

एनडीटीवी में हुए फेरबदल को लोग आज भी याद करते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आख़िर संजय पुगलिया जैसे वरिष्ठ और सम्मानित पत्रकार को क्यों साइडलाइन किया गया और कैसे अचानक राहुल कंवल शीर्ष पर पहुँच गए? क्या यह केवल प्रबंधन का फ़ैसला था या फिर किसी अंदरूनी रणनीति का हिस्सा?
संजय पुगलिया की छवि एक साफ़-सुथरे और स्वतंत्र पत्रकार की रही है, जिन्होंने दशकों की मेहनत से अपनी साख बनाई। उनसे कोई गंभीर गलती नहीं हुई थी। फिर भी उन्हें किनारे कर दिया गया। चर्चा यही बताती है कि भारतीय टीवी न्यूज मीडिया के न्यूज़रूम में एक ऐसा चेहरा था जिसने नेताओं की निकटता को ही सीढ़ी बना लिया था—और वह नाम था राहुल कंवल।
क्या कंवल की ताक़त उनकी पत्रकारिता थी? आलोचक मानते हैं—बिलकुल नहीं। उनकी असली ताक़त सत्ता के गलियारों में घूमना, नेताओं के करीब दिखना और हर मौके पर सहमति जताना रही है। यही वजह है कि उनकी छवि लगातार आलोचना के घेरे में रही। मीडिया जगत में यहाँ तक कहा जाता है कि “कंवल न्यूज़ से ज़्यादा राजनीति में दिखाई देते हैं।”
प्रबंधन को भी शायद यही संदेश दिया गया कि चैनल को नए दौर के लिए ऐसा चेहरा चाहिए जो सत्ता के साथ कदम मिलाकर चले। नतीजा सबके सामने है—पुगलिया हाशिये पर धकेल दिए गए और कंवल कुर्सी पर बैठ गए।
लोग इसे प्रमोशन नहीं बल्कि एक योजनाबद्ध रणनीति मानते हैं। वरिष्ठ पत्रकार को न्यूज़रूम से दूर कर सत्ता-हितैषी चेहरे को जगह दी गई। परंतु आलोचक मानते हैं कि इस पूरे खेल से राहुल कंवल की छवि मज़बूत नहीं हुई, बल्कि और कमजोर पड़ गई है। गंभीर पत्रकारिता की सूची में उनका नाम पीछे छूटता जा रहा है और उनकी पहचान सिर्फ़ सत्ता-निकट पत्रकार के रूप में बन रही है।
एनडीटीवी में आने के बाद राहुल कंवल दूसरे चैनलों से अपने करीबियों और शिष्यों को डबल ट्रिपल सैलरी पर लगातार लाकर भरते जा रहे हैं। इसका ख़ामियाज़ा एनडीटीवी के पुराने लोगों को उठाना पड़ रहा है। उनकी नौकरी बिना किसी गलती के जा रही है।
एनडीटीवी में इस व्यापक फेरबदल से एनडीटीवी का कितना कल्याण हुआ? जीरो! टीआरपी में एनडीटीवी बारहवें पायदान पर है। निर्मला सीतारमण जीएसटी चेंज के बाद सबसे पहले लाइव आजतक पर आती हैं। एनडीटीवी को सत्ता प्रतिष्ठान वाले भी नहीं पूछ रहे। वो कहावत है न- माया मिली न राम!
एनडीटीवी के एक पूर्व कर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित!
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Subodh
September 7, 2025 at 6:11 am
गलत उदाहरण दे रहें हैं आप, जब खुद ही कहा कि नए लोगों को ट्रिपल सैलरी पर भरा गया, तो कैसे कह सकते हैं न माया मिली न राम
Dinesh Taneja
September 8, 2025 at 8:14 am
May be Puglia ji was good journalist. In corporate it happens everyday since many decades. However this article is completely biased and aligned with an ideology only.
राजेश
September 8, 2025 at 9:33 am
देश मे पत्रकार बचे कहां हैं जो रविश जैसे ईमानदार हैं वो सरकार से लड़ रहे हैं जनता के मुद्दों के लिए और बाकी तलवे चाट रहे हैं सत्ता के ताकि मलाई मिल सके
और जिस चैनल में राहुल हैं ना उसके मालिक को साफ सुथरी छवि के नही हैं भरस्टाचार से चैनल को हतियाकर और करोड़ो की बेईमानी कर क्या हासिल किया आदनी ने सिर्फ ऐशो आराम और क्या ? जब आदनी जाएगा उसे भी चार कंधे ही चाहिए होंगे और वी भी लकडि पर ही जले गया पर जनता हमेशा आदनी को लूटरे और डाकू के नाम से ही याद रखेगी
राजेष
September 8, 2025 at 9:35 am
मेरे कमेंट को भले ही ना पब्लिश करे पर मॉडरेटर दिल मे खुश जरूर होगा
Mohan
September 8, 2025 at 3:00 pm
संजय पोखरिया की ओर से जो यह खत भड़ास में छुपाया गया है यह साफ है कि फुगलिया और उनकी जो टीम थी जो पूरी तरह से नाकाम थी उसका ही यह काम है संजय पुगलिया ने एनडीटीवी में आने के बाद केवल संतोष कुमार को सारी जिम्मेदारी दी और दलाली में लग गए पहले भी वह यही करते रहे चैनल पर संजय पुगलिया ने कोई काम नहीं किया कम से कम में एक शो तो कर सकते थे और जिस तरह तारीफ की गई है पत्रकारिता के पिछले 30 सालों में जिसमें उनका दौरा तो कोई मैंने उन्हें कभी भी कोई भी शो हिट करते नहीं देखा अगर किसी ने देखा हो तो बताएं केवल कॉर्पोरेट की जली के अलावा कुछ नहीं किया वामपंथ का जो गढ़ था यह उसी के उपज है