को देशभक्त चैनल साबित कर सके। एनडीटीवी के पास गोबर ,गोमूत्र के चमत्कारी गुणों का फार्मूला भी नहीं है जिसे दिखाकर वे टीआरपी के रेस में आगे बने रहे। एनडीटीवी के संवाददाता बीफ की खोज में मुस्लिमों के घरों के फ्रिज भी नहीं झांकती। कितना गलत करते है ये लोग ,एनडीटीवी वालों को पत्रकारिता ही नहीं आती। एनडीटीवी वालों को पैनल में भाजपाई प्रवक्ता बैठने के बावजूद भाजपाई एंकर की भूमिका निभानी चाहिए तब होगी असली पत्रकारिता ,मोदी की पसंद की पत्रकारिता!

सौजन्य : फेसबुक

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एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय के घर पर इनकम टैक्स छापा

एक बड़ी खबर एनडीटीवी ग्रुप से आ रही है. चैनल के मालिक प्रणय राय के ठिकानों पर इनकम टैक्स का छापा पड़ा है. सीबीआई ने इस बात की पुष्टि की है. इस बाबत समाचार एजेंसी एएनआई ने जो ट्विटर पर न्यूज फ्लैश जारी किया है उसमें कहा गया है कि प्रणय राय के दिल्ली स्थित घर पर इनकम टैक्स विभाग ने रेड किया है और इसकी पुष्टि केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई ने की है.

ज्ञात हो कि मोदी सरकार के निशाने पर एनडीटीवी मीडिया समूह शुरू से है. 2जी स्कैम के पैसे को चिदंबरम के साथ मिलकर ब्लैक से ह्वाइट करने के मामले में प्रणय राय इनकम टैक्स की जांच में आरोपी हैं. मनमोहन सरकार के कार्यकाल में आईआरएस अधिकारी एसके श्रीवास्तव ने अपनी जांच रिपोर्ट में इस स्कैम और इसमें चिदंबरम और प्रणय राय की मिलीभगत को लेकर सनसनीखेज खुलासा किया था जिसके बाद इस आईआरएस अधिकारी को तरह तरह से प्रताड़ित किया गया.


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मोदी सरकार बनने के बाद जांच आगे बढ़ी और कई नोटिस एनडीटीवी और अन्य को भेजे गए. अब इनकम टैक्स ने छापा डालकर इस मामले के कई पहलुओं की पड़ताल शुरू की है. यह भी कहा जाता है कि एनडीटीवी समूह मोदी सरकार को रास नहीं आता इस कारण भी इस ग्रुप के खिलाफ जांच को तेज किया गया है वहीं दूसरे मीडिया समूह जैसे जी ग्रुप और पंजाब केसरी आदि मोदी राज में सरकार की गुणगान में लगे हैं या फिर भाजपा से इनके मालिकान जुड़े हैं, इसलिए इन्हें हर तरह से खुली छूट दी गई है.

ताजा छापों के मामले में बताया जा रहा है कि यह प्रकरण बैंक लोन न चुकाने का है. आईसीआईसीआई बैंक का करोड़ों रुपये हड़पने के मामले को लेकर सीबीआई ने एनडीटीवी के मालिक प्रणय राय, राधिका राय, एक प्राइवेट कंपनी और अन्य के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है. दिल्ली, देहरादून समेत कई शहरों में एनडीटीवी और प्रणय राय के ठिकानों पर सीबीआई व इनकम टैक्स विभाग की छापेमारी जारी है.

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