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उत्तर प्रदेश

अडानी समूह ने एनडीटीवी न्यूज़ चैनल से मुस्लिम पत्रकारों के सफाये का अभियान छेड़ा!

यशवंत सिंह-

एनडीटीवी का मालिकाना हक डॉ प्रणय रॉय से जब अडानी को चला गया तो सबसे पहले एनडीटीवी को अलविदा कहने वाले रवीश कुमार थे। उसके बाद संकेत उपाध्याय, सौरभ शुक्ला, सुनील सैनी के बाद मुम्बई से सोहित मिश्रा, परिमल कुमार, शरद शर्मा आदि नामों ने एनडीटीवी छोड़ दिया।

इसके अलावा सैकड़ो लोग जो एनडीटीवी में बरसों से काम करते थे उन्हें इतना मजबूर कर दिया गया कि या तो उन्होंने एनडीटीवी को छोड़ दिया या उन्हें निकाल दिया गया।

ऊपर लेवल पर बदलाव होता रहा। संजय पुगलिया की टीम ने एनडीटीवी को टेकओवर कर लिया। उसके बाद नई भर्ती शुरू हो गई। संजय पुगलिया अपनी नई टीम बनाने लगे। इसमे संतोष कुमार, गिरीश नायर के बाद सुमित अवस्थी भी आ गए। फिर एबीपी न्यूज़ के पुराने लोगों का एनडीटीवी में ज्वाइनिंग शुरू हो गया। इसमें एक नाम रणवीर सिंह का है जो एनडीटीवी उत्तर प्रदेश को हेड कर रहे हैं। उसके बाद पंकज झा ने भी एनडीटीवी ज्वाइन कर लिया।

जब मालिक बदलते हैं तो बड़े स्तर पर बदलाव होना स्वाभाविक होता है लेकिन यहां तो सबसे पहले उत्तर प्रदेश के जिलों में काम करने वाले पत्रकारों (खासकर मुस्लिम पत्रकारों) को ही टारगेट करना शुरू कर दिया गया। कई जूम मीटिंग में ये कहना शुरू कर दिया गया कि अब यह एनडीटीवी रविश कुमार और कमाल खान वाला एनडीटीवी नहीं है इसलिए उत्तर प्रदेश के जिलों में काम करने वाले पत्रकार अपने आप को बदलना शुरू कर दें। अगर नहीं बदले तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। जैसा कहा गया, वैसी ही शुरुआत भी हो गई।

एनडीटीवी यूपी के हेड रणवीर सिंह ने उन पुराने पत्रकारों को टारगेट करना शुरू कर दिया जो दो दशक से ज्यादा समय से एनडीटीवी में काम कर रहे थे और कमाल खान रवीश कुमार की टीम के अहम हिस्सा थे। छोटी-छोटी खबरों को लेकर उन्हें परेशान किया जाने लगा। उन पर इतना दबाव बनाना शुरू कर दिया गया कि वो एनडीटीवी को छोड़ने के लिए मजबूर हो गए और कुछ लोगों को खबरों का बहाना देकर हटा दिया गया। एनडीटीवी में ऐसा पहली बार हो रहा है जब जिले के रिपोर्टर्स को भी निशाना बनाया जा रहा है।

रणवीर सिंह जो कभी यूपी से एबीपी न्यूज का हिस्सा रहे, बाद में लल्लन टॉप का हिस्सा बने, यूपी का हेड बनकर एनडीटीवी के साथ सफर की शुरुआत की लेकिन जल्द ही वो अपनी पुरानी शैली और तानाशाही पर उतर आए और छोटी-छोटी खबरों को लेकर ग्रुप में जिले के संवाददाताओं के साथ बदतमीजी करने लगे। कई जिलों से जब एक्सीडेंट की खबरें ग्रुप में डाली गई तो रणवीर सिंह ने ग्रुप में लिखा कि तुम लोग बहुत लेट हो, मुख्यमंत्री के यहां से इस खबर पर संज्ञान ले लिया गया है। जब पूरी खबर ग्रुप में डाल दी गई तो वह खबर चली नहीं। रणवीर एनडीटीवी के पुराने पत्रकारों को टारगेट कर रहे थे। किसी भी तरह या तो वह छोड़ कर चले जाए या उनकी कमी निकालकर उन्हें हटा दिया जाए। रणबीर अपने मिशन में कामयाब होते नजर आ रहे हैं।

2013 से इलाहाबाद में एनडीटीवी के संवाददाता के तौर पर कार्य करने वाले नितिन गुप्ता पर रणवीर सिंह की पहली तानाशाही की गाज गिरी। 11 जनवरी 2024 को एक मामूली सी बात पर उनको आराम करने के लिए कह दिया गया। नितिन गुप्ता अपने पत्रकारिता के करियर को खत्म ना करने की विनती करते रहे, गिड़गिड़ाते रहे लेकिन तानाशाह पर इसका कोई असर ना पड़ा। उसने अपने पुराने साथी दीपक गम्भीर को नियुक्त कर दिया। नौकरी जाने की टेंशन की वजह से 15 दिन बाद नितिन गुप्ता को 25-26 जनवरी की रात में ब्रेन हेमरेज हो गया। 20 फरवरी को घर वापसी के बाद उसकी 6 साल की बेटी भी इस दुनियाँ को अलविदा कह गयी। नितिन गुप्ता पूरी तरह से टूट गए। जब उन्होंने अपनी पूरी कहानी दिल्ली में बैठे बड़े अधिकारियों से कही तो उन्होंने भी कोई मदद नहीं की। जब रणवीर सिंह और लखनऊ में कैमरामैन राजेश गुप्ता से उन्होंने अपने कई सालों के पैसे मांगे तो उन्हें काफी परेशान किया गया। क़रीब 4 लाख के बिल देने के बाद उन्हें सिर्फ़ 70 हज़ार रुपये मिले। नितिन गुप्ता आज भी अपनी बीमारी से जूझ रहे हैं और काफी दयनीय स्थिति में उनका परिवार ज़िंदगी बसर कर रहा है।

तानाशाह की दूसरी गाज फरवरी 2025 को हमीरपुर जिले से पिछले 20 सालों से एनडीटीवी के लिये काम कर रहे सलाउद्दीन पर गिरी। उनसे केवल एक न्यूज रिपोर्ट मिस हो गई थी। बिना कोई मौका दिये उन्हें भी बाहर कर दिया। वो इस घटना से सदमे में चले गए। टेंशन की वजह से उनको हार्टअटैक पड़ा। एक महीने बाद मार्च 2025 में उनकी मृत्यु हो गयी, लेकिन तानाशाह ने कोई दुख तक व्यक्त नही किया।

आगरा में पिछले 21 सालो से एनडीटीवी के साथ काम करने वाले जुझारू और आसपास के जिलो में अपनी ईमानदार औऱ निष्पक्ष पत्रकार के रूप में पहचान रखने वाले नसीम अहमद को एक एक्सीडेंट की ख़बर को लेकर टारगेट करना शुरू कर दिया गया। उन्हें ग्रुप में आराम करने की सलाह दी गई।

ये सिलसिला चलता रहा। आगरा में करणी सेना वाली खबर 1 मिनट लेट ग्रुप में डाली गई। इसको लेकर रणवीर सिंह नसीम अहमद से नाराज़ हो गए और उन्हें आराम करने की ग्रुप में सलाह तक दे डाली। इससे पहले भी वह नसीम अहमद को ग्रुप से हटा चुके थे लेकिन दिल्ली में बैठे बड़े अधिकारियों की वजह से उन्हें फिर से ग्रुप में शामिल करना पड़ा। नसीम अहमद रवीश कुमार कमल खान सुनील सैनी संकेत उपाध्याय और सौरभ शुक्ला के करीबी माने जाते थे जिसकी वजह से रणबीर नसीम अहमद को टारगेट पर लिए थे और लगातार खबरों को लेकर उन पर दबाव बनाया जाने लगा। इसकी वजह से नसीम अहमद ने 14 अप्रैल को एनडीटीवी को अलविदा कह दिया। आगरा में उनकी जगह रणवीर ने एबीपी के अपने पुराने साथी के कैमरामैन को रख लिया।

रणवीर सिंह विशेष समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों, जो कई दशकों से एनडीटीवी के लिए काम कर रहे थे, को टारगेट करते रहे। चित्रकूट जिले में 18 सालो से काम कर रहे परवेज अहमद को जलील करने के लिए एक ऐसी खबर जो एनडीटीवी के लेवल की नहीं थी, उसको लेकर ग्रुप में तमाशा खड़ा कर दिया और खबर ना बता पाने के कारण ग्रुप से बाहर बाहर कर दिया। मतलब उन्हें भी एनडीटीवी से हटा दिया गया।

उसके बाद मुरादाबाद के अनवर कमाल जो कई बार रणवीर के निशाने पर थे, ग्रुप में उन्हें कई बार खबरों को लेकर बेइज्जत किया गया। अनवर पिछले 18 साल से एनडीटीवी का हिस्सा बनकर ईमानदारी से काम कर रहे थे। उनका दोष यह था कि दो दिन पहले ग्रुप पर स्टोरी आइडिया भेजा लेकिन तानाशाह उस वक्त नींद में सोया था। जब दो दिन बाद दिल्ली से घन्टी बजी, तानाशाह ने अपनी खुन्नस भरी गाज गरीब संवाददाता पर गिरा दी। उन्हें 4 अप्रेल 2025 को एनडीटीवी से हटा दिया गया।

रणवीर सिंह का निशाना अब इटावा था। 21 साल से एनडीटीवी का हिस्सा रहे अरशद जमाल से पहले मैनपुरी कब्जा किया गया। वहां एक पत्रकार को नियुक्त कर दिया गया और उनसे इटावा में काम करने के लिए कहा गया। बेबाक पत्रकार अरशद जमाल को ग्रुप में छोटी-छोटी खबरों को लेकर टारगेट करना शुरू कर दिया गया। यही नहीं एक खबर को लेकर उन्हें ग्रुप से हटा दिया गया। बाद में कई दिन बाद फिर से ग्रुप में शामिल किया गया और हिदायत दी गई की खबरों पर ध्यान दें। अरशद जमाल रणवीर सिंह के टारगेट पर थे। एक दिन एक खबर को लेकर पुलिस की बाईट देर से भेजने पर उन्हें 4 अप्रैल को आराम करने की सलाह देते हुए एनडीटीवी से हटा दिया गया। जिस खबर पर उन्हें हटाया गया वह खबर एनडीटीवी पर कहीं चली तक नहीं। इटावा में उनकी जगह एक फेसबुकिया/यूटूबर पत्रकार की नियुक्ति कर दी गयी।

हटाये गये इन सारे रिपोर्टर्स का दोष सिर्फ इतना है कि ये सभी मरहूम कमाल खान द्वारा नियुक्त किये गए थे। ना कोई सुनवाई हुई ना कोई मौका दिया गया। यानि 20 20 साल तक सेवा देने वालो को चुटकी में बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इन लोगो को कई सालों से एकाउंट में पैसे तक नहीं भेजे गये। इनके अलावा पूरे यू पी के एनडीटीवी के पत्रकारो का बुरा हाल है। उनको भी सालो से मेहनताना नहीं मिला है। अब एक सेलेरी ऐप बनाया गया है जिसमे आपको 1 से 2 तारीख़ तक बिल सबमिट करना है! उसके बाद सबमिट करने पर आपको पैसा नहीं मिलेगा। ये ऐप भी 2 महीने पहले बनाया गया है। इसके बाद भी पैसे समय से नही मिल रहे हैं।


आगे की कहानी पढ़िए-

एनडीटीवी से हटाए गए इटावा संवाददाता अरशद जमाल की पीड़ा- “21 साल की निष्ठा का ऐसा इनाम!” https://www.bhadas4media.com/arshad-jamal-ki-peeda/


एनडीटीवी का पक्ष पढ़िए-

मुस्लिम पत्रकार सफाया प्रकरण पर एनडीटीवी का पक्ष पढ़िए! https://www.bhadas4media.com/muslim-safaya-ndtv-paksh/

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