राजशेखर पन्त–
कोई पैंतीस-चालिस बरस पहले की बात होगी-हमारे एक करीबी, जो ज़िंदगी को इपीक्यूरिन अंदाज़ में जीने के कायल थे, हमारे घर आये हुए थे। वो 31 दिसंबर की शाम थी; डूबते सूरज की धुंधलाती रौशनी में सामने की पहाड़ी की रिज पर उग आए चीड़ के पेड़ों की कतार का सिलुएट एक कारवाँ की तरह लग रहा था -जैसे बीतता हुआ साल अपना सब कुछ समेट कर जाने की हड़बड़ाहट में हो।
मैं अपने कुछ हमउम्र भाई-बहिनों के साथ, जो कि इत्तफ़ाकन उन दिनों घर आये हुए थे, अपने भीमताल स्थित पुराने मकान की दूसरी मंजिल पर बनी खिड़की से इस खूबसूरत नज़ारे के दीदार में मशगूल था। तभी वह इपीक्यूरिन अंदाज़ वाले आगन्तुक उस कमरे में आये और मायूस सी आवाज़ में मेरी निगाहों का पीछा करते हुए कहने लगे-
31 दिसंबर की शाम है ये, कितनी मनहूसियत है यहां, ज़िंदगी का मज़ा तो यार बस किच्छा के पुल से नीचे ही है…। हमारी पहाड़ी बसाहट की तराई में बसा एक कस्बा है किच्छा, जहां पर बने एक पुल से दिल्ली, लखनऊ जैसे महानगरों की ओर जाने वाले हाइवे गुजरते हैं।
अटपटी सी लगी थी मुझे उनकी यह बात तब। एक आम मध्यमवर्गीय की तरह हमारे लिए उन दिनों 31 दिसंबर का मतलब सामान्य से कुछ हट कर बना खाना परिवार के सभी सदस्यों के साथ रसोई में न खा कर उस बड़े कमरे में खाना हुआ करता था जिसमें टीवी लगा हुआ था। उस दिन दूरदर्शन पर आने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों का इंतज़ार हफ़्ता भर पहले से शुरू हो जाया करता था। शाम के वक्त हमउम्र साथियों से होने वाली मुलाकातों में इस तरह की जानकारियों को बाकायदा शेयर किया जाता था -कि इस बार शैल चतुर्वेदी की कविताएं या फिर फलां-फलां शख़्सियत का मैजिक शो है।
शाम से ही बाहर आँगन में जलायी गयी लकड़ियों के कोयलों को एक अंगीठी में, जिसे सग्गड़ कहा जाता था, सहेज कर कमरे में रख, उसके चारों ओर गुड़ी-मुड़ी हो कर बैठ, काले नमक या गुड़ के साथ मूंगफली टूँगते हुए टीवी के सामने बैठे-बैठे उस दिन दस-साढ़े दस जल्दी ही बज जाया करते थे। इस बीच जब हम माँ के साथ खाने के बर्तनों को उठा कर रसोईघर तक पहुँचाते, पिताजी टीवी की नॉब को घुमा कर उसका शटर बंद करने के बाद उसे एक करीने से काढ़े गये मेज़पोश से ढक रहे होते थे।
रात के 12 बजे तक जाग कर जाते हुए साल को बत्तियां बुझा कर बाय करने और फिर तेज़ रौशनी और धमाकेदार गाजे-बाजे के साथ नये साल को हाय कहने की हॉलिया रवायत से हम जैसे लोग अनजान थे तब। परिवार के सभी सदस्य घर पर ही साथ मिल-बैठ कर कुछ अच्छा पका-खा लेते थे, और दूरदर्शन के प्रोग्राम देखते हुए एक खुशनुमा शाम बीत जाती थी।
चीड़ के पेड़ों के सिलुएट में अपना सब कुछ समेट कर विदा लेते साल का कारवाँ अब नहीं दिखायी देता। नए साल के जश्न को बेचने वाले बहुत से होटल-रिसॉर्ट्स उग आए हैं अब सामने वाली पहाड़ी पर। वहां रौशनी की चकाचौंध है, विस्फोटक संगीत का शोरगुल है, खाने और फेंकने के लिए बहुत सी देसी-विदेशी डिशेस तथा और भी बहुत कुछ है। न्यू इयर्स ईव के धमाकेदार सैलिब्रेशन का सपना संजोये पहाड़ चढ़ने वाले सैलिब्रेटर्स की लंबी लंबी गाड़ियों का काफ़िला क्रिसमस के बाद से ही जारी है। उत्साह, उमंग और उत्सव घर की चौखट लाँघ कर बाज़ार तक पहुंच गए हैं अब।
नए साल की नई सुबह अब हैंगओवर से शुरू होती है। खुशियों की तलाश में घर से बाहर गए लोगों के पास तो ख़ैर इसकी वाजिब वज़ह होती है, घर में छूटे बुजुर्ग कुछ और नहीं तो गुजरे सालों की जुगाली कर के ही खुश हो लेते हैं। ज़िंदगी के मज़े अब वाकई किच्छा के पुल से ऊपर चढ़ने लगे हैं।
संपर्क- बद्री भवन, साकेत.. भीमताल, नैनीताल उत्तराखंड 263136- ph: 9412100304 मेल- [email protected]



विजय बिष्ट
March 22, 2026 at 5:57 pm
अत्यंत सुंदर और भावनात्मक लेख। आपके शब्दों की सहजता पाठक की आँखों के सामने जीवंत दृश्य रच देती है। उस समय की यादें ताज़ा हो गई, हार्दिक बधाई!
वैसे ये दो पंक्तियां भी बहुत कुछ कह गई-
“उत्साह, उमंग और उत्सव घर की चौखट लाँघ कर बाज़ार तक पहुंच गए हैं…”
“घर में छूटे बुजुर्ग कुछ और नहीं तो गुजरे सालों की जुगाली कर के ही खुश हो लेते हैं।”
सादर