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नए डिजिटल नियम जागरूक नागरिकों को सुप्रीम कोर्ट से संरक्षण और सुरक्षा मिलने की व्यवस्थाओं को कमजोर करेंगे!

निखिल पाहवा/अपार गुप्ता

पिछले एक महीने में कई इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को X (ट्विटर) या इंस्टाग्राम से यह सूचना मिली है कि उनके कुछ पोस्ट, यहाँ तक कि पूरे अकाउंट भी, सेंसर कर दिए गए हैं या ब्लॉक कर दिए गए हैं। लाखों फॉलोअर्स वाले फेसबुक पेज भी बंद कर दिए गए हैं। यह सिर्फ उपयोगकर्ताओं तक सीमित नहीं है। ऐप बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सेवा सुपाबेस (Supabase) को भी भारत में बिना किसी सूचना के ब्लॉक कर दिया गया, जिसे बाद में डेवलपर्स की शिकायत के बाद ही बहाल किया गया। लेकिन यह सब हो क्यों रहा है?

मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला दिया था, जो भारत में ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की नींव माना जाता है। श्रेय सिंघल बनाम भारत संघ मामले में कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66A को रद्द कर दिया था, जिसका इस्तेमाल फेसबुक पोस्ट के लिए लोगों को जेल भेजने में होता था। लेकिन इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बात हुई, जिस पर कम ध्यान दिया जाता है। कोर्ट ने धारा 79 के तहत “सेफ हार्बर” प्रावधान को मजबूत किया, जो प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स द्वारा डाले गए कंटेंट के लिए जिम्मेदारी से बचाता है। इससे पहले इस प्रावधान की अस्पष्टता का फायदा उठाकर प्लेटफॉर्म्स पर दबाव डाला जाता था कि वे वैध कंटेंट भी हटा दें।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 69A के तहत ब्लॉकिंग की शक्तियों को भी बरकरार रखा, लेकिन इसके साथ कुछ संरचनात्मक सुरक्षा उपाय भी तय किए: लिखित कारण देना, आदेश किसी संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा जारी होना, और समीक्षा समिति द्वारा जांच। सबसे महत्वपूर्ण, प्रभावित उपयोगकर्ता को (यदि पहचान संभव हो) सूचित किया जाना चाहिए और उसे सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन पिछले 11 वर्षों में ये सुरक्षा व्यवस्थाएँ धीरे-धीरे खत्म होती गई हैं और एक डिजिटल सेंसरशिप तंत्र विकसित हो गया है।

पहला, 2021 में आईटी नियमों में संशोधन कर धारा 79 के दायरे को बढ़ा दिया गया, जिससे डिजिटल न्यूज आउटलेट्स भी इसके तहत आ गए, जबकि यह उनके लिए बना ही नहीं था। दो हाई कोर्ट द्वारा इन प्रावधानों पर रोक के बावजूद सरकार ने नोटिफिकेशन और प्रशासनिक तरीकों से इन्हें लागू किया।

दूसरा, गृह मंत्रालय का “सहयोग पोर्टल” बिना संसदीय मंजूरी के एक हॉटलाइन की तरह काम करता है, जिसके जरिए धारा 79 के तहत प्लेटफॉर्म्स को कंटेंट हटाने के आदेश दिए जाते हैं। इसमें 33 राज्य, 7 केंद्रीय एजेंसियाँ और 72 कंपनियाँ शामिल हैं। उपयोगकर्ताओं को न तो सूचना मिलती है और न ही आदेश की प्रति। X (ट्विटर) ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया कि 2025 के पहले छह महीनों में उसे 29,118 ऐसे अनुरोध मिले, यानी लगभग 160 रोज़। इतनी संख्या में कोई भी प्लेटफॉर्म कानूनी वैधता की जांच नहीं कर सकता और अंततः डिफॉल्ट रूप से सेंसरशिप लागू हो जाती है।

तीसरा, फरवरी 2026 में आईटी नियमों में संशोधन कर ब्लॉकिंग आदेशों के अनुपालन की समयसीमा 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दी गई, जो दुनिया में सबसे कम है। खबरें हैं कि इसे और घटाकर 1 घंटा किया जा सकता है। यह सभी तरह की अभिव्यक्ति पर लागू होगा, जिसमें व्यंग्य, पत्रकारिता और राजनीतिक आलोचना भी शामिल हैं।

चौथा, इस ढांचे का विस्तार किया गया है। अब अधिक सरकारी एजेंसियों को धारा 69A के तहत कंटेंट ब्लॉक करने की शक्ति मिल गई है। प्रस्तावित संशोधन के तहत सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को निगरानी का अधिकार बढ़ाया जाएगा और आम यूजर्स को भी “पब्लिशर” की श्रेणी में लाया जा सकता है। यह 2024 के ड्राफ्ट ब्रॉडकास्टिंग बिल जैसा ही है, जिसे भारी आलोचना के बाद वापस लेना पड़ा था।

पाँचवाँ, धारा 70B, 69 और 75 का उपयोग अलग-अलग सरकारी एजेंसियों द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से व्यापक यूजर डेटा मांगने के लिए किया जा रहा है, बिना पर्याप्त कानूनी आधार या निगरानी के। इससे वैध अभिव्यक्ति भी आत्म-सेंसरशिप का शिकार होगी।

छठा, नियामक बदलाव तेज़ी से हो रहे हैं। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) कानून कार्यपालिका को व्यापक नियम बनाने की शक्ति देता है। आईटी नियम 2021 से हर साल बदले जा रहे हैं। 2024 में सरकार की फैक्ट चेक यूनिट को बॉम्बे हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया, लेकिन इतनी तेजी से नए नियम आते हैं कि न्यायिक समीक्षा पीछे छूट जाती है।

नतीजा:

सेंसरशिप की शक्ति विकेंद्रीकृत हो गई है, लेकिन आदेशों का क्रियान्वयन एक केंद्रीकृत पोर्टल के जरिए होता है। पैमाना बढ़ गया है और समयसीमा घट गई है, जिससे कानूनी समीक्षा की गुंजाइश कम हो गई है। भारत में बाजार तक पहुँच बनाए रखने के लिए प्लेटफॉर्म्स इन आदेशों का पालन करते हैं। जिन नागरिकों की अभिव्यक्ति पर रोक लगती है, उन्हें न सूचना मिलती है, न सुनवाई का मौका, और न ही सरकार या प्लेटफॉर्म जवाबदेह होते हैं।

अगर हम नहीं चाहते कि यह सेंसरशिप स्थायी ढांचा बन जाए, तो अब चेतावनी देने का समय है।


आपके एक पोस्ट के पीछे कितनी सरकारें, कितनी एजेंसियाँ पीछे पड़ सकती हैं? उपरोक्त आर्टकिल को पढ़िए और फिर सबको बोलिए। नया आई टी रूल सोशल मीडिया पर लिखना बोलना असंभव कर देगा। -रवीश कुमार

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